कला साहित्य एवं संस्कृति

राम विलास शर्मा : अपनी धरती अपने लोग: एक जुझारू आलोचक की आत्मकथा. : अजय चंन्द्रवंशी कवर्धा .



      डॉ रामविलास शर्मा हिंदी के श्रेष्ठ आलोचकों में हैं। उनके लेखन की विविधता और विपुलता को देखकर सहसा विश्वास नही होता कि इतना विस्तृत कार्य उन्होंने सामान्य पारिवारिक जीवन जीते हुए कैसे कर लिया।यों राहुल जी, रांगेय राघव जैसे और भी उदाहरण हैं, जिन्होंने व्यापक कार्य किया है।इनमे डॉ शर्मा का विशिष्ट स्थान इसलिए भी है कि उनके यहां कार्य क्षेत्र की व्यापकता पूरे गहराई के साथ हैं।एक तरफ प्रेमचन्द, निराला का व्यवहारिक मूल्यांकन है तो दूसरी तरफ डॉ रामचन्द्र शुक्ल, राहुल जी, द्विवेदी जी,शिवदान सिंह चौहान, अमृत राय ,नामवर जी से वैचारिक बहसें।एक तरफ जहां भाषा विज्ञान का कार्य है तो दूसरी तरफ मार्क्सवाद, दर्शन, वैदिक साहित्य पर उनका कार्य।इन सब मे उन्होंने गहरी सूक्ष्म दृष्टि से कार्य किया है और कई मौलिक स्थापनाएं दी हैं।अवश्य उनके कई स्थापनाओं से विद्वानों में असहमति भी रहीं और उनमें कुछ हद तक सच्चाई भी है। जाहिर है इतना विस्तृत कार्य एक व्यक्ति करे तो कुछ कमियां रह जाती हैं।

         यह स्पष्ट है कि इतना विस्तृत कार्य करने के लिए प्रतिभा के साथ-साथ अनुशासित और प्रतिबद्ध जीवन जीना आवश्यक है।डॉ शर्मा के जीवन पर यह पूर्णतः चरितार्थ होता है। सादगी पूर्ण जीवन जीते हुए वे लगातार अध्ययन, शोध और लेखन करते रहें।इतनी विद्वता होने पर जाहिर है,उनकी पूछ-परख हमेशा होती रही, मगर वे समारोहों और गोष्ठियों से कतराते रहे और अपना काफी समय बचा लिया। समारोहों में न जाने का एक कारण उनकी पत्नी की अस्वस्थता भी थी;इससे उनके पारिवारिक दायित्वों के निर्वहन के प्रति प्रतिबद्धता का पता चलता है।डॉ शर्मा के इस सादगीपूर्ण जीवन का कइयों ने उल्लेख किया है।उनसे मिलने वाले अक्सर आश्चर्य में पड़ जाते थे कि इतना बड़ा आलोचक कैसे लगभग ठेठ किसानी छवि रखता है।उनकी जीवनी में भी इसके कई उदाहरण हैं। एक बार यशपाल जी उनसे मिलने आएं उस पर डॉ शर्मा लिखते हैं "एक बार अखाड़े से कुश्ती लड़कर मैं आया ही था कि यशपाल आ गए। वह साहबी पोशाक में थें, मैं मिट्टी में सना हुआ तहमत बांधे देहाती वेश में था। मुझे देखकर उन्हें काफी आश्चर्य हुआ।"सुभद्रा कुमारी चौहान जब उनसे पहली बार मिली तो इस बात से आश्चर्य में पड़ गई की रामविलास शर्मा बुजुर्ग किस्म के गंभीर आलोचक न होकर एकदम युवा हैं।

