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शाहीन बाग – सत्याग्रह – चरखा – चर्चा : विमल भाई

Vimal Bhai Shaheen Bag

आजादी के आंदोलन में गांधी की भूमिका से उनके विपक्षी भी इनकार नहीं कर सकते। गांधी के आंदोलन में ग्राम स्वराज में चरखा सबसे महत्वपूर्ण रहा। हमें लगा कि यह चरखा जो सत्याग्रह का प्रतीक है उसे क्यों ना शाहीन बाग में ले जाया जाए?

हमने ‘अमन की पहल’ की ओर से बैठकर एक पूरे दिन बैठकर यहां चरखा चलाया। जनसत्ता की पूर्व संपादक अमित प्रकाश, यूनुस खान, जमील भाई व नसीम बहन के साथ उनकी ढेर सारी महिला साथी भी आईं। हमने आंदोलन को थोड़ा और करीब से देखा। लोगों से बात हुई। जुम्मे का दिन उपवास/ रोजा रखकर चरखा चलाते हुए बिताया। ढेर सारे बच्चों से बात हुई। बहनों माताओं से बात हुई। युवाओं से बात हुई।

“कोई बच्चा नारा दे रहा हो तो प्यार से समझाएं और रोकें”

“एक महिला अपने आप को पत्रकार बताकर लोगों से इंटरव्यू ले रही हैं। मगर अपनी पहचान छुपा रही हैं। उन से निवेदन है वह मंच पर आकर अपनी बात रखें।”

“छोटे-छोटे बच्चों को कोई पैसे देकर किसी पार्टी के पर्चे बटवा रहा है। जिनके हाथ में भी वह पर्चे हो वह फाड़ के फेंक दें। हमारा किसी पार्टी से कोई लेना देना नहीं है। हम यहां पर जिन मुद्दों पर धरना देकर बैठे हैं उनको न बिगाड़ें। कोई भी पार्टी का व्यक्ति यहां पर प्रचार ना करे।”

ऐसी कई घोषणाएं शाइन बाग के धरना स्थल से कर रही थीं।

“कल सब लोग अपने मत का उपयोग करेंगे हम भारत के नागरिक हैं

एक साधारण सी। मतदान के लिए शपथ की गई।

जुम्मे का दिन था इसलिए नमाज धरना स्थल पर ही पढ़ी गई। सैकड़ों मर्द पंडाल और उसके बाहर सड़क पर नमाज अदा करने बैठे। बहुत शांति और सलीके से। एक युवा मौलाना ने धार्मिक तकरीर दी। उनका कहना था कि हमारी गलतियों की सजा खुदा हमें दे रहा है। उन्होंने बार-बार मुसलमानों को उनकी कमियां दूर करने के लिए कहा। नमाज अदा करने के लिए कहा। और खुदा को याद करने के लिए कहा। नमाज के बाद देश में अमन चैन कायम करने के लिए दुआ की गई। “हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सब आपस में भाई भाई की तरह रहें ऐ खुदा हम पर करम कर, हमारी गलतियो को माफ कर” यह सब इतने दर्द भरे स्वर में कहा जा रहा था कि मौलाना सहित कितने ही लोगों की आंखों में आंसू थे।

एक बहन जो उम्र में 50 से भी ज़्यादा की रही होंगी, बता रही थीं “हम कभी बाहर नहीं निकले। कभी जब मायके गए होंगे तभी सड़क से गुजरे होंगे। और अभी सड़क पर हम रोज बैठते हैं” वे कह रही थीं अब आप बताइए? एक पढ़ने लिखने वाले बच्चे की आंख फोड़ दी। पढ़ाई की जगहों पर हमले कर दिए और हम अपने बच्चों की खातिर सड़क पर भी ना आएं? हमने कोई गुनाह नहीं किया। हम और कर भी क्या सकते हैं?

