अभिव्यक्ति मानव अधिकार

राष्ट्रीय सम्मेलन ःः चुनौतियों के बीच अंतिम रूप लेता छत्तीसगढ़ में पत्रकार सुरक्षा कानून.


उत्तम कुमार, सम्पादक दक्षिण कोसल

https://youtu.be/mmrJr5lmPps

छत्तीसगढ़ में पिछले कई सालों से उत्पन्न भयावह सामाजिक, राजनैतिक तथा आर्थिक उथल-पुथल के बीच वाणी और अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर छत्तीसगढ़ में मानवाधिकार और पत्रकार संगठनों द्वारा छत्तीसगढ़ सहित पूरे देशभर में पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर कानून के मशविदा को अंतिम रूप देता ‘पत्रकार सुरक्षा कानून ’ पूरे देश में पत्रकारों के सुरक्षा के लिए एक देशव्यापी पहल के लिए आगे बढ़ रहा है। छत्तीसगढ़ सहित पूरे देशभर से सैकड़ों की संख्या में पहुंचे पत्रकार, सम्पादक, मीडिया मालिकों, वकील, मानवाधिकार से जुड़े लोग, श्रमिक संघों, शिक्षाविद, राजनितिज्ञों ने मिलकर छत्तीसगढ़ में पत्रकारों के मानवाधिकार तथा उनके आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक सुरक्षा के लिए बनाए जा रहे इस महत्वपूर्ण कानून को अंतिम रूप देने में जुटे हुए हैं।

छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ सालों से कई पत्रकारों की आत्महत्या-हत्या हो चुकी है। कई पत्रकार झूठे आरोपों में जेल के सलाखों में डाल दिए हैं। अब तो स्थिति यह है कि पत्रकारों को थाने में हाजिरी देनी पड़ रही है। पिछली सरकारों में अभिव्यक्ति की आजादी पर लगातार हमले हुए हैं पत्रकारों की स्वतंत्रता और प्रेस की आजादी का हनन हुआ है बस्तर से लेकर राजधानी तक पत्रकार प्रताडि़त हो रहे हैंं। इन गंभीर हालातों को ध्यान में रखते हुए 17 फरवरी को गास मेमोरियल सेंटर, रायपुर, छत्तीसगढ़ में आयोजित कानून के लिए तैयार मशविदा सम्मेलन में बहस, सुझावों तथा आशंकाओं को अंतिम रूप देते हुए अन्य आयोग से अलग-थलग एक स्वशासी आयोग के रूप में पीडि़त तथा जनसरोकार पत्रकारों, मानवाधिकार संगठनों, शिक्षाविदें, कानून के जानकार शख्सियतों की भागीदारी से जनअधिकार शक्तियों को संक्रेद्रित करते हुए बड़े कार्पोरेट हाऊसेस, गिल्ड और कौंसिल, शासन-प्रशासन के दबाव से मुक्त आयोग के माध्यम से कानून तैयार करने की कोशिश हो रही है। बताया जा रहा है कि पीडि़ त मानवता के लिए संघर्षरत मीडिया कर्मियों के लिए इस महत्वपूर्ण कानून को बनाने पर बल दिया जा रहा है।

संविधान के अनुच्छेद 19 में वाक् स्वतंत्रय आदि विषयक कुछ अधिकारों का संरक्षण, अनुच्छेद 20 में अपराधों के दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण, अनुच्छेद 21 प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण, अनुच्छेद 25 में अंत:करण की और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता के तथा आपीसी और सीआरपीसी के धाराओं के साथ, रासुका, यूएपीए, छत्तीसगढ़ जन सुरक्षा कानून के रहते एक नए कानून बनाने की चुनौतियों को सम्मेलन ने उठाया है। बावजूद लंबे समय से पत्रकारों को जिस तरह लोकतंत्र में चौथा पाया समझा नहीं जाता उसी तरह उनकी दैहिक, अभिव्यक्ति, राजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और सामाजिक सुरक्षा का सवाल एक मुकम्मल कानून का रूप लेगा। मशविदा समिति के सदस्य और अधिवक्ता शालिनी गेरा ने सम्मेलन में कानून पर विस्तार से उसके तकनीकी बातों को बताते हुए कानून की तथ्यसंगत व्याख्या किया है।

छत्तीसगढ़ में लंबे समय से मानवाधिकार के लिए कार्यरत पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीस (पीयूसीएल) छत्तीसगढ़ और पत्रकार सुरक्षा कानून (पसका) संयुक्त संघर्ष समिति के संयुक्त पहल पर पिछले लगभग तीन वर्षों के अथक मेहनत से पत्रकारों और मानवाधिकार रक्षकों की सुरक्षा के लिए छत्तीसगढ़ का विशेष कानून पर एक मशविदा तैयार किया गया है। बहस-मुबाहिसा में यह तय हुआ है कि मानवाधिकार रक्षकों के लिए अलग से कानून पर विचार किया जाना चाहिए यानि कि पत्रकारों और मानवाधिकार के लिए कानून का मशविदा अलग-अलग हो। वर्तमान में पत्रकारों के मानवाधिकार पर विशेष बल देने की बात मुखरता के साथ उठा है। यह भी कि इस कानून को बनाने के लिए गठन किए जाने वाले आयोग में पीडि़त और समझदार सपर्पित पत्रकारों के नेतृत्व में आयोग का गठन हो, जिसमें मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के साथ श्रमिक संगठनों, जनसंगठनों, अधिवक्ताओं और कानून के जानकारों को इसमें शामिल किया जाएगा।

