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याद रखिये…9 to 5 की नौकरी के बाहर भी एक दुनिया होती है ःः छोड़ दी एसी किच किच , ऐसे ही एक  ऑटोवाले की कहानी…

6.02.2019 , प्रस्तुति अनुज श्रीवास्तव

बॉस बहुत किचकिच करता है यार, छोड़ रा हूं अब’
साला EMI नहीं चल रही होती न, तो अभी नौकरी छोड़ देता.
दोस्तों को ऐसी बातें करते सुना ही होगा. ये भी हो सकता है कि आपने ख़ुद ये सब कहा हो. पर इस विचार को अमल में लाने के लिए कुछ ज़्यादा ही बेफ़िक्री की ज़रूरत होती है, जो हर किसी में नहीं होती. अपने पैरों पर खड़े होने वाला एहसास होता ही ऐसा है, जो आसानी से छोड़ा नहीं जा सकता. ऊपर से अगर बचत के नाम पर बैंक अकाउंट में सिर्फ़ चिल्लर है तो नौकरी छोड़ने का विचार अमल में लाना और मुश्किल हो जाता है.  
पर एक शख्स ऐसा भी है जिसने कम्प्यूटर खट्खट, रोज़मर्रा की बोरिंग ऑफिस लाईफ़, आयर बॉस की किच-किच से तंग आकर नौकरी को टाटा बाय बाय कह दिया. Humans of Bombay और SCOOP WHOOP ने एक ऐसे ही ऑटोवाले की कहानी प्रकाशित की, जिसे यहां हम आपके साथ साझा कर रहे हैं.
 
“Until last year, I had a proper desk job but I went through the same boring routine every single day – wake up early, rush to work, stare at a computer all day, get bullied by my boss and then return home exhausted with no time left to do anything else but sleep. I hardly got any holidays so the only time I saw my kids was when they were sleeping. Eventually I realised that I wasn’t ‘living’ anymore and I was sacrificing the best years of my life for something I didn’t even like doing. So that’s when I quit my job and became a rickshaw driver – now I’m my own boss, I have flexible work hours and I can finally watch my kids grow up – it’s the happiest I’ve been in years.”

“पिछले साल तक मेरे पास एक कायदे की डेस्क जॉब थी लेकिन रोज़ मैं उसी बोरिंग रूटीन को फ़ॉलो करता था. सुबह जल्दी उठो, काम पर भागो, पूरे दिन कम्प्युटर को घूरते रहो, बॉस की सुनो और फिर घर वापस आ जाओ. आते आते कुछ और करने का वक्त ही नहीं मिलता था, सिवाए सोने के. मुझे छुट्टी नहीं मिलती थी, जिस वजह से मैं अपने बच्चों को सिर्फ़ सोते हुए देख पाता था…धीरे धीरे मुझे अहसास हुआ कि मैं ‘जी’ नहीं रहा हूं बल्कि अपनी ज़िन्दगी के सबसे बहतरीन पल गवां रहा हूं, और वो भी एक ऐसी चीज़ के लिए जो करना मुझे पसंद ही नहीं था. इस ख़याल के आते ही मैंने नौकरी छोड़ दी और अब मैं ऑटो रिक्शा चलाता हूं. अब मैं ख़ुद अपना बॉस हूं, मेरे काम करने के घंटे भी मेरी मर्ज़ी के हैं, और अब मैं अपने बच्चों को बड़ा होते देख सकता हूं…सालों बाद मैं इतना खुश हूं.”

अगर काफ़ी समय से नौकरी छोड़ कुछ अपना शुरू करने का इरादा बना रहे हो, तो अब उस इरादे को पक्का कर लो. याद रखो, 8 घंटे की नौकरी के बाहर भी एक ज़िन्दगी है. 

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