कला साहित्य एवं संस्कृति

वह मेरा ” पहल समय “शाकिर अली का जीवन कथ्य .

             
अभी कल ही शाकिर अली की तीसरी पुस्तक आलोचना का लोकधर्म , उद्भावना प्रकाशन.से छप कर आयी और अभी बीते इन दिनों मासिक पत्रिका में भी शाकिर अली का लिखा अपने प्रारंभिक जीवन पर उनका लिखा लेख प्रकाशित हुआ जिसमें उन्होंने अपनी प्रारंभिक जीवन यात्रा ,रचना प्रक्रिया और अपने पढने लिखने से लेकर मार्क्सवादी बनने की यात्रा का बेहद प्रभावशाली विवरण लिखा हैं. हम लोग जो उनके मित्र होने और उन्हें जानने का दावा करते है, उनके लिये भी सबकुछ खुलने जैसा हैं. डा. राजेश्वर सक्सेना से लेकर उस काल के साहित्यिक सबंधों और व्यक्तिगत दोस्तों से बढती समझदारी पर बेहतरीन लिखा हैं. हमें लगा कि जो शाकिर अली जी को निकट से जानते है उन्हें भी उनके बारे में और जानने की जरूरत हैं.
आलोचना का धर्म शाकिर अली के समय समय पर लिखे लेखों का संग्रह तो है ही ,हमारी कोशिश रहेगी कि उन लेखों को भी धीरे धीरे समयानुकूल आप तक पहुचाये.
तो आप पढिये शाकिर की कलम से शाकिर अली की प्रारंभिक पहल …

यह सच है कि दिसंबर 71 का युद्ध सिर्फ सीमाओं पर ही नहीं लड़ा गया बल्कि सबने अपने – अपने ढंग से लड़ा है , यह लड़ाई पर घर में लड़ी गयी , मेरे । घर में भी । नगर से दूर रह कर भी बी . बी . सी . के हिंदी कार्यक्रम के माध्यम से युद्ध से हम पूरी तरह जुड़े रहे । परिवार के सभी सदस्य ट्रांजिस्टर से प्रसारित हर बुलेटिन , हर रेडियो स्टेशन , बडी तल्लीनता से सुनते थे , अब्बा की फरमाइश पर रेडियो पाकिस्तान भी सुना जाता , मैं कहता ‘ दिल्ली से कलकत्ता तक कौन – सा शहर कहां पर है , पता नहीं चलेगा ‘ कहने वाले पाकिस्तानी अब कहां है ? अब्बा झल्ला कर रह जाते । हम सब लोग एक तरफ तो वह दूसरी तरफ , घर में एक ‘ टेशन ‘ पैदा हो गया था , वह बिना खाये ही उठ जाते . अम्मा कहती कि पाकिस्तान के खत्म होने से उन्हें क्यों तकलीफ होती है .

मेरी अम्बा से हर बात पर झड़प हो जाती ,वह पाकिस्तानी सैनिकों के अपराधों को उचित ठहराने के लिए कहते कि पहले बंगालियों ने गैर – बंगालियों का गला काटा , वे मुक्ति सेना के अस्तित्व को भी नहीं मानते उन्हें भारतीय घुसपैठिये ही मानते , उधर ढाका में आत्मसमर्पण हो चुका था और याह्या खां का ” जंग जारी रहेगी ” का बार – बार एलान सुन कर हम उसकी हंसी उड़ा रहे थे , तो वह मन – ही – मन कुढते रहते , पाकिस्तान के टूटने से उनके भीतर भी कुछ टूट गया था . आजादी से पहले हमारे घर में जिन्ना की फ्रेम की हुई तस्वीर टंगी थी , ऐसा मैने सुना था , जिसे बाद में हटा दिया गया था । अब्बा याद दिलातेः 63 का ‘ रायट ’ ( रायगढ़ में दंगा ) याद है , जिसमें तुम्हारी नानी की मौत का टेलीग्राग नहीं आता , तो तुम भी शरणार्थी और अनाथ बन गये होते ! में जवाब देताः ‘ ‘ कुरआन में कहा गया है कि अपने पड़ोसियों के सुख – दुख में शामिल हो और उसके साथ अच्छा सलूक रखो , और हम पड़ोसी के सामने उसकी माँ ( गाय ) का गला काटे , यह कहां की इन्सानियत है ? क्यों नहीं हम होली दिवाली में शरीक होते ? तव भिवंडी – जलगांव का खतरा नहीं रहेगा ‘ ‘

