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राजनैतिक ,आर्थिक मुक्ति से पहले जरूरी है सामाजिक बराबरी का आंदोलन ,बिना सामाजिक मुक्ति के राष्ट्र का निर्माण  संभव नहीँ .सम्विधान दिवस के आयोजन में वक्ताओं ने याद दिलाई कानून की ताकत .: बिलासपुर मैं हुआ भव्य आयोजन .:अम्बेडकर युवा मंच बिलासपुर की शानदार पहल .

26.11.2017 बिलासपुर /

आम्बेडकर चौक में सम्विधान दिवस के दिन
अम्बेडकर युवा मंच ने भव्य आयोजन किया ,शानदार सांस्कृतिक कार्यक्रम ,प्रतिभाशील लोगों का सम्मान , युवा साथी सुरेश रामटेके का संस्मरण और देश के प्रसिध्द अम्बेडकर वादी चिंतक चौथी राम यादव और डॉ. सुनील सुमन के वक्तव्य से भारी संख्या में आये डॉ. अम्बेडकर के अनुयाई मुग्ध हो गए .शाम 4 बजे शुरू हुआ कार्यक्रम रात 11 बजे तक चलता रहा .
सांस्कतिक कार्यक्रम के लिए पामगढ़ से करीब 100 लोगो का दल पहुँचा ,
शिक्षा और प्रशासनिक पदों पर पहुचे करीब 60 लोगों का सम्मान किया गया ,इस अवसर पर आयोजको ने अपने साथी सुरेश रामटेके को याद किया जिन्होंने अम्बेडकर युवा मंच के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की और 39 साल की उम्र में उनका निधन हो गया ,सुरेश की पत्नी और बच्चों को सम्मानित किया गया ,.
इस अविस्मरणीय आयोजन की सभी लोग भारी प्रशंशा कर रहे है ,

 


आयोजन के मुख्य वक्ता चौथी राम यादव ने कहा कि आज इतनी बडी संख्या में उवस्थिति को देखकर कहना चाहता हूँ की ,एक हजार भक्त है और चार अनुआई है तो ये चार अनुआई काफी हैं क्यों कि भक्त तो मूर्खों का झुंड होता है.नारों में बड़ी ताक़त होती है ,जैसे जयभीम के नारे ने जयश्री राम के नारे को झंडू कर दिया .


आज हमें तय करना है कि हम किसके साथ खडे होंगे ,एक तरफ हिन्दू राष्ट्र का नारा है जो समाज को बांटता है ,विखण्डित करता है और दूसरी तरफ हमारा संविधान है जो सबको समान अवसर और बराबरी की बात करता है ,आज वो लोग इसी लिए सम्विधान के खिलाफ खड़े दिखते हैं.
15 साल पहले मेने एक लेख लिखा था जिसमे कहा था कि रही होगी बीसवीं सदी नेहरु गांधी तिलक के नाम लेकिन 21 वीं सदी तो आम्बेडकर की होगी ,और आज वह् सही सिध्द हुई है,।में अम्बेडकर की तुलना गाँधी नेहरू से नहीं करता यदि तुलना करनी है तो इनकी तुलना नेल्सन मंडेला या मार्टिन लूथर किंग द्वितीय से करनी चाहिये जो अपने समय रंगभेद से लड रहे थे और यहां ये जातिभेद से लड़ाई कर रहे थे . रँगभेद की लड़ाई से कहीं ज़्यादा जाती की लड़ाई महत्वपूर्ण थी और बडी थी ,,.

गाँधी नेहरू की तरह राजनीतिक स्वतन्त्रता आंदोलन में महात्मा फुले से लेकर अम्बेडकर ने कूदने से मना कर दिया था क्योंकि उनका मानना था कि राजनीतिक आज़ादी से कहीं ज्यादा सामाजिक आज़ादी ज्यादा जरूरी है जो हमारे समाज को नष्ट किये हुए है, यही मतभेद उनके कम्युनिष्टों से भी थे ,उनका कहना था कि पूंजीवाद खत्म होने से भी जातिवाद समाप्त नहीं होगा इसके लिये सामाजिक परिवर्तन करना होगा यह वर्ग के बदलने से नही होने वाला है .आर्थिक मुक्ति से पहले सामाजिक मुक्ति की पहले जरूरत है .
आज वह लोग हमारे बहुजन के प्रतीकों का स्तेमाल कर रहे है , जब भी देश के बाहर प्रधानमंत्री जाते है तो बुध्द गाँधी और अम्बेडकर का नाम लेते है क्योंकि इनके नायको को बाहर कोई जानता ही नही है ,इन्हें अम्बेडकर के सामाजिक न्याय या बराबरी से कोई लेना देना नहीं है यह लोग उनके नाम का उपयोग करके भृमित करना चाहते हैं ,यह हमारे नायको को अपने लाभ के लिये स्तेमाल कर रहे है जैसे बुध्द को विष्णु के अवतार में शामिल कर लिया .
जबतक सामाजिक मुक्ति नही होगी तब तक राष्ट्र का निर्माण कैसे हो सकता है ,इसलिए हमारे सामने राजनीतिक या आर्थिक मुक्ति से पहले सामाजिक मुक्ति का सवाल महत्वपूर्ण है ।


