अदालत दलित नीतियां मानव अधिकार

यदि आपने मलाला जुसुफ़ज़ई का नाम सुना है लेकिन सुरेखा भोतमांगे का नहीं तो आप अंबेडकर को जरूर पढें.

मलाला ऐसी लड़की थी जिसकी आयु मात्र पंद्रह वर्ष थी , लेकिन तब तक वह कई ‘ अपराध ‘ कर चुकी थी । पाकिस्तान की स्वात घाटी में रहती जोजोसी ब्लॉगर थो , न्यूयॉर्क टाइम्स वीडियो में आई थी , और स्कूल जाती मलाला डॉक्टर बनना चाहती लेकिन उसके पिता उसे राजनेता बनाना चाहते थे । वह एक बहादुर बालिका थी ।

जब तालिबान ने फ़रमान जारी किया स्कूल लड़कियों के लिए नहीं बने हैं , अर्थात् लड़कियाँ स्कूल न जाएँ , मलाला ने परवाह नहीं की । तालिबान ने धमकी दी कि यदि मलाला ने उनके विरुद्ध बोलना बन्द नहीं किया , तो उसकी हत्या कर दी जाएगी । 9 अक्टूबर , 2012 को एक बन्दूकधारी ने मलाला को स्कूल बस से नीचे घसीट लिया , और उसके सर में गोली दाग़ दी । मलाला को इंग्लैंड ले जाया गया जहाँ उसे सर्वोत्तम सम्भव चिकित्सकीय सुविधा मिली , और वह बच गई , यह एक चमत्कार ही था ।

अमेरिकी राष्ट्रपति और राज्य सचिव ने मलाला को समर्थन और एकजुटता के सन्देश भेजे . विश्वविख्यात गायिका मैडोना ने उन्हें एक गीत समर्पित किया विश्वविख्यात हॉलीवुड अभिनेत्री एंजिलिना जोली ने मलाला पर एक लेख लिखा मलाला को नोबेल शान्ति पुरस्कार के लिए मनोनीत किया गया टाइम पत्रिका के कवर पेज पर मलाला का चित्र प्रकाशित हुआ .

हत्या प्रयास के चन्द दिनों के भीतर गॉडन ब्राउन , ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री संयुक्त राष्ट्र संघ के वैश्विक शिक्षा के विशेष दूत ने ‘ मैं हूँ मलाला ‘ लोकयाचिका शुरू की जिसमें कहा गया कि पाकिस्तान सरकार सभी बालिकाओं को शिक्षा प्रदान करे । लेकिन नारीवादी अगेंदे के साथ पाकिस्तान में अमेरिकी ड्रोन हमले जारी हैं – नारीद्वेषी , इस्लामी आतंकवादियों का सफाया करने के लिए .

सुरखा भोतमांगे चालीस वर्ष की थीं और उन्होंने भी बहुत से अपराध किए थे — वे एक महिला थीं — एक अछूत , दलित महिला – और इसके फटेहाल दरिद्र भी नहीं थीं । वे अपने पति से अधिक शिक्षित थीं , और अपने परिवार की मुखिया बन गई थीं ।

डॉक्टर आंबेडकर उनके हीरो थे , सुरेखा के परिवार ने भी हिन्दू धर्म त्यागकर बौद्ध धर्म अपना लिया था.सुरेखा के बच्चे शिक्षित थे । उनके दोनों बेटे सुधीर और रोशन कॉलेज गये थे , उनकी बेटी प्रियंका सत्रह वर्ष की थी और स्कूल के अन्तिम वर्ष में थी और उसके पति ने महाराष्ट्र के खैरलांजी गाँव में जमीन का एक छोटा – टुकडा खरीदा था । इस भूखंड के चारों ओर के खेत उस जाति के लोगों के थे सुरेखा की महार जाति से ऊँचा मानते थे । चूँकि वे दलित थीं , परंम्परा के अनुसार एक सम्मानजनक अच्छा जीवन जीने का अधिकार ‘नहीँ ‘ था , इसलिए ग्राम पंचायत ने उन्हें बिजली कनेक्शन लेने की इजाजत नहीं दी उन्हें अपने झोंपड़े को पक्की ईंट के घर में तब्दील करने की इजाजत भी नहीं गई । गाँव वाले नहर के पानी से उन्हें अपने खेतों को सींचने भी नहीं देते थे , ना ही वे सार्वजनिक कुओं से पानी ले सकती थीं , और फिर एक रोज गाँव वालों ने , सुरेखा के खेत के बीच में से एक सार्वजनिक सड़क बनाने की कोशिश की सुरेखा ने इसका विरोध किया तो गाँव वालों ने उनके खेत में अपनी बैलगाड़ियाँ दौड़ा दीं । सुरेखा की पकी हुई फ़सल पर गाँव वालों ने अपने मवेशी , छोड़ दिए.

