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सारकेगुड़ा से लेकर नुलकातोंग तक :  सलवा जुडूम से नरसंहार तक :   क्रूरतम विस्थापन, संवैधानिक प्रतिरोध : उत्तम कुमार, संपादक दक्षिण कोसल.

3.09.2018

केन्द्र सरकार और खनिज धनी राज्यों के बीच, इस्पात निर्माताओं और आयरन ओर खनिजों और निर्यातकों के बीच अढ़ाई साल की खींचतान के बाद अप्रैल 2008 के पूर्वार्ध में भारत ने एक नई राष्ट्रीय खनिज नीति की घोषणा की। जिसमें निजी स्वामित्व वाले, बड़े पैमाने के मशीनीकृत खनन को प्रोत्साहित करेगी। जिसमें बहुराष्ट्रीय कंपनियों के स्वामित्व को भी स्वीकारा है। भारत में खनन केवल खनिज संपदा और साधारण रूप से ‘खोदो और बेचो’ का मामला नहीं है, बल्कि यह आदिवासियों और पिछड़ी जातियों का और उन्हें जमीन और जीविका से अलग किए जाने का मामला भी है। यह अस्मिता, गरीबी, पिछड़ेपन और नक्सलवाद जैसे समस्याओं से भी संबंधित है। यह अवनीकरण और जैव विविधता पर प्रभाव, जल सुरक्षा और प्रदूषण से भी संबंधित है।

जब हम राजनांदगांव से निकले सूर्य ढल चुका था। बगदई-पैरी नदी को पारकर हम आगे बढ़ रहे थे। रात में रास्तों में प्रकाश व्यवस्था के न होने से हमारा चालक सडक़ में चिन्हित रेडियम की निशान को देखकर आगे बढ़ रहा था। राजनांदगांव से 59 किमी की दूरी में कौड़ीकसा गांव मिला। जहां की पानी में आर्सेनिक मिला हुआ है। बच्चे अपाहिज हो रहे है। कौड़ीकसा से 12 किमी में बोदाल माईंस है। जहां उच्चश्रेणी के यूरेनियम निकाला जाता था। जिसे बाद में बंद कर दिया गया। काम बंद होने से कर्मचारी आंध्रप्रदेश व महाराष्ट्र में काम के लिए चले गए। उसके बाद 75 किमी की दूरी को पारकर हम मोहला-मानपुर के लिए निकल पड़ते है। जहां पानाबरस नदी के पास आईटीबीटी का केम्प हमें मिलता है। दमकसा, कलडबरी, कहगांव, इरागांव का क्षेत्र वनों से आच्छादित है। पूरा क्षेत्र सेंधा, कटरा, बीजा, महुआ, सागौन व तेंदू के वृक्षों से आच्छादित है। संबलपुर में खूब बारिश होने से सडक़ डूब चुका था। कभी-कभी वाहन का लाइट बंद हो जाता था। लेकिन चालक की होशियारी से गाड़ी आगे निकल जाती थी।

 

रात को 12 बजे हम भानुप्रतापपुर पहुंचे पुलिस की बैरियर में हमें रोका गया। पूछताछ के बाद हमें छोड़ा गया। कोरर, मरकाटोला, धनेली, कन्हार में हमें बस स्टैंड मिला। लोग नींद में मस्त थे। भानुप्रतापपुर से 50 किमी पर कांकेर मिलता है। जहां हमें माकड़ी ढाबा मिला। आदिवासियों के जमीन को खरीदकर 1961 में इस ढाबा का निर्माण किया गया है। 170 (ख) भू-राजस्व संहिता के तहत आदिवासियों ने इसका विरोध किया था। इसी कांकेर में नक्सलियों से निपटने के लिए 22 करोड़ की लागत से जंगल वारफेयर कालेज का स्थापना किया गया है। यहां अमेरिका भारत के सैन्य कार्यवाहियों में अपना हाथ बटा रहा है। जहां भी हमें ब्रेकर मिलता, हमें समझ आ जाता था कि कोई न कोई गांव आ चुका है। तेज बारिश के कारण हमें आगे बढऩे में परेशानी हो रही थी। केशकाल व हेडक़ू में ट्रकें जंगल में दुर्घटनाग्रस्त होकर फंसी पड़ी थी। सडक़ के किनारे लोग शौच के लिए जाते हुए दिखे। जिस अनुपात में लोगों के हाथों में मोबाइल आ गया है। शौच की व्यवस्था आज भी गांवों में नगण्य है। आधी रात को हम केशकाल की दुर्गम घाटी में पहुंचते है। 16 मोढ़ों से युक्त इस घाटी को चट्टानों को काटकर तैयार किया गया है।

