कला साहित्य एवं संस्कृति

भीष्म साहनी   ःः आज के अतीत : सहजता का सौंदर्य

29.01.2019

अजय चंन्द्रवंशी 

भीष्म साहनी जी बीसवीं शताब्दी के हिंदी के महत्वपूर्ण कथाकार और उपन्यासकार हैं. उनकी कहानियां, उपन्यास और नाटक अपने समय और समाज के विसंगतियों, विडम्बनाओं को और साथ ही मानवता पर उनके दृढ़ विश्वास को उभारती हैं. ‘नयी कहानी’ के दौर के कथाकारों में उनकी अपनी एक अलग पहचान और शैली रही है. उनकी रचनाओं में एक ‘सहजता’ है; जहां ‘बड़ी-बड़ी’ बातें भी कथानक में घुल-मिलकर, बिना किसी अतरिक्त ‘प्रयास’ के पाठकों तक पहुंच जाती है. इस माने वे प्रेमचन्द की परंपरा से स्वाभविक जुड़ जाते हैं. यह ‘सहजता’ और ‘सरलता’ उनके व्यक्तिव में भी रही है. कुछ लोगों के लिए जीवन मे यदि ‘नाटकीयता’ या तीव्र विरोधाभास न हो तो वैसा जीवन उन्हें ‘साधारण’ लगता है, इसमे उन्हें जानने लायक कुछ भी नही लगता. उनका अवचेतन एक तरह से ‘हीरो’ की तलाश करता है, जहां ‘रोमांच’ और ‘चमत्कार’ होते हैं. ऐसे लोग भीष्म साहनी जी की आत्मकथा ‘आज में अतीत’ से निराश हो सकते हैं; क्योकि वहां सब कुछ ‘सामान्य’ है, ‘असाधारण’ कुछ भी नही.

भीष्म साहनी जी उन रचनाकारों में हैं, जिन्होंने स्वतंत्रतापूर्व और पश्चात दोनों दौर को देखा है.स्वतंत्रतापूर्व के औपनिवेशिक शासन, स्वतन्त्रता आंदोलन,भविष्य के सपने, सामाजिक समरसता फिर उसमें क्रमशः बिखराव जिसकी चरम परिणीति देश का विभाजन और साम्प्रदायिक दंगों में हुई,उनकी आंखों के सामने घटित हुए हैं और इनसे उनके जीवन के साथ रचनात्मकता भी प्राभावित हुआ है;जो एक संवेदनशील रचनाकार के लिए स्वाभाविक भी है.देश का विभाजन सम्भवतः उस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी थी, जिसने मानवीयता को तार-तार कर दिया.लाखो लोग अपने घर-बार से वंचित होकर दर-दर भटकने को मजबूर हुए. अविश्वास का माहौल इस कदर था कि कल तक साथ-साथ उठने-बैठने वाले एक-दूसरे से कटने लगे,ऐसे में असामाजिक तत्व अपने रंग में आ जाते हैं, और अमानवीयता का जो नँगा-नाच करते हैं, वह किसी से छुपा नही है.इस त्रासदी ने उस समय के रचनाकारों को उद्वेलित किया और उन्होंने अपनी कलम चलाई.

भीष्म साहनी जी ने भी अपनी कई रचनाओं में उस भयावह माहौल का चित्रण किया है जिसमे ‘अमृतसर आ गया’ और ‘तमस’ प्रमुख है.’तमस’ विभाजन से पहले के देश मे घटित हो रही त्रासदियों का मार्मिक दस्तावेज हैं, जहां साम्प्रदायिकता कैसे मानवता को शर्मशार कर रही थी. यह कृति साहनी जी की पहचान सी बन गयी है.आत्मकथा में उन्होंने इसकी रचना प्रक्रिया के बारे में बताया है. विभाजन के काफी समय बाद 1972 में मुबंई के पास भिवंडी में साम्प्रदायिक दंगे हुए थे,

