नीतियां भृष्टाचार

भाजपा ने आखिरकार इस आम चुनाव को जीता (खरीदा) कैसे ? उत्तम कुमार .

सम्पादक दक्षिण कोसल

सीएमएस (सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज) के रिपोर्ट में किए गए हैरतअंगेज खुलासे के बाद साबित हो गया है कि आखिरकार भाजपा ने 2019 का लोकसभा चुनाव मतदाताओं को रुपयों का लालच देकर जीता। भारत के मतदाताओं ने भ्रष्टाचार के खिलाफ मतदान करते हुए साल 2014 में नरेंद्र मोदी को भारी बहुमत के साथ जीत का सेहरा पहनाते हुए यह उम्मीद की थी कि चुनावी व्यवस्था में परिवर्तन होगा और पारदर्शिता बढ़ेगी। आम चुनाव 2019 के आते-आते ये सारी बातें बेमानी साबित हुई और चुनाव में भ्रष्टाचार काफी बढ़ गया। सात चरणों में हुए इस लोकसभा चुनाव में एक वोट 700 रुपए में खरीदा गया, जबकि पूरे चुनाव में तकरीबन 60 हजार करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। 2019 दुनिया के लोकतांत्रिक इतिहास का सबसे महंगा चुनाव साबित हुआ है। इसमें प्रति लोकसभा सीट पर औसतन 100 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं।

सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज (सीएमएस) ने भारत में 2019 के संसदीय चुनाव को सबसे महंगे होने का अनुमान लगाया है। इस संगठन ने, जो भारत में चुनावों पर नजर रख रहा है और खर्च का आकलन किया है। सीएमएस ने अनुमान लगाया कि 2014 के चुनाव का खर्च 30,000 रुपये आए थे और इस बार यह रकम चुनाव आयोग के द्वारा निर्धारित खर्च से अधिक है। रिपोर्ट में जो आंकड़े दिए गए हैं उसके मुताबिक इस चुनाव में 12 से 15 हजार करोड़ रुपये मतदाताओं पर खर्च किए गए, 20 से 25 हजार करोड़ रुपये विज्ञापन पर खर्च हुए, 5 हजार से 6 हजार करोड़ रुपये लॉजिस्टिक पर खर्च हुए. 10 से 12 हजार करोड़ रुपये औपचारिक खर्च था, जबकि 3 से 6 हजार करोड़ रुपये अन्य मदों पर खर्च हुए। इस रकम को जोडऩे पर 55 से 60 हजार का आंकड़ा आता है।

सीएमएस भ्रष्टाचार पर अपने वार्षिक अध्ययन (इंडिया करप्शन) के लिए भी जाना जाता है। संगठन ने 3 जून, 2019 को भारत में चुनावी खर्च जारी किया है। इसने हमारे चुनावों की बढ़ती लागतों पर अंकुश लगाने के लिए चुनावी सुधार की आवश्यकता बताई है। इस अवसर पर सीएमएस के अध्यक्ष एन. भास्कर राव ने कहा कि खर्च का यह स्तर हमारे डर का कारण होना चाहिए। हमें चुनाव सुधारों के कदम उठाते हुए और मजबूत लोकतंत्र की दिशा में काम करना चाहिए। इस अवसर पर पैनल डिस्कशन भी हुआ, जिसमें पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी भी उपस्थित रहे। औसतन, लगभग प्रति लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में 100 करोड़ रुपये खर्च का अनुमान लगाया है।इसमें से केंद्र में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाले गठबंधन ने अकेले 45-55 फीसदी खर्च किया है जबकि कांग्रेस गठबंधन ने 15-20 फीसदी खर्च किया है। सीएमएस के मुताबिक पिछले 20 साल में आम चुनाव में होने वाला खर्च छह गुना यानी 9000 करोड़ रुपये से बढक़र 55000 करोड़ रुपये हो गया है। दिलचस्प बात यह है कि भारतीय जनता पार्टी, जिसका खर्च 1998 के चुनाव में कुल खर्च का 20 फीसदी हुआ करता था, वो बढक़र 45-55 फीसदी हो गया।

