कला साहित्य एवं संस्कृति

तंत्र शास्त्र के अंतर्गत महाविद्या समूह की दस देवियों की उत्पत्ति , उनसे सम्बंधित विभिन्न मिथक और उनके आधार पर प्राचीन भारत मे मातृसत्तात्मक समाज और उसमे यौनिकता पर लवली गोस्वामी का विशद विश्लेषण . प्रस्तुति शरद कोकास .

लवली गोस्वामी 

?????????

लवली गोस्वामी मूलतः दर्शन और मनोविज्ञान की अध्येता स्वतंत्र टिप्पणीकार और कवयित्री हैं । दस ग्यारह वर्ष पूर्व हिंदी ब्लॉगिंग में उनके ब्लॉग ‘संचिका’ सर्प विज्ञान पर केंद्रित ब्लॉग ‘भुजंग’ काफी लोकप्रिय रहे । विज्ञान और टेक्नोलॉजी के भी अनेक विषयों पर वे लिखती रहीं । उनकी कविताएँ भी काफी प्रसिद्ध हैं ।

लवली जी का प्राचीन भारत मे मिथकों को लेकर गहन अध्ययन है । इस विषय पर प्राचीन भारत मे मातृसत्ता और यौनिकता को लेकर एक पुस्तक उन्होंने लिखी है जिसमे समाज की सामूहिक स्मृति , मानव संस्कृति में स्त्री का स्थान , मातृसत्तात्मक समाज की विशेषताएं , समाज मे यौनिकता की समझ , निषेध और नियमकताएँ तथा धर्म और देवी देवताओं के साथ इनका सम्बन्ध आदि विषयों पर विभिन्न आख्यान समाहित हैं ।

यहाँ इस श्रृंखला में प्रस्तुत अंश उसी पुस्तक से लिये गए हैं । इसमें तंत्र शास्त्र के अंतर्गत महाविद्या समूह की दस देवियों की उत्पत्ति , उनसे सम्बंधित विभिन्न मिथक और उनके आधार पर प्राचीन भारत मे मातृसत्तात्मक समाज और उसमे यौनिकता की समझ आदि का वर्णन है ।

शरद कोकास

महाविद्या समूह की देवियाँ : काली , तारा , त्रिपुर सुंदरी , भुवनेश्वरी , छिन्नमस्ता , त्रिपुर भैरवी , धूमावती , बगलामुखी , मातंगी कमला .

***

18.10.2018

महाविद्याओं के समूह के केंद्रीय चरित्र की बात करें तो एक विलग स्त्रैण – दर्शन का स्वरुप हमारे समक्ष उपस्थित होता है , जो साधारण स्त्रैण गुणों से युक्त हिन्दू देवियों में लगभग अप्राप्य है , यहाँ वह मूलतः नकारात्मक, रहस्यात्मक और मातृत्व हीन गुणों का प्रतिनिधित्व कर रही है । स्त्री ( देवी) यहाँ पतिहर्ता हैं (धूमावती ) , विनाशिनी है (बगलामुखी ) , भयंकर संहारकर्त्री ,अद्वितीय योद्धा (काली ) है। यह देवियों के मातृवत्सल और सौम्य रूप से विलग सामान्य भारतीय समाज के परिमाणों से किंचित अलग रूप में स्त्री और उसके स्त्रीत्व को परिभाषित करता है । जहाँ सामान्य हिन्दू देवियों में पतिव्रता और संतान- वत्सला का रूप स्वीकार्य है , महाविद्याएं इसके ठीक विपरीत अपने पुरुष – सहभागी से उच्च और सम्मानजनक स्थिति में हैं, कभी कभी तो सहभागी पुरुष देवता अत्यंत निकृष्ट दशा में भी दिखाए गए हैं , जैसे काली के पैरों के नीचे शिव की प्रतिमा ।

थोड़ा और बारीकी से देखने पर कई और चीजें सामने आती हैं , जैसे *महाविद्याओं को जो रक्त बलि दी जाती है उसका पुरुष होना अनिवार्य है* ।

*कई जो मुण्डमाला धारण करती हैं वह पुरुषों का मस्तक होता है*, जबकि स्त्री राक्षसियों की उपस्थिति भारतीय वांग्मय में बहुतायत में है , तो यह सिर्फ तथाकथित राक्षस दमन के निमित्त की जाने वाली क्रिया तो किसी दृष्टिकोण से नहीं लगती ।

जैसा कि उनके नाम से स्पष्ट है (रतिप्रिया, महारति, महावीर्या , ‘ललित सहस्त्रनाम’ )महाविद्याएं यौन रूप से सक्षम और आक्रामक हैं ।

वे सामान्य वासस्थान के रूप में श्मशान का प्रयोग करती हैं , उन्हें रक्त और विशेष परिस्थितियों में दूषित रक्त ( *अगर आराधक किसी के आकर्षित करने की मंशा लेकर देवी की आराधना कर रहा है तो मासिक धर्म से संगृहीत रक्त का भोग मातंगी देवी की पूजा में अनिवार्य है* ) का भोग चढ़ाया जाता है ।

*सामान्य स्थितियों में रजस्वला स्त्रियों को मंदिरों में प्रवेश, मूर्तियों के स्पर्श और कर्मकांडों में भाग लेने को पाप माना है , एवं ऐसे समय में उन्हें अशुद्ध समझा जाता है*

इसके पीछे सैद्धांतिक अवधारणा स्त्री को ‘क्षेत्र ‘ की तरह समझने की है अर्थात अगर उचित समय पर गर्भधारण नहीं हुआ और प्रकृति के नियमानुसार प्रतिक्षारत डिम्ब (स्त्री प्रजनन कोशिका ) का स्त्री -प्रजनन तंत्र को परित्याग करना पड़ा तो *एक तरह से यह मान्यता ख़ारिज होती है जो स्त्री को संतान उत्पति का साधन भर मानती है* ।

यह वही पुरुषवादी धर्म – संस्कार है जो रजस्वला होते ही बालिका को विवाह योग्य घोषित कर देता है एवं विवाहित स्त्री को कुनबे और राज्य के मानव – संसाधन बढ़ाने हेतु संतान उत्पति का यन्त्र अथवा ‘बीजारोपण ‘ के लिए क्षेत्र की तरह देखता है , इससे इतर स्त्री का कोई उपयोग उसे ज्ञात है न मान्य है ।

*वाम – तंत्र का दर्शन इस मासिक चक्र से निर्मित प्राकृतिक अपशिष्ट को पूजित घोषित कर उस सर्वमान्य दर्शन का प्रतिपक्ष रचता है* ।

उसे स्त्री के मातृत्व का सम्मान तो मान्य है परन्तु इससे अलग स्त्री को वह प्रजनन के निमित्त सिर्फ साधन की तरह न देखकर उसके स्वतंत्र अस्तित्व को मान्यता देता है ।

वह स्त्री के प्रजनन – तंत्र से इतर उसके लिए यौन आनंद की पृष्ठभूमि का आवाहन करता है।

वह स्त्री को माता से अलग युद्धप्रिया एवं रतिप्रिया के रूप में मान्यता देता है। स्त्री – शुचिता वाद की प्रचंड अवहेलना करके तंत्र का यह सैद्धांतिक प्रतिपक्ष स्त्री की सनातन – उपयोगिता अर्थात संतानोत्पति से अलग उसके अन्य क्षमताओं को केंद्र में रखता है एवं सामाजिक और सौम्य कहे जाने वाले सिद्धातों की अतिवादिता से अवहेलना करके उन्हें असहमति के दूसरे छोर पर ला पटकता है।

*यह सब विवरण एक संस्कारी हिन्दू व्यक्ति के मन में इस विशेष समूह की देवियों के प्रति एक घृणा मिश्रित भय भावना भरने के लिए पर्याप्त है ।*

कुल मिलकर यह कहना कहीं से अतिशयोक्ति नहीं कि इन महाविद्याओं से गुजरना भारतीय यौनिकता और प्रकारान्तर से भारत में स्त्रैण – दर्शन को एक नई पराकाष्ठा तक ले जाता है । यह समूह शुचिता वादी भारतीय दर्शन का स्पष्ट सैद्धांतिक – कर्मकांडी स्त्री वादी – प्रतिपक्ष है ।

**

*महाविद्या समूह की देवियाँ : काली , तारा , त्रिपुर सुंदरी , भुवनेश्वरी , छिन्नमस्ता , त्रिपुर भैरवी , धूमावती , बगलामुखी , मातंगी कमला के अंतर्गत आज पढ़ते हैं काली के बारे में । यहाँ आपको देवियों के संबंध में प्रचलित मान्यताओं से कुछ अलग पढ़ने को मिलेगा ।*

? *काली* ?

देवी काली कृष्णवर्णी हैं। भयभीत कर देने वाला रूप, लगभग नग्न अथवा अर्धनग्न, चार भुजाएं , मुण्डमाल धारण किये हुए एवं श्मशान भूमि (कहीं – कहीं रणभूमि )में शिव पर आरूढ़ हैं। उनके बाल खुले एवं नेत्र क्रोधाग्नि से दीप्त हैं। यह महाविद्याओं का प्रथम रूप है। शेष सब महाविद्याएं काली से जन्मी या उनका ही रूप ही मानी जाती है।

देवी काली पूर्व में बंगाल के अलावा कश्मीर के तंत्र सम्प्रदाय में मुख्य स्थान रखती है, विशेषतः नवीं सदी के लेखक अभिनवगुप्त के तंत्रलोक साहित्य में देवी काली का स्थान प्रधान्यता से आरक्षित है । साधारण शैव मत में देवी प्रकृति के सौम्य स्वरुप पार्वती को शिव की शिष्या के रूप में चित्रित किया गया है परंतु तंत्र संप्रदाय में काली को ही सर्वोच्च मान्यता प्राप्त है।

उदाहरण के लिए निर्वाण तंत्र यह कहता है कि ब्रह्मा , विष्णु और शिव देवी काली से ही उत्पन्न हुए हैं , जैसे सागर के जल से बुलबुले उत्पन्न होते हैं, और देवी काली से उनकी तुलना करना पशुओं के चलने से भूमि पर बने चिन्हों में संगृहीत जल से , सागर के जल की तुलना करने जैसा है ।

*काली के चरित्र में कई रोचक बातें हैं ।*

उदाहरणार्थ देवी काली की पूजा तांत्रिक, कापालिक सम्प्रदायों के अलावा सामान्यतः झारखण्ड – बंगाल की डोम एवं हाड़ी जाती में कुलदेवी की पूजा की तरह प्रचलित है ।

*यह दोनों ही जातियां स्थानीय समाज के लिए ‘अछूत’ समझी जाती है, एवं सामाजिक व्यवस्था में इनका कार्य ग्राम में मल -मूत्र की सफाई करना, शव उठाना और मृत पशुओं से उपयोग की सामग्री प्राप्त करना है ।*

*भारत के अधिकतर क्षेत्रों में बीहड़ के डाकुओं, संगठित चोर – गिरोहों आदि में काली की पूजा प्रचलित है*।

शूद्र कौन 

*शूशद्र शूद्न*

*अब यह दोहराने की आवश्यकता तो रही नहीं कि शूद्र सामान्यतः वे ही लोग हुए जिन्हें संगठित राज्य सत्ता ने पराजित करके शरणागति स्वीकारने के एवज में गांव से बाहर बसाया एवं अनुपयोगी रोगी एवं मृत पशुओं को उन्हें नगर की साफ -सफाई के एवज में भोजन के रूप में देते रहे।*

भारत में दास प्रथा का यह अद्वितीय और अप्रतिम रूप था…….

*अगर ऐसे संप्रदाय की अधिष्ठात्री देवी कालांतर में भयावह और अपूजित प्रमाणित कर भी दी जाये तो यह किसी प्रकार भी आश्चर्य उत्पन्न करने वाला तथ्य नहीं है।*

तंत्र में साधना अथवा पूजा की विधि भी सामान्य देवी – देवताओं की पूजा पद्धति से काफी विलग है। यहाँ साधक की आवश्यकता अनुसार देवी पूजा का प्रावधान है। अर्थात पूजा से पहले उद्देश्य चयनित किया जाये फिर उस चयनित उद्देश्य के अनुसार विशिष्ट देवी की पूजा की जाये ।

*तंत्र – साधना में पूजा गोपनीय और रहस्यात्मक होती है जिसमें ‘पंचमकार’ (मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा एवं मैथुन) का सिध्दांत उपयोग में लिया जाता है, एवं इसका स्वाभाविक स्थान शमशान भूमि होती है ।*

सहजिया तांत्रिक संप्रदाय में , परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग विवाह अनिष्ठा (जार कर्म) है । तंत्र संप्रदाय का यह दर्शन हमें प्रचलित / प्रचित भूतवाद और लोकायत दर्शन के समीप ले जाता है जिसपर चर्चा अन्यत्र कहीं करेंगे। अभी देवी काली के चरित्र पर केंद्रित रहना ही उचित है।

काली अर्थात काल की शक्ति , मृत्यु की अधिष्ठात्री । भय , आतंक , अंधकार , उन्माद , आक्रामकता और अन्य तमाम तामसिक गुणों से युक्त एक ऐसी स्त्रैण शक्ति जो आवाहन पर प्रकट होती है, शत्रु पक्ष का संहार करती है, तत्पश्चात शत्रुओं का रक्त – मांस भक्षण करती है , उनका मुण्डमाल धारण करती हैं , शवों पर संभोग एवं उन्मादित नृत्य करती है , अपने अनुचरों के साथ संरक्षित क्षेत्र में निवास करती है ।

*यह सब एक सभ्य – सौम्य संप्रदाय की नायिका देवी के आदर्श चरित्र के लिए आरक्षित भारतीय समाज के सामूहिक मानस में कतई मान्य नहीं है ।*

*ऐसी किसी युद्धप्रिय नायिका को अगर सभ्य समाज के साहित्य और भक्ति की परम्परा से विलग कर दिया जाये तो इसमें किसी को भी किंचित भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए ।*

 

*महाविद्या समूह की देवियाँ :- काली , तारा , त्रिपुर सुंदरी , भुवनेश्वरी , छिन्नमस्ता , त्रिपुर भैरवी , धूमावती , बगलामुखी , मातंगी कमला ।*

महाविद्याओं में दूसरे स्थान पर देवी तारा है । तारा मुख्यतः तिब्बत मूल की देवी है। वहां उनकी पूजा प्राधान्यता से प्रचलित है। तिब्बत के मिथक साहित्य में तारा के इक्कीस रूप बताये गए हैं जिनमें ‘रक्षण’ से लेकर ‘आक्रमण’ तक के युद्ध कौशल को अलग अलग देवी – रूपों के साथ संबद्ध किया गया है, ज़ाहिर है तारा प्रजनन की देवी नहीं है , उनका आवाहन मुख्यतः संभावित खतरों या मृत्यु से रक्षण हेतु किया जाता है । एक शक्ति जिसका मूल गुण – धर्म ही रक्षा है, फिर वह समुद्र के भँवर में फंसी नाव की रक्षा हो या फिर गहन वन जहाँ प्रकाश की एक किरण भी न जा सके वहां आश्रित की जीवन रक्षा हो । यह मूल गुण – चरित्र ‘रक्षा’ तारा के कई अन्य रूपों में शत्रु – संहार का रूप ले लेती है ।

*देवी तारा की आराधना के लिए ईच्छुक व्यक्ति को लाल वस्त्रों में नारी वेश में सज्जित होना आवश्यक होता है* क्योंकि ऐसी मान्यता है कि विधिपूर्वक आवाहन के बाद देवी खुद उसमें प्रवेश करती है। उस मनुष्य को यह समझना आवश्यक है कि वह स्त्री – रूप है । जहाँ वैदिक – सैद्धांतिकी में स्त्री में इंद्र की गौहत्या के पाप का अंश विद्यमान है, यहाँ तंत्र में पूज्य भी स्त्री और आराधक को भी स्त्रीत्व का अभ्यास अनिवार्य है।

यह परकाया प्रवेश की मनोवैज्ञानिक घटना का अद्भुत उदाहरण है । यह व्यवस्था परम्परा के रूप में मनुष्यों में पीढ़ी – दर पीढ़ी संचालित होकर स्त्रैण दर्शन को जीवित तो रखती ही है साथ ही साथ भक्त में पुरुष के स्व का नाश करके स्वयं में स्त्री के अस्तित्व को महसूसना एक ऐसी घटना के रूप में सामने आता है जो राजनैतिक रूप से स्त्रैण विचारधारा और संप्रदाय के खत्म हो जाने के बाद भी प्रतीकात्मक रूप से लोक मानस में स्त्री को निरीह, अशक्त और अबला बनाये रखने के प्रत्यय के विरुद्ध खड़ा होता है, शायद यही कारण है कि भारत के अधिकांश हिस्से जहाँ इन महाविद्याओं और मातृकाओं की पूजा प्रचलित है , में अन्य क्षेत्रों के मुकाबले पुरुषवादिता, बलात्कार स्त्री उत्पीड़न और स्त्री द्वेष की घटनाएं कम उपस्थित होतीं हैं ।