भीष्म साहनी अपने बड़े भाई बलराज साहनी के साथ उस स्थल के दौरा में गए थे, वहां पहुंचकर उन्होंने फ़साद के बाद के उजड़े मकानों-गलियों को देखा तो विभाजन के दौर के भयावह दृश्य उनके स्मृति में कौंध गए.और वह बेचैनी ‘तमस’ के रूप में सामने आयी. इस कृति में उन्होंने अपने देखे-भोगे अनुभवों का काफी उपयोग किया है. चाहे कांग्रेसी कार्यकर्ता के रूप में उनके अनुभव हो या विभाजन के दौरान लोगों से मिलने के अनुभव, इस कृति में अलग-अलग पात्रों और घटनाओं के रूप में प्रकट हुए हैं. ये सब अनुभव केवल निराश करने वाले नही हैं, वरन इनमे प्रेम, सौहार्द, भाईचारा भी है. यहां यथार्थ के साथ कल्पना का मेल सार्थक ढंग से हुआ है.

साहनी जी ने अपने अन्य प्रमुख रचनाओं की रचना प्रक्रिया का जिक्र करते हुए यथार्थवाद के बारे में अपने विचार प्रकट किएँ हैं.उनके अनुसार रचनात्मक कृति में कल्पना यथार्थ को कमजोर ही नही करता वरन उसके प्रकटीकरण में सहायक भी होता है, और रचना के विकास में मदद करता है. जाहिर है उनका इशारा ‘रचनात्मक कल्पना’ की तरफ है.
भीष्म जी का जन्म 1915 में रावलपिंडी(अब पाकिस्तान) में हुआ था. उनके पिताजी कपड़े के व्यवसायी थे. वे आर्य समाज के अनुयायी थे,तदनुरूप घर का वातावरण था;एक परंपरागत हिन्दू परिवार की तरह का सा माहौल. भीष्म जी दुबले-पतले सामान्य बच्चे थे, किसी भी दृष्टि से ‘प्रतिभाशाली’ नही थे.

उनके बड़े भाई बलराज साहनी(प्रसिद्ध अभिनेता) उनके मुकाबले काफी प्रतिभाशाली थें.अक्सर लोग उनसे भीष्म जी की तुलना करते और निराश होते थे. भीष्म जी लिखते भी हैं वे बलराज जी के व्यक्तित्व के नीचे दब से जाते थे.उनके अंदर एक हीनताबोध सी पैदा हो रही थी, वे अपना निर्णय नही ले पाते थे, महज उनके अनुगामी बन गए थे.वे आगे लिखते हैं “यह श्रद्धाभाव मेरे स्वभाव का ऐसा अंग बना कि धीरे-धीरे हर हुनरमंद व्यक्ति को अपने से बहुत ऊँचा, और स्वयं को बहुत नगण्य और छोटा समझने लगा”.लेकिन यह सब अनजाने में घटित हो रहा था, बलराज जी उनसे बहुत स्नेह करते थे,हाँ उनके अंदर ‘बड़ा भाई ‘ होने का अहसास जरूर था, जो बचपन के स्वाभाविक वृत्तियों में होता है.

भीष्म जी ने कॉलेज की पढ़ाई लाहौर में की; वहां उन्होंने एक नए परिवेश को देखा, जहां अंग्रेजियत की छाप थी और ‘आधुनिक’ जीवनशैली दिखाई दे रही थी.यहां उनकी साहित्यिक अभिरुचि बढ़ रही थी और वे नाट्यमण्डलियों से जुड़ने लगे थें. एम. ए. करने के बाद जब वे रावलपिंडी लौटें तो पिता का व्यवसाय बलराज जी देख रहें थें. मगर उनके अंदर भी एक रचनात्मक छटपटाहट थी, जो उन्हें खींच रही थी, अंततः वे अपने राह चले भी गए. अब व्यवसाय का जिम्मा भीष्म जी के ऊपर आ गया. इसे उन्होंने निभाने की कोशिश की मगर एक तो उनके व्यवसाय का झूंठ-फरेब, भ्रष्टाचार, निर्लज्जता, जिसे सफलता के लिए जरूरी माना जाता है, उनसे हो नही पा रहा था और दूसरी उनके अंदर भी रचनात्मक बेचैनी थी, जो उन्हें खींच रही थी.कई कटु अनुभवों के बाद वे उससे हटने लगें. इसी समय वे ‘इप्टा’ से जुड़े और रावलपिंडी के कॉलेज में ऑनरेरी अध्यापन का कार्य मिलने से उन्हें राहत मिली.