       डॉ शर्मा ने कई लेखकों की तीखी अलोचना की है ;प्रत्युत्तर भी मिला है,मगर व्यवहार में अशिष्टता के उदाहरण नही मिलतें। पंत जी की उन्होंने तीखी आलोचना की है मगर एक बार जब वे बीमार हुए और जब डॉ शर्मा उन्हें देखने गए तो फुट-फुट कर रोने लगें। इसी तरह रांगेय राघव और उनमें काफी वैचारिक असहमतियां थी और दोनों ने एक दूसरे के खिलाफ लिखा है, मगर जब रांगेय राघव जी को किसी पुस्तक की जरूरत होती तो उनसे मांगकर ले जाते थे।उनके व्यवहार के बारे में विपरीत स्वर मैंने केवल शिवदान सिंह चौहान के एक आलेख में पढ़ा है, जहां चौहान जी आलोचना के अपने सम्पादन काल मे जब डॉ शर्मा से आलेख मांगा तो उन्होंने लिखा कि "मैं फरमाइश में नही लिखता"। यह आलेख डॉ शर्मा के निधन के बाद का है इसलिए उनका पक्ष नही जाना जा सकता था।

    डॉ शर्मा के विपुल लेखन में उनके जीवन के बारे में काफी बातें पहले से ज्ञात थी। मसलन 'निराला की साहित्य साधना' में उनके जीवन और लेखन की भी काफी बातें ज्ञात होती हैं। फिर 'घर की बात' में काफी जानकारी है। लेकिन उनकी आत्मकथा 'अपनी धरती अपने लोग' तीन खण्डों में प्रकाशित होने से कई और महत्वपूर्ण बातें सामने आयीं।जीवनी के तीन खण्डों में पहले को उन्होंने 'मुँडेर पर सूरज' शीर्षक दिया है जिसमे बचपन से लेकर अध्यापन कार्य से उनके छुट्टी तक का जीवन और परिवेश के संस्मरण हैं। दूसरे खंड 'देर-सबेर' में उन राजनीतिक कार्यकर्ताओ और लेखकों के संस्मरण हैं जिनसे थोड़ी या ज्यादा देर तक तक उनका सम्पर्क रहा। तीसरे खंड 'आपस की बातें' में छात्र जीवन से लेकर बुढ़ापे थ भाइयों के पत्र, मुख्यतः बड़े भाई के नाम उनके पत्र हैं।

        पहले खण्ड 'मुँडेर पर सूरज ' में उनके गांव ऊँचगांव सानी(जन्म 1912) के संदर्भ में अवध के लोकसंस्कृति का रोचक वर्णन है।उनके पितामह(बाबा) फ़ौज में रहने के बाद गांव में किसानी करते रहें। पिता ने भी विभिन्न जगहों पर नौकरी और किसानी किया।यानी आजीविका का साधन पुरोहित कर्म से न होकर मुख्यतः किसानी रहा; इससे डॉ शर्मा के  व्यक्तित्व निर्माण में महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा होगा। आगे हम देखते हैं कि उनकी आलोचना में किसानी चेतना प्रबल रहा है।उनकी प्रारंभिक शिक्षा झांसी में हुई क्योकि उनके पिता वहां नौकरी कर रहे थे।हाईस्कूल मैकडोनल हाईस्कूल झांसी में।यहां वे अपने शिक्षक 'चटर्जी मास्टर' से काफी प्रभावित हुए, जिन्होंने उन्हें हिंदी में लिखने को प्रोत्साहित किया।वहीं मास्टर रुद्रनारायण ने पंजा लड़ाना सिखाया। इस बीच हाईस्कूल में अध्ययन के  दौरान ही उनका विवाह हो गया। वे कम उम्र में विवाह से सहमत नही थे मगर अपने बाबा के आग्रह पर उन्हें विवाह करना पड़ा।

