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रोहित के संस्थानिक हत्या के तीन वर्ष बाद : रोहित की आत्महत्या दरअसल हत्या है  : उत्तम कुमार

18.01.2019
उत्तम कुमार द्वारा दक्षिण कोसल में लिखित आवरण कथा, फरवरी 2016 से.

‘मैं लिखना चाहता था, हमेशा से, विज्ञान के बारे में, कार्ल सगान की तरह और आखिर में बस यह एक खत है जो मैं लिख पा रहा हूं।’ रोहित कभी मरना नहीं चाहा होगा, उम्मीदों और सपनों के साथ जीने वाला कोई भी इंसान कभी चाह भी नहीं सकता। फिर भी, 17 जनवरी को रोहित नहीं रहा। हॉस्टल से निकाले जाने के बाद 15 दिनों से वो अपने चार साथियों के साथ जिस विरोध स्थल पर रह रहा था, वहां से किसी बहाने उठ कर गया और उसने अपनी जान ले ली। उसी छात्रवास के एक कमरे में खुद को फांसी लगा कर जिससे विवि प्रशासन ने उसे निकाल दिया था। पर क्या रोहित ने वाकई आत्महत्या की है?
रोहित की आखिरी चिट्ठी पढ़े तो साफ समझ आता है कि रोहित ने अपनी जान नहीं ली, रोहित की जान ली है जातिव्यवस्था के उस भयावह पिंजर ने जिस पर हमारी तथाकथित लोकतांत्रिक व्यवस्था टिकी हुई है रोहित को अपनी जान लेने के लिए मजबूर किया गया क्योंकि उसने दलितों पर, अपने लोगों पर लगातार किए जा रहे अन्याय के खिलाफ खड़े होने की हिम्मत की। रोहित को अपनी जान लेने के लिए मजबूर किया गया क्योंकि बस दलित मुद्दों की बात पर ही नहीं रूका। उसने इससे भी आगे जाकर एक अक्षम्य अपराध कर डाला था, समाज के हाशिए पर रह रहे सभी वर्गों की लड़ाई लडऩे का अपराध, अल्पसंख्यकों, मजदूरों, औरतों, आदिवासियों, सबकी लड़ाइयों को जोडऩे का, उनमें अपनी आवाज उठाने का अपराध। अंबेडकर स्टूडेंट एसोसिएशन (एएसए) के एक सक्रिय छात्र नेता के तौर पर रोहित ने व्यवस्था को ज्यादा ही चुनौतियां दे डालीं थी।

देश के इन बड़े शिक्षा संस्थानों में ऐसे मेधावी दलित छात्रों की आत्महत्याएं, दरअसल उनकी निर्मम हत्याएं, कोई नई बात नहीं है। हाल के ही वर्षों में ऐसे तमाम उदाहरण मिल जाते हैं जिनमें देश के सर्वश्रेष्ठ शिक्षा संस्थानों में सवर्ण शिक्षकों और छात्रों ने दलित छात्रों को लगातार प्रताडि़त कर उन्हें आत्महत्या करने पर मजबूर किया है। ‘डेथ ऑफ मेरिट’ नाम की डॉक्यूमेंट्री ने 2007 से 2011 तक के सिर्फ चार सालों में ऐसी 18 घटनाओं के आंकड़े दिए थे, जिस पर काफी लम्बी बहस भी चली थी।

