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लव जिहाद: सबकुछ फ़िल्मी हुआ तो हमने रिपोर्टिंग भी ज़रा फ़िल्मी ही कर मारी

नेताजी का रसूख़ > कोर्ट का आदेश

लव जिहाद के नाम से दुष्प्रचारित किए गए छत्तीसगढ़ के अंजलि-आर्यन प्रेम विवाह मामले में अब तक की स्थिति से ऐसा लगता है कि संविधान, कानून, न्याय, मानव अधिकार और हमारी ज्यूडिशियरी भी नेताजी के रसूख़ के नीचे दबी जा रही है।

माननीय छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के आदेशानुसार बीते कल अंजलि को रायपुर के सखी वन स्टॉप सेंटर से रिहा कर दिया जाना चाहिए था। पुलिस की मौजूदगी में अंजलि जहां और जिसके साथ जाना चाहती हो उसे वहां भेजने का आदेश था। लेकिन आदेशानुसार कार्यवाही नहीं की गई। इसके लिए दोपहर एक बजे का समय बताया गया था।

बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना

स्टोरी कव्हर करने हम जब सखी सेंटर रायपुर पहुँचे तो भाजपा प्रवक्ता गौरीशंकर श्रीवास सेंटर के अंदर ही बैठे हुए थे। उन्होंने मीडिया को दिए बयान में इस प्रक्रिया के लिए आपत्ति जताई।

भई! लड़का-लड़की दोनो बालिग हैं, कोर्ट ने कहा दिया है कि लड़की जहां चाहे वहां राह सकती है, अब वैसे तो इस बात पे किसी को आपत्ति करना बनता नहीं है। पर…चलो आपत्ति करता भी तो परिवर करता!…भाजपा के कोई नेताजी महिलाओं के लिए बनाए गए सखी सेंटर में आकर बैठ जाते हैं और माननीय उच्च न्यायालय द्वारा तय की गई प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर उसे रोकने की बात करते हैं…!

लव जिहाद के नाम से दुष्प्रचारित किए गए छत्तीसगढ़ के अंजलि-आर्यन प्रेम विवाह मामले में आज की स्थिति से ऐसा लगता है कि…

Posted by सीजी बास्केट on Sunday, 17 November 2019

बस ऐसे ही एक मुहावरा याद आ रहा है “बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना”

ख़ैर नेताजी का वहां होना कोई बुरी बात नहीं है। अजीब ये है कि नेताजी आपत्ति करते हैं और प्रशासन माननीय उच्च न्यायालय के आदेश का पालन करना छोड़ नेताजी से सहमत होकर कार्यवाही टाल देता है।

कोर्ट के कहे अनुसार अंजलि को जाने देने की प्रक्रिया पूरी नहीं की गई उसे रोक दिया गया है, और ऐसा किए जाने का कोई ठोस कारण भी नहीं बताया गया। किसी और को न सही, कम से कम अंजलि को तो कारण बताया ही जाना था शायद।

इससे ये सवाल तो उठता ही है कि क्या हमारे सिस्टम में नेताजी(सारे नेताजी) का स्थान न्याय व्यवस्था से भी ऊपर है?
यदि ऊपर है तब तो ठीक है, पर यदि न्याय व्यवस्था ऊपर है तब तो इस घटना पर सेवाल किए ही जाएंगे।

Google serch

नेताजी का इतना रसूख़, और ज़बरदस्त असर देख कर हम उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाए और उनका नाम गूगल पर सर्च किया।
पहली ही ख़बर एक महिला पुलिस अधिकारी को धमकाने के मामले वाली दिखी।
Hmmmmmmmmmm….अच्छाsssssss

