अभिव्यक्ति राजनीति

रायपुर के निवासियों से एक अपील रुचिर गर्गः जिसकी रगों में दौड़ता है रायपुर

26.10.2018 रायपुर 

रायपुर ही नहीं, छत्तीसगढ़ के निवासियों के लिए रुचिर गर्ग का नाम अनजाना नहीं हैं। दुर्गा कॉलेज के जाने-माने प्रोफेसर रहे सुप्रसिद्ध साहित्यकार स्वर्गीय यतींद्र नाथ गर्ग और राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित दानी गर्ल्स स्कूल की जानी-मानी शिक्षिका रहीं स्वर्गीय विनोद गर्ग के होनहार बेटे रुचिर का जन्म रायपुर में ही हुआ और वह यहीं पले-बढ़े हैं। काली बाड़ी स्कूल में अपनी पढ़ाई के दौरान ही मुखर रहे रुचिर की प्रतिभा समय के साथ और निखरती गई।

ऐसे समय जब युवा प्रशासनिक सेवा या निजी कंपनियों की अच्छी नौकरियों की तलाश करते हैं, रुचिर ने पत्रकारिता जैसे चुनौतीपूर्ण पेशे को चुना। यही नहीं, अपनी तीन दशक से भी लंबी पत्रकारिता के दौरान उन्होंने दिल्ली और भोपाल में मिले बड़े अवसरों को ठुकरा कर रायपुर और छत्तीसगढ़ में ही रहकर यहां के मुद्दों को उठाने का फैसला किया। पत्रकारिता में वह गरीब-मजलूबों और आदिवासियों से लेकर हर तबके की आवाज बनकर उभरे।

1990 के दशक में जब छत्तीसगढ़ को अलग बनाने का आंदोलन चरम पर था, तब रुचिर गर्ग पत्रकारिता की सबसे मुखर आवाज थे। और छत्तीसगढ़ के नया राज्य बनने के बाद भी लगातार पूरी संजीदगी के साथ वह यहां के मुद्दे उठाते रहे, ताकि यह राज्य अपनी तमाम दिक्कतों को पार करते हुए आगे बढ़े। पूरी ताकत के साथ उन्होंने रायपुर और छत्तीसगढ़ के आम लोगों से जुड़े मुद्दों पर निर्भिकता और ईमानदारी से कलम चलाई।

ईमानदारी से कारोबार करने वाले व्यापारियों से लेकर मेहनतकश कर्मचारियों से जुड़े मुद्दों को उन्होंने अभियान की तरह उठाया। रायपुर को लेकर इतनी संजीदगी और संवेदनशीलता शायद ही किसी और में नजर आए, जैसा रुचिर ने अपनी पत्रकारिता और सार्वजनिक हस्तक्षेप के जरिये समय-समय पर दिखाई है। फिर वह अवैध कब्जा और अतिक्रमण का मुद्दा हो, या फिर भौंडे विकास और सौंदर्यीकरण के नाम पर चार सौ साल पुराने पेड़ की कटाई, उन्होंने इनके खिलाफ निर्ममता से कलम चलाई। इसके साथ ही उन्हें रायपुर से जुड़े मुद्दों को लेकर हमेशा आम लोगों के पक्ष में खड़ा पाया गया।

फेहरिस्त बनाई जाए, तो कई पन्ने भर जाएंगे, लेकिन यह रायपुर और छत्तीसगढ़ के लोगों को अच्छे से पता है कि भारत में पहली बार नदी के निजीकरण को उजागर करने का श्रेय उन्हें जाता है। आदिवासियों की आजीविका और वनोपज, साल वनों पर संकट, चिकित्सा में भ्रष्टाचार जैसे कई मुद्दों पर लिखी गई उनकी किश्तवार रिपोर्ट्स ने प्रशासन में हड़कंप पैदा किया। विश्वविद्यालय, जनसंपर्क विभाग से लेकर विधानसभा तक पत्रकारिता से संबंधित विभिन्न समितियों के सदस्य के तौर पर उन्होंने कार्य किया।

आज छत्तीसगढ़ को जब 18 बरस हो रहे हैं, यह शोषण, लूट और छलावे का प्रतीक बनकर रह गया। ऐसे में रुचिर गर्ग ने तय किया कि यह वह वक्त है, जब जनता के बीच जाकर सीधा हस्तक्षेप किया जाए और उनके संघर्ष को बुलंद किया जाए।

तो आइये रुचिर का हाथ थामे उनके साथ चलें और एक बड़े बदलाव के साझीदार बनें.

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