उनमें से एक आत्महत्या गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज, चंडीगढ़ के जसप्रीत सिंह की थी। जसप्रीत सिंह एक प्रतिभाशाली छात्र था, जो कभी किसी परीक्षा में असफल नहीं हुआ था, सिवाय अपनी मेडिकल की पढ़ाई के आखिरी साल में। उस साल जसप्रीत के विभागाध्यक्ष ने सिर्फ उसको फेल ही नहीं किया बल्कि बार-बार ऐसा करने की धमकी दी। जसप्रीत एक हद के बाद इस यातना को बर्दाश्त नहीं कर पाया और उसने आत्महत्या कर ली। बावजूद इसके कि उसकी जेल में मिले आखिरी खत में उसने इस निर्णय का जिम्मेदार अपने विभागाध्यक्ष को बताया था, पुलिस ने विभागाध्यक्ष के खिलाफ एफआईआर तक दर्ज करने से इनकार कर दिया। जसप्रीत की मौत और उसके बाद प्रशासन के इस रवैये ने उसकी बहन, जो खुद उस वक्त कम्प्यूटर एप्लीकेशन की छात्र थी, को अंदर तक तोड़ के रख दिया था और उसने भी अपनी जान ले ली।
इन दोनों आत्महत्याओं से उपजे आक्रोश के कारण राष्ट्रीय दलित आदिवासी आयोग ने मामले पर संज्ञान लेते हुए तीन वरिष्ठ प्रोफेसरों की एक समिति बनाई ताकि जसप्रीत की उत्तर पुस्तिकाएं फिर से जांची जा सकें। समिति ने वही पाया जो कह पाने के इंतजार में जसप्रीत दुनिया से चला गया था। यह कि दरअसल वह उत्तीर्ण हुआ था और विभागाध्यक्ष ने उसे जबरन अनुत्तीर्ण किया था। राष्ट्रीय दलित आदिवासी आयोग के हस्तक्षेप के बाद ही पुलिस ने दलित/आदिवासी (अत्याचार निरोधक कानून के तहत विभागाध्यक्ष के खिलाफ एफआईआर दर्ज की, पर व्यवस्था के हाथों मारे गए ज्यादातर दलित छात्रों को इतना, न्याय की एक आभासी सम्भावना, एक झूठी ही सही उम्मीद तक, हासिल नहीं हुई।
देश भर में विरोध के बाद रोहित के मित्रों को विवि में अध्ययन के लिए वापस बुला लिया है यानी उनकी बर्खास्तगी रद्द कर दी गई है। बहरहाल रोहित की आत्महत्या और जातिगत भेदभाव और दुर्भावना के कारण दलित छात्रों को यंत्रणा दे देकर आत्महत्या को मजबूर कर दिए जाने वाली ऐसी तमाम घटनाएं एक जैसी होती हुई भी हकीकतन बहुत अलग हैं। इसलिए कि रोहित को जसप्रीत जैसे सैकड़ों दोस्तों की तरह शैक्षणिक संस्थानों की दीवारों के पीछे छुप कर नहीं खत्म किया गया। रोहित का मामला खराब ग्रेड मिलने का या किसी दुर्भावनापूर्ण शिक्षक द्वारा परीक्षा में फेल किया जाने का भी नहीं था। उसका मामला निवारण या न्यायदोनों के लिए कोई व्यवस्था मौजूद न होने की वजह से साल दर साल अत्याचार सहते जाने, प्रताडि़त होने और अंतत: आत्महत्या कर लेने का भी नहीं था। ऐसा मामला जिनकी खबर समाज तक आत्महत्या हो जाने के बाद ही पहुंचती है। रोहित की आत्महत्या-हत्या इस सबसे अलग थी। वह समाज और लोगों की आंखों के सामने घटती रही, टेलीविजन पे, सोशल मीडिया में, और फिर भी, हम सब, समाज उसको बचा नहीं पाए।
संस्थानों के अंदर ऐसी आत्महत्या-हत्या के शिकार होने वाले छात्र ज्यादातर अकेले होते हैं, पर रोहित अकेला नहीं था। रोहित के पास उसके दोस्त थे, सहकर्मी और साथी थे। ऐसे सतही जिनके साथ संघर्षों का लंबा इतिहास था। रोहित को हॉस्टल से निकाला 5 छात्रों के साथ गया था, पर जब वह निकला तो सिर्फ 5 छात्र नहीं, सैकड़ों छात्रों का एक कारवां निकला था। उसके साथ उसके संघर्ष में शामिल होने, खुले आकाश में सोने, सुबह संघर्ष के गीत गाने, जुलूस निकालने। फिर मसला सिर्फ हैदराबाद विवि परिसर का भी नहीं था। एएसए के साथी जब अपने कैंपस में निकलते थे तब उनकी साझीदारी में देश भर के तमाम छात्र अपने परिसरों में, अपने शहरों की सडक़ों पर उतर आते थे।
ऐसे सशक्त प्रतिरोध आंदोलन का हिस्सा होने के बावजूद, ऐसी साझीदारियों के बावजूद, रोहित को अपनी जान लेनी पड़ी, यही तथ्य इस आत्महत्या-हत्या को इससे पहले की घटनाओं से अलग करता है। इस आत्महत्या-हत्या को आने वाले खतरनाक कल की चेतावनी में बदल देता है।