धरना पंडाल के दाईं तरफ बंद दुकानों की सीढ़ियों पर बैठी शाहीन बाग की औरतें बता रही थीं “हम सुबह अपने काम निपटाती हैं। फिर यहां आ जाती हैं। कोई अपने बच्चों को स्कूल भेजने के बाद आती हैं। फिर बच्चों को लेने चली जाती हैं। दोपहर का काम निपटा के फिर वापस आती हैं। हमारे मर्द फिर जब काम से लौटे तब शामिल हो जाते हैं। कोई बिना बुर्के से भी है कोई हिजाब में है और कोई चेहरा बिना ढके हैं। सब अपने तरीके से हैं। किसी की जोर-जबर्दस्ती या कोई थोपा नियम नहीं।

पंडाल छोटा पड़ गया है। पंडाल के साथ बहुत सारे लोग खड़े हैं। थोड़ा रास्ता है जिस पर आना-जाना चल रहा है। कुछ विदेशी पत्रकार भी नजर आ रहे हैं। दिल्ली में आसपास से भी लोग आए हुए हैं। फुटपाथ पर सीढ़ियों पर स्त्री पुरुष बैठे हुए हैं।

बन्द दुकानो के आगे के बरामदों पर आपको कुछ बच्चे पेंटिंग करते नजर आएंगे

और एक साधारण सी रैक में आपको कुछ किताबें रखी नजर आएंगी। जो स्थानीय बाशिंदे आकर पढ़ते हैं। यहां जामिया के विद्यार्थी आते हैं और बच्चों को पढ़ाते हैं। कुछ नया सिखाते हैं।

वसुंधरा बताती है कि ‘रीड फॉर इंडिया’ के नाम से हमने पहले तो सिर्फ किताबे लाकर के लाइब्रेरी शुरू की थी। फिर हमने देखा कि बच्चे धरने पर आए हैं और इधर उधर घूम रहे है। तो उनको और भी चीज़ों में जोड़ा। अंग्रेजी के प्राध्यापक ओसामा अभी टाइफाइड से पीड़ित हैं। मगर बता रहे हैं कि वे ऐसी शुरुआत दूसरे धरनो,  सीलमपुर जैसी जगहों पर भी कर रहे है।

यह गजब है कि अगर धरना पंडाल में बड़ों का राजनैतिक-सांस्कृतिक शिक्षण चालू है तो यहां बच्चों को भी सही शिक्षण देने की कोशिश जारी है।

लोहे के टनों वजनी भारत के नक्शे के पास में ही बड़ी जोर शोर की तैयारी से लोहे के ही बड़े इंडिया गेट का निर्माण हो रहा है।

पंजाब से आये युवा बूढ़े किसान इस क्षेत्र में फैल गए हैं। इन किसानों को पहले दिल्ली पुलिस ने शांति व्यवस्था का वास्ता देकर पश्चिमी दिल्ली के हरिनगर के पास रोक दिया था। वहां से फिर सब पैदल चल के यहां पहुंचे। शाहीन बाग के बाशिंदों ने भी उनको अपना लिया है।

ऐसा लगता है जैसे कि शाहीन बाग में ढेर सारे बिछड़े रिश्तेदार मिले हों। कितने छोटे बच्चे और बड़े लोग रंगीन पगड़ी बांधे मिले। समझ में नहीं आ रहा था कि वो मुसलमान है या पंजाब से आए सिख। एक सरदार जी यहां के बाशिंदे को पगड़ी पहना रहे थे। गुरु का लंगर भी चल रहा है।

कि पीछे की तरफ स्वाति कि नारी एक बड़ी सी किताब की दुकान सजी हुई है। हिंदी उर्दू अंग्रेजी की ऐसी किताबें जो प्राय आपको साधारण दुकानों पर न मिलेंगी वो यहां मिल सकती हैं. बाबा साहब भगत सिंह गांधी की चित्रों से सजी दुकान में सभी की जीवनी उसे लेकर तमाम आंदोलन की अवधि हाथ की किताबें मिलेंगी।