और अंत में उनके भीतर की लड़ाई में 1923 में पैदा हुआ आदमी , युद्ध के दौरान पैदा हुए नये आदमी से हार गया , वह मान गये वि पाकिस्तान इसलिए टूटा क्योंकि वहां के शासकों ने आम आदमी की हालत सुधारने की ओर ध्यान नहीं दिया आखिर क्या वजह है कि हम लंदन काहिरा , तेहरान में हुई घटना से उतना प्रभावित नहीं होते , जितना कराँची , लाहौर और ढाका में हुई घटना से ? मैं समझता हूं कि सीमा के उस पार के लोग भी उतनी ही मात्रा में , उसी तरह प्रभावित होते हैं । क्योंकि हमारे पास अतीत की साझी स्मृतियां हैं , उपलब्धियों पर गई और पतन पर साझी.ट ग्लानि भी ! सांस्कृतिक एकता की धारा तो है ही , जो किसी एक राष्ट्र के निर्माण के लिए चाहिए । भारतीय उपमहाद्वीप के करोड लोगों की तरह में भी उस दिन का इंतजार कर रहा हूँ जब डॉ.लोहिया की की आकांक्षाओं के प्रतीक एक हिंदुस्तानी कहलाने का गौरव हमे प्राप्त होगा।”

शा.अ.नवीन, बिलासपुर (म.प्र.) सारिका मासिक,

अक्टुबर 1972 में सारिका में प्रकाशित या चिठ्ठी यह बताती है कि एक , ईमानदार और जागरूक पाठक के रूप में साहित्य की दुनिया में मैं सक्रिय हुआ नये इंसान के रूप में ‘ नवीन ‘ उपनाम के साथ ! कुछ दिनों बाद सारिका के एक अंक में रूसी लेखक चेखव की कहानी ” गिरगिट ” का अंग्रेजी से संक्षिप्त रूपान्तर भी इसी नाम से प्रकाशित हुआ और पारिश्रमिक के अनमोल रूपये 25 /मनीआर्डर से मिले । मेरे छात्रजीवन से साहित्य में रूचि की शुरुआत और पहले हो चुकी थी , जब गर्मी की छुट्टियों में सारिका , दिनमान , नवनीत , कादम्बिनी धर्म युग , ब्लिट्ज आदि पत्र पत्रिकाओं के पसंद व रूचि के निबंध , रचनाएं डायरी में उतारता चलता ! पत्र पत्रिकाओं को स्कूल के जेब खर्च से खरीदकर पढ़ता रहा , इकट्ठा करता गया ।

विज्ञान का विद्यार्थी होने के बावजूद साहित्य मेरे रुचिकर विषयों में एक था । ज्ञान विज्ञान के अलावा जनरल नॉलेज के तथ्यों का खजाना मेरे पास हमेशा रहा , जिसने विज्ञान की अंतिम स्नातक कक्षा में मेरी क्लास को शील्ड दिलवाया ! तभी जनवरी 1975 में , दिलीप भट्टाचार्य मेरे सहपाठी से ‘ बंगला ‘ भाषा पढ़ना लिखना , बोलना सीखने के बाद हिन्दी के प्राध्यापक डॉ . राजेश्वर सक्सेना से मित्र दिलीप के घर पर ही दीदी भारती भट्टाचार्य , राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक ने परिचय करवाया । मैं अब अक़्सर, डॉ.राजेश्ववर जी के पास शाम को बैठने लगा । उन्होने बताया कि ज्ञानविज्ञान की दुनिया में जिस तरह प्राकृतिक विज्ञान ( Natural Science ) में फिजिक्स , केमेस्ट्री , खगोल विज्ञान , गणित , अणुविज्ञान है , सभी एक दूसरे से बंधे हुए हैं , निर्भर है । उसी तरह सामाजिक विज्ञान ( Social Sciences ) में भी कई विभाग हैं – राजनीति विज्ञान , मनोविज्ञान , सौंदर्यशास्त्र , समाजशास्त्र , साहित्य नृतत्वशास्त्र ( एथ्रोपोलॉजी ) , इतिहास शास्त्र , पुरातत्व आदि ! इन सब में आपस में निर्भरता है , वे एक दूसरे से बंधे हुए हैं । डॉ . राजेश्वर जी ने मुझे डॉ . राममनोहर लोहिया के राजनैतिक चिंतन का अंग्रेजी के ग्रंथों के द्वारा परिचय कराया , फ्रायड की मूल रचनाओं , कार्ल गुस्ताव रांग , एडलर की मूल किताबें अंग्रेजी में पढंने को दी । मैंने पढ़ा और नोट लेकर पढ़ने की आदत डाली । हरबर्ट गारक्यू के इरोज एण्ड सिविलाइजेशन भी पढ़कर नोट्स लिए ।