               झांसी में कॉलेज न होने के कारण वे बी.ए. अध्ययन के लिए लखनऊ आ गए।लखनऊ आने का कारण यह था कि उनके ससुर यहां नौकरी कर रहे थे, इसलिए उनके साथ रहने की सुविधा थी।उनके ससुर चूंकि मजदूर बस्ती में रहते थे, इसलिए उन्हें यहां मजदूरों का जीवन करीब से देखने का अवसर मिला।फिर यंही से अंग्रेजी में एम. ए. की पढ़ाई की। एम. ए. के बाद प्रोफेसर सिद्धांत के निर्देशन में पी. एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। शोध में उनका विषय था 'कीटस एंड द प्रिरफेलाइट्स'।इस विषय पर उन्हें 1940 में डॉक्टरेट की उपाधि मिली।वे अंग्रेजी विषय मे लखनऊ विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त करने वाले पहले शोधार्थी थें।डॉ शर्मा स्कूल-कॉलेज के अध्ययन के दौरान योग्य विद्यार्थी के रूप जाने जाते रहें और उन्हें स्कालरशिप भी मिली।डॉक्टरेट के बाद प्रोफेसर सिद्धांत ने विश्वविद्यालय में ही उनके अध्यापन की व्यवस्था कर दी।सन से 43 तक उन्होंने यहां अध्यापन किया।यह अवधि उनके लेखकीय जीवन के विकास में उल्लेखनीय है।
            डॉ शर्मा का विवाह हाईस्कूल में अध्ययन के दौरान ही हो गया था। वे कम उम्र में विवाह से असहमत थे मगर अपने बाबा के आग्रह को इंकार नही कर सकें। वे अपनी पत्नी को 'मालकिन' कहते थे जो उनके बड़े भाई का दिया नाम था।उनके लम्बे दाम्पत्य जीवन को एक आदर्श के रूप में रखा जा सकता है,जहां शिक्षा ने ज़मीन आसमान का अंतर होने पर भी कहीं असामंजस्य के उदाहरण नही मिलतें। इसका एक कारण यह भी था कि डॉ शर्मा के लिए ज्ञान कभी बोझ नही रहा; वे हमेशा सहज जीवन जीते रहें।उनकी पत्नी बीमार रहने लगी तो उनकी देखभाल में दिक्कत न हो इसलिए उन्होंने कार्यक्रमों और गोष्ठियों में जाना बंद कर दिया था।इधर घर की सारी जिम्मेदारी मालकिन की थी। डॉ शर्मा ने लिखा है जब आगरा में उनका घर बन रहा था(सन58-59) तो उसकी पूरी जिम्मेदारी मालकिन ने उठा रखी थी, उनका काम केवल पैसे की व्यवस्था करना था।

         तीस का दशक डॉ शर्मा के साहित्यिक व्यक्तित्व के निर्माण के लिए महत्वपूर्ण है।जहां वे कुछ प्रारम्भिक कविताएं लिखते हैं; फिर 1932-33 में निराला के संपर्क में आते हैं।यह सम्पर्क उनके साहित्यिक जीवन के लिए महत्वपूर्ण साबित हुआ।निराला के विद्रोही व्यक्तित्व और लेखन जिसमे अपार करुणा भी थी,उनके व्यक्तित्व को एक नई दिशा दी।आगे देखते हैं कि डॉ शर्मा का आलोचना में प्रवेश निराला की कविताओं पर लगे आक्षेप को जबाव देने के संदर्भ में ही होता है;और उनके काव्य विवेक और प्रतिमान निराला के कविताओं से अन्तःक्रिया करते विकसित होते हैं। आगे जाकर इसमे मार्क्सवाद का द्वंद्ववाद भी जुड़ जाता है।निराला पर अपने संस्मरण उन्होंने 'निराला की साहित्य साधना' में लिख दिया था, इसलिए आत्मकथा में उनका दोहराव नही किया गया है।निराला का उनके जीवन मे कितना महत्व रहा है, इस बात का पता इससे लगाया जा सकता है जहाँ आत्मकथा(खण्ड दो) में वे लिखते हैं "निराला तो रोज ही याद आते हैं....... किसी विशेष कारण से नही, यह एक तरह का संस्कार बन गया है। मेरे मन मे साहित्य और निराला अभिन्न रूप से जुड़े हुए हैं"।इसी समय केदारनाथ अग्रवाल, अमृत लाल नागर, गिरिजा कुमार माथुर, शिव मंगल सिंह सुमन, आदि से उनकी मित्रता होती है और नामवर जी के शब्दों में एक 'निराला मण्डल' का निर्माण होता है। यहीं 'लल्लू' (राम प्रसाद यादव) से उनकी मित्रता हुई जो जीवन भर बना रहा।दशक के आखिर-आखिर उन पर मार्क्सवादी विचारधारा का प्रभाव गहराने लगता है।

