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महात्मा गांधी और अब्राहम लिंकन की तरह ही मार्टिन लूथर किंग जूनियर को 51 साल पहले आज ही के दिन गोली मार दी गई थी.

मार्टिन लूथर किंग जूनियर को 51 साल पहले आज ही के दिन गोली मार दी गई थी। ठीक उन्हीं कारणों से जिनकी वजह से उनसे पहले महात्मा गांधी और अब्राहम लिंकन जैसों की हत्या की गई थी।

गोतम बंदोपाध्याय द्वारा प्रस्तुत

अपनी आत्मकथा में मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने लिखा है.

“ज्यादातर लोगों की तरह मैंने भी गांधी के बारे में सुना जरूर था, लेकिन उन्हें गंभीरता से पढ़ा नहीं था। जैसे-जैसे मैं उन्हें पढ़ता गया, वैसे-वैसे उनके अहिंसक प्रतिरोध के अभियानों के प्रति मैं अत्यधिक मंत्रमुग्ध सा होता गया।

…खासतौर पर मैं समुद्र तक उनके नमक मार्च (दांडी मार्च) और उनके अनगिनत उपवासों से बहुत अधिक प्रेरित हुआ।

…सत्याग्रह की पूरी अवधारणा ही मेरे लिए बहुत मायने रखती थी। इसमें “सत्य” का मतलब है प्रेम और “आग्रह” का अर्थ है बल। इस तरह सत्याग्रह का अर्थ है सत्य का बल या प्रेम का बल।

…जैसे-जैसे मैं गांधी के दर्शन में गहरे उतरता गया, प्रेम की शक्ति के बारे में मेरे संदेह भी धीरे-धीरे छंटते गए। और पहली बार सामाजिक सुधार के क्षेत्र में इसकी ताकत मुझे देखने में आई।”

…गांधी को पढ़ने से पहले मैं लगभग इस निष्कर्ष पर पर पहुंच चुका था कि ईसा मसीह द्वारा बताई गई प्रेम की नीति केवल व्यक्तिगत संबंधों में ही प्रभावी हो सकती है, सामाजिक संबंधों में नहीं।

…मुझे लगता था कि “दूसरा गाल आगे कर देने” या ‘अपने शत्रुओं से प्रेम करने’ वाला दर्शन केवल व्यक्ति-व्यक्ति के बीच होने वाले संघर्षों की स्थिति में ही लागू होता है। प्रजातीय समूहों या राष्ट्रों के बीच संघर्ष की स्थिति में मुझे एक ज्यादा यथार्थवादी दृष्टिकोण जरूरत महसूस होती थी। लेकिन गांधी को पढ़ने के बाद मैंने देखा कि मैं कितना गलत सोचता था…।

…गांधी संभवतः इतिहास के ऐसे पहले शख्स होंगे जिन्होंने ईसा मसीह के प्रेम की नीति को महज व्यक्तियों के बीच की नीति से ऊपर उठाकर बड़े पैमाने पर एक शक्तिशाली और प्रभावी सामाजिक बल के रूप में स्थापित कर दिया।

…प्रेम गांधी के लिए सामाजिक और सामूहिक परिवर्तन का एक शक्तिशाली उपकरण था। प्रेम और अहिंसा पर इस गांधीवादी जोर में ही मैं सामाजिक सुधार का वह तरीका खोज पाया जिसे मैं कब से ढूंढ़ रहा था।

…जो बौद्धिक और नैतिक संतुष्टि मैं बेंथम और मिल के उपयोगितावाद, मार्क्स और लेनिन के क्रांतिकारी पद्धतियों, हॉब्स के सामाजिक अनुबंध सिद्धांत और “प्रकृति की ओर लौटो” वाले रूसो के आशावाद और नीत्शे के सुपरमैन के दर्शन में नहीं पा सका था, वह मुझे गांधी के अहिंसक प्रतिरोध के दर्शन में मिला।

…गांधी को पढ़ने के बाद मैं पूरी तरह आश्वस्त हो गया कि सच्चा शांतिवाद बुराई के प्रति अ-प्रतिरोध (नॉन-रेज़िस्टेंस) नहीं है, बल्कि बुराई के प्रति अहिंसक प्रतिरोध है। इन दोनों तरीकों में जमीन आसमान का फर्क है।

…गांधी ने बुराई का प्रतिकार उतनी ही सख्ती और ताकत से किया है, जितना कि कोई हिंसक प्रतिकार करनेवाला करता, लेकिन उन्होंने घृणा के बजाय प्रेम के साथ प्रतिरोध किया।

…सच्चा शांतिवाद बुराई के प्रति अयथार्थवादी आत्मसमर्पण नहीं है, बल्कि यह प्रेम की शक्ति के जरिए साहस के साथ बुराई का सामना करना है।

…इस विश्वास के साथ कि किसी को हिंसक चोट पहुंचाने से अच्छा है, वह हिंसक चोट स्वयं खा लेना। क्योंकि किसी के ऊपर हिंसा करने से पूरे जगत में हिंसा और कड़वाहट का अस्तित्व कई गुणा बढ़ जाता है, जबकि हिंसाकारी की चोट अपने ऊपर ले लेने से प्रतिपक्षी में शर्म की भावना पैदा हो सकती है, और इससे उसका हृदय-परिवर्तन हो सकता है।”

22 मार्च, 1959 को मांटगोमरी में खासतौर पर गांधी के ऊपर अपने प्रवचन में किंग जूनियर ने कहा था—

“…दुनिया गांधी जैसे लोगों को पसंद नहीं करती। कितना आश्चर्य है, नहीं? वे ईसा मसीह जैसे लोगों को भी पसंद नहीं करते। वे लिंकन जैसे लोगों को भी पसंद नहीं करते। उन्होंने गांधी को मार डाला- उस आदमी को जिसने भारत के लिए सब कुछ किया। …और अब्राहम लिंकन भी तो एकदम उन्हीं कारणों से मार डाले गए जिन कारणों से गांधी को गोली मारी गई।”

तब किसे पता था कि करीब नौ साल बाद 4 अप्रैल, 1968 को खुद किंग जूनियर भी उन्हीं कारणों से मार डाले जाएंगे। हालांकि महज 39 साल जितनी कम उम्र में ही मरकर भी वे हमेशा के लिए अमर हो गए।

समाज में अहिंसा और प्रेम फैलाने का प्रयास करनेवाले लोगों का खुद ही हिंसा की भेंट चढ़ जाना एक दुःखद उदाहरण बन जाता है, लेकिन हिंसा, द्वेष, घृणा और अहंकार से ग्रस्त लोग जीवनभर हर क्षण खुद के द्वारा खुद के प्रति की गई हिंसा का शिकार होते रहते हैं।

यह मदांधता उन्हें भीतर-ही-भीतर घुन की तरह खाती जाती है। भले ही हमेशा नींद और नशे में होने की वजह से उन्हें इसका होश न रहता हो।

घनघोर राजनीतिक द्वेष के वातावरण में अपनी संवेदनाओं को बटोरकर जरा चारों ओर देखें कि हम दिन-प्रतिदिन किस प्रकार कायिक, वाचिक और मानसिक स्तर पर हिंस्र से हिंस्रतर होते जा रहे हैं। और यह भी सोचें कि इसके तात्कालिक और दूरगामी परिणाम क्या होनेवाले हैं।

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