तारा के विषय में एक रोचक मिथक – कथा है । यह कथा ‘आचार’ तंत्र में वशिष्ठ मुनि की आराधना उपख्यान में वर्णित है । महर्षि वशिष्ठ देवी तारा को प्रसन्न करना चाहते हैं वे लम्बे समय तक तपस्या करते हैं परन्तु देवी तारा प्रसन्न होकर दर्शन नहीं देती । महर्षि वसिष्ठ असफल होने पर ब्रह्मा से मार्गदर्शन का अनुरोध करते हैं , ब्रह्मा देवी तारा की महिमा का ज़िक्र करते हुए यह कहते हैं कि देवी तारा ही ब्रह्माण्ड का उद्गम है , उनसे ही सृष्टि की उत्पति हुई है एवं विष्णु इसके पालनकर्ता और शिव संहारकर्ता है । तत्पश्चात वे देवी तारा का मंत्र देते हुए महर्षि वशिष्ठ से मन्त्र द्वारा उनका आवाहन करने को कहते हैं ।

वशिष्ठ असम के कामाख्या मंदिर के लिए प्रस्थान करते हैं एवं ब्रह्मा के दिए तारा – मंत्र द्वारा देवी तारा का आवाहन करते हैं , परन्तु परिणाम पूर्ववत ही रहता है । वशिष्ठ क्रुद्ध होते हैं, वे अपने तपबल के प्रभाव से , तारा को अपनी अवमानना के लिए शापित करना चाहते हैं परन्तु तभी तारा प्रकट होती है और यह कहती है कि यह उनकी पूजा का सही तरीका नहीं है , सही तरीका सीखने के लिए आपको महाचीन (तिब्बत, जो तब शायद चीन से सांस्कृतिक रूप से अधिक जुड़ा हुआ हो इस कारण उसे महाचीन की संज्ञा प्राप्त हो ) प्रस्थान करना चाहिए , वहां जाकर आपको मेरी आराधना के सही तरीके का ज्ञान , विष्णु जो इस वक़्त बुद्ध अवतार में हैं , से ज्ञात हो सकेगा । तदुपरांत वे तिब्बत के लिए प्रस्थान करते हैं । हिमालय के पास उन्हें किंचित निद्रा – किंचित चेतना की अवस्था में एक दृश्य – सा दीखता है जिसमें बुद्ध रूप में विष्णु कई सुन्दर स्त्रियों के साथ नग्न अवस्था में मदिरापान कर रहे होते हैं , और तभी आकाशवाणी होती है ‘यही देवी तारा की पूजा की सही विधि है ‘। आगे वशिष्ठ बुद्ध रूपी विष्णु से मार्गदर्शन की प्रार्थना करते हैं एवं बुद्ध उन्हें ‘पंचमकार’ की अवधारणा से प्रेरित पूजा विधि की शिक्षा देते हैं।

वशिष्ठ को ज्ञान देते विष्णु कहते हैं , इस दृश्य जगत में कुछ भी शुद्ध अथवा अशुद्ध नहीं है । पूजा के लिए कोई उचित अथवा अनुचित नहीं है एवं स्त्रियों को सम्मान देना उनकी सत्ता को सर्वोच्च मानना ही देवी का आराधना का मूल है । यह सब ज्ञान प्राप्त कर वशिष्ठ तारापीठ (बीरभूम जिला , बंगाल ) की और प्रस्थान करते हैं एवं वहां जाकर श्मशान साधना कर देवी को प्रसन्न करते हैं , कालांतर में वे सिद्ध ‘साधक ‘ की तरह प्रसिद्धि पाते हैं ।

आगे की कथा में देवी उनसे वरदान मांगने को कहती हैं और वे उनसे ‘मातृ ‘ रूप में दर्शन देने का आवाहन करते हैं , देवी तारा शिव को गोद में लिटाये मातृ रूप में दर्शन देती हैं । यह प्रतीकात्मक रूप से एक मंगोलियन युद्ध – देवी का हिन्दू संप्रदाय में स्वीकरण के पूर्व किया गया परिवर्तन ही लगता है।

यह मिथक कथा कई निष्कर्षों की तरफ इशारा करती है । उदाहरणार्थ तारा की बुद्ध के साथ संगति , अर्थात यह अकारण नहीं है कि ब्राह्मण संप्रदाय के प्रमुख अधिष्ठाता ब्रह्मा तारा के आवाहन की सटीक विधि नहीं बता पाते, यह प्रमाणित करता है कि तारा मूलतः बौद्ध परम्परा से सम्बन्ध रखती हैं । दूसरा निष्कर्ष यह कि उनकी पूजा विधि की खोज में वसिष्ठ उत्तर की ओर प्रस्थान करते हैं , स्मरण करना होगा कि बुद्ध की जन्मस्थली लुंबिनी भी हिमालय क्षेत्र में अवस्थित है और भारतीय दर्शन के पुरोधा श्रीमान देवी प्रसाद चटोपाध्याय भौतिकवादी दर्शन के उद्गम स्थल के रूप में ठीक इसी भौगोलिक क्षेत्र का ज़िक्र करते हैं , इस तथ्य की संभावनाओं और उपस्थित संदेहों को आगे के अध्यायों के लिए छोड़कर हम देवी तारा के इस आख्यान से उत्पन्न निष्कर्षों पर केंद्रित रहते हैं ।

तीसरा महत्वपूर्ण निष्कर्ष देवी तारा को असम के कामाख्या पीठ और बंगाल के तारा पीठ से संबद्ध करता है और इनकी पूजा विधि में भी उन्मुक्त दैहिक / इंद्रिय आनंद और निषिद्ध तत्वों का समेकन होता है । तंत्र के दर्शन में ’काम’ का अध्यात्म से यह गहरा सम्बन्ध जो साथ – साथ स्त्री की सर्वोच्च सत्ता को स्थापित भी करता चलता है , न्यूनाधिक रूप से सभी महाविद्याओं से सम्बंधित दर्शन का न सिर्फ मूलाधार है अपितु उसकी चरम परिणीति भी है ।

*स्त्रीवाद की इस भव्य शोभायात्रा के देह- गान के इस वर्जित प्रकरण में यह देखना और समझना बहुत आश्चर्यजनक है कि स्त्री की देह का मुक्त होना , प्रकारांतर से पहले परिवार संस्था को , फिर राज्य सत्ता को और फिर सामंतवाद या पूंजीवाद को कैसे सिरे से ध्वस्त करता है, और सिर्फ इसी कारण कैसे यह संगठित हिन्दू – संप्रदाय के बाद के दर्शन में निषिद्ध रूप ले लेता है ।*

 

तारा का चित्रण तिब्बतीय तंत्र साहित्य में जहाँ युवा, सुन्दर रणप्रिय स्त्री योद्धा के रूप में किया गया है , वहीं हिंदी मिथकों में तारा का रूप वीभत्स और घोर – भयोत्पादक हो जाता है। चरित्र -परिवर्तन की यह कौतुक – कथा संस्कृत वांग्मय में नई नहीं है। हमें ध्यान रखना होगा की गणेश कहीं विध्न हर्ता हैं तो कहीं विघ्नपैदा करने वाले, ठीक उसी प्रकार जैसे पहले विष्णु ‘उपेन्द्र’ कहे जाते हैं फिर वह त्रिदेवों में शामिल हो जाते हैं । तारा का चरित्र भी इसी प्रकार के परिवर्तन का भागी बनता है । *अब तारा काली से संबद्ध या काली का एक ही रूप है ।*

*उग्रतारा* जो तारा का उग्र रूप है और दक्षिणा -काली के चित्रण में इतनी कम असमानता है कि साधारण मनुष्य इन्हें एक ही देवी का चित्र समझ लें। दोनों की शव पर आरूढ़ और शमशान में अवस्थित दिखाया जाता है , हालाँकि काली के पैरों के नीचे शिव का चित्रण अधिक आम है जबकि तारा के पैरों के नीचे अज्ञात शव का चित्रण होता है । काली की तरह तारा को भी रक्त (पशु और मनुष्य दोनों ही ) का भोग चढ़ता है । काली घाट (कलकत्ता ) और तारा पीठ दोनों ही क्रमश श्मशान के उपर एवं श्मशान से कुछ दूरी पर अवस्थित हैं । दोनों देवियों का वर्ण श्याम है । दोनों मुंड माल, कपाल और कटार से सुसज्जित हैं एवं दोनों की जिह्वा बाहर लटक रही है । संस्कृत वांग्मय में तारा को शिव के साथ संबद्ध माना जाता है ।

*बंगाल में प्रचलित एक मिथक के अनुसार शिव ने हलाहल पी लिया है अब वे विष के प्रभाव से विचलित एवं दग्ध हैं , तब देवी तारा प्रकट होती हैं शिव की रक्षा के लिए देवी उन्हें अपनी गोद में बिठाती हैं एवं उन्हें स्तनपान कराती हैं , इस प्रकार शिव विष के प्रभाव से मुक्त होते हैं ।*

यह ऋग्वेद की उसी प्रार्थना का स्मरण कराती है जिसमें स्त्री के पति को कालांतर में उसका बालक घोषित कर देने का प्रावधान है जिससे मातृसत्तात्मक नियमों द्वारा उसकी बलि से उसे बचाया जा सके ।

यहाँ रोचक यह भी है कि तारा के साथ भैरव का जो रूप संबद्ध है वह है ‘ बटुक भैरव ‘ अर्थात किशोर शिव । यह समय फिर से हमें कार्तिकेय के ‘कुमार ‘ रूप में पूजे जाने की घटना का स्मरण करवाता है । इस प्रकार हम देवी तारा के चरित्र – चित्रण के अस्थायी उपसंहार पर पहुँचते हैं , हम पाते हैं कि *द्वितीय महाविद्या अर्थात देवी तारा* का रोचक चरित्र भी मातृसत्ता और आक्रमक स्त्रैण दर्शन के तार्किक पक्ष का परिचय ही देता है, जिसमें मातृत्व को बलपूर्वक आरोपित करने का प्रयास भी है और आक्रामक स्त्री – योद्धा के चरित्र की प्रखरता को ढंकने का असफल धतकर्म भी ।

संप्रदाय और उनके दर्शन का अवसान काल की गति के साथ हो जाता है , चिन्ह शेष रह जाते हैं । हम देखते हैं कि वैदिकी के ये संरक्षक जो भारत की स्त्रीवादी परम्पराओं के ‘अशुद्ध’ चित्रों को ढंकने का प्रयास ‘शुद्धतावादी और स्वीकार्य स्त्री गुणों के तथाकथित सौम्य – दर्शन – विरचित मनमोहक आवरण की सहायता से करते रहे , बुरी तरह असफल तो रहे ही एवं अंततः ये आवरण ही प्रतिपक्षी स्त्रीवाद के परिचय का चलचित्र चलाने के लिए पट्टिका का पर्याय बनकर सम्मुख उपस्थित हुए ।

3 

?

*नवरात्र के चौथे दिन आज पढिये महाविद्या समूह की देवियों – काली , तारा , त्रिपुर सुंदरी , भुवनेश्वरी , छिन्नमस्ता , त्रिपुर भैरवी , धूमावती , बगलामुखी , मातंगी कमला में से त्रिपुर सुंदरी के बारे में , साथ ही देवी कैसे आती है इसका मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारण :-

त्रिपुर – सुंदरी

देवी त्रिपुर सुंदरी जिनके नाम के अन्य पर्यायवाची शब्द हैं , षोडषी, ललिता, कामेश्वरी, श्रीविद्या और राजराजेश्वरी आदि हैं ललिता सहस्त्रनाम का पूरा स्तोत्र ही जिन देवी को समर्पित है , इनकी व्याख्या से गुजरना न सिर्फ रोचक अपितु यह भारत में स्त्री – सत्ता को नई परिभाषा देने में भी सक्षम है । देवी त्रिपुर सुंदरी ललिता की पूजा सामान्यतः महाविद्या समूह में शामिल होने से पहले ही कश्मीरी और दक्षिण भारतीय तंत्र में प्रचलित थी । जहाँ दक्षिण में इन्हें कामाक्षी देवी के साथ पूजा जाता है वहीं नेपाल के भक्तपुर में इन्हें अष्टमातृकाओं के समूह में स्थान दिया जाता है ।

त्रिपुर सुंदरी से सम्बंधित *मिथकों* में सबसे प्रचलित भण्डासुर के वध की कथा (ब्रह्माण्ड पुराण ) है जो कुछ इस प्रकार है । तारकासुर को वरदान प्राप्त है कि उसकी मृत्यु सिर्फ शिव के पुत्र के द्वारा ही सम्भव है, शिव योगनिद्रा अथवा ध्यानावस्था में हैं , और तारकासुर देवताओं के लिए एक बड़ी समस्या बनकर सामने आ रहा है।  शिव का ध्यान भंग करने के लिए देवगण कामदेव को पार्वती, जो कि शिव को पति रूप में पाना चाहती है की मदद करने के लिए कहते हैं। कामदेव शिव के तीसरे नेत्र की  क्रोधाग्नि का भाजन बनते हैं अस्तु भस्म हो जाते हैं । फिर इसी राख से भण्डासुर की उत्पति होती है, अर्थात वह कहीं न कहीं  गन्धर्व कुल से संबद्ध प्रतीत होता है। आगे की कथा में त्रिपुर सुंदरी और असुर में युद्ध होता है और देवी असुर का संहार करती है। कथा न्यूनाधिक रूप से वही है। 

असुर द्वारा संसार में अशांति का उत्पन्न होना, देवताओं द्वारा शक्ति रूपी देवी प्रकृति  का आवाहन और असुर का विनाश।  शेष कथा में कुछ भी रोचक नहीं हैं , ध्यान देने वाली बात बस असुर का गन्धर्वी संप्रदाय से जुड़ा होना भर है।

ललिता सहस्त्रनाम में देवी ललिता  को ‘राज्ञी ‘ , राजराजेश्वरी आदि सम्बोधित किया गया है जो कहीं न कहीं राज्य पक्ष से उनके जुड़े होने का परिचायक है। इसके ठीक विपरीत वामकेश्वर  तंत्र में उन्हें पशुचर्म धारिणी , अजटा (मुक्त केश )और तन पर श्मशान की राख लपेटे चित्रित किया गया है. त्रिपुर सुंदरी देवी का साम्य भारत में कई स्थानीय योद्धा स्त्री  देवियों  से है जैसे दक्षिण की  कामाक्षी देवी जिनके बारे में एक रोचक स्थानीय मान्यता है।

*मान्यता यह कि रात्रि में मंदिर की प्रतिमा के समक्ष कोई पुजारी या साधक उपस्थित हो तब वह कामाक्षी के आकर्षण में आबद्ध होकर मानसिक रूप से अव्यवस्थित हो जाता है इस कारण रात्रि में किसी को मंदिर के भीतर वास करने की अनुमति नहीं है ।*

वहीं दूसरी और ‘बाला त्रिपुर सुंदरी ‘ (अर्थात सोलह वर्ष की युवा देवी ) को नेपाल और भारतीय तंत्र में सृजन  और रक्षा करने वाली एक अद्वितीय शक्ति के रूप में मान्यता प्राप्त है । नेपाल की ‘कुमारी देवी ‘ के पूजन की प्रथा भी न्यूनाधिक रूप से इन्हीं से प्रेरित है।

त्रिपुर सुंदरी को  किंचित विचित्र रूप में चित्रित किया जाता है ।  एक शैय्या जिसपर वे अधलेटे शिव के साथ या ऊपर बैठी होती हैं या फिर शिव की नाभि से निकले कमल में अवस्थित होती हैं । सैद्धांतिक रूप से शैय्या का यह चित्र  अन्य महाविद्याओं से अलग नहीं है परन्तु शैय्या के नीचे उसे आधार देते हुए ब्रह्मा, विष्णु और शिव के ही एक अन्य रूप रूद्र का उपस्थित होना किंचित आश्चर्यजनक स्थिति उत्पन्न करता है ।

*यह निश्चित रूप से राजनैतिक अर्थ लिए हुए है । यह देवी के संप्रदाय का किसी वक़्त अन्य दर्शन – सम्प्रदायों पर विजय ही दर्शाता है ।*

देवी त्रिपुर सुंदरी के विषय में जहाँ इच्छा अथवा अनिच्छा से हिन्दू धर्म – विषयक स्रोत साहित्य ‘काम’ तत्व को किंचित कठिनता से  ही सही स्थान दे ही जाता है वहीं तंत्र संप्रदाय स्पष्ट रूप से देवी के चरित्र में प्रधान्यता से ‘काम तत्व ‘ को  संबद्ध बताता है । योगिनी – तंत्र में परकाया प्रवेश का रोचक उदाहरण है । 

*यह तंत्र साधक जो एक पुरुष है,  को यह आदेश देता है कि वह षोडशी-  बाला के नग्न चित्र को अपनी कल्पना में निर्मित करे  और अपनी साधना के निमित्त यह सिद्ध करे कि उसके शरीर का प्रत्येक अंग वह अपने शरीर के अंगों के आलोक में अनुभव कर पा रहा है । रोचक दृष्टांत है ,किन्तु सतही दृष्टि से देखने पर मानसिक -रुग्णता के भौंडे प्रदर्शन से अधिक  कुछ नहीं लगता ।.