सीएमएस की इस रिपोर्ट में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। इसमें बताया गया है कि वोटिंग के ऐन पहले किस तरह मतदाताओं को नकद बांटा गया। यह पैसा मतदाताओं को प्रत्यक्ष और परोक्ष तौर पर सीट और प्रतिद्वंदी उम्मीदवारों की प्रोफाइल देखकर बांटा गया। मतदाताओं से बातचीत पर आधारित रिपोर्ट के मुताबिक कुछ सीटों पर 100-500 रुपये, कुछ पर 500-1000 रुपये और कुछ पर हजार से ज्यादा प्रति वोट दिए गए। मतदाताओं को सीधे नकद थमाने के अलावा बड़े पैमाने पर राजनीतिक बिचौलियों का इस काम में सहारा लिया गया। रिपोर्ट के मुताबिक इनमें कई ऐसे बिचौलिए भी थे जो दूसरे राजनीतिक दलों से संबंधित थे लेकिन पैसे की एवज में काम दूसरी पार्टी के लिए कर रहे थें। बिचौलियों से प्रभावित सीटों की संख्या 100 से 200 बताई जा रही है। रिपोर्ट के मुताबिक 10 से 12 फीसदी मतदाताओं ने माना कि उन्हें सीधे नकद मिला जबकि दो-तिहाई मतदाताओं का कहना था कि उनके इर्द-गिर्द अन्य मतदाताओं को पैसे बांटे गए। इस तरह कुल 12 से 15 हजार करोड़ रुपये सीधे मतदाताओं पर खर्च हुए। गौरतलब है कि चुनाव आयोग के नियमों के मुताबिक वैध खर्च की सीमा 10 से 12 हजार करोड़ रुपए ही थी। सीएमएस ने दावा किया गया है कि 1998 से लेकर 2019 के बीच लगभग 20 साल की अवधि में चुनाव खर्च में 6 से 7 गुना की बढ़ोतरी हुई है। 1998 में चुनाव खर्च करीब 9 हजार करोड़ रुपये था जो अब बढक़र 55 से 60 हजार करोड़ रुपये हो गया है।

इस चुनाव में आंध्र प्रदेश एक मिसाल के तौर पर सामने आया है जहां लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ हुए, लिहाजा मतदाताओं को अन्य राज्यों के मुकाबले दोनों जगह मतदान के लिए पैसे मिले। रिपोर्ट के मुताबिक टीडीपी ने 10 हजार करोड़ रुपये खर्च किए। आरोप यह भी लगे हैं कि जगन मोहन रेड्डी की पार्टी वाइएसआर कांग्रेस को तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव की टीआरएस की तरफ से 1000 करोड़ रुपये जबकि भारतीय जनता पार्टी की तरफ से 500 करोड़ रुपये मिले। रिपोर्ट के मुताबिक आंध्र प्रदेश की हाइ प्रोफाइल 13 सीटों पर 45 से 60 फीसदी मतदाताओं को 500 से 4000 रुपये तक बांटे गए। सीएमएस के चेयरमैन एन भास्कर राव ने इस मौके पर कहा कि इस चुनाव में जो पैसा खर्च हुआ है वह डराने वाला है। उन्होंने कहा कि, समय आ गया है कि हमें इस बारे में गंभीरता से विचार कर इसे दुरुस्त करना चाहिए। उन्होने कहा कि, संसद को इस बारे में बहस कर तय करना होगा कि चुनाव में कितना खर्च हो, चुनाव के लिए पैसा कहां से आए। उन्होंने कहा कि इस रिपोर्ट को जारी करने के मौके पर राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया था लेकिन किसी भी दल का कोई नेता नहीं पहुंचा। राव ने कहा कि, चुनाव लड़ रहे नेता की जिंदगी पर बनी फिल्म और उनके ट्रेलर का प्रदर्शन भी 2019 के चुनाव को ध्यान में रखते हुए जारी किया गया था। इसके अलावा 24 घंटे का डीटीएच चैनल भी सामने आया, आखिर इस सबको चुनाव खर्च में क्यों नहीं शामिल किया जाना चाहिए।

