अभिव्यक्ति कला साहित्य एवं संस्कृति महिला सम्बन्धी मुद्दे मानव अधिकार

समझदारी दिखाने का वक़्त ….

देशबन्धु में संपादकीय आज

19.02.2019

पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर आतंकी हमले में 40 से ज्यादा जवानों की शहादत से पूरे देश में दुख और आक्रोश का माहौल है। कहीं कैैंडल मार्च निकालकर , कहीं दो मिनट का मौन रखकर मृतकों को श्रद्धांजलि दी जा रही है। देश के प्रति प्रेम का यह जज़्बा भावनाओं के अतिरेक में उग्रराष्ट्रवाद में भी तब्दील हो रहा है, जिसमें दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए मुट्ठियां भींची जा रही है। गुस्से के उबाल में आकर पाकिस्तान से बदला लेने की मांग की जा रही है। राष्ट्रवादी मीडिया कहलाने वाले चैनलों के एंकर इस अंदाज़ में आतंकवाद पर चर्चा कर रहे हैं मानो वे अभी सीमा पर जाकर युद्ध लड़ने तैयार हैं। सोशल मीडिया पर भी देशभक्ति के नाम पर नफ़रत का कारोबार खूब फैलाया जा रहा है।

कहीं पाकिस्तानी झंडे का अपमान हो रहा है, कहीं कश्मीरियों को निशाने पर लिया जा रहा है। इस तरह के संदेशों का ही असर है कि देश के कई हिस्सों में कश्मीरी छात्रों और कारोबारियों के साथ दुर्व्यवहार किया गया है। अच्छी बात यह है कि इस तरह के व्यवहार को समाज का शांतिप्रिय तबका नकार रहा है। कई प्रबुद्ध नागरिकों और वरिष्ठ पत्रकारों ने ट्वीट कर प्रताड़ित और डरे हुए कश्मीरियों को अपने घर सुरक्षित रहने का आमंत्रण दिया है। दरअसल संकट की इस घड़ी में सद्भाव और धैर्य बनाए रखने की जरूरत है, ताकि नफ़रत का लाभ लेने वालों को हराया जा सके। अपने घर में बैठकर युद्ध के लिए ललकारना और वीर रस से भरी बातें करना आसान होता है, लेकिन युद्ध का असली मतलब, मोर्चे के हालात, लड़ाई के बाद का असर एक सैनिक और उसका परिवार जितने बेहतर तरीके से समझता है, शायद ही कोई और उसे महसूस करे।

पुलवामा की घटना के बाद एक पूर्व सैन्य अधिकारी ने फ़ेसबुक पर अपना अनुभव साझा किया है, जिसे जंग की चाहत रखने वालों को जरूर पढ़ना चाहिए। मेजर डीपी सिंह भारतीय सेना के अवकाशप्राप्त अधिकारी हैं, जिन्होंने अपने पैर कारगिल की लड़ाई में गंवा दिए। 14 फ़रवरी को पुलवामा की घटना के बाद वे एक टीवी चैनल की चर्चा में हिस्सा ले रहे थे। जहां एंकर प्रतिशोध की बात कर रही थी। लेकिन मेजर सिंह शांति के हिमायती हैं। उन्होंने फेसबुक पोस्ट में लिखा-

हम शहीदों और उनके परिवारों के साथ खड़े हैं। हमें इस क्रूरता के लिए बदला ज़रूर लेना चाहिए। लेकिन कुछ दिन बाद सब कुछ सामान्य हो जाएगा और अभी जो लोगों में उफान है वो भी सामान्य हो जाएगा। सियासी पार्टियों, मीडिया घरानों और आम लोगों के बीच भी सब कुछ सामान्य हो जाएगा। जिन्होंने अपनी ज़िंदगी गंवा दी उनके परिवारों का दर्द कोई नहीं समझ सकता। एक सैनिक हंसते हुए तिरंगे, वतन और उसकी इज़्जत के लिए सब कुछ न्यौछावर कर देता है।

उन्होंने आगे लिखा है कि -लेकिन कुछ सवाल ऐसे हैं जिनकी तादाद वक़्त के साथ बढ़ती ही जा रही है । क्या हम कुछ ऐसा कर रहे हैं जिससे पूरी व्यवस्था में कुछ सुधार हो सके? एक सैनिक हमेशा तिरंगे के लिए अपनी जान दांव पर लगाने के लिए तैयार रहता है । लेकिन इसके साथ ही हमें ये भी जानना चाहिए कि वक़ास कमांडो (पुलवामा का आत्मघाती चरमपंथी) बनने की तुलना में डबल सेना मेडल और अशोक चक्र पाने वाला कश्मीरी युवक लांस नायक नज़ीर वानी हमारे लिए ज़्यादा प्रेरणादायक है। हमें इस मोर्चे पर भी कोशिश करने की जरूरत है । अगर एक पागल पड़ोसी मेरे घर में घुस मेरे युवाओं को भड़काता है और हम इसे रोकने में नाकाम हैं तो कहीं न कहीं हम ग़लत हैं। मेजर सिंह ने लिखा कि जब आप प्रतिशोध के लिए चीख रहे होते हैं तो कृपया दूसरे परिवारों, अभिभावकों, पत्नियों और बच्चों से पूछिए कि क्या वो उन हीरो सैनिकों यानी अपने पति,अपने पिता और अपने बेटे के बिना जीने के लिए तैयार हैं?

कोई कल्पना नहीं कर सकता है कि ज़िंदगी ख़त्म होने का क्या मतलब होता है। हम चाहते हैं कि सैनिक मर जाएं लेकिन उसकी विधवा को बकाया राशि और पेंशन के लिए के लिए दर-दर भटकना पड़ता है। ज़िंदगियों का मज़ाक मत उड़ाइए । अपने कारोबार को चमकाने के लिए भावनाओं से मत खेलिए। मेजर सिंह की इस पोस्ट से दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा गुरमेहर कौर याद आती हैं, जिन्होंने कारगिल युद्ध में अपने पिता को खोया है, लेकिन फिर भी वे युद्ध नहीं चाहती हैं। उदारता और शांति के लिए वे पहले भी ट्रोलर्स के निशाने पर आई हैं और अब भी उनके साथ यही हो रहा है। सोशल मीडिया पर और कई बार मुख्यधारा के मीडिया में भी संतुलन खोकर बातें की जा रही हैं। उपद्रवियों और असामाजिक तत्वों के लिए यह सबसे सुविधाजनक वक्त होता है, कि लोग अपना आपा खोएं और वे अपनी करतूतों को अंजाम दें। इसलिए इस वक्त़ जनता को पहले से अधिक समझदारी से काम लेना होगा।

Related posts

लोकेश शौरी की गिरफ्तारी के विरोध में चक्का जाम .

News Desk

कलम के सिपाही गणेश शंकर विद्यार्थी : साम्प्रदायिक दंगे काे राेकने में शहादत-25 मार्च

News Desk

रायपुर : क्रांतिकारी सांस्कृतिक मंच का द्वितीय राज्य सम्मेलन 25 मार्च को ’’आज के दौर में सांस्कृतिक प्रतिरोध की भूमिका’’ पर संगोष्ठी भी

News Desk