अगर हम एक बार घटनाओं की उस कड़ी पर नजर दौड़ाए जो रोहित की आत्महत्या-हत्या का कारण बनीं तो शायद देख पाएंगे कि हमारे गणतंत्र के हाशिए पर रहे लोगों के लिए आने वाले दिन कैसे होने वाले हैं? इस मामले की शुरूआत अगस्त 2015 में एएसए द्वारा मोंटाज फिल्म सोसाईटी (दिल्ली विवि) पर एबीवीपी द्वारा किए गए हमले के खिलाफ विवि कैम्पस में विरोध प्रदर्शन के आयोजन से हुई थी। एबीवीपी के फिल्म सोसाइटी पर हमले का कारण था डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘मुजफ्फनजर बाकी है’ का प्रदर्शन। एबीवीपी का गुस्सा लाजमी था, यह फिल्म दंगों में हिंदुत्ववादी फसादियों की भूमिका को सामने लाती है।
सो एबीवीपी की हैदराबाद ईकाई हमले के विरोध से निश्चित तौर पर नाखुश थी और उनके एक नेता सुशील कुमार ने अपनी नाराजगी फेसबुक पर एएसए के साथियों को गुंडा कहते हुए जताई। एएसए समेत तमाम छात्रों के विरोध के बाद सुशील कुमार ने इस टिप्पणी पर लिखित माफी भी मांगी। फिर उसके बाद न जाने क्या हुआ कि अगली सुबह सुशील कुमार ने ये आरोप लगाया की एएसए के तकरीबन 30 सदस्यों ने उस के साथ मारपीट की है जिसकी वजह से उसे अस्पताल में भर्ती होना पड़ा है।
विवि के प्रोक्टोरिअल बोर्ड ने इन आरोपों की जांच की और तमाम अन्य सुबूतों के साथ मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर भी सुशील के आरोपों को बेबुनियाद पाया। बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, ‘सुशील के साथ मारपीट होने का कोई भी सुबूत बोर्ड को नहीं मिला है, न ही श्री कृष्णा चैतन्या से और ना ही डॉ. अनुपमा द्वारा दी गई रिपोर्ट से डॉ. अनुपमा की रिपोर्ट के हिसाब से सुशील की सर्जरी का कोई संबंध किसी भी किस्म की मारपीट से नहीं है।’
जांच के इन नतीजों के बाद बोर्ड ने दोनों संगठनों को चेतावनी देकर मामले को खत्म करने का निर्णय लिया। पर इसके बाद परदे के पीछे फिर कुछ घटा जिससे बोर्ड ने अपनी आखिरी रिपोर्ट में एएसए के सदस्यों को सुशील को शारीरिक क्षति पहुंचाने का जिम्मेदार बताते हुए उसके साथ मारपीट करने के आरोप में रोहित समेत पांच छात्रों को निलंबित करने का आदेश दिया। एएसए ने स्वाभाविक ही इस निलंबन का विरोध किया और तत्कालीन वाईस चंासलर प्रो आरपी शर्मा के साथ जांच प्रक्रिया, तथ्यों और निर्णय के बीच बड़ी असंगतियों पर बातचीत की गई। इस बातचीत के मद्देनजर शर्मा ने भी माना कि एएसए के साथ न्याय नहीं हुआ है और निलंबन का आदेश खारिज करते हुए पूरे मसले की फिर से और निष्पक्षता के लिए एक नई जांच समिति के गठन का आदेश भी दिया।
शर्मा के विवि छोड़ते ही मामले का रूख बदलना शुरू हो गया। नए कुलपति अप्पाराव ने किसी जांच समिति का गठन नहीं किया और एग्जीक्यूटिव काउंसिल द्वारा पांचों छात्रों के निलंबन और छात्रावास से उनके निष्कासन का निर्णय ले लेने तक अंधेरे में रखा। ऐसा क्यों हुआ इसके सूत्र केंद्रीय मंत्री बंदारू दत्तात्रेय के मामले में कूदने और एचआरडी को चिट्ठी लिखने में खुलते हैं।
दत्तात्रेय ने एचआरडी को लिखी अपनी चिट्ठी में विवि में एएसए जैसे ‘जातिवादी, अतिवादी और राष्ट्रविरोधी’ संगठनों से मुक्त करने का अनुरोध किया था। उनके इस आरोपों का मुख्य कारण था संगठन द्वारा याकूब मेमन की फांसी की सजा के विरोध में प्रदर्शन आयोजित करना। शायद उन्हें अंदाजा भी न हो कि यह कारण आनंद ग्रोवर, प्रशांत भूषण, इंदिरा जयसिंह, युग चौधरी, नितया रामकृष्णन, वृंदा ग्रोवर जैसे देश के जानेमाने वकीलों को भी देशद्रोही बना देता है क्योंकि उन्होंने भी इस सजा का विरोध किया था। यह शायद सर्वोच्च न्यायालय को भी देशद्रोही ठहरा दे क्योंकि उसने इन लोगों के विरोध का संज्ञान लेते हुए ऐतिहासिक तरीके से सुबह 5 बजे मामले की सुनवाई की थी।
सवाल उठता है कि एक केन्द्रीय मंत्री को किसी विवि के मामले में दखल देने की जरूरत क्यों हुई। वह भी ऐसे छोटे से मामले में जो देश भर के संस्थानों में होते ही रहते हैं? क्या मंत्री महोदय रोहित और एएसए द्वारा हाशिए पर रहने वाले सभी शोषित समुदायों के संघर्षों को एक साथ जोडऩे की कोशिशों से परेशान थे? शायद हां, क्योंकि दलितों का अल्पसंख्यकों की लड़ाई में साथ देना उस राजनैतिक-वैचारिक फंतासी की जड़ों में मट्ठा डाल देगा जिसके बल पे वे अभी सत्ता में हैं।

