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लेनिनः ‘‘मजदूर वर्ग के महान नेता, शिक्षक और दोस्त : आज जब लेनिन की मूर्ति क़ो तोडा गया तो लगा कि लेनिन के बारे में विस्तार से जान ही लिया जाये .

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*त्रिपुरा में जीत के बाद बीजेपी समर्थकों ने लेनिन की मूर्ति को तोड़ दिया। वैसे लेनिन मूर्तियों के मोहताज भी नही। आज भी उनके विचार मेहनतकशों को मुक्ति का रास्ता दिखाते हैं। पर इस बहाने लेनिन का नाम पूरे देश में पहुंचा है। ऐसे मौके पर आइए जान लिया जाए कि लेनिन कौन थे और क्यों संघ मण्डली सहित दुनिया की हर प्रतिक्रयावादी ताकत उनसे खौफ खाती है। इसके लिए हम ‘नागरिक’ अखबार में लेनिन पर छपे लेख को आपके साथ साझा कर रहे हैं। इस आशा के साथ कि आप इसे पढ़कर अन्य साथियों तक भी पहुंचाएगें.

लेनिनः ‘‘मजदूर वर्ग के महान नेता, शिक्षक और दोस्त’’

लेनिन का जन्म 22 अप्रैल, 1870 को एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। उनके पिता प्राथमिक स्कूलों के पहले इंसपेक्टर बाद में डायरेक्टर बने थे। वह जारशाही का जमाना था। उस जमाने में लेनिन के पिता ने शिक्षा के प्रचार-प्रसार को अपना ध्येय बनाया हुआ था। लेनिन की उम्र जिस समय महज सोलह वर्ष थी तब ही उनके पिता का निधन हो गया था।

लेनिन छः भाई-बहन थे। लेनिन के बड़े भाई आलेक्सान्द्र जारशाही के खिलाफ संघर्ष में उतर आये थे। जारशाही के चंगुल से देश को मुक्त कराने के लिए वे एक अतिवादी दल नरोद्नाया वोल्या(जन इच्छा) में शामिल हो गये थे। जार की हत्या के लिए उन्हें फांसी की सजा हुयी थी। लेनिन अपने भाई की वीरता से अवश्य प्रभावित थे पर वे उनके रास्ते से असहमत थे। लेनिन के बाकी भाई-बहन बोल्शेविक बन गये थे।

बहुत छोटी उम्र में ही लेनिन ने रूस के इतिहास व साहित्य से परिचय प्राप्त कर लिया था। वह कई भाषाओं को जानते थे। महज रूसी साहित्यकार, लेखक, क्रांतिकारी चेर्नीशेव्स्की के उपन्यास ‘‘क्या करें?’’ का उन पर अच्छा प्रभाव पड़ा। बाद में कई वर्ष बाद लेनिन ने ‘‘क्या करें?’’ नाम से ही एक किताब लिखी थी जिसने रूस में बोल्शेविक पार्टी के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। इस पुस्तक का क्रांतिकारियों के लिए अतीव महत्व है।

लेनिन एक ऐसे समाज की पैदाइश थे जो जारशाही के चंगुल में कराह रहा था। उस समाज की पैदाइश थे जिसमें भारी उथल-पुथल की जमीन तैयार हो रही थी। उस समाज की पैदाइश थे जिसमें उन्नीसवीं सदी के एक से बढ़कर जहीन दिमाग मौजूद थे। चेर्नीशेव्स्की की चर्चा तो हमने अभी की। टालस्टाय और उनके समकालीन कई और चर्चित लेखक, साहित्यकार रूस की आत्मा और भविष्य को टटोल रहे थे।

सही रास्ता रूस को तब मिला जब वहां माक्र्सवाद का प्रसार शुरू हुआ। प्लेखानोव ने इसमें बड़ी भूमिका निभायी थी। उन्होंने मार्क्स, एंगेल्स की पुस्तकों का अनुवाद करने के अलावा, उस आंदोलन की खूब आलोचना वैज्ञानिक ढंग से की थी, जिसके कारण लेनिन के बड़े भाई को फांसी की सजा हुयी थी।

लेनिन ने माक्र्सवाद को बहुत तेजी से ग्रहण कर लिया था। यह जानकर उस किसी को भी आश्चर्य हो सकता है जिसने मार्क्स की ‘‘पूंजी’’ को पढ़ने व समझने की सफल-असफल कोशिश की हो कि लेनिन ने महज अठारह साल की उम्र में इस पुस्तक को पढ़ व समझ लिया था। इसका परिणाम यह हुआ कि उन्होंने उस जमाने में रूस के गुप्त मार्क्सवादी समाजों में प्रवेश और उनको नेतृत्व देना शुरू कर दिया।

