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सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं के नाम एक अपील : यदि आप आक्रोशित नहीं हैं तो इसका मतलब आप ध्यान नहीं दे रहे हैं! :. An Appeal to Cultural Activists of IndiaIf you are not outraged, you are not paying attention !

7.04.2019 
प्रिय मित्रों,
राजनीतिक हिंदुत्व की अभिजात्य उच्च संस्कृति, भारतीय समाज की सामूहिक संस्कृति में महत्वपूर्ण बदलाव लाने का प्रयास कर रही है। धुर दक्षिणपंथी हिंदुत्ववादी ताकतों द्वारा प्रचारित सांस्कृतिक प्रयोग, भारतीय मध्यम और उच्च वर्गों के बीच लोकप्रिय हो रही है। हम अपने सांस्कृतिक इतिहास में संकट के एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गए हैं जो हमारे समाज में शातिर हिंदूराष्ट्रवादी संस्कृति की बढ़ती आक्रामक प्रवृत्ति से चिंतित ताकतों द्वारा हस्तक्षेप की मांग करता है। विभाजनकारी सांप्रदायिक विचारधारा हमारे संवैधानिक मूल्यों को ख़त्म करने पर तुली है। यदि आप इस पर चिंतित नहीं हैं तो इसका मतलब आप ध्यान नहीं दे रहे हैं।
कॉरपोरेट प्रायोजित दक्षिणपंथी ताकतों द्वारा फैलाए गए प्रभुत्ववादी एकल सांस्कृतिक अभियान ने धर्म को सांस्कृतिक और सामाजिक व्यवहार के केंद्र में रखा है। हिंदू धर्म के ब्राह्मणवादी संस्करण को भारतीय जनता के बीच भारतीय राष्ट्रवाद के नाम से लोकप्रिय बनाया गया है। यह बदले में मुस्लिम कट्टरपंथ के उदय के लिए भी आधार बनाता है। इस प्रकार बनाया गया सांप्रदायिक विभाजन धार्मिक संकीर्णतावाद के विचारों के लिए एक उर्वर भूमि है। उत्तर आधुनिकतावादी विचार, नई सामूहिक संस्कृति में पारंपरिक समकालीन रूपों के पुनरुद्धार के माध्यम से परिलक्षित होते हैं। टीवी सीरियल, अंधराष्ट्रवादी विषयों पर आधारित फिल्में, सोशल मीडिया पर नफरत फैलाने वाली क्लिप इत्यादि, उत्तर आधुनिकतावादी रुझानों की अभिव्यक्ति के उदाहरण हैं। भगवा ब्रिगेड द्वारा क्षेत्रीय साहित्यिक समारोहों में हस्तक्षेप, प्रतिबन्ध के जरिए विरोध की अभिव्यक्ति को दबाना, मीडिया के माध्यम से गैर ज़रूरी मुद्दों को भड़काना, तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भगवाकरण करना हमारी संस्कृति की धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा को कुंद करने की परियोजना के ज्वलंत उदाहरण हैं।
केंद्र का निरंकुश शासन हमारी संस्कृति में उदारवादी लोकतांत्रिक मूल्यों का सफाया करने के लिए प्रतिबद्ध है। भारत में सांप्रदायिकता का उदय प्रगतिशील सांस्कृतिक आंदोलन की अग्रगति के समक्ष एक चुनौती है। भीड़ की संस्कृति, साम्राज्यवाद और हमारे देश के शासक वर्गों के हितों की सेवा करने की दिशा में विकसित हो रही है। लोगों के हितों की अनदेखी की जा रही है, कलात्मक स्वतंत्रता को बाधित किया जा रहा है और वास्तविक सांस्कृतिक प्रगति को हिंदुत्ववादी सांस्कृतिक ब्रिगेड के विरोध का सामना करना पड़ रहा है।
इसलिए तमाम जनपक्षीय कलाकारों और सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं को हमारी संस्कृति पर इस सांप्रदायिक हमले का सक्रिय विरोध करना चाहिए। हमें धर्मनिरपेक्ष लोकप्रिय संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए भी वह सब करना चाहिए जो हम कर सकते हैं। हमें भारतीय संस्कृति के सांप्रदायिकरण के विरोध की परियोजना के मुद्दों पर कार्रवाई नेटवर्क तैयार करना चाहिए। निरंकुशतावादी ताकतों से अपनी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए संघर्षरत नागरिक समाज संस्थाओं का समर्थन करना भी आवश्यक है। कला और संस्कृति के लिए लोकतांत्रिक स्थान को बचाने के हमारे सभी प्रयासों को नवउदारवाद के खिलाफ संघर्ष के साथ जोड़ा जाना चाहिए जो हिंदू राष्ट्र की अवधारणा की फेरी लगाने वाले नव परंपरावादियों को ऑक्सीजन प्रदान करता है।
उदार लोकतांत्रिक मूल्यों को हमारे समाज में सामाजिक और आर्थिक असमानताओं के वास्तविक मुद्दों को संबोधित किए बिना हासिल नहीं किया जा सकता। इसलिए हमें भी कला और साहित्य के अपने कार्यों के माध्यम से इन विषमताओं के शिकार लोगों की आकांक्षाओं को एक नए जोश के साथ मूर्त रूप प्रदान करने का प्रयास करना चाहिए। यह अपील उन सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं और कलाकारों को संबोधित करने के लिए है जो हमारी साझा संस्कृति की रक्षा करने और हमारे देश के प्रगतिशील सांस्कृतिक आंदोलन को मजबूत करने के लिए जुटे हैं।