**

*प्रश्न यह उपस्थित होता है कि क्या यह परकाया प्रवेश कोरी मानसिक रुग्णता है ? उत्तर भी स्पष्ट है* । 

*परकाया प्रवेश की मनोवैज्ञानिक घटना जहाँ आदिम संप्रदाय में आम बात थी (आज भी कई आदिवासियों में यह बड़े उत्साह से प्रचलित है ) वहीं कई अत्याधुनिक धर्म – संप्रदाय भी इससे अछूते नहीं । जहाँ पहले आदिम कबीलाई समाज में यह स्पष्ट रूप से मादक पदार्थों, उल्लास , उन्मादपूर्ण संगीत और यौन क्रियाओं तक सीमित था आधुनिक समाज में इसका रूप बदल गया है यह अपेक्षाकृत  सभ्य रूप में आध्यात्मिक – गुरुओं द्वारा मध्यवर्ग की मानसिक तुष्टि के लिए परोसा गया व्यंजन बन गया है।*

*कल्पना क्या है?*

कल्पना जैसा कि हम जानते हैं पहले से विद्यमान अनुभव को रूपांतरित करने और ऐसे नए विचारों तथा बिम्बों की रचना करने की मानव क्षमता है ,  विद्यमान को अनुपस्थित से जोड़ती है , इसका भौतिक रूप दृष्टि के सम्मुख उपस्थित नहीं होता परन्तु यह व्यक्ति को ऐसे ही प्रभावित करती है जैसे कि वह पूर्ण रूप में नेत्रों के सम्मुख  उपस्थित हो । 

*परकाया प्रवेश जो वस्तुतः इसी मानवीय कल्पना एवं मनोवैज्ञानिक घटनाक्रम का रोचक उदाहरण है । यह तंत्र में बार – बार उपस्थित होता है और हर बार उसी रूप में जहाँ पुरुष को स्त्री होना पड़ता है , जहाँ उसे स्त्रैणता को अंतिम सत्य की तरह मान्यता देनी होती है ।*

स्वाभाविक है कि यहाँ दो प्रश्न  उपस्थित होते हैं प्रथम तो यह कि ऐसा क्यों आवश्यक है ? द्वितीय  यह कि आवश्यकता है भी तो इसका उपयोग मानवता के हित में कैसे संरक्षित किया जाए ।  हम देख ही रहे हैं कि वर्तमान समाज में रूढ़ियों और असमानता के सम्मिलित प्रभाव से स्त्री में जो गुण – चरित्र सभ्य समाज में अपेक्षित है वह मानव के रूप में स्त्री को पूर्णता देने में असक्षम है ।

*स्त्री की पूर्णता जहाँ परिवार संस्था और पूंजीवाद  को खंडित करती है वहीं वर्तमान समाज में स्त्री के विरुद्ध उपयोग किये जाने वाले सबसे समर्थ अस्त्र यौन – पवित्रता की महत्ता का सर्वनाश भी कर देती है ।*

अतः यह आवश्यक था कि कुछ सम्प्रदायों में परकाया (स्त्री – काया ?) प्रवेश की इस घटना को प्रतीकात्मक रूप से संरक्षित किया जाता , यह ध्यान रखा जाता कि राज्य का आश्रय न प्राप्त होने के बावजूद यह रहस्यात्मक रूप से किसी ग्रन्थ में संरक्षित रहे,  सिर्फ तभी सम्भव था कि आने वाली पीढ़ियों को इस समानता वाद के सूत्र राज्य – सत्ता के  बर्बर दमन के बाद भी प्राप्त होते, यह सामूहिक  प्रयास था ।

वहीं दूसरी ओर पुरुष में स्त्री के शरीर के प्रति सम्मान और साम्यता की भावना भरने का अपेक्षाकृत मनोगत लक्ष्य भी इससे पूरा हो रहा था, और चाहे – अनचाहे यह पुरुष को स्त्री होने के अनुभव के समीप ला रहा था जो या तो पुरुष के अंतस में स्त्री की निर्मिति के सांस्कृतिक आधारों को ध्वस्त करता या फिर खुद पुरुष को स्त्री – मुक्ति का पाठ स्त्री की दृष्टि से समझने को प्रेरित करता ।    दोनों प्रश्नों के उत्तर क्रमश यहीं से प्राप्त करते हुए हम आगे त्रिपुर सुंदरी की चरित्र  – कथा में लौटते हैं। 

*त्रिपुर सुंदरी की चरित्र कथा*

देवी त्रिपुर सुंदरी का षोडशी के रूप में बार बार चित्रण भारतीय वाङ्ग्मय की उस मान्यता की ओर इशारा करता है जिसके अनुसार सोलह वर्ष की उम्र में मनुष्य को सुंदरता के सबसे प्रखर रूप में देखा जाता है, एवं सोलह कलाओं में निपुण मनुष्य को सम्पूर्ण मनुष्य की उपमा दी जाती है । यह न सिर्फ स्त्री वरन पुरुष के सन्दर्भ में भी होता है । हमें स्मरण रखना होगा कि कृष्ण को सोलह कलाओं से युक्त बताया गया है , यह भी ध्यातव्य है कि  देवी का साम्य उनकी ही एक प्रेमिका ‘ललिता ‘ से भी लिया जाता है, अब कृष्ण का तो मातृदेवियों  और गंधर्व कुल से सम्बन्ध है ही  तो यह कहना किंचित भी अनुचित नहीं लगता की त्रिपुर – सुंदरी के रूपों और उनके संप्रदाय के दर्शन का गान्धर्वी – दर्शन से कोई सम्बन्ध तो है ।

कृष्ण की कई मूर्तियां स्त्री रूप में श्रृंगार के साथ कई मंदिरों में अवस्थित हैं , जो यह भी दर्शाता है कि संप्रदाय के प्रतिनिधि के रूप में कृष्ण का चरित्र कई विरोधाभासों से घिरा हुआ है ।

4 

आज पाँचवे दिन प्रस्तुत है महाविद्या समूह की देवियों काली , तारा , त्रिपुर सुंदरी , भुवनेश्वरी , छिन्नमस्ता , त्रिपुर भैरवी , धूमावती , बगलामुखी , मातंगी कमला ।भुवनेश्वरी में से भुवनेश्वरी पर लवली गोस्वामी का यह लेख .

 *भुवनेश्वरी

भुवनेश्वरी स्तोत्र  में जलोदरी , जलरूपा , विलासिनी आदि नामों का ज़िक्र आता है । जहाँ अन्य महाविद्याओं की  भूदेवी से साम्यता स्पष्ट नहीं है, भुवनेश्वरी का साम्य स्पष्ट रूप से भूदेवी अथवा पृथ्वी देवी से दिखाया गया है ।

भुवनेश्वरी स्त्रोत्र में कई जगह देवी को पंचभूतों की निर्मात्री, प्रधान और प्रकृति दोनों परिघटनाओं की स्वामिनी एवं भौतिक जगत की शक्ति या जननी के रूप में चित्रित किया गया है, देखने में यह सामान्य सा  प्रतीत होता है पर इसके गूढ़ार्थ हैं जिनकी चर्चा किये  बिना आगे बढ़ना उचित नहीं प्रतीत होता । 

प्रपंचसार तंत्र में देवी को इन्द्रियों की अधिष्ठात्री या उनका ही रूप सम्बोधित किया जाता है ।

यह तो हमें ज्ञात ही है कि वैदिक साहित्य में तंत्र साहित्य की उपस्थिति की गंध से एक प्रकार की वितृष्णा हर वैदिक दार्शनिक के अस्तित्व का सत्य है । यह सत्य वैदिक और तंत्र साहित्य के मूलभूत दार्शनिक मान्यताओं के अंतर का स्पष्ट परिचय हमारे समक्ष रखता है । जहाँ वैदिकी की यात्रा स्पष्ट रूप से राजनैतिक अर्थशास्त्र के साथ  गति पाती है तंत्र साहित्य इससे थोड़ी अलग दिशा लेकर , विज्ञान , जनपक्षधरता आदि को आधार बनाकर चलता है ।

हिंदी भाषा का एक प्रचलित शब्द है *प्रपंच* जिसे कालांतर में भ्रमजाल अथवा माया के पर्याय के रूप में लिया जाने लगा । व्याकरण की दृष्टि से देखें तो इसका शब्द विछ्चेद है प्र + पंच , ‘प्र’ उपसर्ग संस्कृत में सकारात्मक अर्थों में उपयोग होने वाला उपसर्ग है, तो इस प्रकार ‘प्रपंच’ शब्द का अर्थ हुआ पंच भूतों का विस्तार, अथवा उनकी व्याख्या प्रकारांतर से ‘प्रपंचसार’ शब्द का अर्थ हुआ पांच भूतों से बने संसार की व्याख्या में प्रयुक्त होने वाला तंत्र । 

इसी सन्दर्भ में प्रपंचसार – तंत्र शंकराचार्य रचित एक प्रसिद्द ग्रन्थ है । जब आदि  शंकराचार्य इस शब्द का उपयोग करते हैं यह शब्द जो अर्थ लेता है वह वस्तुतः दृश्य जगत के आगे का ‘अवर्णित सत्य अथवा उसका सार’ होता है परन्तु  प्रपंच शब्द का यह अर्थ मूलतः संसार अथवा ‘भौतिक जगत की भावभूमि’ के अर्थ में तंत्र में उपयोग होता है ।

इस प्रसंग में यह देखना रोचक है कैसे एक शब्द के पतन का कारण संप्रदाय की राजनैतिक विचारधारा से उसके हित का शब्द के बदलते अर्थ से  नालनाभिबद्ध होना होता है।

*दोहराने की आवश्यकता नहीं है कि शंकराचार्य और उनका पूरा रचनाकार्य मूलतः भारत में भाववाद को स्थापित करने हेतु रचा गया बुद्धिमता पूर्ण भ्रम जाल ही था । मायावाद के इस समर्थक ने भारत में भौतिकवाद की अवहेलना का हर  सम्भव प्रयास किया है ।*

‘सौंदर्य लाहिरी’ में शंकराचार्य स्पष्ट लिखते हैं कि भगवान शिव ने तंत्र का निर्माण मनुष्य को भ्रमित करने हेतु किया है । ‘भ्रमित’  शब्द से आदि शंकराचार्य का तात्पर्य  संसार के सर्वोच्च सत्य और ज्ञान की पराकाष्ठा को अपने ‘मानस  से अन्यत्र’  बाह्य जगत में ढूँढना यानि भारत के आदिम भौतिकवादी अनुशासन का अनुकरण करना है ।

शंकर द्वारा तंत्र के  उद्भव अथवा निर्माण की यह व्याख्या निसंदेह कोरी गप्प है , परन्तु इसमें यह तथ्य अवश्य है कि तंत्र मष्तिष्क से बाहर वस्तुओं के अस्तित्व को मान्यता देता है अर्थात यह कहीं न कहीं भौतिकवाद से संबद्ध तो है (विशेष ज्ञान के लिए देवी प्रसाद चटोपाध्याय रचित ‘लोकायत’ ग्रन्थ  देखें )।

यह तो हम हम देख ही रहे हैं कि  भारत में तंत्र मातृसत्ता और स्वतंत्र यौनेच्छा के साथ नालनाभी बद्ध था, जैसे जैसे मातृसत्ता का  पतन हुआ तंत्र ने भी अधोगति प्राप्त की ही ।

दर्शन के इस रोचक प्रसंग को पुस्तक की मूल विषयवस्तु  की गरिमा के निर्वहन के निमित्त यहीं छोड़ते हुए हम महाविद्या समूह की चौथी देवी भुवनेश्वरी की बात करें तो इनका महाविद्या समूह से अन्यत्र कहीं भारतीय मिथक – साहित्य में  कोई विशेष स्थान अथवा उल्लेख नहीं है । परन्तु  महाविद्याओं पर पुस्तक लिखने वाले विद्वान डेविड किंस्ले के अनुसार इस प्रपंचशास्त्र की अधिष्ठात्री देवी प्रपंचेश्वरी का देवी भुवनेश्वरी से साम्य है या अन्य अर्थों में भुवनेश्वरी देवी , प्रपंचसार – तंत्र की प्रमुख देवी का ही दूसरा प्रतिरूप हैं तो इस प्रकार हम भुवनेश्वरी को मूलतः  आदिम पदार्थवाद से जुड़ा देख पाते हैं।

5

*महाविद्या समूह की देवियों काली , तारा , त्रिपुर सुंदरी , भुवनेश्वरी , छिन्नमस्ता , त्रिपुर भैरवी , धूमावती , बगलामुखी , मातंगी कमला के विवरण के अंतर्गत लवली गोस्वामी की पुस्तक से आज पढिये ‘त्रिपुर भैरवी के बारे में । लेखिका द्वारा सम्बंधित जानकारी कहाँ से ली गई है इसके संदर्भ भी दिए गए हैं ।*

??  भैरवी ??

महाविद्या भैरवी को सहत्र सूर्य  की आभा से ओतप्रोत , कमल सदृश्य नयनो वाली रक्त से आप्लावित वक्षस्थल वाली एवं मुण्डमाल, कटार  धारण करने वाली रक्तवर्णी वस्त्र से सज्जित युवा स्त्री के रूप में चित्रित किया जाता है । हालाँकि नेशनल म्यूजियम दिल्ली में अजित मुखर्जी के संग्रह से लिए गए निम्नांकित चित्र में इन्हें छिन्मस्तका की तरह निर्वसन ही दिखाया गया है जो अन्य तांत्रिक परम्पराओं में मान्य भी है ।

भैरवी का तांत्रिक वांग्मय में चित्रण न्यूनाधिक रूप से अन्य महाविद्याओं की तरह ही है , अर्थात जगतमाता , काम की अधिष्ठात्री , विनाशिनी और भयावह योद्धा स्त्री के सम्मिलित गुणों से ओतप्रोत देवी के रूप में, जो भयानक रूप वाली है , शमशान वासिनी है , शव पर आसन ग्रहण करने वाली ( शवासन) रक्त पीने वाली है (शाक्त – प्रमोद )। 

भैरवी को सामान्यतः विनाश (भैरवी को नेपाल के नुवाकोट में मलेरिया लाने के लिए उत्तरदायी शक्ति के रूप में चिन्हित किया जाता है ) से जोड़ा जाता है एवं इनकी पूजा वाममार्गी तरीके से होती है अर्थात भैरवी  की पूजा में मांस मदिरा और उन्मादपूर्ण रति को स्थान दिया जाता है ।

*’तंत्रसार’* में भैरवी के बारह अलग अलग रूपों में कल्पना की गई है, जो निर्माण पालन और संहार के गुणों से आबद्ध है । सामान्यतः भैरवी को काल – भैरव से जोड़ कर देखा जाता है परन्तु कुछ तांत्रिक ग्रंथों में भैरवी को श्री (लक्ष्मी ) और भूदेवी (वाराही ) के साम्य के रूप में भी देखा गया है।

भैरवी  पूजा सामान्यतः वाममार्गी प्रविधि से होती है ।  इस प्रविधि में कई तथ्य है जिनका अवलोकन अनिवार्य लगता है ।  तांत्रिक अनुष्ठान के इस तरीके में  प्रथमतः स्त्री और पुरूष निर्वस्त्र हो कर एक दूसरे के सम्मुख कुछ दूरी बैठ कर एक दूसरे की आँखों में देखते हुए शक्ति मंत्रों का जाप करते हैं । लगातार ऐसा करते रहने से साधक के अन्दर का काम-भाव उर्ध्व-मुखी हो कर उर्जा के रूप में सहस्त्र-दल ( योग शास्त्रोक्त षट् – चक्र युक्त मस्तक के अंदर का सहस्त्रदल कमल) का भेदन करता है ।

