कला साहित्य एवं संस्कृति

रजत कृष्ण : छत्तीस जनों वाला घर: लोक चेतना और लोक की चिंता : अजय चंन्द्रवंशी ,कवर्धा

           लोकचेतना लोक की चिंता भी है.अपने जनपद, अपने परिवेश से कवि का जुड़ाव केवल सौंदर्य परक नही होना चाहिए; न ही इतिवृत्तात्मक ढंग से केवल सांस्कृतिक विवरण. कविदृष्टि की सार्थकता उसके अंतर्विरोधों और संकटो को पहचानने में है.कहना न होगा कि रजत कृष्ण जी की कविताएं इस दृष्टि से अपने 'लोक' को उसके सम्पूर्ण आयामों में व्यक्त करती हैं.वहां परिवारिक प्रेम का मजबूत डोर है, पास-पड़ोस के लोगों से भाई चारा है, अपने 'होने' के प्रति गौरवबोध है तो वहां के अवशिष्ट सामंती मूल्यों को लेकर चिंता भी है.
           रजत कृष्ण की कविताएं मुख्यतः ' किसानी जीवन' और परिवेश की कविताएं हैं. यहां उसके विविध चित्र हैं. कृषि कर्मरत जन हैं, संस्कृति है, उनके सुख-दुख हैं, विडम्बनाएं है.लहलहाते फसल जितना उनको उल्लासित करते हैं, 'सूखे के दिन' उतने ही निराश.उस पर व्यवस्था की विडम्बना यह कि 'सुकाल में' भी किसान खेत बेचने को मजबूर हैं.आजादी के इतने वर्षों बाद भी, विकास के इतने दावों के बाद भी यह स्थिति क्यों है? रजत की कविदृष्टि इस पहचानती है.वह जानती है कि 'अंबानी के सपनों में पल रहे इस देश में'  आम आदमी महज वोट है.
              रजत कृष्ण की काव्य यात्रा पिछली सदी के आखरी दशक से शुरू होती है,जो  समाजवाद के विखराव, नव साम्राज्यवाद, एक ध्रुवीय व्यवस्था के लिए जाना जाता है.रजत युवकोचित प्रेम, सौंदर्य के साथ -साथ शुरुआत से ही इन बदलावों के प्रति सचेत दिखते हैं.उत्तरोत्तर उनमे इसकी पहचान गहन होती जाती है,और वे देखते हैं कि किसान क्यों आत्महत्या कर रहे हैं? वे क्यो पुलिस की गोली से मारे जा रहे हैं? क्यों लोप होने लगे हैं बींधना-पटासी बसुला और आरी?क्यों बादल अब खेत पर बरसते नही? वे विकास के इस पूंजीवादी मॉडल के पाखण्ड को समझते हैं.
         पूंजीवाद का सहोदर साम्राज्यवाद है, जो 'मुक्ति' के नाम पर प्रायोजित युद्ध करता है. अफगानिस्तान और ईराक में वही हुआ.यह 'अमेरिकी युग ' की शुरुआत सचमुच गुलामी की नयी गाथाएं रच रही है. लेकिन ऐसा नही की सबकुछ खत्म हो गया है. खरीदी-बिक्री के इस दौर में भी 'सत्तर वर्षीय सतरूपा मरारिन'  जैसे लोग हैं जो 'जबड़ा पसार रहे फैक्ट्री के सामने' अपनी बत्तीस डिसमिल ज़मीन को जीते जी न छोड़ने की कसम खाये बैठे हैं.
           रजत जी की कविताओं में एक निश्छल सहजता है.उनमे प्रेम की सहज सम्वेदना है; व्यक्तिक, पारिवारिक. अपनापन है,पास-पड़ोस,मित्रों के प्रति अपने परिवेश के प्रति.मगर महत्वपूर्ण यह भी है कि वे अपने 'लोक' में डूबकर खो नही जाते; वे अपने परिवेश,अपने समय मे घटित हो रही घटनाओं-दुर्घटनाओं को देखते हैं, उनके पीछे के कारणों को समझते हैं, और एक काव्यात्मक प्रतिपक्ष भी रचते हैं.

भाषा के स्तर पर भी उनमे सहजता है.वे कविताओं में छतीसगढ़ी के शब्दों और क्रियाओं का जो प्रयोग करते हैं,वह असहज नही लगता बल्कि उनकी रचनात्मकता को और बढ़ाता है.

रजत कृष्ण .

जन्म – 26 अगस्त 1968

शिक्षा – एम.ए. हिन्दी साहित्य, पी-एच.डी.

साहित्यिक त्रैमासिक ‘सर्वनाम’ का संपादन

विभिन्न साहित्यिक पत्रिकाओं में कविता एवं लेख विगत पच्चीस वर्षों से प्रकाशित

पं.रविशंकर शुक्ल विश्व विद्यालय रायपुर में‘रजत कृष्ण: जीवन की रचनात्मकता एवं रचनात्मकता का जीवन’ विषय पर शोध कार्य

काव्य संग्रह – छत्तीस जनों वाला घर

शोध ग्रंथ – विष्णुचंद्र शर्मा और उनका रचना संसार

शोध पुस्तिका – समय के शब्द (छत्तीसगढ़ की युवा कविता पर केन्द्रित)

संप्रति – शासकीय महाविद्यालय बागबाहरा में अध्यापन

अजय चन्द्रवंशी

राजा फुलवारी चौक, कवर्धा(छ. ग.)
 मो. 9893728320

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