कला साहित्य एवं संस्कृति

लछमनिया का चूल्हा:अस्मिता और अधिकार की चिंता. अजय चंन्द्रवंशी ,कवर्धा .

    समकालीन राजनीति और साहित्य में आदिवासी स्वर तीव्रता से उभर कर आया है; जो स्वाभाविक है. एक लंबे समय तक हाशिये में रख दिये गये वर्ग अपने अधिकार और अस्मिता के लिए सजग हो रहे हैं. अब वे अपनी बात अपनी जुबान से कह रहे हैं. राजनीति हो के साहित्य अब वे ' पर निर्भर' नही रह गए हैं.अवश्य हर 'दूसरा' सन्देहास्पद नही होता और सहानुभूति सच्ची भी होती है; मगर इस बहुरूपिया समय मे 'अपनो' की पहचान कठिन हो गया है.फिर समस्या को देखने और भोगने का अंतर रहता ही है.यानि कविता में आदिवासियों की बात करना, उसको भुनाना एक बात है, और उनके संघर्ष में भागीदार होना दूसरी बात.यह सुखद है कि आदिवासियों में एक युवा पीढ़ी उभर कर आयी है जिनका समकालीन कविता में सार्थक हस्तक्षेप है.

           श्रीमती विश्वाशी एक्का इस वर्ग के युवा कवियित्रियों में अपनी पहचान बना रही हैं. उनकी कविताएं विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं. अब संग्रह आ जाने से बिखरे सूत्रों को जोड़कर एक मुकम्मल तस्वीर देखी जा सकती है.पेशे से प्राध्यापक विश्वासी जी का सम्बंध छतीसगढ़ के सरगुजा-जशपुर क्षेत्र से है.इसलिए उनकी चिंताएं अपने 'क्षेत्र' से प्रभावित होकर भी व्यापक जनजातीय अस्मिता से जुड़ती हैं,क्योकि कमोवेश ये समस्याएं सभी जनजातियों में है.और अंततः ये 'मनुष्यता' को बचाये रखने की समस्याएं हैं.

            इन कविताओं में आदिवासी स्वर के साथ-साथ एक 'स्त्री' की पीड़ा,चिंताएं,हर्ष- विषाद भी हैं, जिसके लिए संघर्ष दोहरा हो जाता है.मगर यहां संघर्ष का स्वरूप थोड़ा अलग है.आदिवासी स्त्री नगरीय जीवन के 'नैतिक बंधनों' से एक हद तक मुक्त होती है.वह पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाती उसे ललकार भी सकती है.'बिरसो' के लिए साही के कांटे केवल 'गहना' नही 'हथियार' भी है.मगर वह हारा हुआ महसूस करती है तो व्यवस्था के विडम्बना से. 'लछमानिया का चूल्हा' का गैस सिलेंडर में बदलना तो दूर उसे जंगल से लकड़ी लाना तक मुश्किल हो रहा है.'फुलबसिया' के लिए सोना पहनने की बात ही क्या जसे छूकर देखना मुहाल है.अवश्य सोना उसके सौंदर्यबोध का हिस्सा नही रहा है, मगर बढ़ते परस्पर सम्पर्क ने इस भाव को बढ़ावा दिया है.जंगल की कठिन जिंदगी में अभ्यस्त होने के बावजूद कई बार अभाव टीस पैदा करती है; 'सुखमतिया' के लिए जीवन मे सुख एक सपना की तरह रह जाता है.उस पर अपनो की बुरी आदतें, रात-दिन शराब में डूबे रहना और पीड़ा देती है. 'बाहरी' से सम्बन्ध अक्सर छलना साबित होता है. कुछ लोलुप तो ऐसी सोच रखते हैं मानो वे 'बिकने को तैयार' बैठी हैं.इन सब के बीच स्त्री का संवेदनशील मन भी है जो साथ निभाने वाला जीवन साथी चाहता है,जो प्रकृति के रंगों से उल्लासित होता है, नाचना चाहता है, गाना चाहता है.

