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युद्ध और मनुष्य के बीच एक को चुनने का अवसर : डॉ. दीपक पाचपोर

युद्ध और शांति: नवभारत

आज (03.03.2019) ‘नवभारत’ (छत्तीसगढ़-ओडिशा) के रविवारीय में प्रकाशित  मुख्य लेख

लड़ाई दो तरफा होती है, एक तरफ बारूद, दूसरी ओर रोटी होती है. जिन्हें युद्ध का शौक होता है, उन्हें रोटी के जल जाने का पता नहीं चलता. क्योंकि वे हथियारों पर इतराते हैं और धमाकों से मुदित होते हैं, वे सभी को रोटी छोड़कर लड़ाई के मैदान में खींच लाते हैं. वे रोटी को तुच्छ बताकर लोगों को प्रेरित करते हैं एक अनदेखे, अपरिभाषित व लगभग थोपे गये नायकत्व की प्राप्ति के लिए. ऐसे लोगों को न रोटी बनानी आती है, न ही बंदूकें चलानीं. उनके घरों की महिलाएं रोटी बेलती नहीं. उनके घरों के किसी पुरुष की तस्वीर दीवार पर नहीं टंगी नहीं होती जिस पर हार लटका हो; जो वर्दी में हो; और वर्दी पर वीरता के तमगे हों. 

जो बेचारे रोटी में मशगूल होते हैं, वे नहीं चाहते गोली चले और प्याज महंगा जाए. वे हर वर्दी वाले की हर बात से डरते हैं. किसी के बताने पर जानते हैं कि राष्ट्र क्या होता है, देशभक्ति क्या होती है. वतन पर मर-मिटना टीबी-मलेरिया से मरने से क्यों बेहतर होता है. वे बिलकुल नहीं चाहते कि जनता उनके घरों तक ‘फलां-फलां अमर रहे’ के नारे लगाते आएं और इस नारे के बीच उनके एक हिस्से को तिरंगे में लपेटकर ले जाएं- ‘जब तक सूरज-चांद रहेगा, ढिमका-ढिमका तेरा नाम रहेगा’. मीडिया की मौजूदगी में बच्चे सेल्यूट देकर, विधवाएं बेटों को भी सेना में भर्ती करने की बात कहकर, इवेंट बदमज़ा न हो, इसलिए बाप रूलाई को ज़ब्त कर, अम्मा पोपले मुंह से और भी बेटे न होने का रोना रोकर अपने-अपने हिस्से की महफिल लूट लेंगे. एक मामले में वे एकमत हैं, कि मरने वाले पर उन्हें गर्व है. (सारे मिलकर अखबार को टीवी को नई ऊंचाइयां देंगे) जब बाहर मीडिया इवेंट जारी होता है. अंदर आटे का डिब्बा रोता है. स्कूल के बैग उम्मीद करते हैं कि अगले साल भी वे स्कूल जाते रहेंगे- मुन्ना उन्हें फेंकेगा.

बाद में एक सड़क, एक चौराहा, एक बगीचे का नाम ‘शहीद’ शब्द से शुरू होगा, जिस पर चलकर श्रीमती शहीद पेंशन लेने जाएंगे, शहीद कुमार दूकान खोलेगा और मां-बाप टहलेंगे. शहादतें- अनगिन कहानियां भेजती हैं, जबकि लौटना था सजीव शरीरों को जमीन खरीदने के लिए पैसों के साथ, पीएफ, पेंशन के हिसाब के साथ, घर के नक्शे के साथ, लड़की के लिए दूल्हा और लड़के का कॉलेज तय करने के वास्ते. पैसे, पीएफ, पेंशन, नक्शे, दूल्हा, कॉलेज- सबको उड़ाने के लिए एक धमाका काफी होता है. कुछ नहीं आता, सिवा एक पार्थिव शरीर के. परिवार को मिलती हैं रण के मैदान पर देखी-सुनी गाथाएं, जो परिवार की दो पीढ़ियों के लिए वाचिक परंपरा का हिस्सा बन जाती हैं. ‘युद्धस्य कथा रम्यते’ का बैंड बज जाता है जब तीसरी पीढ़ी ऊब जाती है, चौथी भूल जाती है; और पांचवी पीढ़ी- पारिवारिक वीरगाथा काल का गला घोंटकर मुक्ति पा लेती है.
जिनका सेना में कोई न हो, वे ही क्रिकेट मैच की रनिंग कमेंट्री या रियेलिटी शो की तरह समर का आनंद उठाने की हिम्मत व महारत जल्दी हासिल कर लेते हैं.

‘युद्ध खुद एक मसला है, भला वह क्या मसले हल करेगा?’ कहने वाले शांति को मौका न मिले, इसलिए युद्ध की झोली में मौके को डालते हैं. हर युद्ध विश्व को पहले से ज्यादा लहूलुहान करता है. हर समर मानवता को कहीं अधिक हिंसक व एक-दूसरे का कातिल बनाकर ही थमता है. विजयी देश बढ़ी शक्ति और दर्प से अधिक आक्रामक होकर पराजितों को बार-बार ललकारता है, पराजित मुल्क खुद को पशुवत तैयार करते हैं अगली भिड़ंत के लिए. उनके दिमाग में विकास व जनकल्याण की योजनाएं नहीं पनपतीं, दिल में बदले की आग धधकती है: और आंखों में खूं तैरता है. राजनीति और सत्तानशीं जमातें धर्म-जाति-सांप्रदायिकता का सहारा पाकर धंधेवालों से पोषित होकर अपने ही लोगों को मौत के मोर्चे पर ठेलती हैं. वे ही ताकतें लोगों को युद्ध के नाम पर उद्विग्न करती हैं. राजनीति लड़ाई में बिखरे एक-एक कतरे को वोटों में तब्दील करने में निष्णात होती हैं. उनको सत्ता तक पहुंचाने वाले हथियार निर्माता व दलाल लोगों से पूछते फिरते हैं- हाऊ इज़ दी जोश? युद्ध, हथियार, शौर्य, सभी को नुमाईश में बदल देते हैं. शहादत के वारिस जो गुरबत के मारे होते हैं, अनाथ बच्चों व विधवाओं की शक्लों में रह जाते हैं. राजनीति मानती है कि- शहीदों की चिताओं पर होएंगी हर समय चुनावी सभाएं मरने वाले का यही बाकी निशां होगा.,
बारूद की गंध, बमों के धमाके, मानव शरीरों के चीथड़े, लड़ाकू विमानों व टैंकों के मलबे दरअसल इसके गवाह हैं कि विज्ञान-टेक्नालॉजी के अद्भुत विकास और मानव द्वारा मानव को ही दिये गये लोकतंत्र के नायाब तोहफे के बावजूद इंसान की आदिम फितरत आज भी कहां विचरती है. यह गोलीचालन व बमबारी सिर्फ दुश्मन पर नहीं बल्कि मानव के समग्र विवेक और गरिमा पर भी होती है. हड्डियों और पत्थरों से लड़ता हुआ मनुष्य आज मिसाइलों और परमाणु अस्त्रों से लैस है.

सभ्यता, संस्कृति और सकल चराचर को बचाना हो तो हथियारों से तौबा करनी ही होगी. युद्ध शब्द को डिक्शनरी से निकाल बाहर करना ही होगा.
है मुश्किल, पर कोशिश करनी ही होगी, अगर चुनाव मनुष्य के बचाए रखने या सम्पूर्ण विनष्ट करने के बीच हो तो!
——–

दीपक पाचपोर ,वरिष्ठ पत्रकार और लेखक

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