राजनीतिक हिंदुत्व की ‘उच्च कुलीन फासीवादी संस्कृति’ को ख़ारिज करें!

आइए हम अपनी संस्कृति की गंगा जमुनी परंपराओं को संरक्षित करने और बढ़ावा देने के लिए संघर्ष में शामिल हों!

भारत के जनता की बुनियादी सांस्कृतिक अधिकारों और उनकी आज़ादी पर हमले के खिलाफ सांस्कृतिक प्रतिरोध करें!

समाज में नफरत फैलाने वालों के खिलाफ सक्रिय हो जाएं, उठ खड़े हों!

तुहिन, प्रवीण नाडकर, असीम गिरी, रवि पालूर, समर सेनगुप्ता, राजेंद्रप्रसाद सिंह
अखिल भारतीय समन्वय परिषद की ओर से
क्रांतिकारी सांस्कृतिक मंच (RCF)
An Appeal to Cultural Activists of India
If you are not outraged, you are not paying attention !
Dear friends,
Elitist ‘high culture’ of political Hindutva is attempting to make significant inroads in the mass culture of the Indian society. Cultural practices promoted by the right wing Hindutva forces are gaining popular support among the Indian middle and upper classes. We have reached a point of crisis in our cultural history which demands intervention by the forces concerned with the growing trend of vicious Hindu nationalist culture in our society. Divisive communal ideologies are brazenly propagated in defiance of our constitutional principles. If you have not noticed this you are not paying attention.
Hegemonic mono-cultural drive unleashed by the corporate sponsored right wing forces has placed religion at the centre of cultural and social practices. The Brahminical version of Hinduism is made popular among the Indian masses in the name of Indian Nationalism. This in turn creates ground for the rise of Muslim radicalism too. The communal divide thus formed is a breeding ground for ideas of religious sectarianism. Ideas of post-modernism are reflected in the new mass culture through revival of the traditional in the banal contemporary forms. TV soaps, films based on hyper nationalist themes, hate clips on social media, etc., are examples of manifestation of these post modernist trends. Neglect of fine art institutions, interference and interventions in the regional literary festivals by the saffron brigade, using censorship to muffle expression of dissent through media, saffronisiation of the cultural events are the examples of project of de-secularisation of our culture.
Authoritarian regime at the centre is set to wipe out liberal democratic values in our culture. Rise of communalism in India has posed a challenge before the advancement of progressive cultural movement. Mass culture is developing in a direction of serving the interests of imperialism and ruling classes of our country. Peoples interests are being ignored, artistic freedom is being impinged and real cultural progress is facing opposition from the pretentious Hindutva Cultural brigade.
All concerned artists and cultural activists should therefore actively resist this communal onslaught on our culture. We should also do all we can to promote secular popular culture. We should form action networks on issues concerning the project of opposition to the communalisation of Indian culture. It is also necessary to support the civil society institutions struggling to protect their independence from authoritarian forces. All our efforts to save democratic space for art and culture should be combined with struggle against neoliberalism which is the real prop for Neo conservatives of Hindu National variety.
Liberal democratic values cannot be realised without addressing the real issues of social and economic inequalities in our society. We should therefore also strive to give form to the aspirations of the victims of these inequalities through our works of art and literature with a renewed vigour. This appeal is meant to address the cultural activists and the artists to defend our composite culture and strengthen the movement for cultural advancement of our country.
Reject the ‘high culture’ of political Hindutva!
Let us join the struggle to preserve and promote the syncretic traditions of our culture!
Protest against the onslaught on the basic cultural rights and freedoms of Indian people!
Get active, rise up!
Tuhin, Pravin Nadkar, Aseem Giri, Ravi Paloor, Samar Sengupta, RajendraPrasad Singh
On behalf of All India Coordination Council of Revolutionary Cultural Forum (RCF)

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