         सन 43 में रामविलास जी आगरा के बलवंत राजपूत कालेज में अध्यापन के लिए आएं।वे लखनऊ से जाना नही चाहते थे,मगर प्रोफेसर सिद्धांत ने स्थायित्व का हवाला देकर वहां भेजा। डॉ शर्मा ने लिखा है कि इसका असल कारण उनका अंग्रेजी के बदले हिंदी में लिखना और मार्क्सवाद की तरफ उनका झुकाव था,जो प्रोफेसर सिद्धांत को पसंद नही आ रहा था।सन 43 से 73 तक वे बलवंत राजपूत कॉलेज में अध्यापन करते रहें। आखिरी के दो वर्षों में वे कन्हैया लाल माणिकलाल मुंशी विद्यापीठ के निदेशक रहें।इस तरह उनके जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा आगरा में गुजरा;जो उनके आलोचनात्मक लेखन का भी महत्वपूर्ण दौर है।सन 40 से 50 के बीच कम्युनिस्ट पार्टी से उनका काफी जुड़ाव रहा। वे पार्टी के सदस्य भी रहें।पार्टी में रहते हुए उन्होंने तत्कालीन वैचारिक बहसों में खूब भाग लिया और लिखा। ये बहस मुख्यतः भाषा के प्रश्न, परंपरा का महत्व,और भारत मे अंग्रेजी राज की भूमिका को लेकर होती थी। भाषा के सम्बंध में डॉ शर्मा का पक्ष अंग्रेजी के बदले भारतीय भाषाओं को प्रतिष्ठित करना, परम्परा के मूल्यांकन में उसके सार्थक पक्ष को स्वीकार करना, भारत मे अंग्रेजी राज की भूमिका के संबंध में वे भारत मे अंग्रेजी राज की 'प्रगतिशीलता' को अस्वीकार करते थे। आगे जाकर उन्होंने इन विषयों पर विस्तृत लेखन किया। उन्होंने उस समय के पार्टी कें पदाधिकारियो के सम्बंध में अपने संस्मरण और विचार लिखे हैं। इनमे पी.सी.जोशी, रणदिवे, योगीन्द्र शर्मा,डांगे अजय घोष आदि हैं।डॉ शर्मा ने इनकी कार्य प्रणाली और इनसे अपनी सहमति-असहमति का भी जिक्र किया है।सन 49 से 51 तक वे अखिल भारतीय लेखक संघ के महासचिव रहें।सन 51 के बाद उन्होंने पार्टी गतिविधियों से अलग होकर केवल लेखन पर ध्यान केंद्रित किया। पार्टी से अलग होने का एक महत्वपूर्ण कारण पार्टी नीतियों से लगातार बढ़ती उनकी असहमतियां भी थी।

