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माँ का आँचल छीन लिया नक्सवाद की अघोषित लड़ाई ने, : आदिवासियों की मौत पर मौन है सरकार ःः घटना स्थल से लौटकर पुष्पा रोकड़े .

 गोलेगुड़ा पोडियम सुखी की कहानी ,कैसे हो गई एक मासूम आदिवासी महिला की मौत

ग्राउंड जीरो से लौटकर पुष्पा रोकड़े

25.03.2019

सुकमा —जिले के गोलीगुड़ा गांव के 2 फरवरी को हुए फर्जी मुठभेड़ को लेकर मैदानी रूप से आई कई बातें दोरनापाल से लगभग 35 किलोमीटर दूर बसा गांव जहां सुबह 8:00 बजे घर से गई सुखी घर लौट कर नहीं आई घर से महज 100 मीटर की दूरी पर खाना बनाने के लिए लकड़ी लेने गई थी उसी दौरान सुबह सुबह तकरीबन 8 बजे पुसवाड़ा कैंप के जवान आ पहुंचे । जंगल के रास्ते वही गांव से लकड़ी लेने आए महिलाओं पर बरसा दी गोलियां उस समय तीन महिला मौजूद थे जिसमें से स्व .सुखी पोड़ियम घटनास्थल पर मौत नहीं हुई थी । ओ तड़प रही थी दुसरी श्रीमती कलमो देवी महिला को जांग में गोली लगी वही तीसरी को गोली ऊपर से चली गई हाइट कम होने की वजह से बच गई वह श्रीमती सोमड़ी अपनी साथियों की आपबीती बताती कलमो देवी ने बताया कि सुबह-सुबह लकड़ी के लिए गई थी और उनके साथ यह सब हुआ जब जवान पास में ही आ पहुंचे थे तब उन्होंने बोला कि हम लकड़ी लेने आए हैं फिर भी उन लोगों ने हमारी बात नहीं सुनी और हम पर गोली बरसा दी जब मुझे गोली लगी मैं बेहोश हो गई और मेरी आंखें अस्पताल में खुली ।

देवा  पोड़ियम ने बताया कि वह उस दिन गांव में मौजूद नहीं था मिर्ची तोड़ने आंध्र गया हुआ था गांव में कोई काम ना होने की वजह से अपने घर और जीवन यापन के लिए मजदूरी के लिए वह मिर्ची तोड़ने आंध्र गया था उसी दौरान उसे गांव से किसी व्यक्ति ने फोन किया कि पुलिस ने उसकी पत्नी को गोली मार दी है तो वह देर शाम घर लौटा उसने बताया कि मेरे चार बच्चे हैं । एक लड़की 3 लड़के जिसमें से राकेश दूध मुहा 2 महीना का ही है जिसके लिए मुझे बहुत अफसोस है कि अब उसकी मां नहीं रही मुझे काफी दिक्कत तो आ रही है इसे पालने में पर अब मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं इसे गोद में रखो या इनके पालन-पोषण के लिए काम पर जाओ मुझे दोरनापाल थाने से राकेश के लिए दूध मिलता है जिसे मैं दूध खत्म हो जाने पर लेने जाता हूं और लेकर उसे पिलाता हूं । बताया कि जो हो गया उस पर अब वह आगे कोई कार्यवाही नहीं करना चाहते पर उन्हें दुख है इस बात का कि हम गांव में बसे आदिवासियों के लिए इस तरह की घटनाएं आम बात हो चुकी है बाहर से आए पुलिस के जवान हमें जंगल में रहने के कारण नक्सली ही समझते हैं और हमारी बोली भाषा ना समझना भी इनके लिए एक चुनौती है और हमें इस तरह मौत के घाट उतार रहे हैं यह बड़े ही दुख की बात है ।

 सासु मां पोडियम देवी ने बताया कि जैसे ही उसने गोली की आवाज सुनी वह दौड़ती हुई उस जगह पर जा पहुंची जहां जवानों ने उसकी बहू को मारकर पॉलिथीन में लपेट रहे थे उसने कहा उसे छोड़ दो पर जवान उसे लपेट कर अपने साथ ले गये पूसवाड़ा कैंप जहां में बच्चों के साथ मुझे काफी देर तक कैंप में ही रखा गया बच्चों को मैं किसी तरह गाड़ी में बिठाकर वापस गांव भेजें और तकरीबन रात के 10:00 बजे गांव में एक गाड़ी और जवान आकर मेरी बहू के शव को मुझे सौंप दिया यह मेरे लिए बहुत ही दर्दनाक था क्योंकि उसका दूध मुँह राकेश मेरे गोद में था उसके चार बच्चे हैं जिसे अब मुझे पालना है यह मेरे लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है ।

एस पी सुकमा डीएस मरावी — ने बताया कि यह घटना जिस समय हुआ में मौजूद नहीं था इसलिए इसके बारे में मैं कुछ कह नहीं सकता पर आगे इस तरह की घटना नहीं होने का बात कही।

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