कला साहित्य एवं संस्कृति

मुहर्रम पर हुसैनी ब्राह्मणों की याद और :  एक मर्सिया लता जी की आवाज़ में : मुहम्मद ज़ाकिर हुसैन.

 

22.09.2018 ,भिलाई

पत्रकार हरिभूमि
भिलाई से ब्लाग …

 मुहर्रम पर हुसैनी ब्राह्मण का जिक्र शायद कुछ लोगों के लिएअजूबा जैसा लगे लेकिन यह सच है। करबला की जंग में ईसार्ईऔर ब्राह्मणों ने भी इमाम हुसैन के लिए कुरबानी दी थी। टीवीपर अक्सर दिखाई देने वाले मूछों वाले दादाजी का चेहरा तोयाद है न आपको। 

जी हां, जीडी बख्शी। ये बख्शी साहब हैं हुसैनी ब्राह्मण। ऐसे हीफिल्म अभिनेता दिवंगत सुनील दत्त भी इसी कौम के थे।

 किस्सा मशहूर है कि सुनील दत्त ने क्रिकेटर इमरान खान कीमां शौकत की याद में बने कैंसर अस्पताल की डायरी में लिखाथा, ”लाहौर जो मांगेगा मैं दूंगा। डोनेशन ही नहीं, खून काआखिरी कतरा भी। जैसा मेरे पूर्वजों ने करबला में इमाम हुसैनके लिए दिया था।” आज हुसैनी ब्राह्मण दुनिया के हर हिस्से मेंहै। 

भिलाई में भी कुछ हुसैनी ब्राह्मण हैं,जिन्हे मैं जानता हूं लेकिनइन दिनों फिजा में जैसा जहर घोला जा रहा है, उसके चलते येलोग अपनी पहचान जाहिर नहीं करना चाहते।

हुसैनी ब्राह्मणों के बारे में गूगल से लेकर यू ट्यूब पर सारा सबकुछ मौजूद है। फिर भी मुहर्रम पर कुछ हुसैनी ब्राह्मणों के बारेमें- ईरान के शहर कौम में करबला का म्यूजियम बना है,जिसमें२२ मोहयाल यानी हुसैनी ब्राह्मणों के नाम शहीद के तौर परदर्ज हैं।

पी.एन.बाली की किताब ”द हिस्ट्री ऑफ मोहियाल्स- दलीजेंड्री पीपुल”, टी.पी.रसेल की किताब ”’द हिस्ट्री ऑफमोहियाल्स- द मिलिटेंट ब्राहम्न रेस ऑफ इंडिया” और शिशिरकुमार मित्र की किताब ”द विजन ऑफ इंडिया” के अध्ययन सेपता चलता है कि प्राचीन काल में ब्राह्मणों के एक वर्ग नेसैनिकों का पेशा अपनाया अपनाया।

उस समय परंपरा थी कि राज्य अपने यहां कार्य करने वालेव्यक्तियों को बतौर मजदूरी भूमि प्रदान करता। यह भूमिवंशानुगत होती थी। 

यही लोग भूमि के मालिक हो जाते थे जो मोहियाल कहलाए।मोहियाल शब्द प्राकृत शब्दों मोहि और आल से बना है। मोहिअर्थात् जमीन और आल अर्थात मालिक। पूरा अर्थ भूमि केमालिक होता है। बाद में ब्राह्मणों के इसी वर्ग ने बिहार औरउत्तर प्रदेश में मोहियाल का संस्कृत पर्यायवाची अपनाते हुएस्वयं को भूमिहार कहलाया। संयुक्त प्रांत के उत्तर पश्चिमी भागोंविशेषकर पंजाब और सरहद आदि क्षेत्रों में इन मोहियालीब्राह्मणों की सात शाखाएं थीं जिनमें से एक दत्त थे।

अश्वत्थामा का वंशज पहुंचा था पैगम्बर के दर

मोहियाल या हुसैनी ब्राह्मणों में माना जाता है कि महाभारत केयुद्ध में घायल अश्वत्थामा किसी तरह बच निकला और इराक(मेसोपोटामिया) पहुंचकर वहीं बस गया। बाद में इन्हींअश्वत्थामा वंश के दत्त ब्राह्मणों ने इराक में अपनी बहादुरी कासिक्का जमाया।

