कला साहित्य एवं संस्कृति

मैं फूलमती और हिजड़े :स्त्री अस्मिता की तलाश की कहानियां : समीक्षा अजय चंन्द्रवंशी कवर्धा

      समकालीन कहानी में स्त्री और दलित भी अपनी बात मुखरता से कह रहे हैं. इस तरह भोक्ता द्वारा अपनी बात कहने से साहित्य समृद्ध हुआ है; कहानी भी. भोक्ता की अपनी शक्ति है तो सीमा भी, जाहिर है बहुत जगह  बिना दृष्टा हुए काम नही चल सकता.लेकिन भोक्ता की अनुभूति अपने वर्ग की दृष्टा होने में मदद करती है, और उसके प्रमाणिकता की संभावना बढ़ जाती है. लेकिन भोक्ता होना एक बात है और उसको साहित्य के एक विधा में प्रस्तुत करना दूसरी बात. बहुत बार बात तो खरी होती है लेकिन हम उसे ठीक ढंग से कह नही पातें या हमारी वास्तविक मंशा प्रकट नही हो पाती.

       डॉ उर्मिला शुक्ल जी की कहानी संग्रह 'मैं फूलमती और हिजड़े' एक प्रकार से स्त्री अस्मिता की तलाश है. इस संग्रह के एक कहानी को छोड़कर सभी कहानियों के मुख्य पात्र स्त्री ही हैं, जो अपनी पहचान, अपनी अस्मिता और अपने हक के लिए बराबर संघर्ष करते दिखाई देती हैं. इस संघर्ष में जाहिर है उन्हें समाज मे स्थापित पुरुषवाद से टकराना पड़ता है.यह गैर बराबरी की सामंती विचारधारा कमज़ोर जरूर हुई है, खत्म नही.इसका शिकार कमोवेश सभी वर्ग की स्त्रियां हैं, चाहे श्रमिक वर्ग हो या उच्च शिक्षित वर्ग, बस इसका स्वरूप कुछ बदल जाता है. श्रमिक वर्ग के साथ आर्थिक शोषण का कारक भी जुड़ जाता है. उर्मिला जी के कहानी के पात्र इन चरित्रों को चरितार्थ करते हैं.

       कथाकार अपनी कहानी के पात्र सामान्यतः अपने आस-पास के परिवेश से लेतें हैं, लेना भी चाहिए. उर्मिला जी के कहानियों के पात्र मुख्यतः छत्तीसगढ़ी संस्कृति के हैं, इसलिए इन कहानियों में छतीसगढ़ की समस्या, भाषा-संस्कृति भी झलक जाती है. 'मनटोरा', 'फुलकुंवर', 'गनेसिया', 'चैतू', 'केंवरा', 'फूलमती', 'सीमा' इसी संस्कृति के पात्र हैं, लेकिन इनकी समस्याएं स्थानीय नही, स्त्री मात्र की हैं. कुछ पात्र जैसे 'सीमा', 'वसुधा', 'अनु' उच्च मध्यमवर्ग या उच्च वर्ग की हैं, मगर पीड़ित वे भी हैं.

        इनकी समस्याएं क्या है? इनकी समस्याएं वही हैं जो समाज मे लिंग असमानता और पुरुषवाद से जुड़ी है. जैसे- रक्त शुद्धता, पुत्र-मोह, स्त्री को द्वितीयक समझना, स्त्री को पैतृक संपत्ति से बेदखल, अपनी पसंद के पुरुष के चुनाव की स्वतंत्रता का न होना, नैतिकता के दोहरे मापदंड आदि. आश्चर्य है कि स्त्री को अपने लाभ के लिए सामान की तरह प्रस्तुत करते समय इन्ही पुरुषों की नैतिकता गायब हो जाती है. उर्मिला जी के पात्र इस पाखण्ड से लड़ते हैं. उनमें प्रेम है, करुणा है, मगर दीनता नही है.वे अपने वजूद को समझती हैं, और हानि उठाने के शर्त पर उसकी रक्षा करती हैं. यह उनकी समस्या का सही समाधान भी है.

       जैसा कि हमने शुरू में कहा है, हमे लगता है, कुछ जगह कथाकार अपनी बात पूरी तरह खोल नही पातीं. जैसे पहली ही कहानी 'बंसवा फुलाइल मोरे अंगना' में नायिका स्वतंत्र सोच की है वह तथाकथित देह की शुद्धता की अवधारणा को नही मानती मगर स्त्री पुरुष के एक दूसरे के प्रति ईमानदारी को स्वीकार करती है.मगर जब उसका पति छल द्वारा उसके देह से खिलवाड़ कराता है तो उसको सबक सिखाने के लिए वह उसी रास्ते पर चलती है.यहां पुरुष का अहं जरूर टूटता है मगर स्त्री के अस्मिता की रक्षा जिस ढंग से कथाकार बताना चाहती है, समझ मे नही आता. पोलिगेमी की स्वीकृति पहले नही दिखती लेकिन नायिका के साथ जबरदस्ती के बाद इसे स्वीकृत दिखाना सार्थक नही लगता.कहानी से स्पष्ट नही हो पाता की स्त्री उस पुरुष से मुक्त होकर अपना अलग रास्ता तैयार कर रही है. सम्भवतः कथाकार का अभीष्ट उस मार्मिक स्थल पर चोट करना है जहां पुरुष का अहं अधिक तुष्ट होता है .कुछ जगह कथाकार छतीसगढ़ी संस्कृति को ठीक ढंग से कहानी में खपा नही पायी है, वे आरोपित से लगते हैं.

    बावजूद इसके यह संग्रह समाज मे  सार्थक हस्तक्षेप करती है और स्त्री के अपने अस्मिता के प्रति जागरूक होते जाने को सार्थक ढंग से प्रस्तुत कर रही है.यहां हृदय परिवर्तन की भावुक अपील नही बल्कि अपनी पहचान के लिए व्यवस्था से जूझने का माद्दा है.

पुस्तक- मैं फूलमती और हिजड़े (कहानी संग्रह)
लेखिका- श्रीमती उर्मिला शुक्ल
प्रकाशन- नमन प्रकाशन,अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली


अजय चन्द्रवंशी

कवर्धा, (छ. ग.)
मो. 9893728320

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