इसके अलावा विभिन्न राज्यों में कुछ लोकसभा सीटों पर जरूरत से ज्यादा खर्च हुए। इसमें उत्तर प्रदेश की अमेठी, सहारनपुर, कानपुर आजमगढ़; मध्यप्रदेश की गुना, जबलपुर, भोपाल; महाराष्ट्र की नागपुर, बारामती, नांदेड़; राजस्थान की जोधपुर, जयपुर, धौलपुर, दिल्ली की चंडी चौक, पश्चिम दिल्ली, दिल्ली उत्तर पूर्व, केरला की वडकरा तथा तिरूवंतपुरम सीटें शामिल हैं। इसमें हैरानी की बात नहीं कि ये सीटें हाइ प्रोफाइल सीटें थीं जिन पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, सपा के मुखिया अखिलेश यादव, ज्योतिरादित्य सिंधिया, दिग्विजय सिंह व प्रज्ञा, नितिन गडकरी, सुप्रिया सूले और अशोक चव्हाण सरीखे दिग्गज दाव खेल रहे थे।चौंकानेवाली बात यह कि मतदाताओं को सीधे नकदी देने के अलावा सरकारी योजनाओं के माध्यम से बड़ी चालाकी से मतदान के ऐन पहले वोटरों के खाते में सीधे पैसे भी ट्रांसफर किए गए। इसमें केंद्र की प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना एक है, जिसके तहत किसानों को 2000 रुपये की तीन किस्तों में सालाना कुल 6000 करोड़ रुपये का वितरण तय है।

इस योजना की घोषणा हालांकि मोदी सरकार ने अनुपूरक बजट में ही कर दी थी, जिसकी पहली किस्त (लगभग 2 करोड़ रुपये) किसानों को मार्च में मिली जबकि जिन किसानों का पंजीकरण चुनावी अधिसूचना जारी होने से पहले हो गया था, उन्हें अप्रैल और मई में पहली और दूसरी किस्त दी गई। इसके अलावा आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की सरकारों ने भी विभिन्न योजनाओं के तहत वोटिंग से पहले मतदाताओं के खाते में पैसे ट्रांसफर किए गए।जहां एक तरफ 20 साल में चुनावी खर्च 6 गुना हुआ है, वहीं 2014 के मुकाबले 2019 में चुनावी खर्च दोगुना हुआ है। इसमें भारतीय जनता पार्टी का हिस्सा सबसे बड़ा है। हैरान करने वाली बात यह है कि 2014 में विपक्षी पार्टी रही भारतीय जनता पार्टी ने सत्ताधारी कांग्रेस के मुकाबले 15 फीसदी ज्यादा खर्च किया था। चुनाव सुधार पर काम करने वाली संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म की नवंबर 2018 में जारी रिपोर्ट के मुताबिक इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए भारतीय जनता पार्टी को कुल चंदे का 95 फीसदी हिस्सा मिला था।

17वीं लोकसभा में 88 फीसदी अर्थात 475 सांसद करोड़पति हैं। 2014 में 443 अर्थात 82 फीसदी सांसद तथा 2009 में 58 फीसदी अर्थात 315 सांसद करोड़पति थे। ये जनप्रतिनिधि अपनी जनता के लिए उम्मीद की किरण नहीं, धोखा हैं क्योंकि इन्हें चुनाव लड़ाने में पार्टी का तंत्र काम कर रहा होता है। लिहाजा यह मान लिया जाना चाहिए कि अब जनादेश हासिल नहीं किया जा रहा, बल्कि खरीदा जा रहा है। बड़े-बड़े कॉरपोरेट इस जनादेश को खरीदने में राजनीतिक दलों की मदद कर रहे हैं और अगले पांच साल सरकारों से मनमाफिक तरीके से सूद समेत अपना खर्च वसूल रहे हैं। आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि ये सारे फंड रियल स्टेट, माईनिंग, कार्पोरेट, कान्ट्रेक्टर्स, चिटफंड, ट्रांसपोट्र्स, असंगठित क्षेत्र अर्थात एनजीओ, एजुकेशन इन्टरप्राइजेस, विदेशी एनआरई तथा फिल्म और टेलीकॉम सेक्टर से पैसे आ रहे हैं। जो आने वाले दिनों के लिए निष्पक्ष चुनाव सम्पन्न करने में बाधक साबित होंगे। इस तरह यह बिल्कुल नकारा नहीं जा सकता कि इवीएम में डाटा ट्रांसफर कर, चुनाव में धांधलियों के साथ बड़े पैमाने में मतदाताओं को रुपयों का प्रलोभन देकर भारतीय जनता पार्टी ने इस चुनाव को जीता।

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