अभिव्यक्ति

राजनीतिक रिपोर्टिंग के दौरान होती है पत्रकारों की मौत –बस्तर में हो चुकी हैं पत्रकारों की मौत कारण आज तक नहीं आए बहार .. वही कई पत्रकार है जा चुके जेल …

रिपोर्टिंग के दौरान रखना चाहिए वास्तु स्थिति का ध्यान–

द कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स ,सीपीजे के भारतीय संवाददाता ने बीजापुर में चुनावों को कवर करने वाले पत्रकारों के लिए  सुरक्षा किट वितरित किया.

 पुष्पा रोकड़े  की  रिपोर्ट 

बीजापुर / 7.04.2019

द कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (सीपीजे) के प्रतिनिधि  बीजापुर में स्थानीय पत्रकारों से मुलाकात की और सीपीजे द्वारा बनाई गई “चुनावों को कवर करने वाले पत्रकारों के लिए सुरक्षा किट” की प्रतियां वितरित की.   

सीपीजे की इमरजेंसी रिस्पांस टीम (ईआरटी) ने अंतर्राष्ट्रीय कार्यप्रणाली के आधार पर इस सुरक्षा किट का संकलन किया है. यह संपादकों, पत्रकारों और फोटो जर्नलिस्ट की जानकारी के लिए है  कि चुनाव की तैयारी कैसे करें और डिजिटल, शारीरिक और मनोवैज्ञानिक जोखिम को कैसे कम करें.

सीपीजे के भारतीय संवाददाता कुनाल मजूमदार ने डिजिटल सुरक्षा से जुड़े विभिन्न पहलुओं के बारे में बताया. जिसमें बुनियादी उपकरणों की तैयारी से लेकर ऑनलाइन बॉट्स की पहचान करने, ऑनलाइन उत्पीड़न और ट्रोलिंग और सामग्रियों को सुरक्षित संग्रहित करने के बारे में जानकारी दी. इसके अलावा कुनाल ने शारीरिक सुरक्षा के विभिन्न पहलुओं में रैली और विरोध प्रदर्शन के दौरान सुरक्षित रिपोर्टिंग करने और प्रतिरोधी समुदायों के बीच सुरक्षित रिपोर्टिंग करने के उपायों के बारे में भी जानकारी दी.

कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (सीपीजे) के बारे में : 

कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (सीपीजे) एक स्वतंत्र, नॉन-प्रॉफिट संस्था है जो दुनियाभर में प्रेस की आजादी को बढ़ावा देती है. पत्रकारों के प्रतिहिंसा के भय के बिना पत्रकारिता करने के अधिकार की रक्षा के लिए हम लड़ते हैं. हर साल, सैकड़ों पत्रकारों पर हमले होते हैं, उन्हें जेल में डाल दिया जा है या जान से मार दिया जाता है. सीपीजे, उन पत्रकारों के लिए और प्रेस की आजादी के लिए 30 सालों से अधिक समय से लड़ रहा है.   

सीपीजे का मुख्यालय न्यूयॉर्क सिटी में स्थित है और दुनिया भर के करीब 40 विशेषज्ञों से मिल कर बना है. सीपीजे का प्रमुख काम रिसर्च आधारित है. यह दुनिया भर में होने वाले प्रेस अधिकारों के हनन पर एक ग्लोबल स्नैपशॉट प्रस्तुत करता है. सीपीजे का रिसर्च स्टाफ हर साल पत्रकारों पर होने वाले सैकड़ों हमलों का दस्तावेजीकरण करता है. । बिजापुर पत्रकार भवन में  कार्यशाला का आयोजन किया गया था इस दौरान काफी संख्या में पत्रकार आकर कुनाल मजूमदार को सुना अपनी कई तरह की समस्याओं से अवगत कराया । उन्हें बताया कि किस तरह बीजापुर में  पत्रकारिता करना आसान कितना कठिन काम है यहां आए दिन मुठभेड़ और अन्य नक्सली पुलिस राजनैतिक गतिविधियां संचालित होती रहती हैं जिस पर यहां के स्थानीय पत्रकार काम करते हैं और उन्हें किस तरह की दिक्कतें आती है उस पर भी बातें की गई ।

-एस करीमुद्दीन बस्तर जिला पत्रकार संघ अध्यक्ष बस्तर विकास के बाद भी कुछ मामले आज भी कुछ एरिया आज भी पिछड़ा है नक्सली पुलिस और पार्टी के बीच पत्रकार ही आते हैं कभी कभी सरकार के पक्ष या माओवादी वादियों के पक्ष में खबर लिखना भी पत्रकारों के लिए एक चुनौती है चुनाव के दौरान पत्रकारों को संभलकर अपने कर्तव्य का निर्वाह करना चाहिए कोई भी पार्टी पुलिस माओवादी के बीच पत्रकारों पर  निगाह होती हैं ।जब कोई पत्रकार किसी एक विषय पर खबर लिखना लगातार शुरू करते हैं तो यह तीनों ही उस पर अपनी निगाह बना रखते हैं पेपर के कतरन कलेक्शन कर लेते हैं बाद में अपने अपने तरीके से उन बातों को उजागर करते हैं पार्टी हो या पुलिस इस तरह की बातों की वजह से कई पत्रकार जेल जा चुके हैं ।  बस्तर में माओवादियों ने दो पत्रकारों की हत्या भी की है पहले तो नक्सली के सहयोगी की नजर से पुलिस देखती है पत्रकारों को फिर वही बात ठीक उल्टी हो जाती है और नक्सली देखते हैं पुलिस के सहयोगी के रूप में पत्रकारों को और कई तरह के मामले बनाकर पत्रकार को जेल भी भेजा जा चुका है इन सारे मामले को देखते हुए पत्रकारों को अपनी पैनी नजर से स्थिति पर  वास्तु स्थिति की रिपोर्टिंग करनी चाहिए ना कि पार्टी नक्सली पुलिस की रिपोर्टिंग चुनाव के दौरान इन बातों का खास ध्यान रखना चाहिए ।

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