फूटडालो राज करो की राजनीति अंग्रेजों ने भारत के मनुवादियो से ही सीखी थी , वर्ण व्यवस्था की जड़ में ही समाज मे फुट के बीज है ,
वेमूला से लेकर दलितों की हत्या पर हमारे समुदाय के नेता दलाली कर रहे थे.
छात्र और युवा आंदोलन ने पूरे देश मैं बडा़ बदलाव शुरू किया है । विपक्ष की भूमिका में आज युवा और छात्र ही परिवर्तन की लडाई लड रहे हैं .

कबीर ने न मार्क्सवाद पढा और न अम्बेडकर को लैकिन कैसे अम्बेडकर ने कबीर को अपना गुरु माना , भक्ति आंदोलन के सभी संतो को प्रताड़ित किया गया , उनका भंडारा सबसे बडा परिवर्तन का प्रतीक बन गया ,उसमे सभो वर्ण के लोग एक साथ बैठ कर खाना खा रहे होते तर्क, सतसंग भी उस समय बडा परिवर्तन का प्रतीक बन गया था .

युवा अम्बेडकर चिंतक डॉ. सुनील कुमार सुमन ने अपने वक्तव्य में कहा हमारे पहले की जो पीढ़ी है उसने समाज से बहुत लिया लेकिन समाज को कुछ दिया नही
पे बेक तो सोसायटी की जो अवधारणा थी उसके लिए कुछ खास नही किया ,जो हमारे समाज के लोग इस सम्विधान की वज़ह से बड़े बड़े पदों पर गए ,बड़ी बड़ी पढ़ाई की उन्होंने वापस मुड़कर अपने समाज की तरफ नहीं देखा वे भी उसी में बह गए .

जो सम्विधान के सबसे ज़्यादा विरोधी थे जो निर्माताओं से सबसे ज्यादा नफरत करते थे उन्होंने ही सबसे ज्यादा फायदा उठाया इसका में स्वर्ण समाज की बात कर रहा हूँ ,वे इसी के सहारे संसद ,ब्यूरोक्रेसी और न्याय पालिका में बड़ी संख्या में घुस गए उन्होंने इसकी ताकत को पहचान लिया लेकिन बहुजन ने सही ताकत को अभी तक नही स्वीकार किया है.

सुमन आदिवासी गोड समुदाय से है उन्होंने कहा कि संविधान और आमेडकर को कितना जानते और मानते है ,हमसे ज्यादा वो लोग इसको जानते है और लाभ उठा रहे हैं .हम समाज को कितना लौटा रहे है , जो आरक्षित है वो कया कर रहे है अपने समाज के लिये.
जो आदिवासी पढे लिखे नहीं है वे अपनी संस्कृति को बचाये रखे है लेकिन जो पढ लिखकर मनुवादी सिस्टम के मानसिक गुलाम बन गये है .

जितने लोग जय भीम का आज नारा लगा रहे है यदि आज चुनाव हो जाये तो यही सब नागनाथ या सांपनाथ को वोट दे देंगे.
नदी जंगल पानी बेचने वाले देश भी बेच देंगे यदी हम सचेत नही हुये. उन्होंने कहा कि
भंते लोगों से भी सचेत रहिये यह लोग भी धीरे धीरे ब्राह्मण की तरह व्यवहार कर रहे हौ ,वे भी अमीरों के.घर ही जाते है गरीबों के यहाँ नही जाते ,वे लोग दान भी अपने बिहार मे ही लेते है.उसके लिये भी घरो मै नही जाते.

यह दीपदान कया हैं , यह कहानी मत बनाईये ,दीपदान करना है तो संविधान दिवस के दिन क्यों नही ,बिलासपुर से ही शुरुआत किया जाये ।
अगर सवाल नही करोगे तो हमारे नेता बिकाऊ हो जायेंगे .
नेट फेसबुक वाटसेप पत्रिकाओं को परमोट कीजिए.

 

कार्यक्रम में नितेश अम्बादे, रत्नेश ऊके, प्रदीप कुमार ,रत्नेश ऊके,देवेंद्र मोटघरे ,कुणाल रामटेके ,सागर हुमने, लोकेश ऊके ,वर्षा रामटेके ,रश्मि नागदोने ,संघमित्रा वाहने, कपिल चौरे ,सरगम हुमने , नीलिमा बौद्ध , तक्षशिला रामटेके ,हरीश वाहने ,सुखनंदन मेश्राम, नरेंद्र रामटेके , मगन गेडाम, अशोक वाहने ,पायल रामटेके, विशाखा ,राजेश हुमने आदि कार्यकर्ता उपस्थित थे .

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