कला साहित्य एवं संस्कृति

संजय लीला भंसाली की पद्मावती या पद्मावत ने हंगामा मचा रखा है.:  दस्तक के लिए युनूस खान

अफसोस की बात ये है कि अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता को लेकर तमाम तरह के दावे हम करते हैं लेकिन एक स्‍टीरियोटाइप सिनेमा हमें डरा देता है। यकीन मानिये‘पद्मावत’ जो भी हो, वो संजय लीला भंसाली फिल्‍म ही होगी। जैसे आइसक्रीम के सांचे होते हैं वैसे ही फिल्‍म निर्देशकों के भी सांचे बन जाते हैं। अमूमन निर्देशकों की वो शैली या छाप उन फिल्‍मों में बहुत ही स्‍पष्‍ट नज़र आती है।

संजय लीला भंसाली का बचपन मुंबई की संकरी चाल में बीता है। एक मुलाक़ात के दौरान उन्‍होंने मुझे बताया था कि बहुत कम स्‍पेस वाले बचपन ने उन्‍हें बड़े सपने देखना सिखाया। भव्‍य फिल्‍मों की परिकल्‍पना सिखाई। वो कहते हैं कि मेरी हीरोइन को डांस करने के लिए बड़ी जगह चाहिए। हीरो को बड़ा स्‍पेस चाहिए। और ज़ाहिर है कि ये बात उनकी फिल्‍मों में स्‍पष्‍ट नज़र आती है। संजय लीला भंसाली खास तरह के इमोशन वाले सिनेकार हैं। प्रेम और दीवानगी की उनकी अपनी परिभाषाएं हैं। ‘हम दिल दे चुके सनम’ से लेकर उनकी ‘बाजीराव मस्‍तानी’तक अगर हम ग़ौर से देखें, तो फिल्‍मों के परिदृश्‍य से ज्‍यादा संजय लीला भंसाली के अपने फिल्‍मी मानदंड हावी नज़र आते हैं। संजय लीला भंसाली का सिनेमा जुनूनी किरदारों का सिनेमा है।

फिर ‘पद्मावत’ से लोग क्‍यों डर रहे हैं। मुझे नहीं पता कि मेरे क़दम इस फिल्‍म को देखने के लिए थियेटर की ओर मुड़ पायेंगे या नहीं। असल में हमें ‘मुक्‍काबाज़’ जैसी फिल्‍मों की सख्‍त ज़रूरत है। ना कि पद्मावत की। विवाद फिल्‍म के लिए पेशेवर फायदे का सबब बन जाते हैं। मुमकिन है कि इन दिनों में जितना पैसा फिल्‍म की खींचतान को लेकर संजय लीला भंसाली ने गंवाया हो उससे ज्‍यादा मुनाफा वो कमा ले जायें। पर ये सवाल सदा हमारी आंखों के सामने टंगा रहेगा कि हम अपने देश में किस तरह का सिनेमा चाहते हैं। आईये आज दस्‍तक में इसी बात पर बहस करें।

दूसरी बात ये कि ‘पद्मावत’ एक ऐसा हाथी बन गयी है जिसके सामने से सब हट जाते हैं और रास्‍ता दे देते हैं। इस फिल्‍म की रिलीज़ के मद्देनज़र अक्षय कुमार अपनी फिल्‍म पैडमैन को आगे ले गये। सुना जा रहा है कि नीरज पांडे ‘अय्यारी’ को पहले आगे ले गये और अब पीछे ले आये हैं। भारत में इतनी तादाद में फिल्‍में बन रही हैं कि अगर पहले से तयशुदा तारीख में कोई हेर फेर होता है तो फिर प्रदर्शन को लेकर बदहवासी फैल जाती है। एक साथ दो महत्‍वपूर्ण फिल्‍में रिलीज़ होने से दोनों को नुकसान होता है। अब सामान्‍य दर्शक महीने में चार चार फिल्‍में तो नहीं देख सकते। तो आने वाले कुछ सप्‍ताहों में ये बदहवासी लगातार नज़र आयेगी। और इसकी मार सहेंगी छोटी फिल्‍में जो बिना शोर शराबे के आ रही थीं।

पैडमैन, अय्यारी, पद्मावत—आपको किस तरह का सिनेमा चाहिए।
*दस्तक के लिए युनूस खान*

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