वे अरब, मध्य एशिया, अफ गानिस्तान और इराक में फैल गए।पैगम्बर हजरत मुहम्मद साहब के काल में दत्त ब्राह्मणों काराजा राहिब सिद्ध दत्त था। कुछ संदर्भ ग्रंथों में राहिब दत्त कोलाहौर का बड़ा व्यापारी बताया गया है,जिसका व्यापार केसिलसिले में अरब आना-जाना लगा रहता था।

खैर, नि:संतान सिद्ध दत्त मुहम्मद साहब से संतान काआशीर्वाद मांगने मदीना गया।वहां उसे पता चला कि उसकेभाग्य में औलाद नहीं है। मायूस हो कर वह लौट रहा था किउसी समय मुहम्मद साहब के छोटे नाती हुसैन अपने नाना केसाथ वहां आ रहे थे वह निराश सिद्धदत्त को दोबारा मुहम्मदसाहब के पास ले गये. नाना से सारी बात सुनकर इमाम हुसैनने उसे सात औलादों की दुआ दी।

बेऔलाद को मिली 7 बेटों की खुशी

सिद्ध दत्त खुशी खुशी वापस आ गया। इसके बाद उनके घरसात बेटों का जन्म हुआ, जिनके नाम सहस राय, हर्ष राय, शेरखां, राय पुन, राम सिंह, चारू और पुरु रखे गए। पुत्र रत्न कीप्राप्ति के बाद सिद्ध दत्त मुहम्मद साहब के खानदान का मुरीदहो गया। इमाम हुसैन के वालिद (पिता) हजरत अली के विरुद्धलड़ी गई जमल की जंग में हजरत अली ने खजाने की सुरक्षादत्त ब्राह्मणों के सशस्त्र दस्ते को सौंपी। 

करबला की दुखद घटना के समय अकेले बगदाद मे 140 ब्राह्मण रहते थे। राहिब सिंह दत्त इमाम हुसैन का एहसान नहींभूला था। इसीलिए जब इमाम हुसैन का दस्ता करबला की ओरजा रहा था उसके सैनिकों का दस्ता इमाम के साथ गया। बादमें इमाम हुसैन के कहने पर दस्ता लौट गया क्योंकि इमामहुसैन काफिले को सेना में नहीं बदलना चाहते थे।

रास्ते में एक जगह पड़ाव पर रात में यजीदी सैनिकों ने उन्हें घेरलिया और हुसैन के सिर की मांग की। सिद्ध दत्त ने इमाम कासिर बचाने के लिए अपने पुत्र का सिर काट कर दे दिया परसैनिक नहीं माने। हुसैन का सिर बचाने के लिए सिद्ध दत्त नेअपने सातों पुत्रों का सिर काट डाला लेकिन सैनिकों ने उन्हेंहुसैन का सिर मानने से इंकार कर दिया।  दत्त ब्राह्मणों के दिलमें इमाम हुसैन के कत्ल का बदला लेने की आग भड़क रही थी।इसी कारण वे अमीर मुख्तार के साथ मिल गए।

बहादुरी से लड़ते हुए चुन चुन कर हुसैन के कातिलों से बदलालिया। कूफे के गवर्नर इब्ने जियाद के किले पर कब्जा कर उसेगिरा दिया गया।  जब दस अक्टूबर 680  को करबला की घटनाघटी और सिद्ध दत्त को पता चला तो उसे बहुत क्षोभ हुआ।जब उसे पता चला कि यजीदी फ़ौज इमाम हुसैन के सिर कोलेकर कूफा में वहां के यजीदी गर्वनर इब्ने जियाद के महल लारहे हैं तो उसने यजीदी दस्ते का पीछा कर हुसैन का सिर छीनाऔर दमिश्क की ओर बढ़ा।