वहीं अन्तिम चरण में स्त्री और पुरूष सम्भोग करते हुऐ, स्वयं को नियंत्रण में रखते है और कोशिश करते हैं कि स्त्री या पुरूष का स्खलन विलम्बित हो एवं रतिक्रिया देर तक स्थायित्व को प्राप्त करे, साथ ही साथ साधना को करवाने वाला योग्य गुरू अपने शिष्यों को यह निर्देश देता हैं कि यौन क्रिया में जब भी स्खलन हो तो स्त्री और पुरुष को एकसाथ चरमानंद प्राप्त हो । 

*यह सब बहुत विचित्र सा लगता है । प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि ऐसा करने के आदेश क्यों दिए होंगे ? हम इसका उत्तर ढूंढने का प्रयास करते हैं।*

*दक्षिणा रंजन शास्त्री अपनी किताब A Short History of Indian Materialism, Sensationalism and Hedonism में कापालिकों पर अस्पष्ट पर रोचक टिप्पणियाँ करते हैं ।  उनके अनुसार कापालिक शारीरिक सुख को मोक्ष और सिद्धि प्राप्ति का मार्ग बताते है ।  वे वैष्णव कहलाते हैं परन्तु विष्णु या उनके अवतारों में उनकी आस्था नहीं है ।*

वे वाम – मार्गी तंत्र के देहवादी दर्शन को ही सर्वोच्च मानते हैं ।  उन में एक रोचक प्रथा है, वे शारीरिक सुख का उपभोग सिद्धियां प्राप्त करने के लिए करते हैं , मान्यता है कि यह सिद्धियाँ संभोग की अवधि के अनुसार घटती और बढती हैं, अर्थात देह सुख  की अवमानना आपको सिद्धियों और मोक्ष से दूर ले जाती है  और मन को एकाग्र करके देह सुख में प्रवीणता के अभ्यास को ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य समझा जाता है ।

यही मान्यता कमोबेश सहजिया संप्रदाय में भी है, वहां भी इससे स्पष्ट रूप से जार – कर्म अथवा विवाह अनिष्ठा से जोड़कर देखा जाता है, अर्थात  साधक जिस किसी भी साधिका के साथ देह सुख का अभ्यास करे वह उसकी पत्नी नहीं होनी चाहिए । ‘तर्करहस्यदीपिका’ में गुणरत्न यह स्पष्ट करते हैं कि सहजिया , कापालिकों और लोकायतियों के मध्य दार्शनिक – मतों के एकात्म का गहरा सम्बन्ध है । दो सूत्र प्रत्यक्ष होते हैं प्रथम तो विवाह – अनिष्ठा एवं द्वितीय यौन क्रिया में आनंद को स्थान यह दोनों ही तथ्य हमें मातृसत्ता और स्त्रैण दर्शन के आधारभूत नियमों का स्मरण कराते हैं वहीं यह भी तय लगता है कि कामनापूर्ण, संतुलित और उन्मुक्त यौन सुख की महत्ता का गान करने के दंड़स्वरूप भैरवी के अनुयायियों को अवमानित किया गया होगा एवं भैरवी को प्राणांतक ज्वर की देवी के रूप में स्थापित कर दिया गया होगा। 

6 

*तंत्रशास्त्र के अंतर्गत महाविद्या समूह की देवियो काली , तारा , त्रिपुर सुंदरी , भुवनेश्वरी , छिन्नमस्ता , त्रिपुर भैरवी , धूमावती , बगलामुखी , मातंगी कमला में से लवली जी की किताब से आज पढिये देवी धूमावती के बारे में :शरद कोकास*

?? *धूमावती* ??

देवी धूमावती की उत्पति को लेकर दो कथाएं प्रचलित है प्रथम के अनुसार –  देवी पार्वती अकस्मात् बहुत भूख लगने और शिव के द्वारा खाद्य पदार्थ प्रस्तुत करने में विलम्ब होने के कारण क्षुधापीड़िता होकर क्रोध से  भगवान शिव को ही निगल लेती हैं । ऐसा करने के फलस्वरूप पार्वती के शरीर से धूम्र -राशि निस्सृत होने लगती है । शिव  द्वारा देवी पार्वती  को विधवा रूप में पूजित होने और धूम्र से व्याप्त शरीर के कारण  धूमावती नाम से प्रचलित होने का शाप प्राप्त होता है ।

द्वितीय में पिता के घर अपमान के कारण यज्ञ कुण्ड में जल जाने से सती के शरीर से धूम्र आकृति के रूप में देवी धूमावती का जन्म होता है ।

देवी धूमावती को एक विधवा के रूप में जिसके बाल बिखरे हुए हैं और वस्त्र पुराने एवं कांतिहीन हैं चित्रित किया जाता है । धूमावती एक रथ पर आरूढ़ होती हैं जिसके शिखर पर एक कौवा विराजमान होता है और उनके हाथ में अनाज को अशुद्धि से अलग करने में प्रयुक्त होने वाला  सूप होता है ।

धूमावती के चेहरे को सामान्यतः कांतिहीन चित्रित किया जाता है । धूमावती भारतीय वांग्मय में अकेली ऐसी स्त्री – योद्धा है जिसका चित्रण न कुमारी कन्या न विवाहिता वरन विधवा के रूप में किया जाता है।

कोसंबी वृन्दा और कृष्ण के सम्बन्ध में एक रोचक आख्यान का विवेचन करते हैं जिससे परिचित हो लेना इस विधवा देवी की प्रतीकात्मकता को सुलझाने में हमारी मदद कर सकता है।  

हम देख सकते हैं कि कृष्ण की अधिकतर पत्नियाँ मातृअधिकार सम्पन्न क़बीले की मातृदेवियाँ थी । कृष्ण की अनगिनत (सोलह हज़ार आठ ) पत्नियों और प्रेमिकाओं को थोड़ी देर के लिए विस्मृत भी कर दें तो भी उनके साथ अष्टभार्या अर्थात  रुक्मिणी, सत्यभामा ( योद्धा स्त्री जिसने नरकासुर को पराजित करने में कृष्ण की रणभूमि में मदद की थी ।

भागवतपुराण के अनुसार नरकासुर भूदेवी और वराह का पुत्र है  ), जाम्बवती (जाम्बवन्त की पुत्री, जिनका क़बीला –  टोटेम रीछ था  ), नग्नजिती (कोसलदेश के राजा थे नग्नजित् की पुत्री का नाम सत्या था.  नग्नजित् की पुत्री होने से वह नग्नजिती भी कहलाती थी। राजा नग्नजित् की प्रतिज्ञा थी कि जो कोई पुरुष उनके सात भयानक बैलों पर विजय प्राप्त करेगा वे उसी से अपनी पुत्री का विवाह करेंगे, प्रतीकात्मक रूप से यह उनके टोटेम चिन्ह बैल पर कृष्ण के संघ के आधिपत्य का विवरण है  )

कालिंदी (यह नदी देवी यमुना का ही दूसरा नाम है। कालिंद पर्वत से निकलने का कारण इसका नाम कालिंदी भी माना जाता है ),मित्रविंदा, भद्रा, लक्ष्मणा (लक्ष्मणा एक सुपरिचित वनस्पति है, इसकी जड़ी पुत्रदा मानी जाती है। इसे नागपत्री भी कहते हैं ) के रूप में कई कुञ्ज – स्वामिनियाँ, आदिवासी टोटेम व्यवस्था मानने वाली जाति की स्त्री और एक नदी देवी का उल्लेख मिलता है। यह प्रतीकात्मक रूप से कृष्ण के संप्रदाय द्वारा समय – समय पर पराजित हुए मातृअधिकार से आबद्ध क़बीलों की  पराजय का ही द्योतक है।

इसी क्रम में वृंद देवी वृन्दा अथवा तुलसी का शलिग्राम रूपी विष्णु से प्रचलित मान्यताओं के अनुसार कृष्ण से भी  लगभग हर वर्ष कृष्ण का विवाह रचाया जाता है ।

कोसंबी कहते हैं तुलसी देवी को जिस चौकोर चबूतरे पर लगाया जाता है वह बलिवेदी है और जैसा की तुलसी माहात्म्य में तुलसी को विधवा के रूप में दिखाया गया है तो अन्य सभी मातृदेवियों के संप्रदाय में प्रचलित प्रथा के अनुसार हर वर्ष संप्रदाय की प्रमुख पुजारिन  स्त्री के पति की बलि का अनुष्ठान ही हर वर्ष विवाह के उत्सव की पूर्वपीठिका है।

प्राचीन परम्परा और आधुनिक मान्यता के अनुसार वृन्दावन की मूल अवस्थिति कृष्ण की जन्मभूमि गोकुल के अंतर्गत मथुरा में थी और वृन्दा की पूजा – विधि कृष्ण की पूजा विधि से प्राचीन है जिससे यह संकेत प्राप्त होता है कि नई पितृसत्तातमक व्यवस्था में संक्रमण की वजह से मातृदेवी तुलसी का संप्रदाय अपनी उच्च सामाजिक स्थिति से अवमूल्यित हुआ होगा । कहने की आवश्यकता नहीं है कि यह व्याख्या जो मूलतः देवी वृन्दा के अस्तित्व की है धूमावती के विधवा रूप में चित्रित होने के कारण की पूरी व्याख्या कर देती है।

लेखक द्वारा की गई  उपरोक्त व्याख्या से हम स्पष्ट रूप से मातृअधिकार मानने वाले  सम्प्रदायों में प्रमुख स्त्री के अस्थाई पति की बलि का हेतु समझ पाते हैं ।

*ज्येष्ठा*

धूमावती के अधिकार का नक्षत्र ज्येष्ठा माना जाता है एवं  शारदा तिलक  तंत्र में धूमावती को ज्येष्ठा का ही एक रूप घोषित करता है। ज्येष्ठा को अलक्ष्मी भी सम्बोधित किया जाता है।  पदम पुराण की कथानुसार ज्येष्ठा देवी  अथवा अलक्ष्मी ,  देवी  लक्ष्मी के साथ मंथन से प्रकट होती हैं, विवरण के अनुसार उनका रूप बड़ा ही वितृष्णा उत्पन्न करने वाला है जिसमें उन्हें गहरे काले रंग वाली  भयानक स्वरुप वाली चित्रित किया गया है ।

अलक्ष्मी की पूजा दिवाली के ठीक एक दिन पहले अर्थात नर्क चतुदर्शी के दिन की जाती है । इस दिन अलक्ष्मी को दूर करने के लिए बंगाल में स्त्रियां सूप को झाड़ू अथवा लकड़ी  के टुकड़े से पीटते हुए ध्वनि उत्पन करती हैं और अलक्ष्मी को घर से निकल  जाने को कहती हैं जिससे कि दूसरे दिन लक्ष्मी को आश्रय दिया जा सके ।  

ज्येष्ठा को गधे पर आरूढ़ एवं हाथ में सूप (कहीं कहीं झाड़ू भी ) एवं एक हाथ में कलश लिए चित्रित किया जाता है । ज्येष्ठा के पति के रूप में ऋषि उद्दालक ( लिंग पुराण में दुःसह ) का उल्लेख आता है । इनकी प्रवृति रुक्ष , अकल्याणकारी एवं अशुभ मानी जाती है। 

डेविड किंस्ले के अनुसार ज्येष्ठा की पूजा का प्रचलन सातवीं – आठवीं सदी में दक्षिण भारत में प्रचलन में था । किंस्ले  हमारा ध्यान इस रोचक तथ्य की ओर भी दिलाते हैं कि बंगाल में अलक्ष्मी की जो प्रतिमा निर्मित की जाती है उसमें उसके नाक एवं कान को कटा हुआ शिल्पित किया जाता है। 

यह तथ्य हमें रामायण की एक प्रसिद्ध स्त्री पात्र ‘ सूर्पणखा ‘ (सूप जैसे नाक – कान वाली ) का स्मरण कराता है, जिसके प्रणय – निवेदन से क्षुब्ध होकर सभ्य समाज के नियमों के अनुकूल राम उसे अपमानित करने हेतु उसके नाक एवं कान काट लेते हैं , सूर्पनखा का कथित स्थान भी दक्षिण भारत ही है , एवं रामायण में उसे  तुलसी की तरह ही विधवा वन देवी अथवा कुन्जस्वामिनी  के रूप में ही चित्रित किया गया है ।

अर्थात यह निष्कर्ष अतिशय कल्पनाशील नहीं लगता की भारत विजय के अपने अभियान में रघुवंशियों ने ज्येष्ठा के संप्रदाय को भी पराजित किया होगा एवं तीक्ष्ण वैचारिक संघर्ष के कारण ही , इस देवी को इतनी नकारात्मक वृतियों और रोग के साथ आबद्ध कर दिया गया होगा। विजित  टोटेम चिन्ह के रूप में कालांतर में गर्दभ की संज्ञा का ‘मूर्ख’  के रूप में उपयोग होना एवं कौव्वे का दुर्भाग्य और अशुभता से जुड़ जाना भी कमोबेश इसी तीक्षण संघर्ष की प्रतीति देता है.

ज्येष्ठा का गधे पर आरूढ़ होना  दो और देवियों के तरफ हमारा ध्यान खींचता है उनमें से एक देवी  शीतला,  दूसरी देवी  कालरात्रि है, दोनों के यहाँ गर्दभ है ।  कालरात्रि जहाँ स्पष्ट रूप से युद्धोन्माद से आबद्ध है वहीं देवी शीतला को चेचक आदि कई रोगों की देवी बताया गया है ।

अब इन तीन देवियों के इस समेकित अध्ययन से कई रोचक परन्तु एक सी  बातें सामने आती हैं,  प्रथम तो सबका रूप किसी न किसी तरह से अकल्याणकारी वस्तुओं यथा दुर्भाग्य, निर्धनता, रोग, वितृष्णा एवं हिंसात्मकता (कालरात्रि के संदर्भ में ) से जुड़ा हुआ है। द्वितीय जहाँ धूमावती और कालरात्रि को शिव से जुड़ा हुआ माना जाता है वहीं शीतला को स्थानीय प्रथाओं में ज्वरासुर  के साथ  उनकी पत्नी के रूप में  पूजा जाता है एवं ज्येष्ठा का  ऋषि उद्दालक बाद में त्याग कर देते हैं । कथाओं के अनुसार वे, विष्णु जो उसकी बहन के पति हैं  के पास अपने पालन – पोषण का प्रश्न रखती है और विष्णु उसे आश्वस्त करते हैं की वे महिलाओं द्वारा दिए गए अन्न से पोषण प्राप्त करेंगी, अर्थात स्त्रियों द्वारा स्वेच्छा से प्रदान किये गए अन्न द्वारा उनका पोषण होगा । 

धूमावती को साधारणतयः विधवा महिला के रूप में चित्रित किया जाता है परन्तु नेपाल के एक मंदिर में हमें महाविद्या धूमावती का यह चित्र  देखने को मिला है जिसमे धूमावती को युवती (दर्पण – सुंदरी ) के रूप में चित्रित किया गया है एवं उनके पैर उसी विशिष्ट शैली में फैले चित्रित किये गए हैं जिससे उनके जननांग स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं , यह चित्रण हमें छिन्नमस्तका और लज्जा गौरी के चित्र में प्रक्षिप्त व्याख्याएं का स्मरण कराता है।

तथाकथित विधवा देवी धूमावती का यह युवती रूप  जहाँ  हमें आश्चर्यचकित करता है वहीं यह सूर्पनखा के प्रणय – निवेदन के समय धारण किये गए सुन्दर रूप का भी स्मरण कराता है । मानव मस्तिष्क को देखे जाने पर विरोधाभास हमेशा एक साथ दिखाई देते हैं, प्रेम – हिंसा, भाव – तर्क, आशा – निराशा आदि ।  मिथकों में भी यह कई अलग सी शब्दावली में सामने आता था यथा युद्ध – नृत्य, सम्भोग – मृत्यु, हिंसा – पवित्रता अर्थात  किसी न किसी रूप में मानवीय ऊर्जा का विध्वंसक चरम जो एक साथ आये पर विरोधी गतियों का समावेश हो । 