शीला जी से उनका विवाह 1944 में हुआ. इस सम्बंध में वे लिखते हैं “शीला के साथ मेरा विवाह हुआ. विवाह से पहले हमारे बीच कोई रोमांस रहा हो, कोई प्रेमालाप, कोई चिट्ठी-पत्री, ऐसा कुछ भी नही रहा. …..कारण मैं कुछ ज्यादा ही संकोची स्वभाव का था”. शीला जी और उनका दाम्पत्य एक उदाहरण है जहां प्रेम, सहयोग, समर्पण ,त्याग जीवन के संघर्षों में मदद करते हैं. शीला जी ने कई बार भीष्म जी के इच्छानुसार जीवन के लिए अपनी इच्छाओं से समझौता किया, खासकर चित्रकला सीखने की उनकी इच्छा पूरी नही हो पायी. गृहस्थी में सहयोग के लिए उन्होंने आकाशवाणी में उद्घोषिका की नौकरी भी की.इसी दौरान भीष्म जी कांग्रेस से जुड़े फिर वामपंथ के असर में भी आए.

यह आजादी के ठीक पहले का समय था; साम्प्रदायिक तनाव लगातार बढ़ते जा रहे थें, परस्पर अविश्वास बढ़ रहा था, रावलपिंडी चूंकि मुस्लिम बहुल था, हिन्दू-सिख अकेले पड़ते जा रहे थे, लोग शहर छोड़ने लगे थे.विभाजन के समय भीष्म जी दिल्ली में थे, बलराज जी मुम्बई और शीला जी कश्मीर में.पिताजी रावलपिंडी में अकेले रह गए थे, वे काफी मुश्किलों से नवम्बर में वहां से निकल पायें. बाद में पता चला कि जब वे घर से मोटर से निकले तो पहला मोड़ ही काटा था कि घर का ताला तोड़ डाला गया.
दिल्ली में कुछ समय रहने के बाद भीष्म जी बलराज जी के पास मुम्बई चले गयें. इस दौरान वे ‘इप्टा’ से लगातार जुड़े रहें.उन्होंने बंगाल के अकाल से लेकर आगे तक ‘इप्टा’ के जनवादी, साम्राज्यवाद-पूंजीवाद विरोधी कार्यक्रमों की भूरी-भूरी प्रशंसा की है.

1947 में बाद ‘इप्टा’ में नीतियों में आए परिवर्तन की उन्होंने आलोचना भी की है. उनका कहना है कि उस दौरान ‘पार्टीलाइन’ के निर्देशों में अनुरुप उसका मात्र नेहरू विरोध की नीति उचित नही थी; यह एक विषय होना था मगर अन्य व्यापक समस्याओं पर भी पर्याप्त ध्यान दिया जाना चाहिए था.मुम्बई में रहते उन्हें अम्बाला में अध्यापन का अवसर मिला.वहां भी इप्टा की गतिविधियां चलती रही, इसके अलावा वे अध्यापको के संगठन के लिए कार्य किए, यहां भी उन्हें कई अच्छे-बुरे अनुभव मिले, और अंततः इसी कारण उनकी नौकरी चली गई.

