जल जंगल ज़मीन

राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम के बहाने अदानी को परसा कोयला खदान आवंटित हुई..

मुख्यमंत्री से लेकर ग्राम सभा और जनसंगठन की आपत्तियां दरकिनार , परसा कोयला खदान को पर्यावरण मंत्रालय की हरी झंडी.

रायपुर . केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने सरगुजा और सूरजपुर जिलों में परसा कोल ब्लॉक में खनन को अपनी मंजूरी दे दी है । पांच लाख टन प्रति वर्ष क्षमता की यह ओपनकास्ट कोयला खदान राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम को आवंटित हैं पर्यावरणीय मंजूरी देने का फैसला मंत्रालय की पर्यावरण आकलन समिति ने किया है। इस खदान को लेकर स्थानीय स्तर पर कई आपत्तियां हैं । कोल ब्लॉक का पूरा इलाका पांचवी अनुसूची में आता है । पेसा कानून के तहत इसके लिए पंचायतों की सहमति जरूरी है ।

कंपनी ने पर्यावरणीय स्वीकति के लिए ग्राम सभाओं का रजिस्टर लगाया । साल्ही सहित कई गांवों के सरपंचों ने कलेक्टर से शिकायत की थी , खदान को मंजूरी देने के लिए उनकी पंचायत में कभी ग्रामसभा हुई ही नहीं है। कंपनी ने फर्जी दस्तावेज लगाए हैं । स्थानीय संस्थाएं हसदेव नदी का जलागम क्षेत्र खत्म हो जाने और हाथी बहुल क्षेत्र के नष्ट हो जाने की आशंकाएं जताई थीं .

2018 में 15 – 16 फरवरी को हुई समिति की पहली बैठक में इसके लिए राज्य वन्य जीव बोर्ड की अनुशंसा , हसदेव नदी के जलागम क्षेत्र पर खनन प्रभाव का समेकित आकलन और स्थानीय आदिवासी समाज पर पड़ने वाले प्रभाव पर आकलन रिपोर्ट मांगी थी । विपक्ष में रहते हुए मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी परसा कोल ब्लॉक में खनन रुकवाने की माग की थी ।

जुलाई 2018 में तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ . रमन सिंह को लिखे पत्र में उन्होंने कहा था , हसदेव अरण्य का विस्तृत अध्ययन कर विस्तृत कार्ययोजना बनाई जानी चाहिए । वहीं इस पूरे क्षेत्र को खनन मुक्त रखा जाना चाहिए ।

1252 हेक्टेयर की खदान में 841 जंगल

प्रस्तावित खदान में 1252447 हेक्टेयर जमीन आ रही है । इसमें से 841 हेक्टेयर जंगल की जमीन है । 45 हेक्टेयर सरकारी जमीन है । 365 हेक्टेयर जमीन में खेत , गोचर , तालाब और निस्तार की जमीन आ रही है ।

एनजीटी में चुनौती देने की तैयारी , छतीसगढ़ बचाओ आंदोलन .

आलोक शुक्ला ,छतीसगढ़ बचाओ आंदोलन

हसदेवअरण्य बचाओ संघर्ष समिति और छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन इस पर्यावरणीय स्वीकृति को राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण में चुनौती देने की तैयारी कर रही हैं । छत्तीसगढ़ बचाओआंदोलन के आलोक शुक्ला कहते हैं यह पर्यावरणीय स्वीकृति तथ्यों और .स्थानीय आपत्तियों को दरकिनार कर दी गई है । अगर यहां खनन शुरू हुआ तो हसदेव नदी का जलागम क्षेत्र खत्म हो जाएगा इससे मिनीमाता बांगो बांध में पानी का संकटहोगा. वन्यजीवोंकासघनरहवास खत्म होगा इससे हाथी और इंसान के बीच का टकराव बढ़ेगा जिसका खामियाजा सभी को भुगतना होगा शुक्ला ने कहा , वे लोग एनजीटी में इसे चुनौती देने जारहे हैं । राज्य सरकारको भी इस खननका विरोध करना चाहिए ।

आलोक शुक्ला ने आगे कहा कि हसदेव अरण्य के सघन वन क्षेत्र में एक और खनन परियोजना को नियम विरुद्ध, तथ्यों को छुपाकर पर्यावरणीय स्वीकृति केन्द्रिय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने जारी की। सबसे महत्वपूर्ण है कि वर्ष 2018 में पूर्ववर्ती रमन सरकार ने इस खनन परियोजना के लिए हसदेव नदी के केचमेंट और वन्य प्राणी विशेष रूप से हाथी पर होने वाले प्रभाव की गलत और झूठी रिपोर्ट केंद्रीय मंत्रालय में प्रस्तुत की थी। राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद भूपेश बघेल जी की सरकार को हम लोगों ने ज्ञापन सौंपकर उन दोनों NOC को वापिस लेने आग्रह किया था, परंतु अडानी के दवाब में इस सरकार ने भी चुप्पी साध ली । इस सम्पूर्ण वन क्षेत्र को केंद की यू पी ए सरकार ने no go क्षेत्र घोषित कर खनन पर प्रतिवंध लगाया था। वर्तमान मोदी सरकार द्वारा नो गो की जगह वॉयलेट इनवॉयलेट के रूप में निर्धारण किया जा रहा हैं जिसमे देश के कुल 700 से ज्यादा कोल ब्लॉक में 33 कोल ब्लॉक इंवॉइलेट हैं उसमें भी सबसे ज्यादा हसदेव के 7 कोल ब्लॉक शामिल हैं। परसा कोल ब्लॉक उनमे से एक हैं लेकिन मोदी सरकार अडानी कंपनी के मुनाफे के लिए हसदेव के सभी कोल ब्लॉक को पर्यावरणीय स्वीकृति दे रही हैं । हसदेव में अब और खनन से छत्तीसगढ़ के पर्यावरण, जल स्रोत और वन्य प्राणियों पर बहुत ही गंभीर दुष्प्रभाव पड़ेगा जिसे फिर कभी ठीक नही किया जा सकता।

पीसीसीएफ ने छिपाए हाथी

मंत्रालय ने वन्य जीव बोर्ड की अनुशंसा मांगी थी , लेकिन तत्कालीन पीसीसीएफ ने अपनी ओर से एक रिपोर्ट भेजकर कह दिया कि उस क्षेत्र में जानवरों की आवाजाही नहीं है । हालांकि उसी दौरान प्रभावित क्षेत्र में सरकार ने हाथियों के हमले में जन – धन के नुकसान का मुआवजा भी बांटा था । जल संसाधन विभाग ने हसदेव नदी के कैचमेंट का सर्वे किए बिना कंपनी की योजना को एनओसी दे दी ।]

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पत्रिका न्यूज़ नेटवर्क

चित्र . आलोक पुतुल
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