सुरेखा झुकी नहीं . उन्होंने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई । लेकिन पुलिस कोई ध्यान नहीं दिया .कुछ महीने बीत गए , और फिर गाँव में तनाव चरम पर पहुँच गया । उन्हें चेतावनी देने के लिए गाँव वालों ने उनके रिश्तेदार पर हमला करके , उसे अधमरा कर छोड़ा । सुरेखा ने पुलिस में और शिकायत दर्ज कराई । इस बार पुलिस ने कुछ व्यक्तियों की गिरफ्तारी कीं , लेकिन अभियुक्तों को तत्काल जमानत पर रिहा कर दिया गया ।

जिस उन अभियुक्तों को जमानत पर रिहा किया गया ( 29 सितम्बर , 2006 ) , शाम छह बजे , गुस्से से भरे , लगभग सत्तर मर्द और औरतें , ट्रैक्टरों में बैठक आए और भोतमाँगे के घर को घेर लिया । सुरेखा का पति भैया लाल , समय खेत में काम कर रहा था , उसने जब शोर सुना , तो वह घर की दौड़ा । एक झाड़ी के पीछे छुपकर उसने भीड़ को अपने परिवार पर हमला देखा । वह फौरन नजदीक के शहर दुसाला भागकर गया , और वहाँ एक रिश्ते की सहायता से पुलिस को फ़ोन करने में कामयाब रहा ( आपको ऐसे सम्पर्क की जरूरत होती है कि पुलिस आपका फ़ोन सुन ले ) । लेकिन पुलिस नहीं आई । भीड़ ने सुरेखा , प्रियंका और दोनों बेटों को , जिनमें से एक आंशिक से अंधा था , घसीटकर घर से बाहर निकाला . भीड़ ने लड़कों को आदेश कि वे अपनी माँ और बहन के साथ बलात्कार करें , जब लड़कों ने यह करने से साफ़ मना कर दिया तो उनके जननांगों को क्षत – विक्षत कर दिया और अन्ततः भीड़ ने उनकी हत्या कर दी .सुरेखा और प्रियंका का गैंग किया गया और अन्ततः उनकी भी पीट – पीट कर हत्या कर दी गई । चारों को पास की एक नहर में फेंक दिया गया , जहाँ वे अगले दिन पाए गए |

सबसे पहले प्रेस ने इसे एक नैतिक हत्या का मामला ‘ कहा , गया कि गाँव वाले नाराज़ थे क्योंकि सुरेखा के अपने एक रिश्तेदार जिस व्यक्ति पर पहले हमला किया गया था , से नाजायज सम्बन्ध थे .

दलित संगठनों के विरोध के बाद न्यायव्यवस्था को मजबूरन अपराध का संज्ञान लेना पड़ा .

नागरिकों की तथ्य खोज समितियों ने बताया कि सबूतों के साथ कैसे छेडछाड की गई और उसे कैसे तोडा मरोड़ा गया .परी .जब निचली अदालत ने अन्ततः निर्णय सुनाया , मुख्य अपराधियों को सजा ए मौत सुनाई गई लेकिन अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम लगाया नहीं गया । न्यायाधीश महोदय का मानना था कि खैरलांजी की सामूहिक हत्या के पीछे बदले की भावना थी । उन्होंने कहा कि बलात्कार का कोई सबूत नहीं मिला और हत्या के पीछे कोई जातीय कोण भी नहीं था ।

जब कोई न्यायिक निर्णय , पहले अपराध के क़ानूनी ढाँचे को कमजोर कर और फिर मृत्युदंड दे , तो ऐसा करके वह यह आधार दे देता है कि ऊपर की अदालत उस सजा को कम कर दे , या फिर उसको बिलकुल ही समाप्त कर दे । भारत में यह कोई असामान्य चलन नहीं है । किसी भी अदालत द्वारा दी गई मृत्युदंड सजा , चाहे वह कितने भी जघन्य अपराध के लिए क्यों न हो , न्यायसंगत नहीं ठहराई जा सकती । अदालत यदि यह स्वीकार करती कि जातीय विद्वेष आज भारत में एक भयानक वास्तविकता है , तो यह न्याय का एक संकेत होता लेकिन जज ने इस पूरे प्रकरण से जाति का कोण ही ग़ायब कर दिया ।

सुरेखा भोतमाँगे और उसके बच्चे एक बाजारवादी लोकतंत्र में रहते थे इसलिए संयुक्त राष्ट्र की कोई याचिका ‘ मैं हूँ सुरेखा ‘ भारत सरकार को नहीं दी । विभिन्न राष्ट्राध्यक्षों ने समर्थन या एकजुटता के सन्देश भी नहीं भेजे । और दुरुस्त क्यों न हो , आखिर तो हम नहीं चाहते कि हमारे ऊपर भी ‘डेजी कटर ‘ बमबारी हो , और वह भी सिर्फ इसलिए कि हम जाति – व्यवस्था चलाते हैं.

आंबेडकर ने पूरी हिम्मत से , जो हिम्मत आजकल के हमारे बुद्धिजीवी नहीं जुटा पाते , कहा था , “ अछूतों के लिए हिन्दू धर्म सही मायने में एक नर्क है । ‘ ‘

( एक था डाक्टर एक था संत लेखक अरूंधती राय अनुवाद अनिल यादव ‘जय हिंद ‘ रतन लाल . पुस्तक के प्रारंभिक अंश )

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