यह घालमेल रोहित की आत्महत्या-हत्या को ऐसी तमाम आत्महत्याओं से बिल्कुल अलग कर देता है और देश के किसी भी विवेकशील नागरिक को इस बात से डरना चाहिए। अतीत में हुई दलित छात्र आत्महत्याओं-हत्याओं के जिम्मेदारों को, कुटिल जातीय ताकतों को साफ-साफ पहचाना जा सकता था। उन्हें सजा दिलाई जा सकती थी क्योंकि जातिवाद चाहे व्यवस्था में कितनी भी गहराई तक रचा-बसा हो पर इसको ऐसे डंके की चोट पे अमल में लाना इतना आसान भी नहीं था। तब दलित छात्रों को प्रताडि़त करने की घटनाएं ज्यादातर किसी एक व्यक्ति की शुरू की हुई होती थीं भले ही व्यवस्था उनको बाद में बचाने में लग जाए, मगर इतनी बेशर्मी के साथ जातिवाद का अभ्यास इससे पहले नहीं देखा गया था कि एक केन्द्रीय मंत्री सामाजिक न्याय की मांग करती हुई आवाजों को खामोश करने के लिए उन आवाजों को देशद्रोही करार देना शुरू कर दे और दूसरा मंत्री द्वारा उसका साथ देना क्योंकि वो आवाज अब तक तमाम जगहों में, खांचों में बिखरी दलित, अल्पसंख्यक, आदिवासी, स्त्री आदि को संगठित करने की कोशिश कर रही है।