भारतीय मिथक परंपरा में मृत्यु और नृत्य का विचित्र सम्बन्ध है। काली , छिन्न्मस्तका , तारा, शिव,  पार्वती  एवं कृष्ण के जीवन पर इस परिघटना के स्पष्ट प्रभाव हैं। देवी काली एवं तारा जहाँ श्मशान भूमि में युद्ध में विजयी होने के बाद उन्माद में नृत्य करती है, वहीं कृष्ण कालिया नाग के दमन के बाद नृत्य करते हैं, शिव का वीरभद्र रूप भी इसी परिघटना का उदाहरण है वहीं दूसरी ओर शिव के नृत्य के  अन्य उदाहरण दृष्टिगोचर होते हैं जैसे सती के शव के साथ शिव का तांडव  जो मिथक इतिहास की एक अलग सी परिघटना है, अर्थात आनंद और उत्तेजना में किये गए प्रदर्शन से विपरीत यह नृत्य शोक में किया गया है, जो आनंद से कोई  सम्बन्ध नहीं रखता , हाँ यह माना जा सकता है कि शोक के प्रबल भावावेग में भी उत्तेजना के लक्षण तो होते ही हैं । 

युद्ध और उन्माद के साथ नृत्य हमेशा से संबद्ध रहा है, उपरोक्त वर्णित मिथकीय चरित्रों से इतर गणेश और तथाकथित ब्रह्मचारी अवतारी देव हनुमान की भी नृत्यरत मुद्राओं में कई पुरातन प्रतिमाएं कई स्थानों की खुदाई से अथवा मंदिरों के शिल्प से प्राप्त हुई है ।  यह मिथकीय साहित्य की एक रोचक परिघटना है जिसमें जिस भी संप्रदाय के नायक अधिक समीपता से यौनिकता  मुक्त अभिप्राय और मातृसत्ता से जुड़े होते हैं उसे उतनी ही अधिक कठोरता से, अप्राकृतिक नियमों से संबद्ध करके स्त्री – विमुखता और साथ ही साथ पुरुषवाद से जोड़ा जाता  है ।  

इसी क्रम में ग्रीक मिथक का उदाहरण लें तब कभी ऐसा हो जाता है कि अपोलो सूर्य का देवता भी माना जाये और फिर उसे प्लेग लाने के लिए उत्तरदायी भी समझा जाने लगे। इसी प्रकार शरीर से अलग सर की प्रतीकात्मकता की कई रोचक व्याख्याएं उपलब्ध है जिनसे गुजरना इन परिघटनाओं की विषद व्याख्या के लिए  आवश्यक  है ।

तमिल मिथकों में देवी दुर्गा और महिसासुर को  लेकर रोचक कथा  है जिसके अनुसार महिसासुर के  देवी तीर्थ में स्नान के लिए जाती है, वापस लौटकर वे महिसासुर के  कटे सर की जगह  शिवलिंग देखती हैं। इस प्रसंग में ध्यान रखने वाली दो बाते हैं प्रथम तो यह स्नान हेतु प्रयुक्त तीर्थ पूर्व में वर्णित ‘अप्सरा तीर्थ’ का ही एक रूप है,  और  द्वितीय स्त्री योद्धाओं और मातृकाओं का  प्रकारांतर से आवश्यकतानुसार अप्सराओं और देवियों में परिवर्तित होते जाना स्वयं में एक अलग क्षेत्र है दूसरा सर कटे सर का शिवलिंग में परिवर्तित हो जाना अर्थात वही पुरानी योग – दर्शन की मान्यता जो यह बताती है कि साधना से वीर्य को कुण्डलिनी शक्ति में परिवर्तित करके ऊर्ध्वाधर गति में लाया जा सकता है अर्थात जहाँ मनुष्य के इस जीवांश के साथ सम्भोग के बाद यूँ ही प्रवाहित हो जाने की नियति संबद्ध है वहीं इसके नियंत्रण से अपर ऊर्जा  हुआ जा सकता है।

 छिन्नमस्तका का बिम्ब  इससे  अलग नहीं है । संभोगरत रति – कामदेव पर आरूढ़ देवी को काम -क्रिया  पर नियंत्रण से तो  ऊर्जा प्राप्त होती ही  है, साथ ही साथ कटे सर  प्रतीकात्मकता महिष के साथ शिव की साम्यता और उसके सर के स्थान पर पुरुष जननांग की प्राप्ति यह स्थापित कर देती है कि देवी अपने तीव्र इच्छाओं के दमन का संकेत देना चाहती है।

इसे आध्यात्मिक सन्देश की तरह लिया जाये अथवा युद्धरत क़बीलों में यौन क्रिया के असामान्य व्यवहार से जोड़कर देखा जाये यह एक विशाल प्रश्न के रूप में सामने आता है ।  इसी प्रकार नृत्य का युद्ध से सम्बन्ध अन्योन्याश्रित प्रतीत होता है ।   तांडव का चरित्र भी रोचक है, एक तरफ इससे ब्रह्माण्ड का विनाश होता है , दूसरी तरफ नदियों का उद्गम भी।  प्रेम – हिंसा , युद्ध – नृत्य के इन द्वैतों के मध्य धूमावती के ये दो चित्र अर्थात भिखारिन विधवा और  सर्वांग सुंदरी कमनीय युवती भी एक ऐसी ही परिघटना का उदाहरण है । 

देवी धूमावती तंत्र साहित्य में कई जगह पूर्ण श्रृंगार में युवती के रूप में चित्रित होती है तो कई जगह विधवा के रूप में चित्रित की जाती है । वृन्द देवी तुलसी की तरह इनके भी कुमारी, विवाहित और विधवा रूप की परिकल्पना का आधार शुद्ध मातृअधिकारात्मक क़बीले से देवी का जुड़ा होना ही है।

यहां हम स्पष्ट रूप से ऋग्वेद में की गई स्तुति का स्मरण कर सकते हैं जिसमें स्त्री को यह निर्देश दिया गया है कि ‘तू पति को मरने वाली न बन ‘ एवं ‘तेरी दस संताने हो और अंतिम संतान के रूप में अपने पति को मान्यता दे।’

7

*महाविद्या समूह की देवियों काली , तारा , त्रिपुर सुंदरी , भुवनेश्वरी , छिन्नमस्ता , त्रिपुर भैरवी , धूमावती , बगलामुखी , मातंगी कमला के अंतर्गत आज पढिये ‘ छिन्नमस्ता’ के बारे में ।*

छिन्नमस्ता

देवी छिन्नमस्ता महाविद्याओं के समूह में सबसे रहस्यमय प्रतीत होती हैं।  छिन्नमस्ता  अभिसार रत युगल पर आरूढ़ होती हैं जो एक कमल पर लेटे  होते हैं और यह कमल आश्चर्य जनक रूप से जल में अवस्थित न होकर श्मशान भूमि में अवस्थित होता है।   देवी के दोनों और उनकी दो सह – योगिनियाँ (वर्णिनी और शाकिनी) और देवी खुद भी अपने शिरोच्छेदन से प्रवाहित रक्त की धार का सेवन करती चित्रित की जाती है। यह चित्रण स्वयं में उतने ही विरोधाभास लिए हुए है जितना की भारतीय वांग्मय में दर्शन – सम्प्रदायों का इतिहास जटिल है।

गौर से देखें तो इसमें दैहिक प्रेम , रक्तपात, हिंसा, उन्मुक्तता और दमन एक साथ चित्रित है। न्यूनाधिक यह चित्रण हमें तिब्बती देवी वज्रयोगिनी/वज्रवाराही  ( डाकिनी) के पूर्ववर्णित चित्र  का स्मरण करता है।

दोनों में बहुत बारीक से अंतर दिखते है जो क्षेत्र विशेष के वातावरण से प्रभावित होने कारण चित्रण में स्थान प्राप्त करते हैं उदाहरण के लिए जहाँ छिन्नमस्ता अभिसार – रत युगल के ऊपर आरूढ़ दृष्टिगोचर होती है वहीं वज्रयोगिनी दो पुरुषों के शरीर पर पैर रखे खड़ी  चित्रित की जाती है जिसमें से एक गौर -वर्ण और चार हाथ वाला पुरुष है (संभवतः विष्णु ) दूसरा तेंदुए का चर्म धारण किये हुए श्याम वर्ण पुरुष (संभवतः शिव ) है । जहाँ बौद्ध तंत्र में छिनमस्तका वज्रयोगिनी के रूप में उपस्थित है वहीं दूसरी ओर मंगोलिया और जापान में दो देवियों से देवी छिन्नमस्ता का सादृश्य प्राप्त होता है । मंगोलिया से भारत का मार्ग क्योंकि उत्तर भारत की पर्वत श्रुंखला को पार करके ही आता है इस तथ्य पर विश्वास कर लेने का एक तार्किक आधार तो है ही कि यह प्राचीन युद्ध देवी निश्चय ही मंगोलियन नस्ल के भारत के मूल निवासियों से सम्मिलित  रक्त का परिणाम है, एवं मातृसत्ता जनजातीय स्तर पर बहुत बाद तक के समय में भारत के पर्वतीय भागों में पूरे वैभव के साथ उपस्थित थी ।

’डाक’ मूलतः बंगाली भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है ‘आवाज देना या आमंत्रित करना’  वहीं डाकिनी का अर्थ होता है ‘वह जिसे बुलाया गया हो /आमंत्रित किया गया हो’ अब यह अंदाजा लगाना इतना कठिन तो नहीं है कि यह ‘आमंत्रण ‘ युद्ध में भीषण अमानवीय रक्तपात करके शत्रुसंहार की आवश्यकता के मद्देनज़र ही है। इसका एक प्रमाण यह भी हम देख चुके हैं ही कि कैसे बाद के काल में सप्तमातृका समूह की योद्धा ‘वाराही ‘ को विष्णु के वराह अवतार के साथ साथ जोड़ दिया जाता है परन्तु उसकी ‘मातृका’ की उपाधि वैसी ही रह जाती है । वहीं छिन्नमस्ता और काली के अन्य सादृश्यों को शिव के साथ जोड़कर क्रमशः उनकी विशेषता का घटिया सामान्यीकरण कर दिया जाता है।

बहुत  स्पष्ट दिखने वाली प्रतीकात्मकता को भाववाद के शाश्वत भंवर में ऐसे समाहित किया जाता है कि भौतिकवाद छिन्न – भिन्न होकर पाताल – गति को प्राप्त करता है एवं स्त्रैणता की पराकाष्ठा और वाम – दर्शन का भी शासकीय दृष्टि और प्रताप से दाह – संस्कार हो जाता है ।

छिन्नमस्ता के सर का खंडित होना , तमाम दार्शनिक व्याख्याओं के मध्य हमें बार – बार एक जाहिलाना सामान्यीकरण की ओर ले जाता है, और वह सामान्यीकरण है धड़ रहित नग्न देह, और पैरों का ऐसी स्थिति में दर्शाया जाना जिससे कि यौनांग अंशतः या अस्पष्टतः प्रदर्शित हों, यह हमें हड़प्पा से प्राप्त मातृदेवी और भारत के कई हिस्सों की खुदाई से प्राप्त लज्जा गौरी (अन्य नाम अदिति , कोटवी )के चित्र की याद दिलाता है परन्तु जहाँ उन चित्रों में प्रजनन प्रक्रिया से स्पष्ट जुड़ाव के चिन्ह मौजूद हैं, छिन्नमस्ता उन्माद और और अतिआक्रमकता की स्थिति में रक्तपान करती दृष्टिगोचर होती है । यौनांगों की प्रदर्शित करती स्त्री (देवी) का चित्रण भारत की मूर्तिकला में बहुतायत में पाये जाने वाली परिघटना है।

यह मुख्यतः दो कारणों से घटित होती है  प्रथम मातृसत्ता और प्रजनन के सम्बन्ध के कारण द्वितीय युद्धरत स्त्री योद्धाओं में आक्रामक यौनिक – व्यवहार की उपस्थिति के कारण , हालाँकि इन दोनों प्रतीकों के स्थापन के बारीकी से अध्ययन के बाद हम इस तथ्य से अवगत हो सकते हैं कि कौन सा चित्रण किस हेतु किया गया होगा । ध्यातव्य यह भी है कि कालांतर और प्रकारांतर से यह दोनों परिघटनाएँ कभी परस्पर अतिव्याप्ति (overlap ) का शिकार होती हैं तो कभी एक दूसरे की सादृश्यता का रूपांतरित रूप होकर भी सामने आती हैं । 

    
छिन्नमस्ता का धड़ से मस्तक विलग है परन्तु चित्र में मस्तक उपलब्ध तो है , जहाँ लज्जा गौरी अथवा कोटवी के चित्र में एक प्रकार की सौम्यता और अकर्मण्यता का मिश्रण दृष्टिगोचर होता है , छिन्नमस्ता भयावह और उग्र रूप में  शस्त्रधारिणी के रूप में सामने आती हैं, अर्थात हम देख  सकते हैं कि  प्रतीकात्मकता बदलती भी है और जटिल भी होती है ।  काल के अनवरत चलते निर्बाध चक्र में मानवीय चेतना की निरंतर जटिल होती यात्रा के साथ संस्कृति को निर्दिष्ट करती एवं स्वयं उससे प्रेरणा पाती दृश्य अथवा श्रव्य प्रतीकात्मकता का जटिल होना अथवा  परिवर्तित होना कोई आश्चर्जनक बात नहीं है वरन प्रकारांतर से  आश्चर्यजनक वे तथ्य अर्थात वातावरणिक चर होते हैं जो ऐसे परिवर्तन या जटिलता के लिए उत्तरदायी होते हैं, और जिनका सटीक एवं तार्किक अध्ययन हमें  देशकाल की सही वस्तुस्थिति से अवगत करवाता  है ।   

*कोटवी* वस्तुतः एक मातृका मानी जाती है जिसे कहीं –  कहीं पार्वती अथवा रुद्राणी का अष्टम भाग मानकर पूजा जाता है ।   भारतीय मिथकों में  देवी कोटवी,  विष्णु की प्रतिद्वंदी समझी जाती है। विष्णु  पुराण (5.32- 33) और भगवत पुराण (10.63.20) में उसे नग्न, बिखरे बालों में युद्धरत स्त्री – योद्धा की तरह चित्रित किया गया है ।

भगवत  पुराण की कथा के अनुसार वह बाणासुर की माता है और विष्णु से अपने पुत्र की रक्षा के लिए युद्ध करती है।  वहीं तमिल संगम साहित्य की मान्यताओं के अनुसार कोटवी के ही एक अन्य सादृश्य देवी की पूजा मुरुगन की माता कोररवी के रूप में  दक्षिण में एक युद्धप्रिय मातृका के  रूप में होती है,  परन्तु इन दोनों ही साम्यों में कहीं श्मशान  भूमि में पूजित  देवी का उल्लेख नहीं प्राप्त होता जो वस्तुतः छिन्नमस्ता के चित्र का एक महत्वपूर्ण भाग है। जहाँ पार्वती के अष्टम भाग कोटवी  की पूजा युद्धप्रिय परन्तु प्रजनन की देवी के रूप में भारत के आदिवासी समुदायों में प्रचलित है वहीं शायद छिन्नमस्तका एकमात्र ऐसी देवी के रूप में सामने आती हैं जो अंततः अपने अनुयायियों की क्षुधा अपने रक्त से शांत करती है , यह प्रतीकात्मकता है पर यह स्पष्ट रूप में स्वामिनी द्वारा अनुयायी की आवश्यकताओं की पूर्ति करने से असक्षमता का चिन्ह तो है ही । तो अब प्रश्न है इन विरोधाभासों का  क्या अर्थ निकाला जाये ? युद्ध – क्षेत्र , शमशान भूमि में ,प्रजनन और वैभव के चिन्ह अतृप्तता में और  आमंत्रण – परिपूर्ण प्रदर्शन  आक्रामक  नग्नता में कैसे परिणत हो गया होगा  ?    

