कला साहित्य एवं संस्कृति

बिलासपुर में भी है ईरानी बस्ती : सतीश जायसवाल .

सुबह-सुबह, दुकान खुलने के समय..


सुबह के समय अपनी दुकान सजा रहा, यह नीली शर्ट वाला ईरानी लड़का इमरान खान है।और उसके साथ, उसका यह भाई असगर अली है।दोनों यहीँ, भारत की जमीन की पैदावार हैं और अरपा नदी के अन्न-जल से बड़े हुए हैं।

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में, अरपा नदी के उस किनारे, चांटीडीह में, जहां महा- शिवरात्री पर्व पर मेला भरता है, वहां ईरानियों की अपनी बस्ती आबाद है।ये लोग ईरानी बस्ती में रहते हैं, इसलिए हम, शहर के लोग इन्हें ईरानी कहते हैं। लेकिन यहां इनकी इतनी पीढ़ियां हो चुकीं, अब इनमें कहां और कितना ईरान बचा ? फिर भी ये लोग अपने आपस में आज तक अपने पूर्वजों की दी हुई ईरानी ज़बान में ही बात करते हैं।

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इन्होंने अपनी खुशी से अपना वतन नहीं छोड़ा था।उग्र इस्लामवाद के दिनों में जब ईरान में धर्मांतरण का उन्मादी दौर था तभी इन लोगों ने वहां से पलायन किया था।क्योंकि वहां ये लोग सूर्य के उपासक हुआ करते थे।फिर क्या हुआ ? इनको भी नहीं मालूम।इनके पास इनका अपना, अपनी जातीय परम्परा का कोई इतिहास नहीं है।जिनकी अपनी जमीन नहीं होती, उनका अपना इतिहास नहीं होता। 

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मालूम नहीं कितनी पीढ़ियों से ये घुमन्तू ही रहे।अब इनके पास इनके अपने बारे में और इनकी अपनी जातीय परंपराओं के बारे में जो कुछ भी मालूम है वह सब कहे-सुने में है।अर्थात श्रुतियों में। अर्थात– ईयर से।और वह यह है कि ये लोग घोड़े के बड़े सौदागरों के काफिलों के साथ चलते हुए, ईरान से हिंदुस्तान पहुंच गए।इनके भाई-बन्द दुनिया के किन्हीं और मुल्कों में फैल गए।अब इनको उनके बारे में कुछ पता नहीं। उन।लोगों को भी इनके बारे में कुछ पता नहीं होगा।

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ऐसी ईरानी बस्तियां और भी शहरों में बसी हुई मिलेंगी।लेकिन फिर भी शहर से कुछ अलग-थलग।पहले इनके पड़ाव पड़ा करते थे।और ये लोग अपने कबीले में रहते थे।अब बस्तियां बसा कर रहते हैं और चुनावों में मतदान भी करते हैं।लेकिन अपने कबीलाई तौर-तरीके फिर भी बचाये हुए हैं।
कभी, कई पीढ़ियों पहले इनके पूर्वज ईरान की तरफ से आने वाले घोड़े के सौदागरों के साथ इधर आये। और यहीं बस गए।कहीं बसने से पहले, ये घूमंतू रहे।जिप्सियों की तरह नाचने, गाने, घूमने और खुश रहने वाले इन रंग-बिरंगे लोगों को देखना एक दृश्य होता था।और अनेक जिज्ञासाओं को जगाता था।इनकी स्त्रियां जांबाज़ होतीं और खूब घेरदार और लहराने वाले रंगीन घाघरे पहिनती थीं। कभी इनका गोरा गुलाबी सौंदर्य खुली धूप की तरह दमकता था।अब पीढ़ियों से यहां की स्थानीय हवा-पानी के मेल-मिलाप से वह धूमिल पड़ने लगा। और इनके रंगीन घाघरोँ के रंग मुरझाने लगे हैं।
अपने दमकते दिनों में ये जांबाज़ स्त्रियां छूरी-चाकू में धार बनाने का काम करतीं और चलती ट्रेन में नीलामियां लगा कर रंगीन रोशनियों वाले टॉर्च या सस्ते दामों में महंगे कैमरे जैसे ऐसे सामान बेचतीं जो रोजमर्रा की जरूरतों से बाहर का सामान होते।और उतने सस्ते दामों में बेचे ही नहीं जा सकते थे।तब खरीदार-मुसाफिरों और इन जांबाज़ स्त्रियों में जबरदस्त फसाद होता।और, जाहिर है कि जांबाज़ स्त्रियां ही भारी पड़तीं।लेकिन तब एक सवाल सामने होता कि इस तरह के इतने अनिश्चित रोजगार-धंधे से इनका घर-परिवार कैसे चलता होगा ? 

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अब वो जांबाज़ स्त्रियां थक चुकी हैं।उनका रोजगार-धंधा भी बदल गया है।अब ये लोग रंगीन और नज़र वाले, दोनों तरह के चष्मों और तकदीर बदलने वाले रंगीन पत्थरों के रोजगार में आ गए हैं।अब चलती ट्रेन छोड़कर शहर में, सड़क किनारे, पेड़ों की छाया के नीचे दुकान लगाने लगे हैं। लेकिन वह सवाल फिर भी वैसे का वैसा बना हुआ है कि इतने अनिश्चित किस्म के  रोजगार-धंधे से इनका घर-परिवार कैसे चलता होगा ?

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फिर भी सब चल रहा है।बुज़र्ग लोग ज़्यारत पर हज जाते हैं।और युवा लोग सपने पालते हैं।यह, इमरान मुझे जब मिला था तब यह बच्चा था।अब बड़ा हो गया।जिम्मेदार भी हो गया। और अब अपना खुद का रोजगार-धन्धा सम्हालने लगा है।एक स्कूटर या बाइक इसका अपना सपना था।मालूम नहीं पूरा हुआ या नहीं ? लेकिन एक दिन मैंने इसे बाइक चलाते देखा था। वह बाइक किसकी होगी ?मुझे नहीं मालूम।लेकिन बाद में इसे बाइक चलाते मैंने फिर नहीं देखा।इमरान खान के पास उसका अपना स्मार्ट फोन नहीं है।इसलिए उसकी तस्वीरें मैँ उसे फारवर्ड नहीं कर सकता।इसके लिए उसने मुझे अपने भाई का मोबाइल नम्बर दिया है।असगर अली का नम्बर। असगर अली के पास उसका अपना स्मार्ट फोन है।सुबह-सुबह,दोनों मिलकर अपने चष्मे की दुकान सजा रहे थे, तभी दोनों से मेरी मुलाकात हुई। हम बहुत दिनों बाद मिले।इमरान ने अपने घर-परिवार और मोहल्ले का हाल-समाचार भी बताया।

 बताया कि अल्ला का करम है।सब खैरियत है..

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सतीश जायसवाल , वरिष्ठ साहित्यकार

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