इसलिए रोहित की आत्महत्या को किसी हताशा से उपजा हुआ निर्णय नहीं कहा जा सकता। न ही उसकी लड़ाई परीक्षा में उत्तीर्ण होने जैसी कोई निजी लड़ाई थी, न ही कोई और कारण था कि वो इस तरह अचानक हार कर जान दे दें। उसकी आखिरी चिट्ठी से ये बात बहुत साफ साफ कहती है, वह चिट्ठी जो वास्तव में कोई ‘सुसाइड नोट’ नहीं है बल्कि इस देश के जनतंत्र के खिलाफ आरोपपत्र है, हलफनामा है। उस जनतंत्र के खिलाफ जो अरसे से अपने कमजोर और दलित लोगों को ठगता रहा था और जिसने अब उन्हें न्याय दिलाने के लिए तैयार होने का स्वांग रचना तक भी त्याग दिया है-

रोहित के ‘सुसाइड नोट’ से,
‘इंसान की कीमत
कितनी कम लगाई जाती है
फिर जिसका जितना काम निकल आए-
कभी एक वोट,
कभी एक आंकड़ा,
कभी एक खोखली सी चीज
कभी माना ही नहीं जाता कि इंसान
आखिर एक जीवंत मन है
एक अद्भुत सी चीज है
जिसे ‘तारों की धूल’ से गढ़ा गया है
चाहे किताबों में देख लो, चाहे सडक़ों पर,
चाहे उसे लड़ते हुए देख लो,
चाहे जीते-मरते हुए देख लो’
इंसानों को इंसान नहीं रहने देकर उन्हें अलग-अलग खांचों में बैठा देना, रोहित ने अपनी सारी जिंदगी इसी के खिलाफ लडऩे में लगा दी। इसी के लिए उसने शायद अपनी जान भी दे दी, इंसानों को खांचों में कैद करने के खिलाफ आखिरी प्रतिरोध के बतौर, उन्हें ललकारते हुए कि शरीर ही न रहा तो क्या कैद करोगे?

रोहित का शरीर, एक दलित के शरीर के तौर पर, यूं भी हमेशा से ही संघर्ष की जमीन बनता आया है, संघर्ष उनके बीच जो उनके शरीर पर उसके इंसान होने का सच झुठला कर, उसे सिर्फ दलित बना अपनी मिल्कियत बनाना चाहते रहे हैं दूसरी तरफ वे जो ऐसी किसी इंसानी गैरबराबरी के खिलाफ खड़े रहे हैं। रोहित ने इस बार फिर अपने शरीर को एक और संघर्ष की जमीन में बदल दिया। उस संघर्ष के जो सदियों की गुलामी को चुनौती दे रही ताकतों और सड़ांध मारती जाति व्यवस्था के नए, सत्ताधारी अलंबरदारों में होना है।

अब ये हमारी जिम्मेदारी है कि उसकी मौत बेकार ना जाए। हमारी जिम्मेदारी है कि कम से कम यह बलिदान एक ऐसी व्यवस्था और प्रक्रिया शुरू करने का बायस बने हो जो ये तय करें कि जातिगत, लैंगिक और धार्मिक भेदभाव और शोषण के खिलाफ हो रही लड़ाइयों के साथ और ऐसे ताकत आकर मिले। फिर यह शोषण चाहे किसी विवि में पद का फायदा उठा कोई अध्यापक कर रहा हो या किसी मंदिर में कोई पुजारी। हमारी जिम्मेदारी है कि ऐसी व्यवस्था बनाएं जिसमें शोषण के खिलाफ लडऩे वाले अकेले न पड़ें। उल्टा दोषियों के पास बच भागने का कोई रास्ता ना हो, चाहे फिर उनका अपराध कुछ भी हो-सामाजिक कार्यकर्ताओं को निशाने पे लेना या छात्रों को प्रताडि़त करना।

(उत्तम कुमार द्वारा दक्षिण कोसल में लिखित आवरण कथा, फरवरी 2016 से)

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