शाकिर अली की तीसरी पुस्तक जो अभी उद्भावना. प्रकाशन से छप कर आई.
   तभी जून 1975 में बनारस जाना हुआ, मित्र दिलीप के पास जो भी . बी.एच.यू में गणित का शोध छात्र था । मुझसे . डॉ.सक्सेना ने काडवेल की " इल्युजन एड रियलिटी ' ' लंका '   की पुस्तक दुकान से मंगवाई । इस पुस्तक को पढ़कर " सौंदर्यशास्त्र ' ( Aesthetics ) शब्द | अनुशासन का ज्ञान पहली बार हुआ । किस प्रकार साहित्य को मनोविज्ञान , समाजशास्त्र , इतिहास , पोलिटिकल इकॉनामी के झरोखों से देखा जाना चाहिए । अंतर - अनुशासनिक अध्य्यन, ( Inter bisciplinary Studies ) वैज्ञानिक ढंग से साहित्य  कैसे किया जाता है , यह तब जाना ! ,जुलाई 75 में एम . ए . हिन्दी साहित्य में भर्ती हुआ,डॉ. राजेश्वर जी का पट्ट शिष्य बना । 02 नवम्बर 75 में रायपुर में शासन साहित्य परिषद के सचिव श्री शानी जी द्वारा आयोजित कबीर उत्साव"  में शामिल होने आये,  सतना के प्रोफेसर कमलाप्रसाद पांडेय , बिलासपुर पहुंचे । हम सब लोगों से , छात्रों से । प्रोफेसर गुलाबसिंह ने मिलवाया । प्रलेस के गठन की बात चली । 01जनवरी 76 में मैंने “वर्ण से लेकर वर्ग तक की यात्रा का समाजशास्त्र ' निबंध लिखा , जिसे टाइप कर डॉ . राजेश्वर जी के निर्देशन में ' पहल ' पत्रिका जबलपुर ( संपादक ज्ञानरंजन , कमलाप्रसाद पांडेय ) को प्रकाशनार्थ भेजा गया । 