कश्मीर के कवि क्षेमेन्द्र दसवीं सदी रचित अपनी रचना बृहत्कथामंजरी में गौरी को दी जाने वाली रक्त बलियों का वर्णन करते है,  इसी प्रकार छिनमस्तका के तमाम मंदिरों में रक्तबलि के दृश्य बहुत सामान्य है। सामान्यतः जिस स्त्री पुरुष को संभोगरत अवस्था में छिन्मस्तका के पैरों के नीचे पड़ा चित्रित किया जाता है वे कहीं रति – कामदेव तो कहीं कृष्ण – राधा के रूप में चिन्हित किये जाते हैं, जिसमें स्त्री का चित्रण विपरीत रति संस्थि में किया जाता है, आधुनिक शुद्धतावादी इस पूरे चित्र की व्याख्या काम के भाव के देवी द्वारा दमन के रूप में करते हैं, अर्थात उनकी मान्यता है कि देवी के संप्रदाय में काम के अवमूल्यन हेतु देवी छिन्मस्तका का चित्रण संभोगरत – युगल को दमित करते दिखाया गया है। 

यह मान्यता कपोल- कल्पित प्रतीत होती है , हम मस्तक विहीन लज्जा गौरी के चित्र की व्याख्या से यह स्पष्ट सूत्र ले सकते हैं कि यौनांगों का इस प्रकार प्रदर्शन और मस्तक विहीनता का चिन्ह  स्त्रैण – मत से आबद्ध होता है, यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य है कि महाविद्याओं की प्रतिमा अथवा चित्र  रूप अन्य देवी – देवताओं की अपेक्षा आधुनिक युग की देन हैं।  अन्य महाविद्याओं की तरह देवी छिन्नमस्तका के सहस्त्रनाम स्तोत्र में उसके काम और मद उन्माद से सम्बंधित होने के सूत्र प्राप्त होते हैं यथा कामेश्वरी , कामरूपा , मदोन्मतास्वरूपिणी , यह स्पष्ट है कि देवी का काम के उन्मूलन अथवा दमन से कोई सम्बद्ध नहीं है।

देवी छिनमस्तका के चित्र को गौर से देखा जाये तो जो  दो परिकल्पनाएं स्पष्ट दिखती हैं वे है मृत्यु और रति । अर्थात जीवन का अंत एवं जीवन का आरम्भ करने वाली उसका बीजारोपण करने वाली अवस्था। दो स्पष्ट प्रतीक सामने आते हैं कमल जो स्त्री योनि का प्रतीक है और रक्त जो प्रथमदृष्ट्या तो मृत्यु का आभास देता है परन्तु यह उर्वरता का प्रतीक है।

उतरी अमेरिका में एक कृषि अनुष्ठान है जब फसलों में कीड़े लग जाते हैं तो ऐसी स्त्रियां जिनका मासिक धर्म चल रहा हो नग्न होकर खेतों में भ्रमण करती हैं ।  यूरोप के कई अन्य हिस्सों में भी यह परम्परा किसानों के मध्य प्रचलित थी । ग्रीस में यह दिमीटर के संप्रदाय में प्रचलित थी भारत में भी कई कई जगह वर्षा न होने पर स्त्रियों का नग्न होकर खेत में हल चलाना एक कृषि अनुष्ठान के रूप में मान्यता प्राप्त है हालाँकि इस हेतु उनका रजस्वला होना आवश्यक नहीं होता।

तंत्र में मासिक धर्म से संगृहीत रक्त का कई अनुष्ठानों के उपयोग होता है एवं यह बहुत पवित्र माना जाता है , कहना न होगा वैदिक दर्शन से तंत्र के चिरकालिक एवं हिंसक विरोध का कारण वस्तुतः तंत्र का स्त्रैण और वैदिक दर्शन का पुरुषवादी चरित्र भी है ।

स्त्री जननांग के प्रदर्शन से जादू तंत्र और प्रजनन का यह संबध बाद के समाज में इतना नाटकीय रूप ले लेता है कि दक्षिण भारत के तटवर्ती क्षेत्रों में यह मान्यता है कि अगर समुद्री तूफान आने की संभावना हो और अनावृत स्त्रियां तूफान की ओर अपने जननांग प्रदर्शित करें तो तूफान मार्ग बदल कर लौट जायेगा  जिन्हें इस विषय में अधिक जिज्ञासा हो वह कुक के लेख ‘न्यूडिटी इन इण्डिया इन कस्टम्स एंड रिचुवल्स’ में इस तरह के अनेक उदाहरणों का अवलोकन कर सकते हैं।

इस प्रकार हम देख सकते हैं कि मासिक धर्म से उत्पन्न हुए रक्त को तंत्र प्रतिष्ठा प्राप्त है, जहाँ यह स्त्री में कामना और प्रजनन का चिन्ह समझा जाता है वहीं आदिम तंत्र सम्प्रदायों में यह भी मान्यता थी कि पुरुष जीवांश से सम्मिलन के पश्चात यह रक्त नवजात के पोषण हेतु दुग्ध में परिवर्तित हो जाता है।  अतः अगर सिर्फ एक पुरुष जो समर्पण की अवस्था में स्त्री के नीचे पड़ा है, उसे  छोड़ दिया जाये तो छिन्मस्तका के चित्र की शेष सब प्रतीकात्मकता मातृवादी दर्शन की ओर स्पष्ट इंगित करती है । 

*अल्ली और अर्जुन की कथा*

छिन्नमस्तका के चित्र में प्रक्षिप्त यौनिक आक्रामकता की संकल्पना को स्पष्ट करने के लिए हम दक्षिण की प्रचलित अल्ली – अर्जुन की कथा को स्मरण करते हैं । अर्जुन की मातृदेवी पत्नियों के सन्दर्भ में एक और रोचक मिथक का वर्णन महाभारत में है । एक संतानहीन पंड्यान राजा संतान प्राप्ति हेतु अपने राज्य को अस्थाई संचालक हाथों में छोड़ कर तपस्या को प्रवृत होते हैं । उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ईश्वर उन्हें संतान प्राप्ति का वरदान देते हैं, अस्तु तमिल कथाओं की रोचक राज्ञी ‘अल्ली रानी’ का जन्म होता है । वे कन्या को लेकर वापस लौटते हैं परन्तु राज्य की स्थिति तब तक बदल गई होती है । अस्थाई संचालक ने राज्य सत्ता पर अधिकार करके राजा को निष्कासित घोषित कर दिया होता है, हतभाग राजा वन वापस लौट जाता है और एक तपस्वी की सलाह पर अपनी कन्या को राजकुमार की तरह अस्त्र – शस्त्र चलाने की शिक्षा देकर युवा महिला – योद्धा में परिणत कर देता है, जिससे कि वह अपने पिता का राज्य वापस अपने अधिकार में ले सके । राजा की योजना सफल होती है अल्ली अपना राज्य वापस प्राप्त कर लेती है।

अल्ली का चरित्र भयावह, क्रूर एवं सामान्य कन्याओं से अलग विकसित हुआ है। उसके जीवन का एकमात्र उद्देश्य युद्ध करके पिता का राज्य वापस प्राप्त करना था अतएव प्रेम, स्नेह , स्त्रैणता आदि के लिए उसके हृदय और जीवन में कोई स्थान नहीं था। हमने पूर्व में भी देखा है कि युद्धप्रिय स्त्री योद्धाओं अथवा पुरुष योद्धाओं के क़बीलों में सामान्य यौनिक व्यवहार नहीं दृष्टिगोचर होता और यौनिकता कई बार समलैंगिकता अथवा असामान्य यौन व्यवहार का रूप ले लेती है , अल्ली के साथ भी ऐसा ही होता है। अल्ली का जीवन भी स्त्रैणता से अछूता रह जाता है, वह अपनी वनवासिनी सखियों से युद्ध प्रशिक्षण लेकर पुरुष जाति के प्रति द्वेष और अवज्ञा की भावना रखने लगती है। यहाँ कुछ अन्य तथ्य ध्यान देने योग्य है उदाहरणार्थ ‘अल्ली राज्यम् ‘ तमिल में प्रचलित एक व्यंगोक्ति है जिसका अर्थ होता है ऐसा स्थान (या घर ) जो पूर्णतः स्त्रियों के अधिकार में हो और जहाँ पुरुष का प्रवेश निषेध हो, अर्थात यह रानी अल्ली के पुरुष- द्वेष की तरह किया गया एक प्रतीकात्मक ईशारा ही है।

आगे की कथा में महाभारत का सुप्रसिद्ध नायक अर्जुन कृष्ण के साथ भ्रमण करते हुए अल्ली के राज्य के बारे सुनता है, उसे इस अद्वितीय योद्धा स्त्री का आकर्षण और उसके राज्य के बारे में जानने की जिज्ञासा अल्ली के राज्य में खींच ले जाती है, चूकिं रानी अल्ली के राज्य में पुरुषों का प्रवेश निषेध है कृष्ण और अर्जुन स्त्री वेश बनाकर जिसमें वे सिद्धहस्त हैं अल्ली के राज्य में प्रवेश करते हैं । अर्जुन और कृष्ण दोनों ही संगीत – आदि कलाओं में पारंगत हैं वे येन – केन प्रकारेण रानी के महल तक घुसपैठ कर लेते हैं और वार्तालाप के मध्य स्वयं को देशाटन करने निकली सखियाँ बताकर रानी से मिलने की ईच्छा का प्रदर्शन करते हैं ।

अल्ली उनसे भेंट करती है , स्त्री रूप में अर्जुन अल्ली के समक्ष उसके रूप और गुणों की प्रशस्ति करते हैं एवं यह भावना प्रदर्शित करते हैं कि ऐसी गुणवान स्त्री के लिए अर्जुन ही इस सम्पूर्ण संसार में उपयुक्त पुरुष है । रानी अल्ली उनके प्रति सहृदयता का प्रदर्शन करती है परन्तु विवाह अथवा पुरुष – सामीप्य की इच्छा के प्रति कोई रूचि नहीं प्रदर्शित करती । अर्जुन और कृष्ण विदा होते हैं, रानी अल्ली स्त्री रूप धारण किये अर्जुन को स्त्री समझ कर आलिंगन बद्ध कर के विदा करती है, यह अर्जुन के लिए उत्प्रेरक साबित होता है । वे महल से वापस तो लौट आते हैं परन्तु वह अल्ली को अंकशायनी पत्नी के रूप में पाने के लिए उद्विग्न हो उठते हैं । अर्जुन इस हेतु कृष्ण से प्रार्थना करता है कि वे उसकी इस विचलित अवस्था के निराकरण की व्यवस्था करें । कृष्ण अर्जुन की प्रार्थना से द्रवित होकर उसे नाग सर्प में परिवर्तित हो जाने की शक्ति देते हैं , अर्जुन सर्प के रूप में अल्ली के शयनकक्ष में प्रवेश करता है , उसके समीप जाता है एवं उसे शारीरिक संसर्ग हेतु मादक रूप से उत्तेजित करता है एवं उससे अभिसाररत होता है।

अल्ली रति के उन्माद के बीत जाने पर पहले तो क्रोधित होती है बाद में अर्जुन से प्रभावित होकर प्रेम कर बैठती है। अर्जुन और अल्ली का विवाह होता है इस प्रकार अल्ली भी अर्जुन की अन्य कई मातृदेवियों की तरह एक पत्नी के रूप में प्रतिष्ठा पाती है। छिन्नमस्तका का रति क्रिया में लिप्त युगल पर आरूढ़ होना महाविद्याओं के संप्रदाय में व्याप्त युद्धप्रियता के मद्देनजर आक्रमक यौन अभिव्यक्ति के चित्रण का भी एक प्रयास सा लगता है, इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता.

महाविद्या समूह की देवियों काली , तारा , त्रिपुर सुंदरी , भुवनेश्वरी , छिन्नमस्ता , त्रिपुर भैरवी , धूमावती , बगलामुखी , मातंगी कमला ।देवी धूमावती के अंतर्गत आज पढिये धूमावती के बारे में

*धूमावती

देवी धूमावती की उत्पति को लेकर दो कथाएं प्रचलित है प्रथम के अनुसार –  देवी पार्वती अकस्मात् बहुत भूख लगने और शिव के द्वारा खाद्य पदार्थ प्रस्तुत करने में विलम्ब होने के कारण क्षुधापीड़िता होकर क्रोध से  भगवान शिव को ही निगल लेती हैं । ऐसा करने के फलस्वरूप पार्वती के शरीर से धूम्र -राशि निस्सृत होने लगती है । शिव  द्वारा देवी पार्वती  को विधवा रूप में पूजित होने और धूम्र से व्याप्त शरीर के कारण  धूमावती नाम से प्रचलित होने का शाप प्राप्त होता है ।

द्वितीय में पिता के घर अपमान के कारण यज्ञ कुण्ड में जल जाने से सती के शरीर से धूम्र आकृति के रूप में देवी धूमावती का जन्म होता है ।

देवी धूमावती को एक विधवा के रूप में जिसके बाल बिखरे हुए हैं और वस्त्र पुराने एवं कांतिहीन हैं चित्रित किया जाता है । धूमावती एक रथ पर आरूढ़ होती हैं जिसके शिखर पर एक कौवा विराजमान होता है और उनके हाथ में अनाज को अशुद्धि से अलग करने में प्रयुक्त होने वाला  सूप होता है ।

धूमावती के चेहरे को सामान्यतः कांतिहीन चित्रित किया जाता है । *धूमावती भारतीय वांग्मय में अकेली ऐसी स्त्री – योद्धा है जिसका चित्रण न कुमारी कन्या न विवाहिता वरन विधवा के रूप में किया जाता है।*

कोसंबी वृन्दा और कृष्ण के सम्बन्ध में एक रोचक आख्यान का विवेचन करते हैं जिससे परिचित हो लेना इस विधवा देवी की प्रतीकात्मकता को सुलझाने में हमारी मदद कर सकता है।  

हम देख सकते हैं कि कृष्ण की अधिकतर पत्नियाँ मातृअधिकार सम्पन्न क़बीले की मातृदेवियाँ थी । कृष्ण की अनगिनत (सोलह हज़ार आठ ) पत्नियों और प्रेमिकाओं को थोड़ी देर के लिए विस्मृत भी कर दें तो भी उनके साथ अष्टभार्या अर्थात  रुक्मिणी, सत्यभामा ( योद्धा स्त्री जिसने नरकासुर को पराजित करने में कृष्ण की रणभूमि में मदद की थी ।

भागवतपुराण के अनुसार नरकासुर भूदेवी और वराह का पुत्र है  ), जाम्बवती (जाम्बवन्त की पुत्री, जिनका क़बीला –  टोटेम रीछ था  ), नग्नजिती (कोसलदेश के राजा थे नग्नजित् की पुत्री का नाम सत्या था.  नग्नजित् की पुत्री होने से वह नग्नजिती भी कहलाती थी। राजा नग्नजित् की प्रतिज्ञा थी कि जो कोई पुरुष उनके सात भयानक बैलों पर विजय प्राप्त करेगा वे उसी से अपनी पुत्री का विवाह करेंगे, प्रतीकात्मक रूप से यह उनके टोटेम चिन्ह बैल पर कृष्ण के संघ के आधिपत्य का विवरण है  ),

कालिंदी (यह नदी देवी यमुना का ही दूसरा नाम है। कालिंद पर्वत से निकलने का कारण इसका नाम कालिंदी भी माना जाता है ),मित्रविंदा, भद्रा, लक्ष्मणा (लक्ष्मणा एक सुपरिचित वनस्पति है, इसकी जड़ी पुत्रदा मानी जाती है। इसे नागपत्री भी कहते हैं ) के रूप में कई कुञ्ज – स्वामिनियाँ, आदिवासी टोटेम व्यवस्था मानने वाली जाति की स्त्री और एक नदी देवी का उल्लेख मिलता है। यह प्रतीकात्मक रूप से कृष्ण के संप्रदाय द्वारा समय – समय पर पराजित हुए मातृअधिकार से आबद्ध क़बीलों की  पराजय का ही द्योतक है। इसी क्रम में वृंद देवी वृन्दा अथवा तुलसी का शलिग्राम रूपी विष्णु से प्रचलित मान्यताओं के अनुसार कृष्ण से भी  लगभग हर वर्ष कृष्ण का विवाह रचाया जाता है ।

कोसंबी कहते हैं तुलसी देवी को जिस चौकोर चबूतरे पर लगाया जाता है वह *बलिवेदी* है और जैसा की तुलसी माहात्म्य में तुलसी को विधवा के रूप में दिखाया गया है तो अन्य सभी मातृदेवियों के संप्रदाय में प्रचलित प्रथा के अनुसार हर वर्ष संप्रदाय की प्रमुख पुजारिन  स्त्री के पति की बलि का अनुष्ठान ही हर वर्ष विवाह के उत्सव की पूर्वपीठिका है।

प्राचीन परम्परा और आधुनिक मान्यता के अनुसार वृन्दावन की मूल अवस्थिति कृष्ण की जन्मभूमि गोकुल के अंतर्गत मथुरा में थी और वृन्दा की पूजा – विधि कृष्ण की पूजा विधि से प्राचीन है जिससे यह संकेत प्राप्त होता है कि नई पितृसत्तातमक व्यवस्था में संक्रमण की वजह से मातृदेवी तुलसी का संप्रदाय अपनी उच्च सामाजिक स्थिति से अवमूल्यित हुआ होगा । कहने की आवश्यकता नहीं है कि यह व्याख्या जो मूलतः देवी वृन्दा के अस्तित्व की है धूमावती के विधवा रूप में चित्रित होने के कारण की पूरी व्याख्या कर देती है। लेखक द्वारा की गई  उपरोक्त व्याख्या से हम स्पष्ट रूप से मातृअधिकार मानने वाले  सम्प्रदायों में प्रमुख स्त्री के *अस्थाई पति की बलि* का हेतु समझ पाते हैं ।