 

हमने देखा की कई बदहवाश गाडिय़ां इस 6 से 7 किमी लंबी घाटी के दिवारों को ढहा दिया था। केशकाल से कोंडागांव 57 किमी व जगदलपुर 130 किमी की दूरी पर स्थित है। जगदलपुर से 22 किमी पहले हमें बस्तर गांव मिलता है। ऐतिहासिक दृष्टिकोण से यह छोटा-सा गांव दक्षिण छत्तीसगढ़ की दिल की तरह है। हम सभी इस सुदूर क्षेत्र को भले ही विभिन्न नामों से पुकारे लेकिन इस अमीर भू-भाग को आज भी बस्तर कहकर पुकारा जाता है। रायपुर से निकलने वाली रोड को आज भी बस्तर रोड के नाम से जाना जाता है। इन आदिम गांवों में शहर का हिस्सा लगभग सुरक्षित है। जहां बिजली है, पानी है, सडक़ है। केशकाल, कोंडागांव, जगदलपुर शहर बस्तर की आदिवासी अंचल को शहर के रूप में तब्दील करती नजर आ रही थी। सभी आदिवासी नगरों में पुलिस थाना का निर्माण अनिवार्य रूप से हुआ है। दूसरे दिन हम जगदलपुर में ठेले-खोमचों में आदिवासियों को चाय की चुस्की लेते हुए देखे। यहां का आदिवासी कामकाज की तलाश में अब शहर की ओर पलायन कर रहे हैं। कई लोगों को अपने गणतव्य स्थानों की ओर कूच करने के लिए गाडिय़ों का इंतजार करते देखें।

 

जगदलपुर के दिवारों में 15 नवम्बर को एम्बस की आदिवासी सरकार स्थापना अभियान की 70 से 100 फीट लंबी वालराइटिंग लोगों को पढऩे मजबूर कर रही थी। जो नीले स्याही से लिखा गया था। पेंटर दिलीप चौहान ने हमें बताया कि ये दिवार लेखन बारिश के पानी में नहीं धुलता है। इसके स्याही के साथ फेवीकोल को घोला जाता है। शहर में रेशमबोर्ड व आकाशवाणी की गगनचुंबी टावर को आसमान की ओर सिर उठाते देख रहे थे। एक हजार किलोमीटर की इन आदिवासी सडक़ों में माईलस्टोन के साथ माईलबोर्ड लगाया गया है। 4 फीट चौड़ी व 5 फीट लंबी इन दूरीनामा बोर्ड को केन्द्रीय वित्तीय सहायता से निर्माण किया गया है। मैंने देखा कि इन बोर्डों को मात्र शहरी लोग ही दूरी व स्थान देखने में उपयोग में लाते है। अंदर के आदिवासी आज भी दिशाओं की गणना सूर्य, चंद्रमा की स्थिति, पेड़-पौधों, पहाड़ की ऊंचाई व जमीन की उतार-चढ़ाव को दिशासूचक के रूप में उपयोग में लाते है। पहट से ही छोटे-छोटे बसों का आना-जाना शुरू हो गया था। आदिवासी महिलाएं सिर पर भोजन की टोकरियां रखकर बड़े भूपतियों, सेठ व साहूकारों के घरों में धान की रूपाई के लिए जा रही थी। यहां 800 मिमी से 1700 मिमी तक वार्षिक वर्षा होती है। यहां का कृषि मानसून पर निर्भर करता है। अधिकांश आदिवासी खेती करते है।

 