          आदिवासी लोक की बात करते कई कवि केवल उनके गीत-संगीत-नृत्य की मादकता तक ही रह जाते हैं.जंगल के सौंदर्य में उसकी विडम्बना कहीं खो जाती है.यह एक तरह से यथार्थ से मुँह चुराना है.अवश्य प्रकृति और जीवन से रागात्मक लगाव मनुष्य की सहज वृत्ति है,और कवि का उससे जुड़ाव सहज है; मगर अपने समय के 'सच' से आंखे चुराना उचित नही. विश्वासी जी की कविताएं इस मामले में अपने समय को उसकी विडम्बना के साथ व्यक्त करती हैं.आज विकास के इतने दावों के बाद भी आदिवासी क्षेत्रों में 'भूख' समस्या बनी हुई है.जंगल काटे जा रहे हैं, आग लग रही है,लगाई जा रही है,पैदावार नही है,वन-उपजों का उचित मूल्य नही मिलता, कमाने बाहर जाते हैं तो वहां भी  किसी तरह जिंदगी चलती बस है. प्रशासक, नेता,शोधकर्ता सब के लिए वे 'प्रदर्शन' की वस्तु भर रह जाते हैं.स्थिति यह है कि छोटी-छोटी सुविधाएं देकर " छीन लिया सब कुछ/रोटी, कपड़ा, मकान/ और स्वाभिमान भी".

           मगर आदिवासी अब सजग हो रहे हैं,कवियत्री  बार-बार उन्हें सचेत रहने के लिए,अपने अधिकारों के लिए जागृत करने का प्रयास करती है. 'एकलव्य' के मिथक को याद करते हुए कवयित्री पूछती है " लोग कहते हैं/तुमने हँसते-हँसते/ काट दिया था अपना अंगूठा/सच बताना/क्या तुम्हारी अंगूठाविहीन हँसी/ सचमुच निर्मल थी?".कई कविताओं में सांकेतिक रूप से भी यह चिंता प्रकट की गयी है " शेर समूह में शिकार करते हैं/नीलगायों, तुम्हे भी समूह में रहना होगा".

             ये कविताएं आदिवासी जीवन तक ही सीमित नही हैं, इनकी चिंताएं व्यापक हैं. कथ्य की दृष्टि से भी कई कविताएं हैं जो 'अन्य' समूह या जन को सम्बोधित हैं; जिनकी समस्याएं कमोवेश वही हैं.कहीं बाज़ारवाद से खत्म हो रहे लोकजीवन की संस्कृति, बुजुर्गों की उपेक्षा,संस्कृति, पर्यावरण, गजदल से नुकसान, कुत्तो का आतंक की चिंता है तो प्रकृति, प्रेम, भाईचारा, जीवन के रंगीनी की चाह भी है. कवयित्री का मन सहज है, वह प्रकृति के सौंदर्य से आह्लादित होता है.वह केवल निराश नही है,उसके अंदर आशा का दृढ़ स्वर है.उसे विश्वास है "दूर होगा अँधेरा/फिर सुबह होगी"

           इन कविताओं की कहन में सहजता है; भाषा बातचीत के करीब है. कवयित्री बात 'कह' रही है,कविता 'लिख' नही रही. बिंब और रूपक का अतरिक्त आग्रह नही है, सहज रूप से अवश्य आ गए हैं.इनमें 'बौद्धिकता' नही 'उन्मुक्तता' है. 'चिंता' 'उपदेशात्मकता' की हद तक है.इसलिए बहुतों को 'कला' अभाव खल सकता है,मगर जैसा कि कहा जाता है कविता को समझने के लिए फिलॉसफी की नही भावना की जरूरत अधिक होती है.इस दृष्टि से आप इन कविताओं से निराश नही होंगे.

पुस्तक- लक्षमनिया का चूल्हा(कविता संग्रह)
कवि- विश्वासी एक्का
प्रकाशक- प्यारा केरकेट्टा फाउंडेशन,राँची(झारखंड)
मूल्य- 120/


अजय चन्द्रवंशी

कवर्धा(छ. ग.)

मो. 9893728320

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