1899 में अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण निर्वासन का जीवन जीते हुए उन्होंने अपनी मशहूर किताब ‘रूस में पूंजीवाद का विकास’ लिखी थी। इस किताब में लेनिन ने बता दिया था कि रूस का रास्ता क्या है। इसने नरोद्वादी आंदोलन की नींव ही खोद दी थी।

लेनिन ने रूस में बिखरे हुए माक्र्सवादी दलों को एकजुट करने के लिए प्लेखानोव सहित अन्य लोगों के मध्य भारी मेहनत की। 1898 में रूस की सोशल लेबर डेमोक्रेटिक पार्टी की स्थापना की। इसी बीच ‘इस्क्रा’ (चिंगारी) नाम से बाद में मशहूर अखबार निकाला।

रूस के क्रांतिकारी आंदोलन के विकास में लेनिन के कानूनी माक्र्सवादियों व अर्थवादियों से संघर्ष की अहम भूमिका है।

लेनिन की पुस्तक ‘‘क्या करें’’ ने रूस में बोल्शेविक पार्टी की नींव डाली। इस पुस्तक में लेनिन ने अर्थवादी (जो आर्थिक संघर्षों के पीछे भागते, राजनैतिक-वैचारिक संघर्षों की तौहीन करते थे, हमारे देश के आज के भाकपा-माकपा आदि की तरह), ट्रेड यूनियनवादी, नौसिखियेपन की आलोचना की। और बताया कि पेशेवर क्रांतिकारियों की रीढ़ के बिना क्रांतिकारी आंदोलन नहीं खड़ा हो सकता है। पेशेवर क्रांतिकारियों से लेनिन का आशय ऐसे व्यक्तियों से था जिनका पेशा ही क्रांति करना हो। और वे अपने पेशे में दक्ष हों। क्रांति की सैद्धान्तिक जानकारी से लेकर व्यवहारिक प्रश्नों को हल करने में सिद्धहस्त हों। और पेशेवर क्रांतिकारियों को आधार बनाकर उन्होंने अजेय बोल्शेविक पार्टी का गठन कर भी डाला।

और बोल्शेविक पार्टी एक ऐसी पार्टी थी जो रूस के मजदूर वर्ग की पार्टी थी। इस पार्टी ने रूस में हुयी तीनों क्रांतियों में मजदूर वर्ग को संगठित किया व नेतृत्व किया। रूस में 1905-07 में पहली क्रांति हुयी थी जो कि असफल रही और जारशाही का तख्ता नहीं पलट सकी थी। दूसरी क्रांति फरवरी 1917 में हुयी थी। वह सफल रही उसने जारशाही का तख्ता उलट दिया था। पर यह भी उतनी सफल नहीं रही थी क्योंकि इसके बाद सत्ता पर पूंजीपतियों व भूस्वामियों का कब्जा हो गया था।

तीसरी क्रांति ‘महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति’ जिसने सत्ता से पूंजीपतियों को बेदखल कर मजदूर-किसानों-सैनिकों का राज कायम किया। समाजवाद की स्थापना की थी।

लेनिन के नेतृत्व व सही दिशा के बिना ‘महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति’ सम्भव नहीं हो सकती थी।

अपनी मशहूर किताब ‘‘क्या करें?’’ में लेनिन ने कहा था ‘‘क्रांतिकारी नेतृत्व के बिना क्रांतिकारी आंदोलन असम्भव है।’’ यह बात सोलह आने सच साबित हुयी। क्योंकि रूस की बोल्शेविक पार्टी क्रांतिकारी सिद्धान्त से लैस थी इसलिए वह क्रांति करने में सफल हुयी। और वह इसलिए सफल हुयी क्योंकि लेनिन ने हर कदम पर पार्टी को क्रांतिकारी सिद्धान्त से लैस किया था।