आज भी अंदर के इलाकों में लंगोटी पर जीवन बिताने वाला आदिवासी अपनी जीविका सल्फी पीकर व पेंदा खेती कर जीवन गुजार रहे है। यह क्षेत्र खनिज, पेड़ व वन सम्पदा से परिपूर्ण है। लेकिन जगदलपुर के बाद विकास आदिम युग की ओर हमें ले जाता है। केशलूर, तोकापाल, एरण्डवाल, गीदम, बारसूर, बड़े अरापुर, कावलीभटा, डिलमिली, तिरथम व कोड़ेनार की जमीन फख लाल नजर आता है। जगदलपुर से आगे सडक़ को बॉर्डर रोड आर्गेनाईजर (बीआरओ) की 108 आरसीसी एचआरके टुकड़ी ने बनाई है। कहा जाता है सैनिक साजो-सामान से लेकर दैनिक उपयोग की सारी चीजें गांव तक पहुंचती है लेकिन आदिवासी आज भी बुनियादी सुविधाओं से कोसों दूर जीवन व्यतीत कर रहे है। इन क्षेत्रों में बिजली नहीं है। बीजेपी सरकार ने दोबारा सत्ता में आने के बाद सबसे पहला नोटिफिकेशन छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत बोर्ड का विखंडन कर उसे 5 विभिन्न कंपनियों में विभाजित किया। कर्मचारियों और इंजीनियरों के संगठनों ने इसका प्रतिरोध किया। सरकार के इस कदम को परोक्ष रूप से निजीकरण के रूप में देखा जा रहा है। विदेशी कंपनियों का दावा है कि छत्तीसगढ़ देश में सबसे सस्ती बिजली का उत्पादन करता है। इसमें अधिग्रहण की गलाकाटू प्रतिद्वंद्वता बढ़ेगी।

 

इससे बोर्ड उत्पादन से बाहर आ जाएगी। इसका प्रभाव हमें आज बस्तर में देखने को मिलता है। ग्रामीण विद्युतिकरण की उपेक्षा हो रही है। जहां बिजली है। वहां 2-2 मिनटों में बिजली गुल होती है और दोबारा वापस आती है। बिजली बोर्ड को अपने कब्जे में लेने के लिए डेवलेपर इंडियाबुल्स पॉवर जनरेशन लिमिटेड की अहम भूमिका है। वह 26 फीसदी हिस्सेदारी के लिए अपना कदम इस क्षेत्र में रख रही है। राज्य का सारा कोल ब्लॉक उनके नाम से आबंटित है। जिंदल द्वारा सस्ते बिजली का उपयोग सभी जानते है। यहां पर महिला आदिवासी भी हल चलाती है। तोकापाल में सलवा जुडूम केम्प के मजबूर लोग पूरे परिवार के साथ खेत को जोतने जुटे हुए थे। नेलसनार, हेमलपारा, बोदली, ताकीलोड़, बेलचर, माटवाड़ा, जांगला, बरदेला, जैवारम, निगाचल, नेमेड़, मुसालूर, धनोरा, मांझीगुड़ा का यह क्षेत्र 50 किमी के परिधि के अंतर्गत आता है। पूरा सडक़ बस्तर की बदहाली की कहानी बया करती है। इस कहानी को समझने जून 2005 की तारीख में लौटना होगा।

 

दिन तो ठीक मालूम नहीं लेकिन किसी एक मनहूस दिन को बर्बरतम ‘सलवा जुडूम’ ने जन्म लिया था। जिसे शांतिरैली या शुद्धिकरण शिकार का नाम दिया गया। शांति तो था ही नहीं। हां आदिवासियों का शिकार सबसे ज्यादा किया गया। बीजापुर और दंतेवाड़ा जिलों के करीब 644 गांव। कुछ के अनुसार तो यह 700 गांव से भी ज्यादा है को खाली करवाया गया और करीब 3 से 5 लाख की जनसंख्या को विस्थापित किया गया। शिविरों की संख्या 24 थी। लोगों को जोर-जबरदस्ती करके या उनकी इच्छा के विपरीत कैम्पों में लाया गया और कई बार जब उन्होंने बच कर जाने की कोशिश की तो उन्हें पकडक़र वापस कैम्पों में लाया गया। सरकारी कैम्पों में 47 हजार लोग निवासरत है याने विस्थापित जनसंख्या का मात्र 13 फीसदी है। विस्थापित जनसंख्या का करीब 75 फीसदी या करीब 2.6 लाख लोगों ने कैम्पों में जाना स्वीकार नहीं किया और उन्होंने जंगल के भीतर और बाहर रहकर जीवन गुजारना मंजूर किया। इससे उन्हें कानून के समक्ष आरोपी के रूप में माना गया। इस दौरान ‘स्टैटेजिक हैमलेटिंग’ यानि गांव को साफ करना शुरू हुआ। इस कार्य को जंगल वारफेयर कॉलेज के बिग्रेडियर बीके पोनवार के नेतृत्व में किया गया।

 

