जल जंगल ज़मीन

रायपुर :वनों से बेदखली पर सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई में आदिवासियों का मजबूती से पक्ष रखे राज्य सरकार – छत्तीसगढ़ बचाओ आन्दोलन.

वनों को कार्पोरेट के हाथों सौपने वन अधिनियम में संशोधन कर रही हैं मोदी सरकार l

वनों से आदिवासियों की बेदखली के सुप्रीम कोर्ट आदेश व भारतीय वन अधिनियम में संशोधन के खिलाफ छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन सहित दलित आदिवासी मंच, जिला किसान संघ, भारत जन आन्दोलन हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति, जनाधिकार संगठन, किसान सभा, छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा (MKS), सर्व आदिवासी समाज, छत्तीसगढ़ वनाधिकार मंच छत्तीसगढ़ मजदुर यूनियन, नदीघाटी मोर्चा, जनाधिकार संगठन, छत्तीसगढ़ किसान मजदुर आन्दोलन, महिला महासंघ जशपुर आदि संयुक्त तत्वाधान आज दिनांक 22 जुलाई 2019 को बूढ़ा तालाब रायपुर स्थित धरना स्थल में एक दिवसीय धरना देकर मुख्यमंत्री निवास तक मार्च कर ज्ञापन सौंपा गया ।

ज्ञात हो कि आदिवासियों और अन्य परम्परागत वन निवासियों के साथ हुए एतिहासिक अन्याय की भूल को सुधारते हुए उनके वनाधिकारों को मान्यता देने के लिए वनाधिकार मान्यता कानून 2006 बनाया गया l कानून लागू होने के एक दशक बाद भी आज तक इसका सही ढंग से क्रियान्वयन नही हुआ जिसके कारण लाखों लोग अपने वनाधिकारों से वंचित हैं l

ऐसी स्थिति जब वनाधिकार मान्यता कानून का सही तरीके से पालन भी नही हो पाया हैं, केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाली मोदी सरकार इसे कमजोर करने की भरसक प्रयास कर रही हैं l इसी मंशा के कारण जब विभिन्न पर्यावरण समूह के मामलों पर 13 फरवरी 2019 को सुप्रीम कोर्ट वनाधिकार मान्यता कानून की वैधानिकता पर सुनवाई कर रहा था तो मोदी सरकार व अन्य राज्य सरकारों के वकील कोर्ट में खड़े ही नही हुए या फिर मूकदर्शक बने रहे हैं l कोर्ट ने सुनवाई करते हुए वनों पर निर्भर उन आदिवासी व अन्य परम्परागत वन निवासियों की बेदखली का आदेश दे दिया जिनके वनाधिकार के दावे निरस्त हो चुके हैं l इस आदेश के खिलाफ देशव्यापी विरोध प्रदर्शन के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में संशोधन किया और इसे 10 जुलाई 2019 तक इस पर रोक लगा दिया l 24 जुलाई को पुनः सुप्रीम कोर्ट इस मामले में सुनवाई करने जा रहा हैं l

धरना को संबोधित करते हुए भारत जन आन्दोलन के विजय भाई ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मामला वनाधिकार कानून की संवैधानिकता के सवाल पर था केंद्र सरकार द्वारा सही ढंग से पैरवी न करने के कारण कोर्ट क्रियान्वयन की की प्रक्रिया पर चला गया l दल असल वन अधिकार जैसे जन कल्याणकारी कानून में बेदखली का प्रावधान नहीं है और राज्य सरकार को भी अपने हलफनामे में जोर देकर इस बात को कहना चाहिए

छत्तीसगढ़ किसान सभा के संजय पराते ने कहा कि असल में यह सब प्राकृतिक संसाधनों को अपने कब्जे में लेकर मुनाफे में बदलने की कोशिशे है l किन्तु यह सच्चाई बदल नहीं सकती कि जहाँ आदिवासी है वहीँ जंगल है और बचे रहेंगे l देश में संवैधानिक संस्थाओं के क्षरण का कार्य जो पिछले पांच सालों से चल रहा है उस से सुप्रीम कोर्ट भी अछूता नहीं है| लेकिन सुप्रीम कोर्ट जैसी संस्था यह स्वीकार रही है कि आदिवासियों के कारण जंगलों को क्षति पहुँच रही है और इस तरह के आदेश कर रही है इस से यह स्पष्ट है कि उन्हें इस कानून की मूल मंशा पता ही नहीं है l

दलित आदिवासी मंच से राजिम केतवास और महिला महासंघ से ममता कुजूर ने संबोधित करते हुए आरोप लगाया कि मोदी सरकार कार्पोरेट मुनाफे के लिए और कंपनियों को जंगल सोंपने के लिए ही भारतीय वन अधिनियम 1927 में भी संशोधन करने जा रही हैं जिसमें आदिवासियों के दमन और बेदखली के असीमित अधिकार वन विभाग को भी मिलेंगे l

