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मोदी-2 का पहला बजट : कारपोरेट पूँजी की आक्रामक वहशी लालसाओं को खुली छूट.- सीपीआई (एम-एल) रेड स्टार.

मोदी-2 के पहले बजट से पूर्व जारी आर्थिक सर्वेक्षण पर पार्टी ने बयान जारी करते हुए स्पष्ट तौर पर बजट में पूर्ण धुर-दक्षिणपंथी झुकाव का ज़िक्र किया था, जिसका प्रमाण कल लोकसभा में नई वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश किये गए बजट में दिखाई देता है। यह कारपोरेट पूँजी की शोषणकारी आक्रामक वहशी लालसाओं को तृप्त कर उसे खुली छूट देने वाला मेहनतकश-मजदूर विरोधी बजट है। किसानों और ग्रामीण क्षेत्र में कुछ लोकलुभावन वादे और हल्के-फुल्के आयकर टैक्स छूट देकर माध्यम वर्ग को रिझाने की आड़ में इस बजट ने विदेशी सट्टा पूँजी और भारत के वित्त, व्यापार, इंफ्रास्ट्रक्चर और सर्विस सेक्टर का अब तक का सबसे बडा एकीकरण करने का कार्य शुरू कर दिया है। बीमा, बैंक, हवाई सेवाएं, खुदरा व्यापार और मीडिया जैसे सामाजिक क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफ. डी. आई) की खुली छूट पर लगी पाबंदियां मिटा दी गयी हैं। सट्टा पूँजी को बढ़ावा देने वाली विदेशी निवेश पूँजी पर भी लगे नाममात्र के नियंत्रण हटा लिए गए हैं।

इसी प्रकार रेल्वे के पूर्ण निजीकरण की ओर एक और कदम बढ़ाते हुए, रेल्वे इंफ्रास्ट्रक्चर सहित पूरे रेल्वे विकास को कुख्यात पी. पी. पी (सार्वजानिक निजी भागीदारी) मॉडल के तहत लाये जाने की योजना है, जिसमें भारतीय और विदेशी कारपोरेटों के नेतृत्व में अगले पांच वर्षों में 50 लाख करोड़ रूपये निवेश किये जायेंगे। कारपोरेट आकाओं द्वारा निर्देशित मूल्यों के अनुसार इस बजट में 1.05 लाख करोड़ रूपये का विनिवेश करने का लक्ष्य रखा गया है, जो देश के बचे-कुचे सार्वजनिक क्षेत्रों का भी सफाया कर देगा।आर. एस. एस के एक तबके द्वारा स्वदेशी के नाम पर जनता को छलने की सारी नौटंकी अब कूड़ेदान में डाल दी गयी है। रक्षा पर भारी-भरकम 431011 करोड़ रुपये प्रस्तावित है, जिसका अधिकांश हिस्सा भारत पर थोपे गए अमेरिकी हथियारों के क्रय पर खर्च होगा, जबकि शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में इस राशि का मात्र एक बटा पांच और एक बटा आठ हिस्सा ही खर्च होगा। वहीँ पेट्रोल व डीजल में 2 रुपये प्रति लीटर सेस आम जनता की दैनिक और आवश्यक वस्तुओं के दामों में असहनीय वृद्धि करेगा।

“रिफॉर्म, परफार्म एन्ड ट्रांसफॉर्म” ( सुधार, प्रदर्शन और परिवर्तन) के चोले के नीचे, भारतीय और विदेशी निजी पूँजी के नेतृत्व में इंफ्रास्ट्रक्चर विकास कार्यक्रम चलाने की योजना है, जो कथित तौर पर भारत को अगले पांच सालों में 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बना देगी और भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जी. डी. पी) को लगभग दुगुना कर देगी। पिछले वर्ष इसी जी.डी.पी का 73 प्रतिशत हिस्सा, अति-अमीरों के केवल एक प्रतिशत हिस्से ने आपस में बाँट-खाया है। यदि इस बजट की परिकल्पना के अनुसार कारपोरेटीकरण का एजेंडा श्रम कानूनों के ख़ात्मे के साथ मूर्त रूप ले लेता है, तो आगामी गैर-बराबरी बहुत ही भयंकर होगी। इसकी झलक इस बजट में कारपोरेट करों में दी गयी अभूतपूर्व छूट की घोषणा में स्पष्ट दिखाई देती है। मोदी -2 के बजट का प्रस्ताव पूर्ण रूप से कृषि में तंगी, बेरोजगारी और जनता की गरीबी में इज़ाफ़ा करेगा। यह नव-उपनिवेशिक निर्भरता को और तीव्र करेगा। इन सभी समस्याओं को ढंकने के लिये फासीवादीकरण को भी तेज़ किया जायेगा जिसकी जद में मुस्लिम अल्पसंख्यक और आदिवासी, दलित, महिलाओं सहित सभी शोषित तबके आएंगे। ऐसी परिस्तिथि में हम सभी वाम प्रगतिशील ताकतों से अपील करते हैं कि वे इस नव-उदारवादी बजट के प्रस्तावों का विरोध करें और इसके खिलाफ जन-आंदोलन की शुरुआत करें।

के.एन.रामचंद्रन
महासचिव
सीपीआई (एम-एल) रेड स्टार

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