सभा में यह भी तय किया गया है कि यह आयोग अन्य आयोग की तरह शासन-प्रशासन के हाथ का कठपुतली कानून बनकर न रह जाए इस दृष्टि से इस कानून को बनाने में विशेष ध्यान रखा जाएगा। पत्रकारों को मुआवजा राशि के लिए सुझाए गए फंड तथा भविष्य निधि के लिए तकनीकी जानकारियों का अध्ययन किया जाएगा। कानून के बनने के साथ पत्रकारों को सचेत किया गया है कि वे खबर प्रकाशित करने से पहले तथ्यों के साथ बहुत एहतियात बरतें तथा कानून में अपनी तथा अन्य लोगों की सुरक्षा और उनके मानवाधिकार व अन्य अधिकारों का ध्यान भी रखेंगे। इस पूरे सम्मेलन में पत्रकार को परिभाषित करते हुए कहा गया है कि ऐसा कोई भी व्यक्ति जिसने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बरतने और/या सूचना के प्रसारण को अपना प्राथमिक, अहम या मुख्य काम बनाया हो, या फिर ऐसा व्यक्ति जिसका काम सूचना एकत्रित करना, जमा करना, पैदा करना, प्रसंस्करित करना, संपादित करना, टिप्पणी करना, उसकी समीक्षा करना, प्रसारित करना, प्रकाशित करना या सूचना को किसी माध्यम से प्रदान करना या ऐसा कोई भी संचार करना हो जिसे छापा जा सके, डिजिटल या तस्वीर के रूप में प्रसारित किया जा सके,या फिर ऐसा कोई भी व्यक्ति जिसके पास पत्रकारिता करने की योग्यता या तर्जुबा हो।

यह कानून एक लंबी प्रक्रिया के बाद हमारे समक्ष आने वाला है। जिस पर एक सहमति बनाने के लिए एक देशव्यापी अभियान छेड़ा गया है। एक नागरिक सम्मेलन के खुले सत्र में इस मशविदा कानून को पेश कर आम बहस चलाई गयी है। ‘प्रेस, जनता और राज्य’ इस सम्मेलन के माध्यम से मूल विषय ध्यान केन्द्रित किया गया है और यह जून 25-26, 2016 को वृन्दावन हाल, सिविल लाइन्स, रायपुर, छत्तीसगढ़ में पहले मशविदा के रूप में हमारे समक्ष प्रकाश में आया था। इस कार्यक्रम में मशविदा बनाने में सुधा भारद्वाज, शालिनी गेरा सहित देशभर के लगभग 150 नामचीन विशेषज्ञों ने अपना योगदान दिया था। जिनमें पत्रकारों, वकीलों, पूर्व न्यायाधीशों, शिक्षाविदों, राजनितिक और श्रम संगठनों के कार्यकर्ताओं, सामाजिक और मानव अधिकार कार्यकर्ताओं ने इस मशविदा कानून पर अपने विचार और सुझाव प्रमुखता के साथ दिए थे। इत्तफाक यह रहा कि पिछले साल दिसम्बर 2018 में छत्तीसगढ़ में विधान सभा चुनाव घोषित हो गए। कांग्रेस पार्टी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में इस मुद्दे को शामिल भी किया था। फिलहाल कांग्रेस पार्टी बहुमत से सत्ता में आ गयी है। मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण के तत्काल बाद ही भूपेश बघेल ने मीडियाकर्मियों को आश्वत किया है कि छत्तीसगढ़ में पत्रकारों की सुरक्षा सम्बन्धी कानून बनाया जाएगा। इसके चलते प्रदेश में पत्रकारों के सुरक्षा के लिए छत्तीसगढ़ का यह विशेष कानून जल्द अमल में लाने की प्रक्रिया छत्तीसगढ़ सहित पूरे देशभर में तेज हो गई है।

