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वर्धा : हिंदी विश्वविद्यालय में एवीबीपी से यारी, बहुजनों की हकमारी?

पिछले दिनों विवि प्रशासन द्वारा पीएम मोदी को देश के मौजूदा हालात पर सामूहिक पत्र लेखन व बहुजन नायक मान्यवर कांशीराम के परिनिर्वाण दिवस मनाए जाने के कारण 6 बहुजन छात्रों-शोधार्थियों को जब निष्कासित किया गया था, उस वक्त हमलोगों ने कई सवाल उठाए थे. छात्रों के अनुसार उन्होंने तीन दिन पूर्व सामूहिक पत्र लेखन  कार्यक्रम के आयोजन की सूचना दी थी. विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस कार्यक्रम को बाधित करने के लिए एक परिपत्र जारी करते हुए विवि कैम्पस में कार्यक्रम हेतु विवि प्रशासन से अनुमति प्राप्त करना जरूरी बताते हुए बिना अनुमति के कार्यक्रम किए जाने पर अनुशासनिक कार्रवाई की धमकी दी गई और कार्यक्रम करने की अनुमति नहीं दी गई. जब छात्र विवि में निर्धारित तिथि को कार्यक्रम के लिए गए तो विश्वविद्यालय प्रशासन ने उन्हें कार्यक्रम स्थल जाने से रोका. छात्र चंदंसरोज ने बताया कि उन्हें चुनाव आचारसंहिता उल्लंघन व विवि का अनुशासन भंग करने के आरोप में सीधा निष्कासित कर दिया गया था. उसके बाद क्या हुआ, यह पूरा देश जानता है.

आज उसी विश्वविद्यालय प्रशासन ने एक खास किस्म के छात्र संगठन को कार्यक्रम के लिए विश्वविद्यालय का सभागार उपलब्ध कराया है. चंदन सरोज व अन्य छात्रों ने विविश्वविद्यालय के इस दोहरे स्वभाव पर सवाल उठाया है. उनका कहना है कि यदि आचार संहिता के उल्लंघन का ही मामला था तो क्या अब ABVP द्वारा किए जा रहे कार्यक्रम से आचार संहिता का उल्लंघन नहीं हो रहा है?

किसी भी विश्वविद्यालय प्रशासन का अपने छात्रों के साथ यह भेदभाव क्यों?

क्या विश्वविद्यालय एक दल विशेष की जागीर है??

इससे पूर्व विश्वविद्यालय की प्रवेश प्रक्रिया में एवीबीपी से जुड़े फेल छात्रों को भी पास कर नामांकन दिया गया जबकि आरएसएस-भाजपा से इतर विचारधारा वाले संगठनों से जुड़े छात्रों व बहुजन छात्रों को चुन-चुनकर प्रवेश प्रक्रिया से बेदखल कर दिया गया था. विवि के कुलपति एक पार्टी विशेष के एजेंट के तौर पर कार्य कर विश्वविद्यालय की गरिमा व शैक्षणिक-लोकतांत्रिक परिवेश को नष्ट करने का अपराध कर रहे हैं. विश्वविद्यालय में आरएसएस की शाखाएं लग रही हैं किंतु देश के ज्वलन्त सवालों पर छात्रों को आपस में संवाद करने तक की इजाजत नहीं है! ऐसे में विश्वविद्यालय ज्ञान के सृजन व नवाचार के बजाय सड़ांध ही पैदा करेगा. एवीबीपी-आरएसएस-बीजेपी मनुविधान में यकीन रखने वाले जातिवादी-यथास्थितिवादी व सवर्ण वर्चस्व वाले संगठन हैं, ऐसे संगठन प्रतिक्रियादी समाज बनाने के लिए ही कार्यरत हैं. ऐसे संघठनों को सर पर चढ़ाने वाले विश्वविद्यालय प्रशासन की मानसिकता को समझना मुश्किल नहीं है. ये संगठन पूंजीवाद व मनुवाद के एजेंट की भूमिका निभा रहे हैं. छात्र संगठन होने के बाद भी छात्रों के बुनियादी प्रश्नों-बेरोजगारी, शिक्षा के निजीकरण व सार्वजनिक उपक्रमों को मोदी सरकार द्वारा बेचे जाने के मसले पर ये पूरी तरह से चुप हैं. छात्र-युवाओं के इन अहम सवालों पर आंदोलन चलाने के बजाय यह संगठन छात्र-छात्राओं को फर्जी सवालों में फंसा कर सत्ता की ही दलाली कर रहा है.

वर्धा से चंदन सरोज की रिपोर्ट

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