तय हुआ कि उसे जाने माने प्रसिद्ध हिन्दी व्यंगकार हरिशंकर परसाई जी को उनके घर पर दिखाया जाये । निबंध लेकर मैंने परसाई जी से जबलपुर में । दिखाकर बहस की , और सतना जाकर दूसरे दिन कमला प्रसाद जी को देकर आया । ज्ञान रंजन जी ने “ Further studies In dying Culture ” क्रिस्टोफर कडवेल की पढने को दी तथा डेविड क्रेग की ” Marxist on Litreture : an Anthology ” भी पढ़ने को दी । मेरा सारा साहित्यिक अध्ययन , अंग्रेजी में भी चलता रहा । तभी अप्रैल 1976 में दिल्ली जाना हुआ । ज्ञान रंजन जी ने जे . एन . यू . जाकर पहल के माक्र्सवादी सौंदर्य शास्त्र अंक 10 – 11 के लिए संदर्भ ग्रंथों की सूची को अंतिम प्रारूप देने , डॉ . नामवरसिंह , विभागाध्यक्ष जे . एन . यू . से मिलने को भेजा । उनसे मिलने की व्यवस्था श्याम कश्यप , संपादक , “ जनयुग ‘ दैनिक दिल्ली तथा उदयप्रकाश शोध छात्र ( हिन्दी ) जे . एन . यू . ने की , जो आज के विश्वविख्यात हिन्दी कथाकार हैं । उदयप्रकाश जी ने चेम्बर में मुझे अकेले डॉ . नामवर सिंह जी से मिलवाया । मैंने मिलकर सूची फाइनल करवाई । तभी पता चला कि उदय प्रकाश जी के शोध कार्य का शीर्षक था – ” डेवलपमेंट ऑफ एगेरियन रिलेशंस आफ्टर ‘ इंडिपेंडेंस विथ रीफरेंस टू फाइव , हिन्दी नावेल्स ” ( आजादी के बाद विकसित कषि संबंधों का विकासः हिन्दी के पाँच उपन्यासों के संदर्भ में ) । इस तरह जे . एन , यू . के एकडेमिक वातावरण के उच्च स्तर का पता चला कि किस तरह अंतर अनुशासनिक अपयन वहां होता है । उसी समय पहल ” और ” उत्तरा ” के अंको में इमरजेंसी को लेकर फाँसीवाद की परिभाषा संबंधी बहस चली . शिरा पर मेरे द्वारा ज्ञानरंजन जी के समक्ष प्रश्न उठाने पर उसका जवाब दिल्ली प्रवास में सोवियत सूचना केन्द्र में कार्यरत श्री बद्रीनारायण तिवारी से मिलने कहा गया । मैं उनसे मिला भी लेकिन संतोष जनक जवाब नहीं मिला । श्री बद्रीनारायण तिवारी के पुत्र प्रोफेसर अजय तिवारी उस समय एम . ए . के छात्र हुआ करते थे । मेरे भी मन में शौक जागा कि मैं भी जे . एन . यू . में एम . फिल में एडमिशन अगले साल लूँ। वह संभव भी हुआ , तब तक ‘ ‘ पहल ‘ ‘ – 7 में मई 1976 में ‘ “वर्ण से लेकर वर्ग तक की यात्रा का समाजशास्त्र ‘ ‘ और ‘ ‘ पहल ‘ ‘ 10 – 11 में 1977 में ” हरबर्ट मारक्यूजः

निषेधात्मक द्वंदवाद का दर्शन ” मेरे दो आलेख प्रकाशित भी हो चुके थे । लेकिन एम . फिल में एडमिशन होने पर भी मैं बैंक की नौकरी छोड़कर उच्च शिक्षा हेतु नहीं जा सका ।

इसी बीच पहल के मई 76 के अंक 07 में छपे मेरे वर्ण से वर्ग तक की यात्रा का समाजशास्त्र ‘ शीर्षक आलेख को लेकर जबलपुर , भोपाल , दिल्ली एवं बम्बई के साहित्यकार एक होकर पहल के संपादक ज्ञानरंजन जी और मेरे लेख के कारण मुझ पर आक्रामक हो गये , सरकारी कानूनी कार्यवाई की मांग भी उठी । । उन सब का विवरण परिशिष्ट में दर्ज है , ताकि उस समय के साहित्यिक माहौल और साहित्य की राजनीति का पता चले । देश भर के लेखकों ने भी समर्थन में प्रस्ताव पारित कर पत्रिका ‘ ‘ पहल ‘ के संपादक की नौकरी बचाई , जेल जाने से रोका ! यह सब इस पुस्तक के परिशिष्ट में प्रकाशित करना मैने इसीलिए जरूरी समझा आखिर यह भी प्रमाणित करता है कि साहित्य किस प्रकार राजनीति , समाज , बौद्धिक वर्ग एवं सामाजिक हलचलों को किस तरह प्रभावित करता है । कादंबिनी , ( मासिक ) धर्मयुग ( साप्ताहिक ) आदि में विरोध में छपता रहा , तो सारिका ( मासिक ) , देशबंधु दैनिक रायपुर , स्वाधीनता साप्ताहिक ( कलकत्ता ) में समर्थन में छपा । ” पहल ‘ पत्रिका भी चर्चा के केन्द्र में आ गई । मैं भी चर्चा में आया । ।