जिला किसान संघ से सुदेश टेकाम ने कहा कि प्रस्तावित संशोधन में वन विभाग को गोली चलाने के अधिकार दिए गए हैं l धारा 66 (2) के अनुसार यदि किसी के पास कुल्हाड़ी, दरांती या अन्य औजार भी देखे गए तो विभाग को गोली चलाने का अधिकार होगा l यदि विभाग द्वारा किसी आदिवासी या अन्य व्यक्ति पर आरोप लगाया गया हैं कि उसने अपराध किया हैं तो उस व्यक्ति को साबित करना हैं कि वह निर्दोष हैं l धरना को छत्तीसगढ़ किसान मजदुर आन्दोलन के गंगाराम पैकरा, गौतम बंधोपाध्याय, एस आर नेताम केशव सोरी, प्रथमेश मिश्रा, रमाकांत बंजारे ए पी जोसी आदि ने संबोधित किया

सभा के बाद मुख्यमंत्री निवास तक पैदल मार्च किया गया और निम्नलिखित ज्ञापन मुख्यमंत्री को दिया गया .

  प्रति,
आदरणीय श्री भूपेश बघेल,
माननीय मुख्यमंत्री,
छत्तीसगढ़ शासन

विषय :- वन क्षेत्र से आदिवासियों की बेदखली, वन अधिनियम 1927 का प्रस्तावित 
      संशोधन एवं  वन अधिकार मान्यता अधिनियम 2006 के संबंध में

महोदय,
हम, छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों में आदिवासी-किसान-मज़दूरों के बीच कार्यरत सामाजिक संगठनों/यूनियनों की ओर से मौजूदा परिस्थिति में केंद्र एवं राज्य सरकार के द्वारा ऐसे कुछ नीतिगत प्रश्न पर, जो छत्तीसगढ़ के पर्यावरण, वन एवं निवासियों को भयावह संकट की और ले जा रहा है कि ओर ध्यान आकर्षित कराते हुए उनके समाधान की अपेक्षा करते हैं l 

माननीय उच्चत्तम न्यायालय में रिट पिटीशन (सिविल) न. 109/2008  पर 24 जुलाई को वन अधिकार मान्यता कानून के बारे में सुनवाई होने वाली है। केंद्र सरकार के वकील इस केस में मुखर रूप से लोगों के पक्ष उठा नहीं सके, जिसकी वजह से 13 फरवरी को कोर्ट ने आदेश दिया था कि निरस्त हुए वन अधिकार दावों पर कार्यवाही कर आदिवासी एवं अन्य वन निवासियों को बेदखल किया जाए। बाद में जन आंदोलन के दवाब से केंद्र सरकार को न्यायालय से निवेदन करना पड़ा कि इस आदेश को स्थगित किया जाए। इस पर माननीय उच्चत्तम न्यायलय ने स्टे-आर्डर देते हुए 24 जुलाई को फिर से सुनवाई के लिए तय किया है।
छत्तीसगढ़ सरकार ने इस संबंध में न्यायलय का फैसला आने के बाद स्पष्ट कर दिया था कि छत्तीसगढ़ में कोई आदिवासी एवं वन निवासियों को बेदखल नहीं किया जाएगा - जो सराहनीय कदम था। न्यायलय में इस संबंध  में छत्तीसगढ़ सरकार ने अपना  पक्ष रखने की तैयारी भी की हैं, लेकिन हमें लगता है कि : समन्वय की कमी, सुसंगत कानूनी सलाह तथा न्यायालय में पैरवी करने के लिए सही वकील चयन में देरी के कारण सरकार के पक्ष रखने में कमज़ोर पहल हुई है l 

छत्तीसगढ़ सरकार की तरफ से जो हलफनामा प्रस्तुत किया गया है उसमे माननीय उच्चत्तम न्यायालय द्वारा मांगें गये प्रश्नों के जवाब  देने के साथ साथ यह  सशक्त रूप से कहना था कि उक्त पीटिशन कानून की संवैधानिकता पर हैं बेदखली पर नही l जन आन्दोलनों की और से दायर  हलफनामे में कहा गया है  कि वन अधिकार जैसे जन कल्याणकारी कानून में बेदखली  का प्रावधान नहीं है, राज्य सरकार की ओर से भी इस बात को माननीय सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष रखा जाना चाहिए।

भारतीय वन अधिनियम में संशोधन:- वन, वन्यजीवों एवं वन नीवासियों को अभूतपूर्व क्षति पहुंचाते हुए कारपोरेट मुनाफा तथा वन क्षेत्रों में प्रभावी दखल और सहूलियत देने के लिए भारतीय वन कानून, 1927 के  संशोधन का मसौदा 7 मार्च को केंद्र सरकार ने राज्य सरकार को भेजा है। उस मसौदे पर 7 अगस्त तक  जवाब प्रस्तुत करना हैं । प्रस्तावित संशोधन, मुख्य रूप से वन अधिकार मान्यता कानून 2006 को पीछे के दरवाजे से खारिज करने की साज़िश है, यह  भयानक रूप से जन विरोधी है। प्रस्तावित संशोधनों के अनुसार वन क्षेत्रों में लोगों के उपर शंका के आधार पर गोली चलाना, वन अपराधी आरोपित किये गए व्यक्ति को स्वयं यह साबित करना कि वह  निर्दोषी है,  व्यक्ति को कस्टडी में लेते हुए बल प्रयोग करके लिए गए बयान को कोर्ट द्वारा मान्य होना, किसी भी वन क्षेत्र को आरक्षित घोषित कर देना ,यहां तक कि पट्टा वाला वन ज़मीन और सामुदायिक संसाधनों को औने पौने भाव मे खरीद लेना तथा लोगों की निस्तार अधिकार को प्रतिबंधित कर देना जैसे घोर तानाशाही पूर्ण प्रावधान इस कानून में लाया जा रहा है।