माक्र्सवाद के क्रांतिकारी सिद्धान्त पर रूस के भीतर ही नहीं बल्कि विश्व के स्तर पर हमला बोला जा रहा था। कोशिश की जा रही थी कि माक्र्स के क्रांतिकारी विचारों को साधारण बातों में इस आधार पर तब्दील कर दिया जाये कि अब जमाना बदल गया है, कि माक्र्स की बातें पुरानी पड़ गयी हैं, कि पूंजीवाद में ऐसे परिवर्तन आ गये हैं कि अब यहां चुनाव होते हैं ताकि चुनाव में सबको मत देने के अधिकार के चलते यह सम्भव हो गया कि बहुमत की सरकार बने। क्योंकि मजदूर वर्ग समाज में सबसे बड़ा वर्ग है। अतः आसानी से वह अपनी सरकार बना सकता है। इस तरह शांतिपूर्ण ढंग से पूंजीवाद से समाजवाद में जाया जा सकता है। क्रांति की कोई आवश्यकता नहीं है। क्रांति बीते जमाने की बात हो गयी। लेनिन ने अपनी कई रचनाओं के द्वारा इन बातों का खण्डन किया।

हम भारत में आजकल रोज ऐसी बातें शासकों के मुंह से सुनते रहे हैं। नेहरू, लोहिया, इंदिरा गांधी से लेकर भाकपा-माकपा-भाकपा (माले-लिबरेशन) इस तरह की बातों का प्रचार करते रहे हैं। ये नहीं चाहते कि पूंजीवाद समाप्त हो और समाजवाद आये।

लेनिन ने उस जमाने के मशहूर माक्र्सवादियों काउत्सकी, प्लेखानोव आदि जैसे लोगों का तीव्र विरोध किया जो क्रांति से धोखा कर रहे थे। उन्होंने सैकड़ों लेख लिखे और दर्जनों पुस्तकों की रचना की जिसके जरिये उन्होंने क्रांतिकारी सिद्धान्त को प्रस्तुत किया।

लेनिन के द्वारा प्रस्तुत क्रांतिकारी सिद्धान्त का ही प्रभाव था कि रूस का क्रांतिकारी आंदोलन लगातार सही दिशा में आगे बढ़ता रहा। उसने हर तरह के उतार-चढ़ाव देखे पर उसकी प्रगति को कोई नहीं रोक सका।

कभी माक्र्स ने कहा था,‘‘दार्शनिकों ने विभिन्न विधियों से विश्व की केवल व्याख्या ही की है, लेकिन प्रश्न विश्व को बदलने का है’’।

लेनिन जो कि माक्र्स के सच्चे अनुयायी थे, जानते थे कि विश्व को बदलने का कार्य माक्र्स की शिक्षाओं के आधार पर ही हो सकता है। और कोई रास्ता नहीं है। यही बात आज भी लागू होती है।

लेकिन लेनिन लकीर के फकीर नहीं थे। वे जानते थे कि बदलती हुयी दुनिया में क्रांतिकारियों को कैसे माक्र्सवाद का प्रयोग करना चाहिए वे जानते थे कि माक्र्सवाद एक विज्ञान है। विज्ञान का तकाजा है कि वह तथ्यों से प्रस्थान करे। तथ्यों की छानबीन करे। और तथ्यों से जो ऐसी नयी बातें सामने आती हैं, जो सत्य और सटीक हैं, उन्हें विज्ञान में शामिल करेे। सिद्धान्त का दर्जा दें।

उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशकों में पूंजीवाद के चरित्र में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन आना शुरू हो गया था। विशाल एकाधिकारी घराने ट्रस्ट, सिंडीकेट आदि के रूप में प्रकट होने लगे थे। औद्योगिक पूंजी और बैंकिंग पूंजी एक होकर वित्तीय पूंजी में तब्दील हो रही थी। और यह वित्तीय पूंजी इतनी शक्तिशाली होती जा रही थी कि यह राष्ट्रों का भविष्य तय करने लगी थी। अपने हितों के लिए न केवल सरकारों से अपनी मन की नीतियां बनवाती थीं बल्कि सरकारें किसकी, कब बनेंगीं, ये भी तय करने लगी थी।

लेनिन ने इसे पूंजीवाद की उच्चतम अवस्था साम्राज्यवाद कहा। और बताया कि साम्राज्यवाद की इस अवस्था में युद्ध, गृहयुद्ध अनिवार्य हैं। उन्होंने कहा कि साम्राज्यवाद सर्वहारा (मजदूर) क्रांतियों का युग है। इस संदर्भ में लेनिन की किताब ‘‘साम्राज्यवाद पूंजीवाद की उच्चतम अवस्था’’ पढ़ने योग्य है। लेनिन की बातें कई देशों में छिड़े गृहयुद्ध के अलावा पहले और दूसरे विश्वयुद्ध के रूप में एकदम सटीक बैठी। और उसके बाद की दुनिया में साम्राज्यवाद द्वारा थोपे गये युद्धों में इसे देखा जा सकता है कि कैसे वित्तीय पूंजी अपने हितों के लिए किसी भी देश की सरकार को खरीद सकती है और कैसे किसी भी देश को तबाह-बर्बाद कर सकती है। इराक, अफगानिस्तान, लीबिया, सीरिया, सोमालिया, कांगो आदि तो पिछले कुछ वर्षों के ही उदाहरण हैं।