    एम . ए . प्रवीयस की गर्मी की छुट्टियों में रविशंकर यूनिवर्सिटी के द्वारा आयोजित प्रसिद्ध नाटककार हबीब तनवीर के ड्रामा वर्कशॉप में जून 1976 में रायपुर में भाग लेने का अवसर मिला । लौटकर बिलासपुर में " ड्रामा ग्रूप बना " रचना बिलासपुर के नाम से ! इस तरह ड्रामा के रूप में जनआंदोलन की एक कड़ी के रूप में जुड़ गया । छात्रावासों में जाकर छात्र आंदोलन का भी हिस्सा बना । लगातार माक्र्सवाद की किताबों को लेकर बहस मुबाहिसे का माहौल मिलता गया । प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ा , सतना के मध्यप्रदेश राज्य प्रगतिशील लेखक संघ के 22 - 23 मार्च 1976 सम्मेलन में मुझे राज्य कार्यकारिणी का सदस्य चुन लिया गया । 15 अगस्त 1977 को जबलपुर में हुए कार्यकारिणी बैठक में भाग लेकर प्रसिद्ध कवि एवं साहित्यकार त्रिलोचन जी का डेढ़ घंटा लंबा भाषण सुना , सुनकर पता चला कि हमारे अग्रज रचनाकार , जो कई भाषाओं के , खासकर उर्दू , फारसी , अरबी के जानकार थे , शब्दकोश निर्माण से जुड़े थे , अपने अनुभव बताते रहे त्रिलोचन जी ! JNU न जा पाने के बाद मैने प्रोफेसर प्रमोद वर्मा जी को ( रायगढ़ ) पत्र लिखकर पी . एच . डी . हेतु संपर्क किया , उनके पास सीट उपलब्ध नहीं थी । डॉ . मलय ( राजनांदगांव ) के पास भी संपर्क किया , किंतु वहां भी असफल रहा । अंत में डॉ . शिवकुमार मिश्र के पास डॉ . राजेश्वर जी ने सरदार पटेल यूनिवर्सिटी , आणंद , गुजरात भेजा । मेरा वहां रजिस्ट्रेशन हो गया । लेकिन बैंक की नौकरी में गाँव - गाँव घूमना पड़ा , मेरा शोध कार्य अधूरा रह गया । लेकिन मेरा अध्ययन निरंतर जारी रहा भारतीय चिंतन परंपरा " ( लेखक के दामोदरन ) मार्क्सवादी साहित्य चिंतन ( डॉ . शिवकुमार मिश्रा ) , राहुल सांकृत्यायन की “ वोल्गा से गंगा तक " " दर्शन दिग्दर्शन . " डी . डी . कोशाम्बी , देवी प्रसाद चटर्जी रांगेय राघव , रामविलास शर्मा की किताबें भी पढी । ' पहल ' , उत्तरार्ध , कथन उद्घभावना , कलम जैसी विचारोत्तेजक पत्रिकाएं , पढना एवं बांटना चलता रहा । प्रभु जोशी की " एक चुप्पी क्रास पर चढी ' शीर्षक धर्मयुग में छपी पहली कहानी एवं सारिका तथा पहल में छपी कहानियां पढ़कर गई 1973से पत्र मित्र बना , उनसे अप्रैल 1974 में  देवास जाकर मिलकर आया ड्रामा गुप में अशोक मिश्र रायपुर , राजकमल नायक , जयन्त देशमुख जैसे कलाकारों से मित्रता हुई । लेखक संगठन – प्रलेस , जलेस , जसम के हर कार्यक्रम के अलावा " सूत्र ' जगदलपुर , हरकिशोरदास के चिरंजीव दास स्मृति समारोह रायगढ़ , देशबंधू रायपुर . छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य सम्मेलन से भी जुड़ाव निरंतर आज तक बना हुआ है । 

   कविताएं और लेख समय - समय पर प्रकाशित हुये । शानीजी ने भोपाल से प्रकाशित साक्षात्कार ' त्रैमासिक में 1977 में कविताएं छापी । उनसे पारिवारिक संबंध बने भी और टूटे भी ! सव्यसाची जी संपादक ' उत्तरार्ध ' के कारण ग्वालियर , रतलाम , दिल्ली के लेखक सम्मेलन में जाकर वृहत्तर लेखक वर्ग से जुड़ा । सुधीर सक्सेना , उदय प्रकाश , भरत सिंह , राजेश जोशी , मनमोहन , राजेन्द्र शर्मा , उदयशंकर , नरेन्द्र जैन , धीरेन्द्र अस्थाना , हरीश पाठक , शैलेन्द्र शैली , बादल सरोज , रामप्रकाश त्रिपाठी जैसे मित्र बने । और रमेश उपाध्याय , जानकी प्रसाद शर्मा , विजय बहादुर सिंह , सुधीश पचौरी , चंचल चौहान , कर्ण सिंह चौहान , से भी मिलना हुआ । इनकी किताबें पढ़ता रहा । समीक्षा , कविता में रूचि ज्यादा रही । 