भीष्म जी पुनः दिल्ली आ गए और अध्यापन करने लगे.इस दौरान वे दिल्ली के साहित्यिक वातावरण से जुड़ने लगें. वहां करोलबाग में हर इतवार की शाम लेखक बैठते थे, और अपनी-अपनी रचनाएँ सुनाते थे.वे भी इस बैठक में जाने लगें.वहीं उनकी रामकुमार, निर्मल वर्मा, नरेश कुमार शाद, कृष्ण बलदेव वैद, मनोहर श्याम जोशी, जैसे लेखकों से उनकी मुलाकात हुई. इसी दौरान उनका दूसरा कहानी संग्रह ‘पहला पाठ’ 1956 में प्रकाशित हुआ.उनका पहला कहानी संग्रह ‘भाग्यरेखा’ 1953 में प्रकाशित हुआ था.यह ‘नयी कहानी’ आंदोलन का दौर था; मगर भीष्म जी इस प्रकार के किसी ‘आंदोलन’ की जरूरत मससुस नही करते थे; वे अच्छी कहानियों की बात करते थे.मगर वे अपने समय के चुनौतियों से अलग भी नही थे और कहानी में इसके चित्रण को जरूरी मानते थे.’नयी कहानी’ में पात्र के व्यक्तिगत गुण-दोष और उसके आंतरिक भावनाओं-वृत्तियों पर ज्यादा बल दिया जा रहा था जिससे वे असहमत नही थे.दिल्ली से ही कुछ समय शोध के लिए वे बनारस गयें, जहां द्वेदी जी, नामवर जी, विश्वनाथ त्रिपाठी जी का सानिध्य मिला.

1957 से 1963 तक वे मास्को में विदेशी भाषा प्रकाशन गृह में अनुवादक के रूप में कार्यरत रहें. वहां उन्होंने लगभग दो दर्जन रूसी किताबों का हिंदी में अनुवाद किया.उनका मानना है कि वे वहां जिस आकर्षण से गए थे, उस अनुरूप रचनात्मक काम नही कर पाए.लेकिन वहां उन्होंने साम्यवादी रूस, जो उस समय महाशक्ति था और जिसकी समाजवादी व्यवस्था इतिहास की अभूतपूर्व घटना थी, को करीब से देखा.

वे सोवियत रूस के उपलब्धियों से अभिभूत भी होते हैं, और लोगो मे पनप रहे ‘असन्तोष’ का भी जिक्र करते हैं. सोवियत संघ के अंध विरोधियों को इसे पढ़ना चाहिए.शिक्षा की जिम्मेदारी, विज्ञान की उपलब्धि, रोजगार गारंटी, निःशुल्क शिक्षा,समानता का जो उदाहरण उन्होंने आत्मकथा में दिया है वह गौरतलब है. यह व्यवस्था आगे जाकर ‘असफल’ हुई तो इसका भी उन्होंने कारण ढूंढने की कोशिश की है. उनके अनुसार एक तो क्रांति करने वाली पीढ़ी दो महायुद्धों में लगभग शहीद हो गई थी, वह दृढ़ता और त्याग नयीं पीढ़ी में अपेक्षाकृत कम हो रहा था,समान सस्ते तो थे मगर उनकी उपलब्धता पर्याप्त नही होती थी, गांवो में तो और भी कम.पूंजीवादी देशों की तरह उपभोक्ता वस्तुओं में विकल्प नही थे,इस पर पूंजीवादी देशों का दुष्प्रचार, पूंजीवादी देशों के मोर्चाबन्दी से निपटने सैन्य व्यवस्था पर अत्यधिक व्यय,अर्थव्यवस्था और राजनीति का अत्यधिक केन्द्रीयकरण आदि.भीष्म जी के अनुसार ” व्यवस्था ने जनहित के लिए बहुत कुछ किया, लेकिन व्यक्ति की पहलक़दमी को प्रोत्साहित नही किया”. समाजवादी व्यवस्था बिखर गई “लेकिन इससे न तो यह साबित होता है कि पूंजीवादी व्यवस्था आदर्श व्यवस्था है, और न ही यह कि अब दुनिया इसी पूंजीवादी व्यवस्था को अंतिम सत्य मानकर इसे कबूल कर लेगी….इंसान फिर से एक न्यायसंगत व्यवस्था के सपने देखने लगेगा”.