अगस्त 2019 की एक ख़बर बताती है कि नेताजी पर एक महिला पुलिस अधिकारी को धमकाने के मामले में FIR दर्ज हुई थी।
ज़ोमैटो के एक डिलीवरी बॉय ने नेताजी पर आरोप लगाया था कि उन्होंने अपनी कार से उसकी बाइक को टक्कर मारी और फिर उसके साथ गाली-गलौच भी की। डिलीवरी बॉय ने तेलीबांधा थाने में इसकी शिकायत की थी। इसी मामले में उनपर ये आरोप था कि उन्होंने केस न दर्ज करने के लिए प्रभारी महिला पुलिस अधिकारी को धमकी दी।

एक और ख़बर इसी ख़बर के आगे की थी, वो ये कि महिला पुलिस को धमकाने वाली ख़बर जब एक वेब पोर्टल ने प्रकाशित की तो नेताजी ने उस वीडियो जर्नलिस्ट को दलाल और दो कौड़ी का पत्रकार कह दिया। प्रेस क्लब ने इस मामले की शिकायत भी की थी।

आठ महीनों से सखी सेंटर में कैद अंजलि ने उम्मीद की थी कि कोर्ट के आदेश के बाद आज उसे इस कैद से आज़ादी मिल जाएगी पर कोर्ट के आदेश को रसूख़ के नीचे दबता देख उसने पुलिस अधीक्षक महोदय को पत्र लिखकर सहायता मांगी:-

प्रति श्रीमान पुलिस अधीक्षक महोदय रायपुर छ.ग.

विषय – मेरे पिता अशोक जैन द्वारा माननीय उच्च न्यायालय के पारित आदेश दिनांक 15 11 2019 की कार्रवाई को बाधित करने के प्रयास को दूर करते हुए मेरी स्वतंत्रता करने बाबत ।

महोदय,
आपसे सादर निवेदन है कि मेरे पिता अशोक जैन जो कि मुझे जान से मारने की कोशिश कर चुके हैं, जिसकी शिकायत मेरे द्वारा की गई थी और अभी तक f.i.r. के लिए लंबित है। माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष आदेश दिनांक 15 11 2019 के पारित होने के समय मेरे पिता के अधिवक्ता श्री प्रकाश तिवारी मौजूद थे जिनके माध्यम से आदेश की जानकारी और उसमें दिए गए निर्देश की पूरी जानकारी मेरे पिता द्वारा रखने के बावजूद जानबूझकर षड्यंत्र पूर्वक ढंग से अपना एवं मेरी बहन तथा मेरी माता के मोबाइल को बंद करवा दिया गया, तथा घर में ताला लगाकर कहीं चले गए आज मुझे ज्ञात हुआ है कि उनके अधिवक्ता द्वारा मेरे अधिवक्ता को कल दिनांक 18.11. 2019 को माननीय सर्वोच्च न्यायालय मे लंबित प्रकरण की मेन्शनिंग करने की मोबाइल पर सूचना दी गई है। ऐसा उन्होंने जानबूझकर माननीय उच्च न्यायालय के निर्देशानुसार मेरी स्वतंत्रता को बाधित करने के लिए साजिश रचा है, और दिल्ली चले गए हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि मेरे पिता अशोक जैन यह नहीं चाहते कि मैं कोई निर्णय लूं मेरे पिता माननीय उच्च न्यायालय के आदेश का पालन में सहयोग नहीं करना चाहते हैं अतः उनके जानबूझकर इस प्रक्रिया से बचने के कार्य को और मेरे धमतरी स्थित घर में चस्पा की गई सूचना को आधार मानते हुए तत्काल सखी सेंटर रायपुर से मेरी स्वतंत्रता सुनिश्चित करने का कष्ट करेंगे।
आवेदिका
अंजली आर्य

अंजलि के वकीलों ने मीडिया को बताया कि अंजलि को आज़ाद न होने देने के लिए ये उसके परिवार वालों की साज़िश है। उन्होंने ये भी बताया कि आदेश के अनुसार परिवार वालों का वहां उपस्थित होना आवश्यक नहीं है, अंजलि की मर्ज़ी हो तो वो अकेले भी जहां चाहे जा सकती है, दोनों पक्षों में से किसी का भी उसके साथ होना अनिवार्य नहीं है।