   इसी बीच अलखनंदन को जबलपुर से मार्च 1980 में बिलासपुर लाकर एक माह लम्बा ड्रामावर्कशाप भी बिलासपुर में आयोजित किया गया । बकरी ' सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का नाटक माह भर में तैयार हुआ । जिसने बिलासपुर में इप्टा को जन्म दिया । छत्तीसगढ़ में प्रलेस की गतिविधियों से जुड़ा रहा । प्रलेस का राज्य सम्मेलन बिलासपुर में 1985 में हुआ , किंतु मैं बैंक की ट्रेड यूनियन आंदोलन का हिस्सा बनकर लेखन से दूर छिटक गया . 1993 तक ! बैंक की नौकरी में फंसकर ट्रेड यूनियन आंदोलन में तो रहा । बोट क्लब , नई दिल्ली में धरना प्रदर्शनि , हाईकोर्ट सुप्रीमकोर्ट की लड़ाइयाँ भी लडी । देश भर में यूनियन पदाधिकारी के रूप में घूमता रहा । यह अलग कहानी है । लेकिन इसी बीच पत्रपत्रिकाएं , किता , इकट्ठी करना , कपूर वासनिक जी के माध्यम से निरंतर आज से जुड़ा रहना , आंदोलनों के द्वारा भी विश्व , देश , प्रदेश भर से जुड़ाव की निरंतरतारही । लेकिन आधार के रूप में माक्र्स , एंगेल्स , लेनिन , प्लेखानोव , गोर्की , टॉल्सटाय , दातोवस्की, माओत्से तुंग की सैद्धांतिक / साहित्यिक रचनाओं को पढकर बहस भी मित्रों से चलती रही , अपने को अपडेट करने की कोशिश भी आजतक डॉ . राजेश्वर सक्सेना की बैठक में पहुच कर होती रहती है । हर प्लेट फार्म पर चाहे वह साहित्य संगठन का हो या ट्रेड युनियन का , विश्वशांति के

मुददों पर भी लगातार बात होती रही , देश , समाज और विश्व की विभिन्न समस्याओं पर वंद्वात्मक चिंतन कर बहस मित्रों के बीच आज भी चलती है । अभी भी हंस कथादेश , नयापथ , पहल , वागर्थ , आकंठ , अदरपर्व , पाठ , समयान्तर , भारतीय समकालीन साहित्य , दुनिया इन दिनों , फिलहाल , तदभव , पल प्रतिपल , उद्भावना , कतिओर , नया ज्ञानोदय , समकालीन जनमत , बया , शेष , मड़ई आदि । पढना जारी है । इनके पुराने अंकों के साथ – साथ दिनमान , सारिका , उत्तरार्ध , पहल के पुराने अंक भी सम्हाल कर रखे हुए हैं ।

