कला साहित्य एवं संस्कृति

राष्ट्रीयता वर्तमान का कोढ़ है उसी तरह जैसे मध्यकालीन युग का कोढ़ सांप्रदायिकता थी. – मुंशी प्रेम चंद

सन 1933-34 को ‘राष्ट्रीयता और अंतर्राष्ट्रीयता’ के शीर्षक से मुंशीजी ने लिखा–


● राष्ट्रीयता वर्तमान का कोढ़ है उसी तरह जैसे मध्यकालीन युग का कोढ़ सांप्रदायिकता थी।.. लेकिन प्रश्न यह है कि उस से मुक्ति कैसे हो?

अर्थ के प्रश्न को हल कर देना ही राष्ट्रीयता के किले को ध्वंस कर सकता है।

वेदांत ने एक एकात्मवाद का प्रचार करके एक दूसरे ही मार्ग से इस लक्ष्य पर पहुंचने की चेष्टा की। उसने समझा, समाज के मनोभाव को बदल देने से ही यह प्रश्न आप ही आप हल हो जाएगा, लेकिन इसमें उसे सफलता नहीं मिली। उसने कारण का निश्चय किए बिना ही कार्य का निर्णय कर लिया जिसका परिणाम असफलता के सिवा और क्या हो सकता था। उसकी असफलता का मुख्य कारण यही था कि उसने अर्थ को नगण्य समझा।

जब तक संपत्ति मानव समाज के संगठन का आधार है, संसार में अंतर्राष्ट्रीयता का प्रादुर्भाव नहीं हो सकता। राष्ट्रों-राष्ट्रों की भाई-भाई की स्त्री-पुरुष की लड़ाई का कारण यही संपत्ति है। संसार में जितना अन्याय और अनाचार है जितना द्वेष और मालीन्य है जितनी मूर्खता और अज्ञानता है, उसका मूल रहस्य यही विश की गांठ है। जब तक संपत्ति पर व्यक्तिगत अधिकार रहेगा, तब तक मानव समाज का उद्धार नहीं हो सकता। मजदूरों के काम का समय घटाइए, बेकारों को गुज़ारा दीजिए ज़मीदारों और पूंजीपतियों के अधिकारों को घटाइए मजदूरों और किसानों के स्वत्वों को बढ़ाइए, सिक्के का मूल्य घटाइए, इस तरह के चाहे जितने सुधार आप करें, लेकिन यह जीर्ण दीवार इस तरह के टिपटाप से नहीं खड़ी रह सकती इसे नए सिरे से गिरा कर उठाना होगा।

संसार आदि काल से लक्ष्मी की पूजा करता चला आता है।.. लेकिन संसार का जितना अकल्याण लक्ष्मी ने किया है, उतना शैतान ने नहीं किया। यह देवी नहीं डायन है।

संपत्ति ने मनुष्य को क्रीतदास बना लिया है। उसकी सारी मानसिक, आत्मिक और दैहिक शक्ति केवल संपत्ति के संचय में बीत जाती है। मरते दम भी हमें यही हसरत रहती है कि हाय इस संपत्ति का क्या हाल होगा। हम संपत्ति के लिए जीते हैं, उसी के लिए मरते हैं। हम विद्वान बनते हैं संपत्ति के लिए, गेरुए वस्त्र धारण करते हैं संपत्ति के लिए। घी में आलू मिलाकर हम क्यों बेचते हैं? दूध में पानी क्यों मिलाते हैं? भांति-भांति के वैज्ञानिक हिंसा यंत्र क्यों बनाते हैं? वेश्याएं क्यों बनती हैं, और डाके क्यों पड़ते हैं? इसका एकमात्र कारण संपत्ति है। जब तक संपत्ति हीन समाज का संगठन ना होगा जब तक संपत्ति व्यक्तिवाद का अंत ना होगा संसार को शांति न मिलेगी।

प्रोम्थियस प्रताप सिंह

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