राजनीति

संसदीय लोकतंत्र को न तो “पूँजीवाद” के खात्मे के लिए, और न ही “समाजवाद” लाने के लिए डिजाईन किया था. राजेन्द्र सायल.

“एक, संसदीय लोकतंत्र को न तो “पूँजीवाद” के खात्मे के लिए, और न ही “समाजवाद” लाने के लिए डिजाईन किया था.

दो. भारत में लोगों/नागरिकों को उनकीं बुनिआदी ज़रूरतें (जैसे कि भोजन, पानी, आवास, नौकरी, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, सुरक्षा आदि) मुहैय्या कराने में संसदीय लोकतंत्र नाकाम रही है.

तीन, नागरिकों द्वारा अतिरिक्त संसदीय साधनों के सहारे ही राज्य अधिकारियों/ मशीनरी, (जिसमें उनके प्रतिनिधि शामिल हैं) द्वारा सत्ता या राज्यसत्ता पर कब्ज़ा, अधिकार और शक्ति के कार्यान्वयन पर लगाम लगाईं गई है. ख़ास कर अपने अधिकारों, न्याय, अस्मिता और मानव गरिमा पाने के लिए जन-संघर्ष, जन-आंदोलनों का रास्ता अख्तियार जन-शक्ति का प्रदर्शन किया गया है, न कि “चुनाव” के चलते.

चार, राज्यसत्ता का चरित्र उन लोगों/वर्गों द्वारा निर्धारित होता है जो उनपर काबिज़ होते हैं. और इसलिए वह तय करते हैं कि नागरिकों के विभिन्न वर्गों को किस तरह के और कितनी मात्रा में अधिकार और सुविधाएं प्रदान की जायें.

पांच, भारत में आज राज्यसत्ता के चरित्र को परिभाषित करने के लिए निसंकोच कहा जा सकता है कि वह : कॉर्पोरेट- सांप्रदायिक- सुरक्षा-राज्य है. इसके अलावा उसका प्रारंभ से जो चरित्र रहा है, वह बरक़रार है जैसे कि पित्र्सतात्मक, जातिगत, पूंजीवादी, सामंतवादी आदि.

छह, चुनाव एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके ज़रिये राजनैतिक दल राज्य सत्ता को हथिया लेते हैं, और बाद में उन वर्गों के हितों की सुरक्षा और विकास करते हैं जिनके वे प्रतिनिधि होते हैं, जैसे कि पूंजीवादी, साम्राज्यवादी, सामंतवादी, फासीवादी, जातिवादी, पित्र्सतात्मक, आदि.
सात, वर्तमान राजनितिक दलों के चरित्र के मद्देनज़र (गठबंधन में हों व् उसके बाहर हों), ऐसा कहीं प्रतीत नहीं होता कि चुनाव के बाद वे पूँजीवाद, फासीवाद, जातिवाद, और पित्र्सत्ता को समाप्त करने के लिए कोई कदम उठायेंगे. सभी चुनावों के विश्लेषण से यह स्थापित होता है कि चाहें कितने भी भारी बहुमत से कोई भी दल सत्ता में आया हो, मूलभूत परिवर्तन लाने और संविधान में निहित सिद्धांतों और दिशानिर्देशों को लागू करने में कतई कामयाब नहीं हुए.

चुनाव के विश्लेषण करते समय और भी बुनियादी सवाल उठाने होंगे, और उनका हल ढूँढना होगा.

राजेंद्र सायल ,पीयूसीएल छत्तीसगढ़ के पूर्व अध्यक्ष और सामाजिक ,मानवाधिकार आंदोलन म़े सक्रिय हैं .शकरगुहा नियोगी के साथ लगातार मजदूर आंदोलनों में सक्रिय सायल आज भी अपनी पूरी क्षमता और इच्छा शक्ति के साथ सक्रिय है.

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