सीआरपीएफ की 19 बटालियनों और 2 नागा, मिजो, आईआरबी बटालियनों, एसपीओ(विशेष पुलिस अधिकारी)को आदिवासियों के खिलाफ हर किस्म की बर्बरता के लिए झौंक दिया गया था। यह तरीका आज भी अमल में है ताकि आदिवासी जनता को दबाकर रखा जा सकें। इससे पहले महेन्द्र कर्मा के नेतृत्व में 1991 में जनजागरण अभियान शुरू हुआ था। जो खत्म हो गया। जुडूम करकेली, कुटरू सहित कुछ अन्य गांवों से संगठित किया गया था। जिसे देवा या महेन्द्र कर्मा ने नेतृत्व दिया था। अब स्थिति यह है कि लगभग आधा से ज्यादा कैम्पों के दरवाजों में ताला जड़ा हुआ है। पानी की व्यवस्था, राशन व बिजली की व्यवस्था कैंपों में नगण्य है। बलात्कार के कारण एक ‘हराम’ पीढ़ी भी जन्म ले रही है। आज कुछ एक हजार लोगों को इन कैंपों में रखकर यातनांए दी जा रही है। पूरे कैम्प को छावनी में तब्दील कर दिया गया है। बुनियादी सुविधाएं नगण्य है। जानकारी के अनुसार इन गांवों की साढ़े तीन लाख आदिवासी सलवा जुडूम से प्रभावित है। लगभग 50 हजार कैम्प में है। यानि 3 लाख नक्सलियों के और करीब चले गए है। अबतक 50 हजार में से 13 हजार लोग ही कैम्प में मौजूद कहे जा रहे हैं।

 

इस पूरी घटना का मूल उद्देश्य निजी व बड़े धनाढ्य कंपनियों के लिए मैदान साफ करना है। पहाड़-जंगल साफ करना है। टाटा, एस्सार, टेक्सास पॉपर जनरेशन, आर्सलर, मित्तल, बीएचमी बिल्टन, डि-बियर्स, रियो टिन्टो, गोदावरी इस्पात, प्रकाश इंडस्ट्रीस व जायसवाल इस्पात के साथ एमओयू हस्ताक्षरित हुए है। उच्च क्वालिटी के लौह अयस्क, कोल ब्लॉको को व इंद्रावती के पानी को इन लोगों को दान में दे दिया गया है। कम्पनियों के स्वार्थ इस बात में भी दिखाई देती है कि पहला सलवा जुडूम शिविर बनाने की राशि एस्सार कम्पनी ने दी थी। एक विदेशी कंपनी ‘क्रेस्ट’ को दक्षिण बस्तर, दंतेवाड़ा और बीजापुर जिलों में खनिज भंडारों के सर्वे करने का ठेका दिया गया है। कंपनी ने तब कहा था कि वे इतना विशाल सर्वे तभी कर पाएंगे जब जमीन साफ कर दी जाए। 13 मार्च 2007 को जब नागा बटालियन और सलवा जुडूम के लोग गगनपल्ली पंचायत के नेन्दरा गांव में घुसे तो सभी भाग गए। गांव के कुछ बच्चे एक बोरिंग पर नहा रहे थे।

 

जब नागा जवान गांव में और किसी को नहीं पकड़ सके तो उन्होंने 2 से 16 साल के बीच की उम्र के 11 बच्चों और एक युवक को गोली मार दी। ये आंकड़े नहीं है बल्कि जीते जागते इंसान थे। सोयम राजू (2), माडवी गंगा(5), मिडियम नगैया(5), पोडियम अडमा (7), वेट्टी राजू(9), वंजम रामा(11), सोयम राजू (12), सोडी अडमा(12), मडकम साइत(13),मडकम बुदरैया(14), सोयम राका(16) व सोयम नखां(20)। इस रणनीति के तहत अहम पहलू यह है कि जो आदिवासी कैम्पों में नहीं आते हैं उन्हें गैरकानूनी बना देना और उनकी घेराबंदी कर देना। उनके लिए स्वास्थ्य सेवाएं, राशन दुकानों और स्थानीय हाट-बाजार की सुविधाओं को बंद कर देना। दूसरे शब्दों में उन्हें भूखे मारना या प्रतिबंध जारी करना। इस विषम परिस्थितियों में भी आदिवासियों ने सलवा जुडूम जैसे कू्ररतम अभियान का लगातार संवैधानिक विरोध करते रहे।

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दूसरी किस्त…
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