सुबह पंडाल और आसपास में थोड़ा खालीपन था मगर नमाज के समय और उसके बाद तो फिर लोग बढ़ते गए पंडाल खचाखच और उसके बाहर भी लोग खड़े थे। एक के बाद एक। कोई उड़ीसा से कोई पंजाब से। उत्तर प्रदेश से। आकर अपनी बात रख रहा है कविता गीत सुना रहा है। मंच संचालिका बोलने वालों को बार-बार दो-तीन मिनट में बात पूरी करने को कह रही हैं क्योंकि वक्ता बहुत हैं। लोग बड़ी चमकते थे। देश दुनिया में। शाहीन बाग का नाम। चमक रहा है।

बृहस्पतिवार को यहां गीता कुरान बाइबल रामायण। गुरु ग्रंथ साहिब। सब का पाठ हुआ था। एक साथी ने बताया कि इन औरतों ने हवन पहली बार देखा होगा। महिलाओं का राजनीतिक प्रशिक्षण। शिविर जैसा लगता है यह। कहीं कोई कड़वाहट नहीं कोई गाली गलौज नहीं। किसी के खिलाफ कोई बद जुबानी नहीं।

मगर कुछ खास चैनलों पर जो चल रहा हैं । व्हाट्सएप, फेसबुक और ट्वीटर पर जो जहर बिखेरा जा रहा है उससे मालूम होता है कि राजनैतिक और धार्मिक कट्टरता के चलते किस तरह इंसानियत को कुचला जा सकता है और गंदी सी गंदी भाषा को समाज में सराहा जा सकता है।

दो तीन स्थानीय महिलाएं हैं। जो कि बड़े सलीके के साथ मंच। संभालती हैं। यहां की महिलाएं जानती हैं कि उनपर बार-बार हमले हो रहे हैं उनको बदनाम करने की कोशिश हो रही है। इन साजिशों को भी भीतर से समझती हैं। आने वाला समय। कठिन होगा यह भी जानती हैं। मगर फिर भी इस बात से उत्साहित हैं कि आज शाहीन बाग पूरे देश में पैदा हो गए हैं। जो बात उन्होंने शुरू की उस बात को देशभर ने माना है। वे बहुत अदब से अपना काम कर रही हैं। यह महिलाओं का। धरना है। वह जमाने को बहुत कुछ सिखा रही हैं। और सीख भी रही हैं। इनमें सिर्फ मुसलमान औरतें नहीं है। हिंदू महिलाएं भी आगे हैं।

1947 से पहले। आजादी की लड़ाई में महिलाएं आगे रही हैं। मगर ऐसा, पूरे देश में जगह-जगह हद दर्जे की बदसलूकी, बदतमीजी व सत्ता की हिटलरशाही को झेलते हुए भी वे आगे बढ़ी है, बैठी हैं, आवाज उठा रही हैं। कभी उनके कंबल छीन लिए जाते हैं, खाने के सामान छीन लिए जाते हैं। पार्क में पानी भर दिया जाता है। रातों को बिजली काट दी जाती है। तंबू उखाड़ दिए जाते हैं। उसके बाद भी उनके अंदर की ताकत खत्म नहीं हुई है। शाहीन बाग से ताकत देश की महिलाओं को पहुंच रही है।

शाहीन बाग, बिलासपुर, छत्तीसगढ़

नारी सशक्तिकरण का बड़ा विस्तार सामने नजर आता है। देशभर के आंदोलनकारी आंदोलन के बारे में योजना बनाते कि ऐसे में घर गृहस्थी चलाने वाली औरतों ने दिखा दिया कि वह आंदोलन भी चला सकती हैं। आजादी के बाद देश की सबसे ज्यादा दुर्दांत सरकार के सामने भी वे अपनी जीत के लिए निश्चिंत नजर आती हैं।

विमलभाई “अमन की पहल”

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