इस संबंध में राज्य सरकार केंद्र के इस मसविदा पर क्या जवाब दिया यह सार्वजनिक होना चाहिए, साथ ही विभिन्न जनसंगठनों, प्रभावित क्षेत्र के नागरिकों से परामर्श भी करने की जरूरत थी। हमारा अनुरोध है कि इस संबंध में तत्काल ही एक बैठक कर जन परामर्श किया जाए और केंद्र द्वारा संशोधित कानून को अस्वीकार किया जाए।
वन, जो  कि संविधान की समवर्ती सूची में है, इसलिए छत्तीसगढ़ सरकार इस मसविदा को सार्वजनिक रूप से खारिज करते हुए वन अधिकार मान्यता कानून की युगान्तकारी उद्देश्य के तर्ज पर छत्तीसगढ़ के वन संसाधन  एवं  वन प्रशासन को लोकतांत्रिक तरीके से  बचाने, बढ़ाने एवं प्रवंधन करने का अधिकार ग्रामसभा को देने की घोषणा करे।  

वन अधिकार मान्यता कानून का कार्यान्वयन:- हालांकि, छत्तीसगढ़ में नई सरकार आने के बाद वन अधिकार मान्यता कानून को सही रूप में कार्यान्वयन करने के लिए  सराहनीय प्रतिबद्धता सार्वजनिक रूप से जताई, जिसके तहत  पिछले 11 साल से मृतवत वन अधिकार मान्यता कानून को फिर से नए सिरे से सही व्याख्या करते हुए कार्य प्रारंभ किया गया। निरस्त दावों पर ग्राम सभा को पुनर्विचार करने, सामुदायिक दावों को प्राथमिकता देना, मार्गदर्शिका तैयार करने की प्रक्रिया शुरू करते हुए व्यापक प्रशिक्षण के  ज़रिए कार्यदल खड़ा कर कानून की सही कार्यान्वयन की रूपरेख तैयार किया गया।
लेकिन पिछले कुछ महीनो से यह सम्पूर्ण प्रक्रिया ही रुक गई हैं । मार्गदर्शिका के आभाव में  प्रशिक्षण नहीं हो पाया और न प्रशिक्षित कार्यदल बने l आदिवासी विभाग जो इस हेतु नोडल एजेंसी है वो निर्णायक मुखिया विहीन है। जो  अधिकारी प्रतिवद्धता के साथ काम करते हुए इतने महीने काम किये उनका ट्रांसफर हो जाना। दावा निराकरण करने में अति जल्दीबाजी जिसके कारण न ठीक से ग्राम सभा गठित हो पाई, और न अधिकारी कानून के प्रावधानों को समझ पाएं, यहाँ तक कि वितरित अधिकार वनाधिकार  पत्रकों में गंभीर त्रुटियाँ हैं ।
हमारा आग्रह है कि :-
कानून के सही कार्यान्वयन के लिए कोई अधिकारी को निर्णायक अधिकार देते हुए केंद्रिकृत रूप से कार्य योजना बनाकर बिना किसी ज़ल्दीबाजी के, योजनावद्ध तरीके से किया जाए ।
मार्गदर्शिका तैयार कर व्यापक प्रशिक्षण के ज़रिए कार्यदल तैयार किया जाए 
हर जिले में टास्कफोर्स समिति गठन करते हुए प्रशिक्षित सामाजिक समूह को शामिल करते हुए निगरानी समिति बनाई जाए ।
त्रुटी पूर्ण आधे अधूरे मान्यता दिए गए सामूदायिक वन अधिकारों को संशोधित किया जाये l अधिकार पत्र में शामिल गैरकानूनी शर्तो को हटाया जाएँ l 

क्षतिपूर्ति वनीकरण फण्ड, जिला खनिज फंड हो या कोई धनराशि ग्रामसभा के नियंत्रण तथा निर्णय से किया जावे।
बेलाडीला के 13 नंबर डिपोजिट की तरह ही अन्य खनन परियोजनाओं जैसे परसा कोल ब्लाक सरगुजा आदि में फर्जी ग्रामसभा के आधार पर हासिल वन स्वीकृति के प्रकरणों की जाँच कर उन्हें निरस्त करने की कार्यवाही की जाये l 

भवदीय                                                                                                                                                   

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