‌ रूस से लौटकर वे स्थायी रूप से दिल्ली में रहने लगें और अध्यापन करने लगें.साहित्यिक वातावरण में ‘नयी कहानी’ का दौर चल ही रहा था.लगभग ढाई वर्ष उन्होंने ‘नयी कहानियाँ’ पत्रिका का संपादन भी किया.इसके बाद भीष्म जी आत्मकथा में अपने चर्चित कृतियों ‘तमस’ ‘,मय्यादास की माड़ी’, ‘हानूश’, ‘माधवी’, ‘कबीरा खड़ा बाजार में’, के रचना प्रक्रिया, उसकी पृष्टभूमि, को बताते हैं, जिनसे इन कृतियों के बारे में एक नयी दृष्टि और जानकारी मिलती है.आगे वे ‘अफ़्रो-एशियाई लेखक संघ’ और ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ के अपने अनुभवों को बताते हैं. अफ़्रो-एशियाई लेखक संघ में रहते उन्होंने तीसरी दुनिया के कई देशों की यात्राएं की और उनके संघर्षों के चिन्हों को देखा. प्रलेस के काफी समय तक पदाधिकारी भी रहें. प्रलेस मार्क्सवाद विचारधारा से प्रभावित संस्था है, इस कारण उस पर यह आरोप अक्सर लगाया जाता रहा है कि वह पार्टी के दिशा-निर्देशों के अनुसार कार्य करती है. मगर भीष्म जी ने दिखाया है कि आरोप राजनीति से प्रेरित अधिक रहे हैं. मार्क्सवाद समाजोन्मुखता और वैज्ञानिकता पर बल देता है जिससे लेखक उसकी ओर आकृष्ट होते हैं; वे स्वयं इसी कारण आकर्षित हुए.वे लिखते हैं कि उनके कार्यकाल में कभी भी उनके ऊपर क्या लिखना है क्या नही लिखना है इस बात को लेकर कभी पार्टी का दबाव नही रहा. मार्क्सवाद पर आस्था रखते हुए भी वे मानते रहे हैं कि “रचना में कथानक का स्वाभाविक विकास हो, कृति ख़ुद बोले, उस पर कुछ भी आरोपित न हो, उसमें से जीवन की सच्चाई झलके”.वैचारिक रूप से भी वे मानवतावादी मूल्यों पर जोर देते हैं, और सर्व-धर्म समभाव की वकालत करते हैं. वे धर्मो के कर्मकांडी पक्ष को छोड़कर उसके मानवतावादी मूल्यों को अपनाने की बात करते हैं.
‌ इस तरह उनकी पूरी आत्मकथा सामान्य आदमी के जीवन की कथा है;जहाँ कमजोरी है, लगाव है, आशंका है, रोजी-रोटी की चिंता है, सुख-दुख है. कहीं पर भी नही लगता कि वे लेखक होने के लिए ही पैदा हुए हैं; हाँ उनमे सृजन की छटपटाहट अवश्य रही है, मगर वह उनके जीवन प्रवाह में स्वाभाविक गति से रहा है; पारिवारिक दायित्वों से भागकर कभी नही.

आत्मकथा में कई मार्मिक प्रसंग भी हैं, जैसे उनके बहन के निधन के दृश्य, बलराज जी के निधन का दृश्य का कई जगह शीला जी की पारिवारिक चिन्ता.भीष्म जी ने कहीं भी अपनी कमजोरियों को छुपाया नही है न ही खुद को महिमामण्डित किया है.इस प्रकार यह आत्मकथा एक सामान्य इंसान के जीवन और सामान्य महत्वाकांक्षाओं की कहानी है जो अपने सिवा थोड़ा दूसरों के लिए भी सोचता हैं, और चाहता है कि यह दुनिया ऐसी हो जहां सब अपनी जिंदगी अच्छे से जी सकें.

 

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‌अजय चन्द्रवंशी
‌ राजा फुलवारी चौक, कवर्धा(छ. ग.)
‌ मो-9893728320

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