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व्यंग्य: विधर्म का डर

“अचानक उन्हें एहसास हुआ कि जो हवा वह अपने फेफड़ों के अंदर ले रहे हैं, वह तो कभी न कभी किसी विधर्मी ने भी अपने फेफड़ों में ली होगी”

ये व्यंग्य रचना “डाउन टू अर्थ” वेब पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी है. वहां से साभार हम इसे cgbasket.in के पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं. इसके रचनाकार हैं Sorit Gupto

दरवाजे को बंद कर अब वह सुकून महसूस कर रहे थे। अभी-अभी उन्होंने ऑनलाइन ऑर्डर किए खाने को वापस भेज दिया था क्योंकि डिलीवरी बॉय विधर्मी था। बस एक मलाल था कि आज तक उन्होंने ऐसी सावधानी क्यों नहीं बरती? पता नहीं कहां-कहां उन्हें ऐसे लोगों के हाथों से खाना खाना पड़ा होगा। फिर उनके मन में एक विचार आया और उन्होंने झटके से परदे का एक किनारा उठाया और उस पर लगी स्लिप को देखने लगे। उस स्लिप पर उत्पादक का नाम, पता और दाम लिखा था। पर धर्म? वह तो कहीं पर नहीं था!

मन ही मन गुस्सा कर उन्होंने सोचा, “इस परदे को न जाने किसने बुना होगा? क्या धर्म होगा उसका जिसने इसे सिला? जाने किसने इसके कपास को पैदा किया होगा?”

उन्होंने एक झटके में घर के सारे परदे उतारकर घर के बाहर रख दिए। इससे भी उनका मन नहीं भरा। उन्होंने गौर से अपने घर को देखा। उन्हें लगा कि वह कितने लापरवाह थे इतने दिन! वह अपने दुश्मनों, विधर्मियों से घिरे जिंदगी काट रहे थे। उन्होंने कभी जाने की कोशिश ही नहीं की कि उनका चादर, गद्दे, तकियों का धर्म क्या है? पलंग-अलमारी, कपड़े-लत्ते, बर्तनों की न उन्होंने कभी जात पूछी और न ही यह पता किया कि उनका गिलास, चाय की प्याली का धर्म क्या है?

अब तक वह दुकान से लाए सामान का बस तोलमोल करते पैसा चुकाते रहे। उन्होंने दराज से कुछ पुराने बिल खोज निकाले और ध्यान से पढ़ने लगे। उन्होंने सभी बिलों की पड़ताल की। बिलों में दुकान का नाम-पता और दाम वगैरह लिखा था पर कहीं पर भी खरीदे गए सामान के धर्म पर कुछ नहीं लिखा था।

“कितने लापरवाह हैं हम” उन्होंने मन ही मन सोचा और घर का सामान एक-एक कर घर से बाहर रखने लगे। पहले पंखे और बल्ब गए, फिर बारी थी फ्रिज, टीवी, स्मार्ट फोन, कूलर, एसी की। उसके बाद उन्होंने बर्तनों, साबुन, तेल, शैंपू को घर से बाहर निकाल फेंका। उन्होंने घर के राशन को भी फेंक दिया। घर से सारे रुपए पैसे भी फेंक दिए कि जाने कितने विधर्मियों के हाथों ने इन्हें छूआ होगा! घर अब खाली हो चुका था। बाल्टी, बोतल, घड़े से सारा पानी फेंक दिया। अब उनकी निगाह खुद पर पड़ी और उन्होंने अपने सारे कपड़े उतार कर फेंक दिए कि उन्हें यह नहीं पता था कि यह कपड़े किसने सिले?

इतना कुछ करने के बाद भी एक अनजाना डर जाने का नाम ही नहीं ले रहा था। अचानक उन्हें लगा कि उनका मकान जिन ईंटों से बना है, उसके कारीगर के बारे में उन्हें कुछ नहीं पता और न ही उन्हें यह पता है कि इसको बनाने वाले मिस्त्री किस धर्म के थे। उन्होंने एक हथौड़ा उठाया और दीवारों को तोड़ने लगे। थोड़ी ही देर में वह अब हांफने लगे थे। दीवारों पर पड़ने वाले हथोड़े की हर चोट दीवारों को नहीं, मानो उनके दिल में बरसों से घर जमाए हुए डर की एक-एक ईंट को तोड़ रही थी। पर हाय! उनकी यह खुशी क्षणिक साबित हुई।

जल्द ही एक नए डर ने उन्हें बुरी तरह जकड़ लिया। अचानक उन्हें एहसास हुआ कि जो हवा वह अपने फेफड़ों के अंदर ले रहे हैं, वह तो कभी न कभी किसी विधर्मी ने भी अपने फेफड़ों में ली होगी। एक विधर्मी के फेफड़ों की हवा वह भला अपने फेफड़ों के अंदर कैसे ले सकते हैं?

उन्होंने एकाएक सांस लेना बंद कर दिया। पर मरकर भी उनकी आत्मा को शांति नहीं मिली। उनकी आत्मा ने देखा कि उनकी अस्थियों को एक पीतल के घड़े में रखा गया है।

उन्हें यह पता था कि अच्छे पीतल के घड़े तो मुरादाबाद में बनते हैं!

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