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भोपाल गैस त्रासदी के प्रभावितों पर हो रहा कोविड-19 का ज्यादा असर मरने वाले 14 में 12 हैं गैस काण्ड के पीड़ित

डाउन टू अर्थ में प्रकाशित मनीष चन्द्र मिश्रा की रिपोर्ट

भोपाल : गैस त्रासदी के प्रभावितों पर हो रहा कोविड-19 का ज्यादा असर मरने वाले 14 में से 12 हैं गैस काण्ड के पीड़ित

भोपाल में कोविड-19 से मरने वाले लोगों के सम्बन्ध में डाउन टू अर्थ ने एक महत्वपूर्ण तथ्य उजागर किया है. वो ये कि मरने वाले इन 4 लोगों में से 12 लोग भोपाल गैस काण्ड के प्रभावित लोग हैं.

मरीजों की मेडिकल हिस्ट्री बताती हैं कि ये गैस पीड़ित होने की वजह से पहले से ही किडनी, दिल और फेफड़े की समस्याओं से ग्रस्त थे.

भोपाल में गैस पीड़ितों के कोविड-19 से मरने का सिलसिला थम ही नहीं रहा है। 30 अप्रैल तक कोविड से मरने वाले 14 मरीजों में 12 गैस पीड़ित हैं। हालांकि, प्रशासन ने सिर्फ एक मरीज की मेडिकल हिस्ट्री गैस पीड़ित के तौर पर जाहिर की, लेकिन इन मरीजों के दस्तावेजों के आधार पर यह पुष्ट होता है कि वे गैस पीड़ित थे।

डाउन टू अर्थ ने लिखा है कि उसके पास इन सभी लोगो के स्वास्थय सम्बन्धी दस्तावेज़ मौजूद हैं जिनसे पता चलता है कि  इनमें से अधिकतर को फेफड़े, दिल और किडनी की गंभीर समस्याएं थी। 6 मरीजों को डायबिटीज और उच्च रक्तचाप की समस्या थी, तीन को फेफड़ों में समस्या और एक को टीबी और एक मरीज को कैंसर की समस्या थी। इनमें से एक मरीज यूनुस (60) को कोविड-19 के संक्रमण के अलावा पहले से कोई गंभीर बीमारी नहीं थी। उम्र के आंकड़ों को देखें तो 95 प्रतिशत मरीज 55 वर्ष के ऊपर थे। इनमें से आठ  मरीज  यूनियन कार्बाइड की  फैक्ट्री (जहां 1984 में गैस हादसा हुआ था) से तीन किलोमीटर से कम के दायरे में और चार  मरीज  चार किलोमीटर से कम के दायरे में रहते थे। इससे भी उनके गैस पीड़ित होने की पुष्टि होती है।

गैस पीड़ित महिला स्टेशनरी कर्मचारी संघ की राशिदा बी कहती हैं  कि इतनी मौतों के बाद भी केंद्र और राज्य सरकार की तरफ से कोई कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। राशिदा बी के संगठन ने तीन अन्य संगठन चिल्ड्रेन एगेंस्ट डाव-कार्बाइड, गैस पीड़ित महिला-पुरुष संघर्ष मोर्चा और भोपाल ग्रुप ऑफ इंफॉर्मेशन एंड एक्शन (बीजीआईए) के साथ मिलकर सुप्रीम कोर्ट की निगरानी समिति को पत्र लिखा है। इस पत्र में पीड़ितों के इलाज की अच्छी व्यवस्था न होने के आरोप लगाए गए हैं। बीजीआईए की रचना ढींगरा का कहना है कि हमने मरीजों की मृत्यु के बाद उनकी मेडिकल हिस्ट्री के साथ पुख्ता सुझाव केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय, भारतीय आयुर्विज्ञान शोध परिषद (आईसीएमआर), मध्यप्रदेश के स्वास्थ्य आयुक्त और कलेक्टर भोपाल को भेजे थे, लेकिन उस पर अभी तक कोई जवाब नहीं आया।

सुप्रीम कोर्ट के द्वारा नियुक्त निगरानी समिति ने संगठनों के द्वारा भेजे गए पत्र का संज्ञान लिया है। निगरानी समिति के अध्यक्ष जस्टिस वीके अग्रवाल ने राज्य सरकार को लिखा है कि यह बात कहने की जरूरत नहीं कि बड़ी संख्या में गैस पीड़ित फेफड़े, दिल और किडनी की गंभीर बीमारी के साथ अस्थमा, कैंसर और डायबिटीज जैसी बीमारियों के शिकार हैं। उन पर कोविड-19 का भी अधिक खतरा है। जस्टिस अग्रवाल ने आगे लिखा,  “समाचार और पीड़ितों के पत्र से मेरी जानकारी में आया है कि बीते दिनों हुई कोविड-19 की मृत्यु में गैस पीड़ित शामिल हैं। इससे यह दिखता है कि पीड़ित को खतरा अधिक है। सभी गैस पीड़ितों की कोविड-19 जांच होनी चाहिए और उन्हें बिना किसी कोताही के इलाज मिलना चाहिए।“ जस्टिस अग्रवाल ने भोपाल स्थित राष्ट्रीय पर्यावर्णीय स्वास्थ्य अनुसंधान संस्थान को सलाह दी कि वे अपनी जानकारियों का इस्तेमाल जांच और इलाज के काम में सक्रिय होकर करें। 

सुप्रीम कोर्ट की निगरानी समिति के सदस्य पूर्णेंदु शुक्ल ने डाउन टू अर्थ  से कहा कि जबलपुर हाईकोर्ट ने हाल ही में सरकार को अस्पताल आने वाले गैस पीड़ितों की कोविड-19 जांच के आदेश दिए थे, लेकिन अभी तक कोर्ट को अस्पताल या सरकार ने अपनी रिपोर्ट नहीं दी है। वह कहते हैं कि जांच का काम ठीक से नहीं हो रहा है। डाउन टू अर्थ  ने इस मामले पर सरकार का पक्ष जानने के लिए स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख सचिव, आयुक्त, भोपाल के कलेक्टर और मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी को अपने सवाल ईमेल किए हैं। खबर लिखने तक उनका जवाब नहीं आया था। 

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