सम्मेलन के प्रारंभ में अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार के राष्ट्रीय परिदृश्य पर व्यापक और गहन चर्चा के लिए राष्ट्रीय परिदृश्य में अभिषेक श्रीवास्तव (मीडिया विजिल डॉट कॉम तथा कमेटी अगेन्स्ट असाल्ट ऑन जर्नलिस्ट), हृदेश जोशी (स्वतंत्र पत्रकार, नई दिल्ली), सुहास मुंशी (नेटवर्क 18, नई दिल्ली), अजय प्रकाश मिश्रा (जनवार डॉट कॉम, नई दिल्ली), अतुल चौरसिया (न्यूज लांड्री, नई दिल्ली), सौरभ बाजपेयी (नेशनल मूवमेंट फ्रंट, नई दिल्ली) तथा जितेंद्र कुमार (कमिटी अगेन्स्ट असाल्ट ऑन जर्नलिस्ट) ने अपने विचार व्यक्त किए। सत्र की अध्यक्षता ललित सुरजन (देशबंधु ) कर रहे थे। इस पूरे सम्मेलन से यह स्पष्ट हुआ कि जिन कारणों से पत्रकार आज असुरक्षित हैं उन कारणों को खत्म करना होगा। इस कानून को नुकसान पहुंचाने वाले छत्तीसगढ़ जनसुरक्षा कानून सहित सारे काले कानूनों को वापस लेना होगा। पत्रकारों को निर्भीक, निडर और निष्पक्षता के साथ काम करने के लिए कार्यनीति के साथ एक अच्छा माहौल सुनिश्चित कर सके इस पर गहन विचार किया गया। युद्ध क्षेत्र में पत्रकार कार्य कर सके ऐसी स्थिति बनेगी। विशेषकर शासन प्रशासन तथा कार्पोरेट दबाव से मुक्त स्थिति निर्मित हो ऐसे हालात सुनिश्चित किए जाएंगे। पत्रकारों को सुरक्षा के रूप में आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक सुरक्षा के साथ उनके संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा तथा दैहिक सुरक्षा सुनिश्चित हो तथा पत्रकारों के आश्रितों जोखिम लाभ के लिए भी दिशा-निर्देश तय किए जाएंगे।

एक व्यापक परिपेक्ष्य में इस कानून को छत्तीसगढ़ में अमल में लाने की तैयारी शुरू हो चुकी है। छत्तीसगढ़ के परिदृश्य पर गिरीश पंकज (वरिष्ठ पत्रकार), कमल शुक्ला (छत्तीसगढ़ पत्रकार सुरक्षा कानून संघर्ष समिति), प्रफुल्ल ठाकुर (प्रेस क्लब रायपुर), राजकुमार सोनी (अपना मोर्चा डॉट कॉम), मालिनी सुब्रमनियम (स्क्रोल डॉट इन), सुमन पाण्डेय (द वोइसेस), पुष्पा रोकड़े (प्रखर समाचार) तथा अजय टीजी ने अपने अनुभव साझा किए इस कानून के साथ अंतरराष्ट्रीय संबंधों अपनी नजर और राय के लिए कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट के भारतीय प्रतिनिधि कुनाल मजूमदार ने अपने संगठन के संबंध में बताया कि यह एक स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय संस्था है, जिसका मुख्यालय संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के न्यूयार्क शहर मे है। इसका उद्देश्य प्रेस की स्वतन्त्रता तथा बिना किसी भय या दबाव के रिपोर्टिंग करने के पत्रकारों के अधिकार हेतु कार्य करना है। उन्होंने पत्रकार सुरक्षा के अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य को रेखांकित किया। पांचवे सत्र में संजय परिख (सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता तथा पीयूसीएल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष) ने प्रभावी कानून बनाने हेतु भावी कार्यनीति पर चर्चा की। धनंजय सिंह ठाकुर (कांग्रेस), चितरंजन बक्शी (भाकपा), धर्मराज महापात्र (माकपा), सौरा यादव (भाकपा माले रेड स्टार), बेला भाटिया, तुहिन देव (कसम) ने जन आंदोलन के साथ पत्रकार सुरक्षा कानून की समीक्षा की।

मशविदा को अंतिम रूप देने के लिए अंतिम सत्र में उत्तम कुमार (दक्षिण कोसल), डॉ. गोल्डी जॉर्ज (छत्तीसगढ़ नागरिक संयुक्त संघर्ष समिति),नारायण शर्मा, आवेश तिवारी ने छत्तीसगढ़ पत्रकार सुरक्षा कानून के प्रति अपनी एकजुटता प्रदर्शित करते हुए महत्वपूर्ण सुझाव दिए तथा भावी कार्यनीति का खाका खींचते हुए कहा कि तमाम संशोधनों के तहत, आयोग का गठन किन व्यक्तियों और परिस्थितियों में हो, कानून के समक्ष उत्पन्न दिक्कतों का सामना कैसे करे, अन्य आयोग से अलग इस आयोग का औचित्य पर सवाल खड़े करते हुए एडिटर गिल्ड, प्रेस काउंसिल, शासन-प्रशासन के दबाव से मुक्त कानून बनाने पर विशेष बल देते हुए आशंकाओं के साथ कि कहीं यह भी एक खतरनाक कानून में तब्दील न हो जाए जैसे तमाम अड़चनों को दूर करते हुए कानून के लिए एक नई मशविदा समिति का गठन कर इस मशविदा कानून को अंतिम तथा संवैधानिक रूप देने के लिए सर्वसम्मति से सहमति बनाने की कोशिश हुई है। गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में बन रहे इस कानून पर पूरे देश के पत्रकारों, मीडिया हाऊसेस, प्रेस मालिकों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, श्रम संगठनों, शिक्षाविदें, कानून के जानकारों और समाजशास्त्रियों के साथ देश की सरकार की नजर छत्तीसगढ़ में मूर्तरूप लेता इस कानून और उसके वर्तमान चुनौतियों और संभावनाओं पर टिकी हुई है।

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