कला साहित्य एवं संस्कृति कविताएँ

रंगों की आजादी : बोधि सत्व 

15.09.2018

उन तितलियों के पर जला दिए गए
जिनके रंग विधर्मी थे
यह एक समय ऐसा था कि विविधता
को विधर्म घोषित कर दिया गया।

वे परिंदे वे पशु वे पेड़ सब पराए हो गए
जो बहुवर्णी थे।

रंगों का ऐसा डर था हवा में
कि दो तीन रंगों तक सीमित था संसार।
पर रंग थे कि जीवन को रंगों से भरते रहे
इंद्रधनुष के रंग बादलों की छाती तोड़ कर
चिढ़ाते रहे उनको जिनकों
अनेक रंगों से नफरत थी।

कई बार तो अस्त होता सूरज
अजब रंग बदल लेता।

उसी सूरज के नीचे
और एक पेड़ था जो अपनी पत्तियों का रंग
खेल खेल में बदल देता था
हर अगले मूहूर्त
जैसे वह आरियों आग और कुल्हाड़ियों को
खुली चुनौती दे रहा हो कि
तुम सब कौन हो
मेरी पत्तियों, मेरा और मेरे जंगलों का रंग
तय करने वाले।

और समुद्र था कि सूर्य आकाश और
बादलों के साथ
रंग परिवर्तन का कौतुक करता था।

और एक चिड़िया थी
जिसके परों का रंग उजालों और
अंधेरे के साथ बदल जाता
अनेक पक्षी विशेषज्ञ
न उसका नाम तय कर पाए
न कोई देश ही सुनिश्चित हुआ उसका
तय नहीं हो पाई उस पक्षी की राष्ट्रीयता
आज सुबह तक भी
अभी वह गाती हुई उड़ गई होगी
समुद्र पार
रंगों के मंच पर छटा बिखेरने।

उसके साथ उड़ कर गई होंगी
जले परों वाली तितलियाँ
और बहुवर्णी मछलियाँ भी
गई होंगी उसी ओर
पानी और तरलता को
अपने रंग से रंगती
आजादी को कुछ रंगों से कुचलने वाले लोग
उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते।

बोधिसत्व, मुंबई

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