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राशन मिलेगा सोचकर उनके पास चला गया था, पुलिस ने इतना मारा कि अब हाथ नहीं उठा पा रहा

छत्तीसगढ़ के भूरे हुसैन तकरीबन 84 साल के हैं. कभी हकीम हुआ करते थे अब इधर उधर से मांग कर पेट भरते हैं. 22 तारीख़ के जनता कर्फ्यू के बाद जो लॉक डाउन बढ़ा उसने करोड़ों लोगों को एक झटके में भिखारी बना दिया. भूरे हुसैन भी इस त्रासदी के मारे हैं.

भूरे को जब पुलिस ने पीटा वो घटना तीन दिन पहले की है. वे मोहल्ले में इस उम्मीद से निकले थे कि शायद आज कहीं से कुछ खाने या राशन का जुगाड़ हो जाए. उसी समय वहां पुलिस की गाड़ी आ गई. खाना तो मिला नहीं उलटे पुलिस ने उसे इतना मारा कि अब उसका एक हाथ ठीक से उठ नहीं रहा है. पुलिस के डंडे इतनी जोर से चल रहे थे कि तीन दिन बाद भी भूरे के हाथ में बड़े बड़े लाल चकत्ते एकदम ताज़ा सरीखे दिख रहे हैं.

जानकारी के लिए आपको बता दें कि छत्तीसगढ़ में कई जगहों सरकार ने ये आदेश निकाला है कि ज़रूरतमंदों को खाना या राशन देने का काम सिर्फ़ पुलिस करेगी.

भूरे हुसैन और उनके मोहल्ले के लोगों ने बताया कि लॉक डाउन के दौरान यहाँ पुलिस तो आती है पर वो आज तक कभी खाना लेकर नहीं आई. पुलिस आती है, जो भी दिखा उसे बेतहाशा पीटती है, पर खाना तो कभी नहीं देती.

इस तरह का कोई भी इन्प्रैक्टिकल आदेश निकालने से पहले शासन को ये बात सोचनी ही चाहिए थी कि आखिर पुलिस क्या क्या करेगी. पुलिस के पास वैसे भी स्टाफ़ की कमी है.

ग़रीब आदमी जाए तो जाए कहाँ. पार्षद ने जो 5 किलो चावल दिया था वो कब का ख़त्म हो चुका है दुबारा के राशन के लिए वो नगर निगम में जाने को कहता है, निगम की हैल्पलाइन वाले फ़ोन नहीं उठाते, राशन कार्ड वालों को सिर्फ़ चावल देकर पल्ला झाड लिया गया है, जिनके राशन कार्ड नहीं हैं या बाहर के हैं उनकी तो हालत ही क्या कहिए.

इसमें फैक्ट्रियों कारखानों में काम करने वाले मजदूर हैं, ठेला-रेड़ी लगाने वाले लोग हैं, सड़कों में मनियारी का सामान बेचने वाले लोग हैं, ऑटो रिक्शा चलाने वाले, घरों में बिजली फिटिंग और बिजली उपकरणों की मरम्मत करने वाले लोग हैं, सिलाई कढ़ाई पीकू फ़ाल करने वाले लोग हैं, जूते चापलों की मरम्मत करने वाले, घरों में झाड़ू बर्तन करने वाले लोग हैं. आपके मोहल्ले में रहने वाले ग़रीब आदमी से लेकर मुंबई की फ़िल्म इंडस्ट्री तक में लोग खाना मांगते फिर रहे हैं.

आखिर पुलिस लोगों को इस कदर क्यों पीट रही है ? ये सब किसके आदेश से होता है ? पुलिस खाना पहुचाने से ज़्यादा डंडे मारने को तवज्जो क्यों दे रही है ? जितनी मेहनत किसी को दौड़ाकर पीटन के लिए की जाती है उतनी मेहनत उनके घर तक राशन पहुचाने के लिए क्यों नहीं की जाती ? क्यों सरकार अब तक हर ग़रीब तक खाना नहीं पहुचा पाई है ? क्या लोगों ने इसी उम्मीद में पुरानी बदलकर नई सरकार बनाई थी ?

सरकार के दावों में तो सब अच्छा अच्छा है. लेकिन सरकारी विज्ञापन के पीछे का सच अमानवीय है.
अब ये शासन पर निर्भर करता है कि वो काम बेहतर करना चाहती है या पोस्टर बॉय बनना चाहती है.

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