लेनिन ने यदि पूंजीवाद की इस नयी अवस्था का सही और वैज्ञानिक अध्ययन और सूत्रीकरण नहीं किया होता तो क्रांतिकारी आंदोलन कदाचित अंधेरे में ही भटकता रहता। बोल्शेविक पार्टी रूस में समाजवादी क्रांति करने में सफल नहीं हो पाती।

लेनिन ने यह भी बताया था कि युद्ध दो तरह के होते हैं। एक न्यायपूर्ण और दूसरा अन्यायपूर्ण। जो युद्ध साम्राज्यवादी थोपते हैं या वे आपस में लड़ते हैं तो यह युद्ध अन्यायपूर्ण हैं। लेकिन जब शोषित उत्पीड़ित जनता अपने लुटेरे शासकों या कब्जे को आतुर साम्राज्यवादी ताकतों से लड़ती है तो वह न्यायपूर्ण युद्ध होता है। जब वियतनाम की जनता अमेरिकी साम्राज्यवाद को अपने देश से खदेड़ने के लिए युद्ध लड़ती है तो वह न्यायपूर्ण युद्ध था। कल को भारत, पाकिस्तान या चीन के शासक देश को युद्ध की ओर धकेलते हैं तो यह अन्यायपूर्ण युद्ध होगा। न्यायपूर्ण युद्ध वह होते हैं जो जनता के हित में होते हैं। उसकी राष्ट्रीय मुक्ति से लेकर पूंजीवाद से मुक्ति के लिए लड़े जाते हैं। इन न्यायपूर्ण युद्धों को पूरी बीसवीं सदी में देखा जा सकता है। पहले व दूसरे विश्वयुद्ध के अन्यायपूर्ण युद्धों के बीच व बाद में दुनिया के मजदूरों व किसानों ने शासकों के खिलाफ न्यायपूर्ण युद्ध छेड़कर कई देशों में समाजवाद की स्थापना की तो कई देशों में आजादी हासिल की।

लेनिन के व्यक्तित्व को समझना है तो इस तरह से समझा जा सकता है। कभी राहुल सांकृत्यायन ने लेनिन की जीवनी लिखी थी। और उस जीवनी में राहुल ने बताया था कि लेनिन अक्सर कवि नेक्रासोफ के इन शब्दों को दोहराते थे,

‘‘हम सुनते सम्मान की आवाज

नहीं मीठे प्रशंसा के शब्दों में

बल्कि बर्बर हल्ले और निंदा में!’’

और यह बात सही है कि पूंजीपति वर्ग और उसके टुकड़ों पर पलने वाले जब माक्र्स, लेनिन, स्तालिन पर हमले करते हैं तो यह समझा जाना चाहिए कि वे पूंजीवाद के महान शत्रुओं के लिए सम्मान व्यक्त कर रहे हैं। वे जानते हैं कि जिस दिन फिर से दुनिया के मजदूर, गरीब किसान, बदहाल नौजवान माक्र्स, लेनिन की आवाज को सुनने लगेंगे उस दिन फिर से उनका स्वर्ग छिन जायेगा। 27 मंजिला इमारत में रहने वाला मुकेश अम्बानी बम्बई की सड़कों पर खाक छानता हुआ मिलेगा।

1914 में जब पहला विश्वयुद्ध छिड़ा तो रूस के जार ने पूरे रूस को इस साम्राज्यवादी युद्ध में धकेल दिया। बोल्शेविकों ने इस युद्ध का पूरी ताकत से विरोध किया। एक समय ऐसा आया कि वह अलग-थलग पड़ गये। लेकिन लेनिन ने सिखाया कि शीघ्र ही जनता इस युद्ध की हकीकत समझ जायेगी।

1916 आते-आते रूस के मजदूरों, किसानों, सैनिकों और युद्ध से त्रस्त महिलाओं को बोल्शेविकों की बातें समझ में आने लगीं। युद्ध में लाखों रूसी सैनिक जो कि किसानों के बेटे थे, मारे गये। फरवरी 1917 आते-आते पूरा रूस जारशाही के खिलाफ हो गया। मार्च, 1917 (नये कैलेण्डर के अनुसार) में जारशाही का तख्ता पलट दिया गया। पहले से ही ताक में बैठे पूंजीपतियों, भूस्वामियों ने सत्ता पर कब्जा कर लिया।