अंजलि के वकीलों ने मीडिया को बताया कि अंजलि को आज़ाद न होने देने के लिए ये उज़के परिवार वालों की साज़िश है

Posted by सीजी बास्केट on Sunday, 17 November 2019

पुरानी फिल्मों में गाल में मस्सा लगाकर लोग अपना रूप बदल लेते थे और कोई उन्हें पहचान भी नहीं पाता था। ऐसे ही जब उधार मांगने कोई घर तक आन पड़ता था तो बाप बच्चे से कहता था “बोल दो पापा घर पे नहीं हैं” और बच्चा देनदार से कहता था कि “अंकल पापा कह रहे हैं कि वो घर पर नहीं हैं”

जानकारों का कहना है कि कोर्ट के आदेश को न मानने का कोई कारण नज़र नहीं आता है।

बस एक बात परेशान किए जा रही है कि क्या नेताजी की दखल छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के आदेश से भी बड़ी है….?

जानने लायक एक बात ये भी है कि एक तरफ़ तो नेताजी ने कहा कि लड़की के पिता अशोक जैन व परिवार के अन्य सदस्य अभी दिल्ली में हैं उनसे संपर्क नहीं हो पा रहा है और उन्हें कोर्ट की इस कार्यवाही की सूचना नहीं हो पाई है, वहीं दूसरी तरफ़ अशोक जैन के वकील की तरफ़ से ईमेल के माध्यम से ये जानकारी अंजलि के वकीलों को दी गई है कि वे सोमवार को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट (दिल्ली) में याचिका लगाने वाले हैं। तो क्या बिना आदेश के बारे में मालूम चले ही उसके ख़िलाफ़ याचिका लगाने की तैयारी की जा रही है?…सबकुछ किसी फ़िल्म की कहानी की तरह चल रहा है।

वो ज़ोर से कहता है “ठहरो…”

इसी बीच सखी सेंटर में एक और शख़्स आए। मालूम चला कि उनका नाम राजेश पंचारिया है। पंचारिया जी ने कहा कि वो अंजलि के पिता के भांजे हैं और इसी नाते उन्होंने लिखित आपत्ति पुलिस स्टेशन और सखी सेंटर में दी है। हम जबतक वहां मौजूद थे तबतक उन्हें शिकायत की पावती नहीं दी गई थी, पर सुना तो उन्हें बराबर गया।

पुरानी फ़िल्मों में कचहरी का सीन याद कीजिये। जिरह चल रही होती है। विलेन का वकील दूसरे पक्ष के गवाह से चिल्ला-चिल्ला कर उससे सवाल कर रहा होता है, पीड़िता का वकील बार-बार ऑब्जेक्शन माएलार्ड कह रहा होता है, जज साहब ऑब्जेक्शन ओवररूल्ड और सामने बैठे शोर मचाते लोगों के लिए दो बार लकड़ी का हथौड़ा बजाकर ऑर्डर-ऑर्डर कहते हैं, वो फैसला सुनाने ही वाले होते हैं कि तभी कोर्ट रूम में अचानक एक नया शख्स आकर ज़ोर से कहता है…ठहरो…और साहब फैसला लिखना छोड़ उसे सुनने लग जाते हैं…

बाहरहाल, हम आशावादी लोग हैं, हमें कानून व्यवस्था पर भरोसा है और पुलिस प्रशासन पर पूरा विश्वास है कि वो न्याय को रसूख़ के नीचे दबने नहीं देगी। भई सिंघम की यूएसपी चश्मा, बॉडी बुलेट भर थोड़ेइ है…

फिल्मों से बाहर एक आश्चर्य हमेशा बचा रह जाता है!…उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा सुनाए गए आदेश को क्या वाकई, कोई भी इतनी आसानी से टहला सकता है!!!!!!!?????

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