कुरबान कर दिए अपने सभी बेटे

रास्ते में एक जगह पड़ाव पर रात में यजीदी सैनिकों ने उन्हें घेरलिया और हुसैन के सिर की मांग की। सिद्ध दत्त ने इमाम कासिर बचाने के लिए अपने पुत्र का सिर काट कर दे दिया परसैनिक नहीं माने। 

हुसैन का सिर बचाने के लिए सिद्ध दत्त ने अपने सातों पुत्रों कासिर काट डाला लेकिन सैनिकों ने उन्हें हुसैन का सिर मानने सेइंकार कर दिया।

दत्त ब्राह्मणों के दिल में इमाम हुसैन के कत्ल का बदला लेने कीआग भड़क रही थी। इसी कारण वे अमीर मुख्तार के साथमिल गए। बहादुरी से लड़ते हुए चुन चुन कर हुसैन के कातिलोंसे बदला लिया। कूफे के गवर्नर इब्ने जियाद के किले परकब्जा कर उसे गिरा दिया गया।

पैदाईश के वक्त बच्चे की गरदन पर लगाते थे चीरा

इस कुरबानी को याद रखने के लिए दत्त ब्राह्मणों ने दर्जनों दोहेरचे जो मुहर्रम में उनके घरों में पढ़े जाते थे। कुछ घरों में आजभी यह दोहे पढ़े जाते हैं और उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में येहुसैनी ब्राह्मण बाकायदा मुहर्रम की मातम मजलिस मेें शरीकभी होते हैं। 

करबला की जंग के बाद वहां शासकों ने शिया लोगों के साथहुसैनी ब्राह्मणों पर भी जुल्म ढाना शुरू किया तो वे सीरिया,एशिया का चक और बसरा होते हुए अफगानिस्तान की ओरआए वहां उन्होंने गजनी, बल्ख, बुखारा, और कंधार पर कब्जाकर लिया।कालांतर में सिंध के अटक क्षेत्र से होते हुए वहपंजाब आ गए। दत्त सुल्तानों के बारे में कहा जाता है कि वहआधे हिंदू और आधे मुसलमान हैं। 

इनके वंशज दुनिया के हर हिस्से में हैं तो भिलाई इनसे अछूताकैसे रह सकता है। वैसे खास बात यह है कि हुसैनी ब्राह्मणों केयहां पैदाईश के बाद बच्चे के गरदन के पास हल्का सा चीरालगाया जाता था। यही चीरा इस कौम की पहचान हुआ करतीथी। 

आज भी बुजुर्ग हुसैनी ब्राह्मणों की गरदन पर यह हल्का साचीरे का निशान दिख सकता है। हालांकि नए दौर में हुसैनीब्राह्मण इस रवायत को भूल भी रहे हैं। इन सबके बावजूदकरबला की जंग और ईमाम हुसैन के साथ अपना रिश्ता कायमरखे हुए हैं। ये लोग इसका कभी ढिंढोरा नहीं पीटते।

…. और आखिर में एक मर्सिया लता जी की आवाज़ में

इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत को याद करने केअपने-अपने तरीके हैं। शिया समुदाय में मुहर्रम के १० दिनों मेंमर्सिया  (शोकगीत) पूरी शिद्दत से गाया और सुना जाता है।साल 1977 में आई फिल्म “शंकर हुसैन” में मीर अनीस कालिखा और खय्याम साहेब की तर्ज़ पर एक पारम्परिक मर्सियालता जी  ने गाया था। जिसके बोल इस तरह से है-

हुसैन जब के चले बाद दोपहर रन को

ना था कोई के जो थामे रकाबे तौसन को

सकीना झाड़ रही थी क.बा के दामन को

हुसैन चुप के खड़े थे झुकाए गरदन को

ना आसरा था कोई शाह-ए-करबलाई को

फकत बहन ने किया था सवार भाई को

हुसैन जब के चले बाज दोपहर रन को

**

इसका वीडिओ इस लिंक पर मौजूद है

 

मोहम्मद ज़ाकिर हुसैन ,हरिभूमि भिलाई में पत्रकार हैं और भिलाई के इतिहास पर अधिकृत नोट लिखते रहे हैं ,वे  भिलाई से .. नाम का एक ब्लॉग भी लिखते है.

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