ऐसे वक्त में लेनिन ने मशहूर ‘‘अप्रैल थीसिस’’ दी जिसके जरिये उन्होंने बताया कि अब समाजवादी क्रांति का वक्त आ गया है। नयी पूंजीपतियों की सरकार ने जारशाही की नीतियों को ही जारी रखा। पहले विश्वयुद्ध से रूस को अलग नहीं किया। और ज्यादा बड़े पैमाने पर युद्ध की तैयारियां कीं।

मजदूर, किसान, सैनिक पूरी तरह से बोल्शेविकों के प्रचार और जीवन की हकीकत को देखकर युद्ध के खिलाफ हो गये। ‘‘शांति’’ के नारे गूंजने लगे। पूंजीपतियों की सरकार डांवाडोल होने लगी।

ऐसे मौके पर लेनिन ने समाजवादी क्रांति की ठोस योजना बनायी और वे स्वयं क्रांति का नेतृत्व करने लगे। 7 नवम्बर, 1917 को रूस में क्रांति प्रारम्भ हो गयी। ‘‘शांति’’ ‘‘रोटी’’ और ‘‘जमीन’’ की मांगों को क्रांति ने तुरन्त पूरा किया। सदियों से गुलाम महिलाओं व जारशाही के चंगुल में पिस रही राष्ट्रीयताओं को आजादी व बराबरी दी। फिनलैण्ड जिस पर जारशाही ने कब्जा किया हुआ था उसे तुरन्त आजाद कर दिया।

रूस की समाजवादी क्रांति को कुचलने के लिए देशी-विदेशी ताकतें एक हो गयीं। चौदह देशों की सेनाएं अलग-अलग दिशाओं से उस पर आक्रमण करने लगीं। लेकिन लेनिन के नेतृत्व में बोल्शेविकों ने बहादुरी और बुद्धिमानी से इस लड़ाई में जनता का नेतृत्व किया। कई वर्षों तक युद्ध चला पर अंततः मजदूर, किसान, जीत गये और साम्राज्यवादियों और जार के बचे-खुचे जनरलों को मुंह की खानी पड़ी।

लेनिन जहां जनता की आंखों के तारे थे वहां दुश्मनों की आंखों में सदा चुभते थे। उनकी हत्या की कई बार दुश्मनों ने कोशिशें कीं। 30 अगस्त 1918 को एक आतंकवादी ने हमला किया। इस हमले में लेनिन बुरी तरह से घायल हो गये। वे उस समय बच गये परन्तु उनके स्वास्थ्य पर इसका बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। और अंततः करीब छः साल बाद यही उनकी मृत्यु का कारण बना। 21 जनवरी, 1924 को लेनिन की मृत्यु हो गयी।

लेनिन की मृत्यु से पूरी दुनिया की जनता खासकर मजदूरों, क्रांतिकारियों में शोक की लहर दौड़ गयी। लेनिन ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने हजारों-हजार लोगों को क्रांति की राह दिखायी थी। स्वयं हमारे देश के महान क्रांतिकारी शहीद भगतसिंह लेनिन से प्रभावित थे।

‘महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति’ के सौ वर्ष बाद आज भी लेनिन दुनिया के क्रांतिकारियों, मजदूरों को राह दिखा रहे हैं। वे, उनकी पुस्तकें, लेख क्रांति के विज्ञान को जानने के लिए अति आवश्यक है।

लेनिन की मृत्यु के बाद सुप्रसिद्ध फ्रांसीसी लेखक आॅरी बारबूस की बात एकदम सही है,

*‘‘वह समूची रूसी क्रांति के अवतार थे, जिसे उन्होंने अपने दिमाग से सोचा, उसके लिए तैयारी की और उसे जन्म देकर उसकी रक्षा की। लेनिन इतिहास निर्माताओं में सर्वश्रेष्ठ और सभी बातों में शुद्धतम पुरुष थे। उन्होंने मानवता के लिए उससे कहीं अधिक काम किया, जितना कि उनसे पहले किसी ने किया था।’’

(राहुल सांकृत्यायन लिखित लेनिन की जीवनी से)*

लेनिन की प्रशंसा में बहुत कुछ कहा जा सकता है पर असल सवाल उस दुनिया को बदलने का है जिसे बदलने के लिए लेनिन ने अपनी ऊर्जा, मेधा, जीवन लगा दिया।

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http://www.enagrik.com/news.php?n=1711160801

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