अभिव्यक्ति महिला सम्बन्धी मुद्दे राजनीति

मी टू और धुंआ – धुंआ सच की पीड़ा :  आज शाम की बात .ईवनिंग टाईम्स .

नथमश शर्मा  वरिष्ठ पत्रकार , संपादक 

आदि शक्ति की अर्चना के इन दिनों की शुरूआत के कुछ दिन पहले शुरू हुआ मी टू अभियान । अब जब सब तरफ़ देवी भक्ति का माहौल है ,तब अनेक देवियां दुःखी हैं । बरसों पुराने अपने अपमान को उजागर कर रहीं हैं । इस मी टू की चपेट में फ़िल्म अभिनेता से लेकर राजनेता,पत्रकार सब आ चुके हैं । सभ्य कहलाने वाले समाज का धुआं – धुंआ सच सामने आ रहा है । बरसों से दर्द सहती आ रहीं महिलाएं बोल रही हैं । इस बोलने का असर कितना और किस पर पड़ रहा है या पड़ेगा जैसे सवाल भी इस धुएं में ही है ।         

   मी टू अभियान अमेरिका से शुरू हुआ । एक सामाजिक संस्था चला रही तराना बर्क  ने 2006 में अपने साथ हुए यौन दुर्व्यवहार पर लिखा और इस वाक्यांश मेरे साथ भी या मी टू का उपयोग किया। फ़िर वहीं की फ़िल्म अभिनेत्री एलिसा मिलानो  के खुलासे और ट्वीट द्वारा महिलाओं से इससे जुड़ने की अपील के बाद यह जोर पकड़ा ।साधारणतः यह कार्यस्थल पर यौन प्रताड़ना से सम्बंधित है । अपने देश में अनेक फ़िल्म अभिनेता, राजनेता, पत्रकार मी टू की चपेट में हैं । कुछ मामले तो बीस पच्चीस बरस पुराने भी हैं । इन आरोपों की फ़िलहाल समाज में चर्चा है । तरह -तरह की चर्चा है । कहने वाले यह भी कह रहे हैं कि इतने बरस तक बात को क्यों छुपाए रखीं ? वहीं कुछ आरोपी प्रति प्रश्न करते हुए खुद को निर्दोष बता रहे हैं । न्यायालय तक भी गए हैं,यानीपुलिस,थाना,न्यायालय और मीडिया में चर्चा सब हो गई। हो रही है । अब इसका परिणाम क्या निकलता है यह देखना है । इसमें शायद काफ़ी वक़्त लगे । शायद यह भी बहुत सारे दर्द की तरह धुंआ-धुंआ हो जाए । शायद यह चिंगारी शोला बन जाए । इस तरह के अनेक शायद के साए में ही है यह पीड़ा,यह दर्द ,यह मी टू ।  

 

हजारों बरस के सफ़र के बाद समाज बहुत आगे बढ़ चुका है । गांव एक सपना लेकर शहर आए और शहरों में दफ्न हो गए । शहर में सपने पले नहीं मरते रहे । रसोई से निकलकर वह स्कूलों तक गईं । पहले चार अक्षर और फ़िर हजारों अक्षर पढ़कर अब अंतरिक्ष तक हो आईं । अंतरिक्ष से लौटने पर भी पहले वह रसोई (नहीं किचन) गई पति के लिए और अपने लिए चाय बनाकर लाई और फ़िर चांद पर बिताए पलों को साझा करने लगी । टीवी पर उसे देखते हुए यहां भी कोई और बस कुछ क्षण के लिए रुकी , आंखो में एक सपने की कौंध हुई , फ़िर वह तुरंत रसोई में चली गई । गर्म रोटियों के लिए उसके अपने इंतज़ार कर रहे थे । सबके लिए गर्म रोटियां बनाते,खिलाते और खुद ठंडी रोटी खाकर वह सोने चली गई । जहां सोने से पहले सोना था और सुबह सबसे पहले उठना था । खुद को भी दफ़्तर जाना था । रसोई से दफ़्तर या रसोई से खेतों तक के सफ़र में उलझी वह मर्दों (?) के धक्कों, कामुक नज़रों, इशारों की शिकार होती रहीं । सभ्य समाज महिलाओं के सशक्तिकरण पर कार्यशालाएं करते रहा । देवी भक्ति में भी लीन रहा । यत्र पूज्यते नारी….कहकर मां बढ़ाते रहा और वह इन सबके बीच , सब सहते, समझते और बोलते हुए अपनी जगह बनाती रही । बना रही है । सचमुच सशक्त हुई और हो रही है । लेकिन पुरुष की लंपटता से गुस्सा और दुखी है । इंद्र पहला लम्पट हुआ , उसे श्राप मिला । आज तो भरमार है लम्पटों की । और रहना इन्ही के बीच ही तो है । ऐसा भी नही है कि सारा मामला एकतरफ़ा ही है । सौंदर्य और शॉर्टकट भी एक शस्त्र की तरह के बार इस्तेमाल हुआ है । सहमति भी । पर अनेक मामले कामुकता, असभ्यता के कारण ही हैं । बलात्कर की खबरें इसी सभ्य समाज से आती हैं । 

 

            सवाल इस बात है कि मी टू से कुछ होगा भी या नही ? या यह भी एक चर्चा बनकर रह जायेगा । क्या पति,पिता और भाई अपने घरों में ही तो डरने और शक तो नहीं करने लग जायेगा । और इस भय से वह महिलाओं को बाहर जाने से रोकने की कोशिश तो नही करेगा ? ऐसे अनेक सवाल है । हालांकि आज की जीवन शैली में न तो यह आसान है और न ही सम्भव ही दिखता है । अकेले पुरुष से गृहस्थी चलना कठिन है । तो फ़िर ? फिर यही कि जरूरत तो हमारी मानसिकता में बदलाव की ही है । घरों में,रिश्तेदारों में जब वह असहज महसूस करती है तो मोहल्ले, पड़ोस की बात तो और दूर की ही है । पढ़ा लिखा तबका हो या अनपढ़ सब जगह यही हाल है । जरूरी है कि हम अपनी सोच बदलें । थोपी गई शुचिता से मुक्त होकर सचमुच संस्कार गढ़ें । अध्ययनों से निकलकर एक विचार कुछ बरस पहले आया था कि घरों में लड़कों का लालन-पालन लड़कियों की तरह हो । उसे महिलाओं की इज्ज़त करना सिखाया जाए । इसलिए कि सिर्फ़ कानून से कुछ नहीं होना है ।(कार्यस्थल पर यौन प्रताड़ना कानून2013 में बन चक है ) लेकिन जब तक हम अपनी मानसिकता नहीं बदलेंगे तब तक मी टू में उसके प्रतिपक्ष ही बने रहेंगे जबकि जरूरत साथ चलने की है क्योंकि दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं । 

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नथमल शर्मा 

वरिष्ठ पत्रकार 

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