धूमावती के अधिकार का नक्षत्र ज्येष्ठा माना जाता है एवं  शारदा तिलक  तंत्र में धूमावती को ज्येष्ठा का ही एक रूप घोषित करता है। ज्येष्ठा को अलक्ष्मी भी सम्बोधित किया जाता है।  *पदम पुराण की कथानुसार ज्येष्ठा देवी  अथवा अलक्ष्मी ,  देवी  लक्ष्मी के साथ मंथन से प्रकट होती हैं, विवरण के अनुसार उनका रूप बड़ा ही वितृष्णा उत्पन्न करने वाला है जिसमें उन्हें गहरे काले रंग वाली  भयानक स्वरुप वाली चित्रित किया गया है ।अलक्ष्मी की पूजा दिवाली के ठीक एक दिन पहले अर्थात नर्क चतुदर्शी के दिन की जाती है ।*

इस दिन अलक्ष्मी को दूर करने के लिए बंगाल में स्त्रियां सूप को झाड़ू अथवा लकड़ी  के टुकड़े से पीटते हुए ध्वनि उत्पन करती हैं और अलक्ष्मी को घर से निकल  जाने को कहती हैं जिससे कि दूसरे दिन लक्ष्मी को आश्रय दिया जा सके ।  

*ज्येष्ठा* को गधे पर आरूढ़ एवं हाथ में सूप (कहीं कहीं झाड़ू भी ) एवं एक हाथ में कलश लिए चित्रित किया जाता है । ज्येष्ठा के पति के रूप में ऋषि उद्दालक ( लिंग पुराण में दुःसह ) का उल्लेख आता है । इनकी प्रवृति रुक्ष , अकल्याणकारी एवं अशुभ मानी जाती है।  डेविड किंस्ले के अनुसार ज्येष्ठा की पूजा का प्रचलन सातवीं – आठवीं सदी में दक्षिण भारत में प्रचलन में था ।

*सूर्पनखा की कहानी*

किंस्ले  हमारा ध्यान इस रोचक तथ्य की ओर भी दिलाते हैं कि बंगाल में अलक्ष्मी की जो प्रतिमा निर्मित की जाती है उसमें उसके नाक एवं कान को कटा हुआ शिल्पित किया जाता है।  यह तथ्य हमें रामायण की एक प्रसिद्द स्त्री पात्र ‘ सूर्पणखा ‘ (सूप जैसे नाक – कान वाली ) का स्मरण कराता है, जिसके प्रणय – निवेदन से क्षुब्ध होकर सभ्य समाज के नियमों के अनुकूल राम उसे अपमानित करने हेतु उसके नाक एवं कान काट लेते हैं ।

सूर्पनखा का कथित स्थान भी दक्षिण भारत ही है , एवं रामायण में उसे  तुलसी की तरह ही विधवा वन देवी अथवा कुन्जस्वामिनी  के रूप में ही चित्रित किया गया है । अर्थात यह निष्कर्ष अतिशय कल्पनाशील नहीं लगता की भारत विजय के अपने अभियान में रघुवंशियों ने ज्येष्ठा के संप्रदाय को भी पराजित किया होगा एवं तीक्ष्ण वैचारिक संघर्ष के कारण ही , इस देवी को इतनी नकारात्मक वृतियों और रोग के साथ आबद्ध कर दिया गया होगा। विजित  टोटेम चिन्ह के रूप में कालांतर में गर्दभ की संज्ञा का ‘मूर्ख’  के रूप में उपयोग होना एवं कौव्वे का दुर्भाग्य और अशुभता से जुड़ जाना भी कमोबेश इसी तीक्षण संघर्ष की प्रतीति देता है.

*देवी गधे पर क्यों आरूढ़ है*

ज्येष्ठा का गधे पर आरूढ़ होना  दो और देवियों के तरफ हमारा ध्यान खींचता है उनमें से एक देवी  *शीतला*,  दूसरी देवी  *कालरात्रि* है, दोनों के यहाँ गर्दभ है ।  कालरात्रि जहाँ स्पष्ट रूप से युद्धोन्माद से आबद्ध है वहीं देवी शीतला को चेचक आदि कई रोगों की देवी बताया गया है ।

अब इन तीन देवियों के इस समेकित अध्ययन से कई रोचक परन्तु एक सी  बातें सामने आती हैं,  प्रथम तो सबका रूप किसी न किसी तरह से अकल्याणकारी वस्तुओं यथा दुर्भाग्य, निर्धनता, रोग, वितृष्णा एवं हिंसात्मकता (कालरात्रि के संदर्भ में ) से जुड़ा हुआ है। द्वितीय जहाँ धूमावती और कालरात्रि को शिव से जुड़ा हुआ माना जाता है वहीं शीतला को स्थानीय प्रथाओं में ज्वरासुर  के साथ  उनकी पत्नी के रूप में  पूजा जाता है एवं ज्येष्ठा का  ऋषि उद्दालक बाद में त्याग कर देते हैं । कथाओं के अनुसार वे, विष्णु जो उसकी बहन के पति हैं  के पास अपने पालन – पोषण का प्रश्न रखती है और विष्णु उसे आश्वस्त करते हैं की वे महिलाओं द्वारा दिए गए अन्न से पोषण प्राप्त करेंगी, अर्थात स्त्रियों द्वारा स्वेच्छा से प्रदान किये गए अन्न द्वारा उनका पोषण होगा । 

धूमावती को साधारणतयः विधवा महिला के रूप में चित्रित किया जाता है परन्तु नेपाल के एक मंदिर में हमें महाविद्या धूमावती का यह चित्र  देखने को मिला है जिसमे धूमावती को युवती (दर्पण – सुंदरी ) के रूप में चित्रित किया गया है एवं उनके पैर उसी विशिष्ट शैली में फैले चित्रित किये गए हैं जिससे उनके जननांग स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं , यह चित्रण हमें छिन्नमस्तका और लज्जा गौरी के चित्र में प्रक्षिप्त व्याख्याएं का स्मरण कराता है।

तथाकथित विधवा देवी धूमावती का यह युवती रूप  जहाँ  हमें आश्चर्यचकित करता है वहीं यह सूर्पनखा के प्रणय – निवेदन के समय धारण किये गए सुन्दर रूप का भी स्मरण कराता है । मानव मस्तिष्क को देखे जाने पर विरोधाभास हमेशा एक साथ दिखाई देते हैं, प्रेम – हिंसा, भाव – तर्क, आशा – निराशा आदि ।  मिथकों में भी यह कई अलग सी शब्दावली में सामने आता था यथा युद्ध – नृत्य, सम्भोग – मृत्यु, हिंसा – पवित्रता अर्थात  किसी न किसी रूप में मानवीय ऊर्जा का विध्वंसक चरम जो एक साथ आये पर विरोधी गतियों का समावेश हो । 

भारतीय मिथक परंपरा में मृत्यु और नृत्य का विचित्र सम्बन्ध है। काली , छिन्न्मस्तका , तारा, शिव,  पार्वती  एवं कृष्ण के जीवन पर इस परिघटना के स्पष्ट प्रभाव हैं। देवी काली एवं तारा जहाँ श्मशान भूमि में युद्ध में विजयी होने के बाद उन्माद में नृत्य करती है, वहीं कृष्ण कालिया नाग के दमन के बाद नृत्य करते हैं, शिव का वीरभद्र रूप भी इसी परिघटना का उदाहरण है वहीं दूसरी ओर शिव के नृत्य के  अन्य उदाहरण दृष्टिगोचर होते हैं जैसे सती के शव के साथ शिव का तांडव  जो मिथक इतिहास की एक अलग सी परिघटना है, अर्थात आनंद और उत्तेजना में किये गए प्रदर्शन से विपरीत यह नृत्य शोक में किया गया है, जो आनंद से कोई  सम्बन्ध नहीं रखता , हाँ यह माना जा सकता है कि शोक के प्रबल भावावेग में भी उत्तेजना के लक्षण तो होते ही हैं । 

युद्ध और उन्माद के साथ नृत्य हमेशा से संबद्ध रहा है, उपरोक्त वर्णित मिथकीय चरित्रों से इतर गणेश और तथाकथित ब्रह्मचारी अवतारी देव हनुमान की भी नृत्यरत मुद्राओं में कई पुरातन प्रतिमाएं कई स्थानों की खुदाई से अथवा मंदिरों के शिल्प से प्राप्त हुई है ।  यह मिथकीय साहित्य की एक रोचक परिघटना है जिसमें जिस भी संप्रदाय के नायक अधिक समीपता से यौनिकता  मुक्त अभिप्राय और मातृसत्ता से जुड़े होते हैं उसे उतनी ही अधिक कठोरता से, अप्राकृतिक नियमों से संबद्ध करके स्त्री – विमुखता और साथ ही साथ पुरुषवाद से जोड़ा जाता  है ।  

इसी क्रम में ग्रीक मिथक का उदाहरण लें तब कभी ऐसा हो जाता है कि अपोलो सूर्य का देवता भी माना जाये और फिर उसे प्लेग लाने के लिए उत्तरदायी भी समझा जाने लगे। इसी प्रकार शरीर से अलग सर की प्रतीकात्मकता की कई रोचक व्याख्याएं उपलब्ध है जिनसे गुजरना इन परिघटनाओं की विषद व्याख्या के लिए  आवश्यक  है ।

तमिल मिथकों में देवी दुर्गा और महिसासुर को  लेकर रोचक कथा  है जिसके अनुसार महिसासुर के  देवी तीर्थ में स्नान के लिए जाती है, वापस लौटकर वे महिसासुर के  कटे सर की जगह  शिवलिंग देखती हैं। इस प्रसंग में ध्यान रखने वाली दो बाते हैं प्रथम तो यह स्नान हेतु प्रयुक्त तीर्थ पूर्व में वर्णित ‘अप्सरा तीर्थ’ का ही एक रूप है,  और  द्वितीय स्त्री योद्धाओं और मातृकाओं का  प्रकारांतर से आवश्यकतानुसार अप्सराओं और देवियों में परिवर्तित होते जाना स्वयं में एक अलग क्षेत्र है दूसरा सर कटे सर का शिवलिंग में परिवर्तित हो जाना अर्थात वही पुरानी योग – दर्शन की मान्यता जो यह बताती है कि साधना से वीर्य को कुण्डलिनी शक्ति में परिवर्तित करके ऊर्ध्वाधर गति में लाया जा सकता है अर्थात जहाँ मनुष्य के इस जीवांश के साथ सम्भोग के बाद यूँ ही प्रवाहित हो जाने की नियति संबद्ध है वहीं इसके नियंत्रण से अपर ऊर्जा  हुआ जा सकता है।

छिन्नमस्तका का बिम्ब  इससे  अलग नहीं है । संभोगरत रति – कामदेव पर आरूढ़ देवी को काम -क्रिया  पर नियंत्रण से तो  ऊर्जा प्राप्त होती ही  है, साथ ही साथ कटे सर  प्रतीकात्मकता महिष के साथ शिव की साम्यता और उसके सर के स्थान पर पुरुष जननांग की प्राप्ति यह स्थापित कर देती है कि देवी अपने तीव्र इच्छाओं के दमन का संकेत देना चाहती है। इसे आध्यात्मिक सन्देश की तरह लिया जाये अथवा युद्धरत क़बीलों में यौन क्रिया के असामान्य व्यवहार से जोड़कर देखा जाये यह एक विशाल प्रश्न के रूप में सामने आता है ।  इसी प्रकार नृत्य का युद्ध से सम्बन्ध अन्योन्याश्रित प्रतीत होता है ।   तांडव का चरित्र भी रोचक है, एक तरफ इससे ब्रह्माण्ड का विनाश होता है , दूसरी तरफ नदियों का उद्गम भी।  प्रेम – हिंसा , युद्ध – नृत्य के इन द्वैतों के मध्य धूमावती के ये दो चित्र अर्थात भिखारिन विधवा और  सर्वांग सुंदरी कमनीय युवती भी एक ऐसी ही परिघटना का उदाहरण है । 

देवी धूमावती तंत्र साहित्य में कई जगह पूर्ण श्रृंगार में युवती के रूप में चित्रित होती है तो कई जगह विधवा के रूप में चित्रित की जाती है । वृन्द देवी तुलसी की तरह इनके भी कुमारी, विवाहित और विधवा रूप की परिकल्पना का आधार शुद्ध मातृअधिकारात्मक क़बीले से देवी का जुड़ा होना ही है। यहां हम स्पष्ट रूप से ऋग्वेद में की गई स्तुति का स्मरण कर सकते हैं जिसमें स्त्री को यह निर्देश दिया गया है कि ‘तू पति को मरने वाली न बन ‘ एवं ‘तेरी दस संताने हो और अंतिम संतान के रूप में अपने पति को मान्यता दे।’

**

*महाविद्या समूह की देवियाँ*

1⃣काली ,
2⃣तारा ,
3⃣त्रिपुर सुंदरी ,
4⃣भुवनेश्वरी ,
5⃣छिन्नमस्ता ,
6⃣त्रिपुर भैरवी ,
7⃣धूमावती ,
8⃣बगलामुखी ,
9⃣मातंगी

*देवी मातंगी*

देवी मातंगी जैसा कि नाम से आभास होता है मातंग अर्थात हाथी टोटेम से सम्बंधित देवी लगती है । मातंगी को सामान्यतः युवा- सुन्दर स्त्री के रूप में लाल वस्त्रों से सुसज्जित श्यामवर्णी स्त्री के रूप में चित्रित किया जाता है । तंत्र साहित्य में इन्हें शव पर आरूढ़ और एक हाथ में तलवार एवं दूसरे में कपाल – पात्र धारण किये चित्रित किया जाता है ।

मातंगी के साथ सामान्यतः एक तोते को भी चित्रित किया जाता है और मातंगी की आराधना में  उच्छिष्ट (वह खाद्य पदार्थ, जो किसी के भोजन करने के बाद उसके आगे बच गया हो ) अन्न का प्रयोग किया जाता है ।

*बौद्ध साहित्य* की रचना दिव्यवंदना / दिव्यावदान जिसका संग्रहण द्वितीय शताब्दी के आस -पास किया गया था में मातंगी की कथा इस  प्रकार है । मातंग एक शिकारी क़बीले का राजा था एवं मातंगी उसकी पुत्री थी । गौतम बुद्ध का एक शिष्य आनंद जो भिक्षाटन के लिए निकलता है उसे मार्ग में प्यास लगती है और वह कुँए के पास जाकर वहां पानी ले रही मातंगी से जल की याचना करता है । 

मातंगी उसके वेश से पहचान लेती है कि वह *बौद्ध भिक्षु* हैं  एवं उत्तर देती है कि मेरा नाम प्रकृति है एवं मैं चांडाल (जो एक निम्न जाति मानी जाती थी ) कन्या हूँ एवं राजा मातंग की पुत्री हूँ , फिर भी क्या आप मेरे हाथ  जल ग्रहण करना पसंद करेंगे ? आनंद उत्तर देते हैं कि मैंने आपकी जाति नहीं पूछी वरन  आप से जल की याचना की है ।

मातंगी इस उत्तर से प्रभावित होती है एवं आनंद को पति रूप में पाने की कामना करती है।  आनंद वापस मठ में लौट जाता है एवं मातंगी अपने गृह की ओर प्रस्थान करती है। आनंद की कामना में डूबी मातंगी अपनी माता महाविद्याधरी जो अलौकिक शक्तियों से सम्पन्न जादूगरनी है से याचना  करती है की वह मन्त्रों द्वारा आनंद को उससे मिलन हेतु उपलब्ध करा दे ।

 अब वहां का स्थानीय राजा बुद्ध का अनुयायी है एवं नायक आनंद बुद्ध का शिष्य अर्थात आनंद को मातंगी हेतु उपलब्ध करने का अर्थ है राजकोप और बुद्ध के प्रभाव का एक साथ भय होना,  उसकी माता महाविद्याधरी  पहले तो मातंगी को समझाने का प्रयत्न करती है कि यह सम्भव नहीं है किन्तु मातंगी के तीव्र प्रतिरोध एवं आत्महत्या की चेतावनी के बाद महाविद्याधरी आनंद पर अपनी जादुई शक्ति का प्रयोग करने को तैयार होती है । 