      आत्मकथा (खण्ड एक) में अवध की लोक संस्कृति तथा झांसी, लखनऊ आगरा के चित्र एवं संस्मरण हैं।इसमे महत्वपूर्ण हिस्सा आगरा का हैं जहां बलवंत राजपूत कालेज में उन्होंने अध्यापन किया। आगरा में उन्हें बार-बार किराये का मकान बदलना पड़ा, इसलिए अलग-अलग लोग मिलते रहें; उन सब का विवरण है। कालेज जीवन के अध्यापन, कॉलेज का माहौल, शिक्षक-छात्र के संस्मरण हैं।कॉलेज के प्राचार्य रायकरण सिंह के बारे में किंचित विस्तार है। अध्यापन के अंतिम दो वर्ष वे कन्हैया लाल माणिक लाल मुंशी शोधपीठ के निदेशक रहें;उसके भी संस्मरण हैं।यहां आना उनके लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण साबित हुआ कि यहां के लाइब्रेरी में भाषा विज्ञान की विपुल सामग्री थी जिसका उपयोग कर आगे उन्होंने तीन खंडों में 'भारत मे प्राचीन भाषा परिवार और हिंदी' लिखी। आत्मकथा के खंड दो में कम्युनिस्ट के नेताओं तथा साहित्यकारों के संस्मरण हैं। पार्टी के नेताओं में पी.सी. जोशी, रणदिवे, अजय घोष, योगीन्द्र शर्मा, डॉ गंगाधर अधिकारी,डांगे, राजेश्वर राव,रमेश सिन्हा आदि के संस्मरण हैं।उन्होंने इनकी कार्य पद्धति और इनसे अपनी सहमति-असहमति का जिक्र किया है। साहित्यकारों में अमृतलाल नागर,नरोत्तम नागर, केदारनाथ अग्रवाल,घनश्याम अस्थाना,नागार्जुन,त्रिलोचन,शमशेर, पंत, सुमन,नरेंद्र शर्मा,मैथलीशरण गुप्त, शुभद्रा कुमारी चौहान,महादेवी वर्मा, बनारसी दास ,अली सरदार जाफ़री,चन्द्रबली सिंह आदि के संस्मरण हैं। इनमे केदारनाथ अग्रवाल और अमृत लाल नागर से उनका संपर्क अपेक्षाकृत अधिक रहा। अमृत लाल नागर जी से उनकी घनिष्ट मित्रता थी। नागर जी का ससुराल आगरा था। डॉ शर्मा कुछ समय उनके ससुराल में भी किराये से रहें। नागर जी से उनकी मुलाकात होते ही रहती थी। नागर जी सम्वेदनशील थें, कथाकर के रूप में उन्हें पहचान कुछ देर से मिली;फिर पारिवारिक दायित्वों के निर्वहन में समस्याएं आती रही।इसी कारण कभी-कभी निराशा से भी ग्रसित हो जाते थे। डॉ शर्मा ने एक दो घटनाओं का जिक्र किया है।एक बार डॉ शर्मा ने किसी से उनका परिचय हास्य कथाकार के रूप में करा दिया, जिससे वे काफी आवेशित हो गयें और उन्हें काफी भला-बुरा कहा। डॉ शर्मा के अनुसार नागर जी के मन मे ऐसी धारणा बन गई थी कि डॉ शर्मा उन्हें उर्दू के कृष्णचंदर जैसे कथाकारों से कम आकतें हैं। जबकि ऐसी कोई बात नही थी। खैर यह क्षणिक था बाद में सामान्य हो गए।केदारनाथ जी के संस्मरण 'मित्र संवाद' में आ गए थे, इसलिए यहां विस्तार नही है।डॉ शर्मा की पद्धति यह है कि वे किसी मित्र का संस्मरण लिखते हैं तो उनका आलोचनात्मक विवेक भी काम करते रहता है। उन्होंने सभी के उपलब्धि और सीमाओं को रेखांकित करने का प्रयास किया है।

           आत्मकथा(खण्ड दो) में उन्होंने अपनी किताबों के लेखन की प्रेरणा और कार्ययोजना के बारे में बताया है, जिससे उनके अध्ययनशीलता और लगन का पता चलता है।एक समस्या को सुलझाते अक्सर दूसरी समस्या आ जाती इस क्रम में वे लगातार लिखते चले गए। फिर समस्याएं विभिन्न अनुशासनों की सीमा अतिक्रमित कर जाती हैं, इसलिए भी उनके विवेचन का दायरा बढ़ता गया।इतने वृहत कार्य के लिए जाहिर है उन्हें अथक श्रम करना पड़ा। कितनी यात्राएं की;ग्रंथालयों-संग्रहालयों में समय बिताया; समय का अधिकतम उपयोग का प्रयास किया; कॉलेज में चयन समिति, पुरुस्कार चयन,विभिन्न समितियों, गोष्ठियों से बचते रहें।इस खंड के आखिर में उनके डायरी के अंश हैं जिनमे उनकी गांव यात्रा का विवरण और दिल्ली विश्वविद्यालय में उनकें हिन्दी जाती के अवधारणा पर बहस का विवरण है। परिशिष्ट में साहित्य अकादमी में दिया गया उनका महत्वपूर्ण भाषण है।

