कला साहित्य एवं संस्कृति दलित मानव अधिकार

संजीव खुदशाह को राजनारायण मिश्र स्मृति पुनर्नवा पुरस्कार 2017 , प्रदान : हिन्दी साहित्य सम्मेलन छतीसगढ़ .

7 जनवरी 2018

पुरस्कार प्राप्त करते हुये संजीव ने कहा :
जब आप साहित्य की दुनिया में लगातार काम करते होते हैं और आपका सम्मान होता है वह भी एक नामचीन प्राचीन साहित्यिक संस्था के द्वारा। तो निश्चित तौर पर वह क्षण उसके लिए जीवन का बेहद गौरवशाली होता है।

मैं लेखक के तौर पर जाना जाता हूं और मैं अपनी पीढ़ी का कुल जमा दूसरा सदस्य हूं। जिसने पढ़ना लिखना सीखा है। यदि मेरे पिताजी को छोड़ दिया जाए तो उनके पहले यानी मेरे दादा परदादा पढ़ाई लिखाई से मरहूम थे। इसीलिए आप समझ सकते हैं कि मेरे लिए लेखन की दुनिया में आना कितना महत्वपूर्ण है। मैं आज भी सीखता हूं हर पल जानने की चेष्टा करता हूं। क्योंकि मेरा मार्गदर्शक किताबें और मेरा खुद का अनुभव है। मुझे पीढ़ियों से साहित्य नहीं प्राप्त हुआ हां यह जरूर है कि मुझे अपने पूर्वजों से उनके सामाजिक परिवारिक अनुभव का ज्ञान मिला। जिनका प्रयोग अपनी रचनाओं में समय समय पर करता रहा हूं।

बस मैं एक खास बात आप लोगों के साथ साझा करना चाहता हूं कि यदि आप अपनी समाजिक और राजनैतिक परिस्थिति से प्रभावित नहीं हैं और आपके साहित्य में इन परिस्थितियों का कोई योगदान नहीं है तो इसका मतलब है आप मुग्घता की बीमारी से ग्रस्त है। आम आदमी साहित्य से इसलिए दूर होता गया है। अपनी समाजिक और राजनैतिक स्थिति के प्रति आंखों को बंद करके साहित्य की रचना नहीं हो सकती।

मैं हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा गठित जूरी के मेंबरान का शुक्रिया अदा करता हूं जिन्होंने मेरे नाम की सिफारिश की। मैं खासतौर पर आदरणीय ललित सुरजन जी आदरणीय प्रभाकर चौबे जी आदरणीय नरेंद्र श्रीवास्तव जी रवि श्रीवास्तव जी का हृदय से आभारी हूं

मुझे जो यह सम्मान मिला है उसके लिए मैं बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के मार्गदर्शन को महत्वपूर्ण मानता हूं जिन को पढ़ने के बाद मुझ में नई ऊर्जा का संचार होता रहा है। साथ में मेरे पारिवारिक सदस्य जिन्होंने मुझे लिखने पढ़ने का मौका दिया उनका भी आभारी हूं। और वे तमाम लेखक बंधू, पाठक मित्र जो मुझे लिखने के लिए प्रेरित करते रहे और समय-समय पर मेरी आलोचना भी करते रहे हैं उनका भी मैं ऋणी हूं।

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