महाविद्याधरी पुत्री की ज़िद से पराजित हो कर रात्रि बेला में मंत्रजाप आरम्भ करती है , उसके मन्त्रों के प्रभाव से आनंद मठ में प्रभावित होने लगता है, उसे प्रकृति का सौंदर्य उसका लावण्य अपनी ओर खींचने लगता है, वह विचलित हो जाता है एवं मठ से पलायन कर प्रकृति के घर की ओर प्रस्थान करता है । मंत्रमुग्ध सी स्थिति में आनंद को अपने घर की ओर आता देख महाविद्याधरी अपनी पुत्री  को अभिसार हेतु शय्या तैयार करने का आदेश देती है ।

अनुष्ठान के स्थान से कुछ दूर पर आनंद रुक जाता है, उसका मोह टूटता है एवं वह मन ही मन बुद्ध से प्रार्थना करता है कि वे इस माया के प्रभाव से उसे मुक्त कर दें। बुद्ध जो अंतर्यामी है अपने योगबल से आनंद को यह माया खंडित करके लौट आने  सामर्थ्य प्रदान करते हैं । आनंद लौट जाता है ।

क्रोध , क्षोभ और उद्दाम प्रेम में बंधी प्रकृति को जब यह ज्ञात होता है वह बुद्ध के पास जाकर उनसे कहती है कि वह आनंद से प्रेम करती है एवं आनंद से विवाह करने की इच्छा से यहाँ आई है , अतएव आप (बुद्ध )  अपने प्रभाव से मुक्त करके आनंद को मुझे सौंप दें, उसके सामीप्य के बगैर जीवन की कल्पना मेरे लिए सम्भव नहीं ।   

बुद्ध कहते हैं कि अगर तुम आनंद के सामीप्य की इच्छा रखती हो तब इसका एक मात्र मार्ग है कि तुम खुद भिक्षुणी बनकर दीक्षा ले लो । आनंद के प्रेम में आकंठ डूबी मातंगी बुद्ध के इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेती है, एवं  दीक्षा लेकर मठ में भिक्षुणी बनकर रहने लगती है, तत्पश्चात बुद्ध उसे उसके और आनंद के मध्य के आकर्षण का कारण बताते हैं।

बुद्ध कहते हैं पुरातन काल में त्रिशंकु  नामक  हाथी – शिकारियों  के क़बीले का एक राजा (मातंग राजा ) हुआ करता था । उसका एक पुत्र था जिसका नाम शार्दूलकर्ण था, त्रिशंकु उसके विवाह हेतु योग्य कन्या की तलाश  करता है इसी क्रम में उसके कानों में एक  ब्राह्मण कन्या प्रकृति के रूप – गुण की चर्चा पहुचंती है, राजा अपनी तरफ से विवाह प्रस्ताव लेकर प्रकृति के पिता के समक्ष उपस्थित होता है । अब कन्या का पिता जो ब्राह्मण है इस विवाह से इंकार कर देता है , त्रिशंकु तर्क करता है एवं अपनी प्रज्ञा से ब्राह्मण देव को परास्त कर देता है इस प्रकार प्रकृति का विवाह  शार्दूलकर्ण  से हो जाता है।

बुद्ध आनंद को सम्बोधित करके कहते हैं कि वह शार्दूलकर्ण और कोई नहीं बल्कि तुम ही हो और तुम्हारी पूर्व – जन्म की विवाहिता पत्नी यही प्रकृति है और मैं स्वयं वह शिकारी राजा हूँ ।

इस कथा से कई रोचक सूत्र प्राप्त होते हैं।  *हिन्दू वांग्मय* में भी महाविद्या देवी मातंगी को बहुधा ऋषि मातंग अथवा राजा मातंग की पुत्री बताया जाता है, एवं जैसा कि हम देख सकते हैं इस कथा में स्पष्ट उल्लेख है कि मातंगी अथवा प्रकृति चांडाल जाति की कन्या है जो प्राचीन भारतीय वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत *शूद्र* में गिने जाते हैं ।

दूसरा महत्वपूर्ण तथ्य है मातंगी की माता का जादुई -अनुष्ठान में निपुण होना जो हमें पुनः जादू की क्रिया में निपुण महिला –पुजारिनों का स्मरण कराता है एवं मातंगी का मुक्त प्रेम निवेदन करना भी न्यूनाधिक हमें महाविद्या संप्रदाय की अनेक देवियों के अनुयायियों में प्रचलित मुक्त – यौन दर्शन का स्मरण कराता ही  है।

तंत्र में भी मातंगी के जन्म की कई कथाएं हैं । उदाहरणार्थ शक्ति -संगम तंत्र के अनुसार मातंगी के जन्म का विवरण इस प्रकार है ।  एक समय की बात है कि विष्णु एवं लक्ष्मी , शिव एवं पार्वती से भेंट करने कैलाश में उपस्थित होते हैं ।   विष्णु एवं लक्ष्मी उपहार स्वरुप शिव एवं उनकी पत्नी को खाद्य – सामग्री भेंट करते हैं जिसमें से कुछ भाग पृथ्वी पर गिर जाता है, उस गिरे हुए अन्न से एक सुंदरी का जन्म होता है एवं वह सुंदरी उस भूमि पर गिरे हुए अन्न की मांग करती है , उसे देखकर शिव कहते हैं देवी आपको ‘उच्छिष्ट मातंगी’ के नाम से जाना जायेगा एवं आपकी पूजा में उच्छिष्ट अन्न का भोग लगेगा।

प्राणतोषिणी तंत्र की कथा के अनुसार पार्वती शिव से अपने पिता पर्वत राज हिमवान के घर जाने की आज्ञा मांगती है । शिव इस ताकीद के साथ कि वह शीघ्र -अति -शीघ्र लौट आएँगी, एवं अगर वे कुछ दिनों में नहीं लौटीं तो वे खुद उसे लेने जायेंगे, पार्वती को बेमन से जाने की आज्ञा दे देते हैं । पार्वती पिता – गृह से लौटने में विलम्ब  करती हैं, विरह में अकुलाये शिव आभूषण – विक्रेता का रूप धारण करके पर्वतराज के यहाँ आभूषण बेचने पहुंच जाते हैं ।  पार्वती के चरित्र को लेकर उनके मन में संदेह होता है एवं उनकी जाँच के लिए वे आभूषण के मूल्य स्वरुप पार्वती से अभिसार की इच्छा का प्रदर्शन करते हैं । पार्वती क्रोधित होकर उन्हें शापित करने को तत्पर होती है परन्तु अपनी योगविद्या से पार्वती यह जान लेती है कि आभूषण – विक्रेता कोई और नहीं उनके पति शिव है । वे मन ही मन मुस्कुराती हैं एवं कहती है ठीक है इन आभूषणों के एवज में आपको अपना विक्रय – मूल्य अवश्य प्राप्त होगा परन्तु अभी नहीं आप जाएँ मैं स्वयं आके पास आउंगी ।

तत्पश्चात  एक दिन संध्याकाल के समय पार्वती चांडाल कन्या का रूप बनाकर शिव के समक्ष उस समय उपस्थित होती है जब वे संध्या वंदन कर रहे होते हैं ।  पार्वती स्वयं को शिव को प्रस्तुत करती हैं एवं पार्वती को पहचान कर शिव अभिसार हेतु  खुद को चांडाल – पुरुष के वेश में सुसज्जित कर लेते हैं । वे दोनों अभिसाररत होते हैं, प्रणय –  क्रीड़ा की अवधि  समाप्त होने के पश्चात शिव कहते हैं शिवा (पार्वती) चूँकि तुमने मुझसे चांडाल स्त्री के रूप में सम्भोग किया तुम्हारा यह रूप उच्छिष्ट चण्डालिनी के नाम से प्रसिद्द होगा एवं तुम्हारी आराधना की विशिष्ट विधि में मुक्त – यौन आनंद का समावेश होगा। 

मातंगी की पूजा में कई अशुद्ध वस्तुओं का समावेश किया जाता है। उदाहरणार्थ प्रथम तो उच्छिष्ट अन्न, द्वितीय मातंगी तंत्र में मुख्यतः यौन – आकर्षण की देवी मानी जाती है अर्थात *अगर कोई मनुष्य मातंगी की पूजा अगर किसी का आकर्षण पाने हेतु कर रहा है तब उसके लिए यह आवश्यक है कि मासिक धर्म के रक्त से सने वस्त्र का एक टुकड़ा वह देवी की आराधना में अर्पित करे* ।

द्वितीय जैसा कि उसके जन्म की अन्य कथाओं से प्रमाणित होता है वह कहीं न कहीं अस्पृश्य कही जाने वाली जातियों से सम्बंधित है । इसी क्रम में नेपाल के मातंगी संप्रदाय का उदाहरण लें तो यह सम्प्रदाय शौचालय की सफाई और प्रसव उपरांत मानवीय – अपशिष्ट की सफाई के लिए सामाजिक  मान्यता प्राप्त संप्रदाय माना जाता है ।

*अर्थात यह तो तय है कि मातंगी तथाकथित निचली जातियों के संप्रदाय में पूजित देवी है।*

एक अन्य निष्कर्ष जो मातंगी की अनेक कथाओं के अध्ययन से हमें प्राप्त होता है वह ‘निषिद्ध यौनक्रिया ‘ की देवी मान्यता का मातंगी से जुड़ा होना है । इसी सन्दर्भ में एक और रोचक तथ्य का उल्लेख आवश्यक लगता है।  

जहाँ मातंगी , मातंग (हाथी ) से आबद्ध है , वहीं गणपति का सर ही हाथी का है, इस प्रकार गणपति और  मातंगी के मध्य एक सूत्र तो हमें प्राप्त होता ही है।

उच्छिष्ट गणपति के विशेष रूप को अगर अल्प समय के लिए विस्मृत भी कर दें तब भी गणपति के चरित्र को लेकर हमारे पास कई रोचक विरोधाभासी व्याख्याएं उपलब्ध हैं। उदाहरण के लिए याञवल्क्य संहिता में गणपति को रोचक रूप से विघ्नहर्ता नहीं वरन विघ्न – निर्माता बताया गया है, याञवल्क्य लिखते हैं कि गणपति से आक्रांत व्यक्ति को दु:स्वप्न आते हैं कि वह अथाह जलराशि में डूब रहा है , लाल कपडे पहने सर मुंडे लोगों के मध्य फंसा हुआ है, मांसाहारी पशुओं पर आरूढ़ है , शत्रुओं को भगाने का उपक्रम करता है परन्तु असफल होता है । व्यक्ति की एकाग्रता भंग हो जाती है उसे किसी कार्य में सफलता नहीं प्राप्त होती एवं अगर वह राजकुमार भी हो तब भी राज्य सुख से वंचित हो जाता है।

मनुस्मृति में मनु (iii 167 ) आदेश देते हैं कि जो लोग गणयज्ञ करते हैं उन्हें अन्येष्टि में शामिल न होने दिया जाये, ध्यातव्य है कि भाष्यकार गोविन्दराज ‘गणयज्ञ ‘ को गणपति के अनुयायियों का यज्ञ चिन्हित करते हैं । यह स्पष्ट है कि कालांतर में परिवर्तित गणपति का विघ्नविनाशक रूप  आरम्भ में वैदिक वांग्मय में मान्यता प्राप्त नहीं था, इस प्रसंग की बृहद्तर व्याख्या डी पी चट्टोपाध्याय के ग्रथ ‘लोकायत ‘ में गणपति के अध्याय के अंतर्गत की गई है ।

आगे के पाठ में लेखक कहते हैं कि मनु के  एक श्लोक में गणपति शूद्रों  और दलितों का देवता घोषित करते हैं अतएव गणयज्ञ के प्रति उनका विद्वेष युक्तिसंगत ही है । इस चर्चा का उद्देश्य केवल इतना ही है कि

*हम उपरोक्त प्रमाणों से इस निष्कर्ष पर पहुँचते ही हैं कि मातंगी के साथ जिस उच्छिष्ट गणपति का प्रसंग आता है वह वस्तुतः शूद्र अथवा दलित वर्ग के संप्रदाय का ही कोई योद्धा है।  

छान्दोग्य उपनिषद में ‘इभ्य’ नामक ग्राम का उल्लेख प्राप्त होता है जिसमें ‘इभ्य ‘ जाति के लोगों का वास होता था. ‘इभ ‘ शब्द का अर्थ हाथी ही होता है प्रकारांतर से ‘इभ्य‘ का अर्थ हुआ ‘हाथी के वंशज’ । कहना न होगा यह हमारी टोटेम सबंधी उस व्याख्या को बल ही देता है जिसके अनुसार प्रारम्भ में हर संप्रदाय स्वयं को किसी पशु -पक्षी अथवा अन्य प्राकृतिक वस्तु से उत्पन्न समझता था ।

गणपति के जन्म के साथ ही एक प्रकार की अपवित्रता और रहस्य उनसे संबद्ध हो जाता  है, जैसे प्रथम तो उनका  देवी के शरीर की अशुद्धि से निर्मित होना अर्थात जन्म से ही अपवित्रता की परिकल्पना गणेश से आबद्ध हो जाती है तो जब मनु उन्हें शूद्रों का अधिनायक घोषित  करते हैं तब आश्चर्य नहीं होता । दूसरा उनका जन्म बिना किसी पुरुष से सहयोग के होता है यह इसी और इंगित करता है कि गणपति के समुदाय में पुरुष का महत्व इतना अधिक नहीं रहा होगा कि उसके उल्लेख को मान्यता दी जाये ,  वे लोग स्पष्टतः  मातृसत्तात्मक रहे होंगे ।

महाभारत के अनुशासन पर्व में गणेश्वरों और विनायकों के सन्दर्भ में बहुवचन का प्रयोग किया गया है जो यह स्पष्ट दर्शाता है कि गणेश का न सिर्फ जन्म अपितु देव परिवार में स्थापन भी काम रहस्यमयी नहीं है । ‘तैत्तरीय संहिता’ आभास देती है कि सभी गणपतियों की मुखाकृति एक सी नहीं थी वे अलग पशुओं के मुख से साम्य रखते थे (iv 1. 2. 2 ). वहीं तांत्रिक पुस्तकों में गणेश के लिए वर्णित  50 नामों में वृषकेतन (बैल )एवं द्विजिह्वा (सर्प )जैसे सम्बोधन भी हैं, जो न्यूनाधिक रूप से यह पुष्टि करते हैं कि गणेश का चरित्र अर्धसभ्य आदिवासी सम्प्रदायों के नायक का ही था जिसे बाद में विघ्नविनाशक के रूप में परिवर्तित करके शिव- परिवार में जोड़ दिया गया ।  हम कह सकते हैं कि हस्तिमुख गणपति का सम्प्रदाय जिन्होंने मूषक क़बीले को पराजित किया कालांतर में  शक्तिशाली गणपति के रूप में उभरे होंगे और उनकी अनदेखी करना सम्भव न होने के कारण उन्हें वैदिक साहित्य में ‘विध्नहर्ता ‘ की सम्मानजनक स्थिति देने की विवशता उपस्थित हुई होगी ।

कहना न  होगा मातंगी के साथ मातंगी का यह सम्मिलन मुख्यतः आदिम आदिवासी समाज के मुख्य यौन – आचरण और गणों में मान्यता प्राप्त स्त्री- अधिकार के दर्शन का ही परिणाम है, बाद में जहाँ मातंगी को महाविद्याओं में सम्मिलित कर लिया जाता है वहीं गणेश शिव परिवार में शामिल   कर लिए जाते हैं , परन्तु इसके उपरांत भी दोनों के अस्तित्व से जुड़ा ‘अशुद्धता ‘ का अवयव एकदम से अलग करना सम्भव नहीं हो पाता है । तंत्रसार में उल्लेख हैं कि  रात्रि के समय श्मशान में मातंगी को दुग्ध , पके हुए चावल , मछली और मांस का भोग लगाने से साधक को बृहस्पति के समान काव्य -कुशलता प्राप्त होती है । यह मान्यता बुद्धि एवं तर्क से मातंगी के संप्रदाय के आकर्षण को दर्शाता है, जिसका अनुमोदन गणेश का बुद्धि – सिद्दी से जुड़ा होना एवं बुद्ध का मतंग – राज द्वारा ब्राह्मण को तर्क में पराजित करने से भी होता है .

शरद कोकास द्वारा प्रस्तुत

Related posts

सत्येन्द्र कुमार की कविता : मैं अपने देश को कहां ढूंढू …

News Desk

आज : भोपाल जनउत्सव ,इसलिए कि जो है उससे बेहतर चाहिए* (संदर्भ मुक्तिबोध जन्मशति) : वक्ता-नरेश सक्सेना, राजेश जोशी, शुभा, संजीव कौशल, आरती

News Desk

रायपुर : गुफ्तगू :ब यादगारे कामरेड अकबर उर्दू हिंदी की साझी विरासत के अलम्बरदार -प्रेमचंद

News Desk