     आत्मकथा (खण्ड तीन) में डॉ शर्मा के पत्र हैं जो उन्होंने मुख्यतः अपने बड़े भाई को लिखे हैं।इसके अलावा परिवार के अन्य सदस्यों को लिखे पत्र भी हैं। इन पत्रों से भी उनके युवावस्था से लेखकीय जीवन की शुरुआत और विकास को देखा जा सकता है। डॉ शर्मा की शुरुआत से हिंदी लेखन के प्रति समर्पण झलकता है।अध्यापक जीवन का चुनाव भी इसी संदर्भ में दिखाई देता है।शुरुआती पत्रों में जीवन के प्रति युवकोचित रोमान और भावुकता है जो क्रमशः प्रौढ़ होते जाता है।यह महत्वपूर्ण है कि वे शुरुआत से ही शिक्षा, स्त्री-पुरुष समानता, परिपक्व उम्र में विवाह आदि सकारात्मक मूल्यों के पक्षधर रहे हैं, और घर मे उसके लिए संघर्ष भी किया। पत्रों से उनके बड़े भाई के सहयोग, परस्पर प्रेम, पारिवारिक एकता का पता चलता है। पत्रों में डॉ शर्मा के लेखन योजना, कई लेखकों के व्यक्ति चित्र भी हैं; खासकर निराला के बारे मे महत्वपूर्ण प्रारम्भिक टिप्पणियां हैं।पत्रों में पारिवारिक जीवन के चित्र तो हैं ही, तात्कालीन राजनीति, साहित्य के बारे में भी पर्याप्त जानकारी मिलती है।

          आत्मकथा में ऐसे कई सवालों के जवाब मौजूद हैं, जो उनके निधन के बाद दोहराये जाते रहें। मसलन उनके 'वैदिक प्रेम' के बारे में कहा गया कि वे उम्र के आखरी पड़ाव में उस तरह गए। 'अंतिम अरण्य'! जबकि वेदों से लगाव उनका प्राम्भ से ही था। आत्मकथा(खण्ड एक) 1950की एक घटना का जिक्र है, जब वे दिल्ली गए थे। डॉ शर्मा लिखते हैं " पार्लियामेंट की लाइब्रेरी से पुस्तके लेकर पढ़ा करता था। ऋग्वेद से दिलचस्पी थी, कीथ और मैकडनल के 'वेदिक इंडेक्स' से मैं नोट्स लिया करता था"।

आगे उन्होंने भाषा विज्ञान और सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास पर जो काम किया जो एक विस्तृत योजना का ही परिणाम है।इसी तरह विवेकानंद के अनुवादों के पुनः प्रकाशन पर सवाल उठाया गया।डॉ शर्मा वेदांत की सीमित युग सापेक्ष प्रगतिशीलता को स्वीकार करते थे मगर उसकी सीमा को भी जानते थे। विवेकानन्द के बारे में आत्मकथा(खण्ड दो) में लिखा है “विवेकानंद से मेरा कोई झगड़ा नही, लेकिन यदि कोई मार्क्सवाद की जगह विवेकानंद को प्रतिष्ठित करे तो मैं उसकी आलोचना जरूर करूँगा”। एक और बात उनके भाषण कला का उल्लेख नही किया जाता मगर आत्मकथा से पता चलता है कि प्रभावी भाषण किया करते थे। चालीस-पचास के दशक के काफी उदाहरण इसमे हैं। बहुत जगह तो उन्हें मार्क्सवाद से परिचय के लिए ही भाषण करने बुलाया जाता था।

        इस तरह देखते हैं कि वे बीसवीं सदी के हिंदी साहित्य के साक्षी हैं। यह रेखांकित किया जाता रहा है कि देशप्रेम और मार्क्सवाद उनके केंद्रीय प्रेरक तत्व रहे हैं। देशप्रेम उनके यहां कोई अलग से चीज नही है वरन इस देश के कला,साहित्य, संस्कृति, इतिहास, दर्शन, भाषा से प्रेम है। और इनमे भी मुख्यतः श्रमिक-किसान वर्ग के।इसलिए वे परम्परा के मूल्यांकन पर जोर देते हैं और ऋग्वेद से निराला तक श्रमशील परंपरा को रेखाँकित करते हैं। उन्होंने बातों से नही अपने कर्म से हिंदी की सेवा की और विविध विषयों में ग्रन्थ लिखें । जब कभी भी भारत का सांस्कृतिक इतिहास लिखा जाएगा, उनके अवदान को याद किया जाएगा।उनके जीवन की कर्मठता, दृढ़ता, अध्ययनशीलता, अथक परिश्रम आने वाले पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।

कृति-अपनी धरती अपने लोग, तीन खंड(आत्मकथा)
लेखक- डॉ रामविलास शर्मा

प्रकाशन- किताबघर प्रकाशन, दिल्ली

अजय चन्द्रवंशी, कवर्धा( छ. ग.)

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