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राम की शक्तिपूजा

आलेख : अजय चन्द्रवंशी, कवर्धा (छ॰ग॰)

निराला की कविताओं में ‘राम की शक्तिपूजा’ को अधिकांश विद्वानों द्वारा उनकी श्रेष्ठ कविता माना गया है। इस कविता पर डॉ रामविलास शर्मा, चंचल चौहान, डॉ नगेन्द्र, धूमिल, नामवर सिंह आदि बहुत से विद्वानों ने लिखा है, और अब भी लिखा जा रहा है। बदलते युगीन परिस्थितियों में रचना का पुनर्मूल्यांकन होता भी है। श्रेष्ठ कहे जाने वाली रचनाओं की यह खासियत होती है कि बदलती परिस्थितियों में अपनी सार्थकता बनाए रखती है। काव्य विधा की यह खासियत है कि कवि ‘ज़माने का ग़म’ भी अपने ग़मों के माध्यम से कहता है। इस कविता में भी निराला के द्वंद्व परिवेश के द्वंद्व से घुल-मिल गए हैं।

जैसा की सभी विद्वानों ने लक्षित किया इस कविता में पौराणिक कथा(राम कथा) के माध्यम से निराला के जीवन संघर्ष और युगीन संघर्ष (स्वतन्त्रता आंदोलन) का चित्रण है। निराला को जहां व्यक्तिगत जीवन में विकट संघर्ष करना पड़ा, वहीं राजनीतिक पराधीनता भी कहीं न कहीं मन को आहत कर रहा था। “अन्याय जिधर है उधर शक्ति”  से कविता शुरू होती है, पृष्टभूमि का गहन अंधकार बिडम्बना की तीव्रता को और बढ़ा देता है। राम का मन संशयग्रस्त है, उसके प्रहार निष्फल रह जाते हैं। वानर सेना पस्त है, उस पर रावण का अट्हास! कारण वही “अन्याय जिधर है उधर शक्ति”। यह विडम्बना अस्वाभाविक है, क्योंकि कहा जाता रहा है ‘सत्य की विजय होती है’, मगर यहां तो असत्य की विजय हो रही है। इसलिए राम जैसा स्थिर चित्त का व्यक्ति क्षण भर को भयातुर हो जाता है “स्थिर राघवेंद्र को हिला रहा फिर-फिर संशय”। यहां राम बिल्कुल मानवीय धरातल पर आ जाते हैं, और राम का दुःख एक आम-आदमी का दुःख हो जाता है। राम जिस तरह सीता के लिए व्याकुल होते हैं वहां पर भी उनका व्यवहार मानवीय हो जाता है। यों निराला का अभीष्ट भी मानवीय दुखों और द्वंद्वों का चित्रण है।

शक्ति में एक निष्क्रिय तटस्थता है। उसमे ऊर्जा है, गति है, मगर दिशा नही। उसे दिशा देनी पड़ेगी। या यूँ कह लें  अभी उसकी सही पहचान नही हुई है। क्या यह शक्ति जन-मन के भीतर की नही है? जिससे वह अभी अनजान है! “शक्ति की करो मौलिक कल्पना” यानी जन को अपनी शक्ति पहचाननी(जाग्रत करनी) है, जिससे अंधकार छट सकता है। इस तरह “अन्याय जिधर,है उधर शक्ति” शाश्वत नही है, इस भाव से ऊपर उठ कर ही इस भ्रम को दूर किया जा सकता है। शक्ति की दिशा को रावण की तरफ से मोड़कर राम की ओर करनी है। राम की ‘शक्तिपूजा’ इसी शक्ति की पहचान का उपक्रम है। ज़ाहिर है यह पहचान आसान नही है। दुविधाग्रस्त मन को एकाग्र करना, अपने व्यक्तिक राग-द्वेष की सीमा से परे जाकर बिना विचलित हुए समस्या पर ध्यान केंद्रित करने से ही शक्ति का ‘संधान’ हो सकता है। इस प्रक्रिया में तमाम भीतरी- बाहरी कमजोरियां पूरे शिद्दत के साथ आजमाती हैं।

सीता की छवि में निराला के व्यक्तिक जीवन की अंतरंगता घुल-मिल गई है, फिर उसकी व्यापकता देशोद्धार तक चली आती है। सीता की मुक्ति कवि के दुःखों की मुक्ति, और पराधीनता से मुक्ति की व्यंजना लिए हुए है। एक छण के लिए राम की निराशा निराला की निराशा बन जाती है। “धिक जीवन को जो पाता ही आया विरोध, धिक साधन जिनके लिए किया सदा शोध” में निराला की छवि उभर आती है। फिर “वह एक और मन रहा राम का जो न थका” भी निराला की जिजीविषा से अभिन्न है। इस तरह निराला के व्यक्तिक जीवन के द्वंद्व युगीन परिस्थितियों के द्वंद्व से जुड़कर इस कविता को महत्वपूर्ण बना देते हैं।

पौराणिक कथानक की अपनी सीमा भी कवि के समक्ष है। बातें कथानक की सीमा में बंधकर कही जानी है, मगर उस सीमा में रहते हुए भी निराला की प्रतिभा इस कविता में चरम में है। कविता की महाकाव्यात्मकता को रेखांकित किया जाता रहा है। उस पर शब्द की गरिमा, नाद सौंदर्य, छंद का अबाध प्रवाह कविता को शसक्त करता है। जैसा कि हमने ऊपर कहा है, महत्वपूर्ण रचनाएं बदली परिस्थितियों में नए सन्दर्भों से जुड़ने की सम्भावना रखती हैं। धूमिल ने सन बैसठ के युद्ध के पराजय जनित हताशा से जोड़कर इसकी व्याख्या की थी;  आज जब सत्ता की एकाधिकारवादी प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है, क्या रावण का अट्टहास फिर नही गूंज रहा?  मगर रावण का अट्टहास हमेशा नही रहा;  शक्ति हमेशा उसके साथ नही रहती, वह सत्य के पक्ष में आती है- “होगी जय, होगी जय, हे पुरषोत्तम नवीन”।

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