         दिसम्बर 1992 में बाबरी मस्जिद के ढहने के बाद देश में साम्प्रदायिक धुर्वीकरण के तेज होने की शुरूआत हुई । तभी मुझे ग्राम ठठारी , बाराद्वार जिला जांजगीर ( छत्तीसगढ़ ) के मजदूर नेता कामरेड मुरारी सिंह बनाफर ने मुझसे बिलासपुर में भेंट होने पर एक काम सौंपने अपने गाँव बुलाया और मुझे " मेंनस्ट्रीम " ( अंग्रेजी साप्ताहिक नई दिल्ली सम्पादक , निखिल चक्रवती ' ) पत्रिका के तीन अंकों मई - जून 1992 में प्रकाशित डॉ . ए . रहमान ( वैज्ञानिक नई दिल्ली ) के आलेख देकर अनुवाद करने कहा । वह अनुवाद " भारतीय मुसलमान सार्थक दिशा की तलाश के शीर्षक से ' पहल ' एवं ' साम्य ( अंबिकापुर ) पत्रिकाओं ने प्रकाशित किया । यह अनुवाद बहुत चर्चित हुआ । इसी काडवैल की ' इल्यूजन एण्ड रियलिटी ' के प्रथम अध्याय ( Birth of Poetry ) का संक्षिप्त रूपांतरण किया , जिसे वागर्थ पत्रिका ने 2007 में छापा । यह दोनों अनुवादखण्ड में शामिल है । बस्तर घुमते हुए बैंक में चार साल काम करते हुए कविताएं भी ' पहल ' एवं कृतिओर में प्रकाशित हुई , जो फेसबुक में चर्चित हुई , उसी समय 2007 में ! जगदलपुर के साहित्यिक , सांस्कृतिक माहौल ने मुझसे बरतर पर जो कविताएं लिखवा लीं उसके लिए बिजय सिंह , ‘ सूत्र संपादक जगदलपुर के चार साल के साथ का योगदान किसी भी प्रकार कम नहीं था । इसी प्रकार कवर्धा में चार साल 2012 से 2016 तक अजय चंद्रवंशी , नीरज मंजीत , समयलाल विवके , आमदे सर , एवं प्रोफेसर विनय शुक्ला का साथ वहां के सांस्कृतिक एवं साहित्यिक माहौल के निर्माण में बहुत काम आया । 

                   एक खजाना अवश्य हाथ लगा , वो भी डॉ . राजेश्वर सक्सेना एवं नंद कश्यप तथा अन्य मित्रों के साथ निरंतर बहस करके , हर मसले के सभी पहलुओं पर वैज्ञानिक ढंग से , द्वंद्वात्मक ढंग से चिंतन कर निष्कर्षों तक पहुंचने के लिए न सिर्फ़ किताबी अध्ययन , अद्यतन तथ्यों का अध्ययन ,आँकलन , बल्कि जमीनी हकीकतों / आंदोलनों में शमूलियत एवं भागीदारी की हद तक जुड़ाव , खासकर युवा कार्यकतओं , लेखकों , जन संगठन सदस्यों से सक्रिय चर्चा  जैसे कामो में मसरूफ रहकर अपने को अपडेट करना यह शौक के रूप में आज भी व्यतित्व का अंग शुरू से लेकर आज तक बना हुआ है ! अंतर अनुशासनिक अध्ययन , साहित्य , समाज , राजनीति , मनोविज्ञान , अर्थशास्त्र सब को जोड़कर अध्ययन , मनन करने की आदत सोच में शुरू से अब तक मुझमें बनी हुई है।

निरन्तर सीखने की ललक ,प्रशन पूछना,बहस करने की प्रवित्ति ,मेरे नचिकेता स्वभाव का अंग है।

इन सारे आलेखों में सोच की यह विधुतीय /चमक बरकरार रही है , अतः यह पुस्तक पुराने निबंधों से लेकर अद्यतन आलेखों तक सतत एवं जीवंत के लिए बहस का हिस्सा बनी हुई है । और बहस के लिए आमंत्रित करती है । लेकिन द्वन्दात्मक चिंतन की चमक इनमें होने के बावजूद अभी भी ठोस काम बहुत सारा भाकी है , गंभीर किताबों का अनुवाद , डॉ . राजेश्वर सक्सेना पर , श्रीकांत वर्मा,सानी जी प्रमोद वर्मा , हरिशंकर परसाई . डॉ . मलय आदि पर गंभीर लेखन प्रक्रिया जारी है । यह किताब केवल पूर्व पीठिका भर है । इस किताब का कव्हर डिजाइन हेतु मैं भाई रबिन्द्र का आभारी हूँ उन्होंने मेरे दोनो काब्य संग्रह का भी कव्हर बनाया हैं

इस किताब की भूमिका लिखने के लिए बांदा के भाई उमाशंकर सिंह परमार का आभार प्रकट करना एक औपचारिक्ता भर है , जो उनके साथ आत्मीयता को छति पहुंचाने वाला है । उसी प्रकार मेरे गुरू आदरणीय डॉ . राजेश्वर सक्सेना का आशीर्रवचन उनके अस्वस्थ होने के बावजूद मेरे लिए वरदान की तरह है । –

शाकिर अली

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