अभिव्यक्ति राजनीति

लड़ाई हमेशा सीएम पीएम के चेहरे पर क्यों होती है, यह अमरीका नहीं फिर भी : देवेश तिवारी अमोरा

19.10.2018

हमारे देश के संविधान निर्माता जब संघीय व्यवस्था बना रहे थे उस दौरान उन्होंने यह तय नहीं किया कि पीएम या सीएम को जनता सीधे वोट करे, कारण था कि पावर ताकत सत्ता का विकेंद्रीकरण बना रहे , व्यवस्था ऐसी बनी कि, मतदाता अपने अपने विधानसभा-लोकसभा से जनता अपना प्रतिनिधि चुने और बहुमत वाले विधायक सांसद मिलकर सदन का नेता तय कर लें वही मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बनेगा।

मगर समय के साथ व्यवस्था वही है मगर नेताओं ने इसे चेहरे पर आधारित कर दिया शुरूआती दौर में यह नेहरू, इंदिरा का तिलस्म रहा कि उनके चेहरे पर वोट मांगे जाते रहे, बाद में अटल अब मोदी के नाम पर वोट मांगे जा रहे हैं।

पहले संचार माध्यमों का अभाव था लोग अपने नेता के बारे में ठीक ठीक नहीं जानते थे अपने विधायक को जानते थे। अब सीधे पीएम या सीएम को जानते हैं कई पिछड़े इलाकों में अपने विधायक को भी नहीं जानते।
दरअसल संचार माध्यमों टीवी, अखबार, सोशल मीडिया, प्रचार तंत्र के जरिये एक एक विधायक की इमेज बनाना मुश्किल है, इसके मुकाबले 1 ही चेहरे को प्रचारित करना और उसे महान साबित कर देना आसान है। 2014 के चुनाव में यह देखा भी गया। कई लोग यह भी कहते देखे गए कि फलां तो मजबूरी है मोदी जी जरूरी है। 

 

फिर जब एक ही चेहरे का चयन करना है फिर संघीय व्यवस्था की जरूरत क्या है अमरीका की तर्ज पर सारे लोग एक नेता को चुनें।  मगर भारत देश मे व्यवस्था अलग है। शायद यही वजह है कि ऊपर वाला जरूरी और स्थानीय जिसे वोट मिलना है मजबूरी , देश के सभी सदनो में दागी सांसद विधायक भरे पड़े हैं।

यह शुरुआत कांग्रेस के जमाने से हुई, मगर आज संचार माध्यमों के विस्तार से इसे कांग्रेस ही भुगत रही है।
किसी राज्य में सीएम या देश का पीएम अपने प्रचार प्रसार के लिए क्या क्या इस्तेमाल नहीं करता, टीवी, रेडियो, अखबार, होर्डिंग, इवेंट, पेड न्यूज, शोशल मीडिया के लिए ट्रोलर्स का खर्च। इन सबका कुल बजट राज्यों में 1 साल का 500 करोड़ से ऊपर होता है। मान लीजिये 15 साल से रमन और कुछ 14 साल से शिवराज सीएम हैं तो 15 सालों में उनके चेहरे, योजना के नाम पर इन्होंने ही बनाया है यह बताने में 500 x 15 =7500 करोड़ रुपए खर्च किये गए हैं। यह खर्च जनसपंर्क विभाग के जरिये होता है इस खर्च के लिए उनका दल पैसे नहीं देता। यह जनता के टैक्स का पैसा होता है।

फिर चुनाव आता है हम जैसे पत्रकार सामने वाले दलों से सवाल पूछते हैं क्यों जी आपका सीएम चेहरा कौन है। वे बता नहीं पाते  क्योंकि जैसे ही चुनाव  चेहरा बनाम चेहरा होगा , 7500 करोड़ बनाम 77 लाख हो जाएगा.
जाहिर है इस जंग में लड़ाई से पहले जीत उस चमकदार चेहरे की हो जाती है, जो कभी गाने, स्लोगन, नारे, वीडियो ऑडियो समायोजन के फ़िल्म, करोड़ो के डोम , पी आर कंपनियों के करोड़ो खर्च कर बुलाये गए रणनीतिकारों के बूते चेहरा चमक रहा है।

फिर भी आपको लगता है लोकतंत्र और संघीय व्यवस्था सलामत है।.लड़ाई जब तक नीति बनाम – नियत , विचारधारा बनाम विचारधारा, विधायक बनाम विधायक की नहीं होगी तब तक वही चेहरा जीतेगा जिस चेहरे पर 75 सौ करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं।
मगर जनता ने तो mass Communication में मास्टर्स नहीं किया है।

जनता तो वह है जो इन्हीं प्रचार माध्यमों के प्रभाव में, राख नमक कोयला दातून छोड़ देती है, फिर कोलगेट लेती है, फिर घूमकर कोल नमक वेदशक्ति वाला कोलगेट इस्तेमाल करने लगती है।

उसे पता ही नहीं चलता कि वह बेवकूफ बन रहा है। वह अपने आज में जीता है। वह विज्ञापनों और सोशल मीडिया के दुष्प्रचार का गुलाम हो चुका है।
फिर भी हम उसके वोट को स्वतंत्र, अप्रभावित और निष्पक्ष ही मानेंगे।
इस तरह एक एक सरकारें लंबे समय तक जमी रहेंगी, वे हटेंगी भी तब जब उनके सामने वाला इससे ज्यादा खर्च करके अपना जनसम्पर्क करे।
इस प्रयोग की कोशिश कांग्रेस ने सर्वाधिक करने की कोशिश की मगर तब संचार माध्यमों का फैलाव नहीं था। 60 साल की उपलब्धियां जनता को याद नहीं है, विशाल बांध जनता को याद नहीं है .. उस बांध से बनी नहर लाइन का उद्घाटन जो आज हुआ है वह याद है। क्योंकि तब बांध की स्मार्ट फोन में तस्वीर नहीं आती थी अब शिलान्यास और उद्घाटन में तब के बांध निर्माण के कुल ख़र्च का दसवां हिस्सा खर्च हो जाता है।

तो लोकतंत्र को मारते रहिये। आपके टीवी और स्मार्टफोन पर आने वाले ब्रेनवॉशिंग वीडियो फर्जी खबरों को पढ़ते रहिए। अपने गधे विधायक सांसद को भी सीएम पीएम का चेहरा देखकर चुन लीजिये, लोकतंत्र मर जायेगा तब तेरहवीं का भोज भी आप ही लपेटेंगे।

*

देवेश तिवारी अमोरा ,वरिष्ठ पत्रकार रायपुर 

Related posts

इस बार 2 अक्टूबर को? (लेखक : विमलभाई NAPM)

Anuj Shrivastava

सीजीबास्केट : वंचितों के विचारों का साझा मंच . अपील ,आप हमें सहयोग करें.

News Desk

आदिवासी नर्सिंग छात्राओं का लंबित प्रशिक्षण शुल्क देने की मांग की माकपा छत्त्तीसगढ  ने

News Desk