कला साहित्य एवं संस्कृति कविताएँ

“शुभचिंतक” ःः  जिनके मानस पटल पर मैं छा गई हूँ…..सविता तिवारी 

कुछ ऐसे मेरे कुटिल शुभचिंतक जिनके मानस पटल पर
मैं छा गई हूँ,
दिन-रात, प्रति पल, हर क्षण, विचारों में जिनकी मैं समा गई हूँ, कुटिल मेरे शुभचिंतक,
ईर्ष्या की आग में हर क्षण
जलते रहते हैं,
कैसे “सवि”को परेशान करें, निरंतर चिंतन मनन करते रहते हैं, दोस्तों को मेरे विरुद्ध
विस्तृत पाठ पढ़ाते हैं,
शतरंज की बिसात बिछाकर कुटिल शकुनि का चौसर पासा
ढलकाते हैं,
कुछ ऐसे मेरे शुभचिंतक,
जिनके मानस पटल पर
मैं छा गई हूं,
मेरा अवचेतन मन, असीमित ऊर्जा से लबरेज,
निरंतर प्रगति के पथ पर
अग्रसर है…..
मेरे कुटिल शुभचिंतक को जरा सा भी नहीं सब्र है,
आतुर है, प्रतिपल, प्रतिक्षण, नुकसान मुझे पहुंचाने को,
साम, दाम, दंड, भेद,
सब कुछ तैयार है, अपनाने को, चाहे कितनी भी कुटिल चाल चले, मेरे अवचेतन मन की असीमित ऊर्जा के सुरक्षात्मक आवरण को भेदने की, उनकी न दाल गले…….
है पूर्ण विश्वास, आत्म प्रकाशित अवचेतन प्रकाश पुंज पर, मुझे निरंतर प्रगति के सोपान पर बढ़ते जाना है,
लाखों बाधायें आये राहों में,
हर बाधा को दूर भगाना है… सद्भावना, सतमार्ग, सच्चे मन से निरंतर खुशियां बांटते हुए, मुस्कुराते हुए,
आगे बढ़ते जाना है,
मंजिल को पाना है ।
मेरे कुटिल शुभचिंतक की
हर बुरी चाल,
मुझ तक पहुंच कर, मेरा ही अच्छा करते जाएगी,
उसकी नई योजनाएं,
नया षड्यंत्र,
मेरे लिए उन्नति के नये आयाम
बनाते जाएंगी,
पथ प्रदर्शक बनकर,
मुझे निरंतर सफलता दिलाएगी, उसके रग-रग में,लहू के कतरे- कतरे में, मेरा नाम बस जाएगा, खुली आंखों से ही नहीं,
बंद आंखों में भी उसे मेरा चेहरा नजर आएगा,
हर वार चलाएगा,
मेरा कुटिल शुभचिंतक,
सारे वार उसके एक दिन खत्म हो जाएगा,
तरकश खाली हो जाएगा,
मेरा नाम लेते लेते
गश खाकर
मेरे ही पैरों में गिर जाएगा,
तब तक शायद वो सब कुछ अपना हार चुका होगा,
नज़रों में सबकी स्वयं को मार चुका होगा,
कुछ ऐसे मेरे कुटिल शुभचिंतक
हैं, जिनके मानस पटल पर मैं छा गयी हूं,
दिन-रात, प्रति पल, हर क्षण, विचारों में जिनकी मैं समा गई हूं, कुछ ऐसे मेरे कुटिल शुभचिंतक जिनके मानस पटल पर
मैं छा गई हूँ…..

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कुटिल शुभचिंतक के लिये ….

मेरी अभिव्यक्ति
मेरी कलम से

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