आदिवासी जल जंगल ज़मीन वंचित समूह

विधानसभा चुनाव नतीजे से ठीक हफ्तेभर पहले अडानी को दी गई बैलाडीला खदान.

10 साल बाद अचानक फैसला सुर्खियों में . . . रायपुर से बस्तर तक बवाल

आदिवासियों का तीसरे दिन भी विरोध

मुख्यमंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री हुए आमने – सामने

पत्रिका न्यूज

रायपुर . बैलाडीला में एनएमडीसी की खदान को अडानी इंडस्ट्रीज को सौंपे जाने के मामले में आदिवासियों के विरोध के बीच आरोप – प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है । इस मामले में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल , पूर्व मुख्यमंत्री डॉ . रमन सिंह और अजीत जोगी आमने – सामने हो गए हैं । उधर पत्रिका को माइनिंग की टेंडर प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेज मिले हैं जिनसे खुलासा हो रहा है कि पिछले साल विधानसभा चुनाव की मतगणना से महज एक सप्ताह पूर्व 6 दिसंबर को हैदराबाद में एनसीएल सीएमडी और एनएमडीसी के चेयरमैन द्वारा अनुबंध पत्र पर हस्ताक्षर किया गया । बेलाडीला माइंस में माइनिंग के लिए पिछले वर्ष 2 जुलाई को एनसीएल द्वारा मेसर्स अडानी इंटरप्राइजेज को सफल निविदाकार घोषित किया गया था । एनसीएल ने 20 सितंबर को अडानी के पक्ष में लेटर आफ एवार्ड आफ कांट्रेक्ट जारी किया गया । दस्तावेज के अनुसार वर्ष 2007 में छत्तीसगढ़ सरकार ने बैलाडीला की खदान के लिए एनएमडीसी के पक्ष में लेटर आफ इंटेंट जारी किया था । लकिन 10 साल तक खामोशी के बाट अचानक 2017 में केंद्र ने इस खदान को पर्यावरण मंजूरी दे दी । छत्तीसगढ़ शासन द्वारा माइनिंग लीज की स्वीकृति प्रदान कर दी गई । एनएमडीसी के अनुरोध पर नवंबर 2017 में माइनिंग लीज एनसीएल को । स्थानांतरित कर दी गई ।

जोगी ने भी मुख्यमंत्री को घेरा

जनता कांग्रेस के सुप्रीमो अजीत जोगी ने भी इस मामले में वर्तमान मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और पूर्व मुख्यमंत्री डॉ . रमन सिंह को घेरा है । उन्होन ट्वीट कर कहा है कि डॉ . रमन सिंह ने पुज्यनीय पहाड को अडानी को देने की मंशा जाताई और भूपेश बघेल ने दोस्त को खुदाई के लिए दे दिया ।

अडानी समूह 2018 में निविदा में शामिल

अडानी समूह के प्रवक्ता ने बैलाडीला लौह अयस्क भंडार में उनकी भूमिका को लेकर स्थिति स्पष्ट की है । समूह की ओर से बताया गया कि बैलाडीला लौह अयस्क भंडार में खनन गतिविधियों की शुरुआत के लिए एनएमडीसी और छत्तीसगढ़ खनिज विकास निगम लिमिटेड ( सीएमडीसी ) ने वर्ष 2008 में संयुक्त उपक्रम का गठन किया था । एनएमडीसी 2010 से 2014 के बीच ग्राम सभाओं के आयोजन किए , 2015 में पर्यावरण संबंधी मंजूरी और जनवरी 2017 में वन मंजूरी हासिल की । इसके बाद 2017 में खनन लीज सरकारी स्वामित्व वाली संयुक्त उपक्रम एनएमडीसी – सीएमडीसी लिमिटेड ( एनसीएल ) को हस्तांतरित कर दी गई । जनवरी 2018 में कम से कम 10 कंपनियों ने बैलाडीला लौह अयस्क भंडार क्रमांक 13 के विकास और परिचालन के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धी बोली में हिस्सा लेने के लिए दिलचस्पी दिखाई । पारदर्शी रिवर्स विडिंग प्रक्रिया के माध्यम से अडानी इंटरप्राइजेज लिमिटेड ( एईएल ) को सफल बोलीदाता के रूप में चुना गया था । दिसंबर 2018 में एनसीएल ने लौह अयस्क खनन अनुबंध पत्र प्रदान करके एईएल को खनन कॉन्ट्रैक्टर के रूप में नियुक्त किया । पहले एल इस परियोजना के लिए मंजूरी प्राप्त करने में शामिल नहीं था और उसने केवल दिसंबर 2018 के बादस्पर्धात्मक निविदाद्वारा खनन कान्ट्रैक्टर की भूमिका निभाई ।

आपत्ति थी तो इजाजत क्यों दी

खदान देने का फैसला ज्वॉइंट वेंचर कंपनी सीएमडीसी और एनएमडीसी का था । मुख्यमंत्री भूपेश बघेल , सरकार और पर्यावरण मंडल को जवाब देनी चाहिए कि जब आपत्ति थी तो फिर पर्यावरण विभाग ने इजाजत क्यों दी । अकबर पर्यावरण मंडल की बैठक में गए थे प्रोजेक्ट अप्रैल में ही रोक देना था ।
डॉ . रमन सिंह , पूर्व मुख्यमंत्री

गरमाई सियासत

पिछली सरकार की गड़बड़ी

पिछली सरकार के निर्णयों । की समीक्षा की जरूरत है । अगर ग्राम सभा कर आदिवासियों को विश्वास में लेते तो वे आज आंदोलन क्यों करते । सारी गड़बड़ी पिछली सरकार की है ।

भूपेश बघेल , मुख्यमंत्री , छत्तीसगढ़

बस्तर से खिलवाड़ करेंगे तो विरोध होगा । |

बस्तर में सरकारी उपक्रम वर्षों से चल रहा है । उसका कोई विरोध नहीं है । जिस उद्योग में सरकार और जनता की भागीदारी है , उसका कोई विरोध नहीं होगा । लेकिन कोई बस्तर से खिलवाड़ करेगा , उसका जनता और आदिवासी विरोध करेंगे ।

कवासी लखमा , उद्योगमंत्री छत्तीसगढ़

सरकार जिम्मेदार – अमित

जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ के प्रदेश अध्यक्ष अमित जोगी ने पहाड़ में खनन की अनुमति के लिए मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और वन मंत्री मोहम्मद अकबर को जिम्मेदार ठहराया हैं । अमित जोगी ने कहा दस्तावेजों से प्रमाणित हैं कि डॉ . रमन सिंह ने नंदराज पर्वत को डिपॉजिट 13 में बदलने के लिए अडानी समूह को लेटर ऑफ इंटेंट के जरिए लीज देने की मंशा जताई थी । वहीं मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और वन मंत्री मोहम्मद अकबर ने चार महीने में ही लेटर टू ऑपरेट के माध्यम से अपनी सहमति जता दी ।
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