आंदोलन मानव अधिकार

बिलासपुर . अघोषित आपातकाल उससे भी बुरा .पूरे देश को विभाजित करने की कोशिश.देश की एकता ,लोकतंत्र और संविधान की रक्षा करने आगे आना ही होगा.

बिलासपुर . आपातकाल की यादों और अत्याचारों को याद करते हुये संयुक्त नागरिक संघर्ष समिति बिलासपुर ने आपातकाल की पूर्व संध्या पर देवकीनंदन चौक पर सभा की .


सभा को आपात काल के भुक्तभोगी आनंद मिश्रा ने कहा कि आज की स्थितियां आपातकाल से भी खतरनाक हो गई हैं।इंन्दिरा गांधी ने उस समय संविधान का उपयोग करके इमर्जेंसी की घोषणा की और सारे मीडिया की आवाज़ को दबाने की कोशिश की ,फिर भी अखबारों ने इसका अपने अपने तरीकों से विरोध किया किसी ने संपादकीय खाली छोड दिये तो बहुत से पत्रकार जेल जाने को तैयार हो गये लेकिन आज गंभीर विपरीत परिस्थितियों में तो लगभग पूरा मीडिया दंडवत हो गया हैं ,मोदी ने झुकने को कहा पर यह तो उनके सामने अपने स्वार्थों के लिये रेंगने लगे.


आपातकाल में उस समय की कांग्रेस ने धर्म का स्तेमाल नही किया लेकिन आज के दिल्ली में काबिज फासिस्ट ताकतों ने पूरे देश को धर्म के आधार पर बांट दिया हैं .अपराधी को सजा धर्म देखकर हो रही हैं. हमें संविधान और उसके मूल्यों को बचाने के लिये और मजबूती से सडकों पर निकलना ही पड़ेगा.


सामाजिक और राजनैतिक कार्यकर्ता नंद कश्यप ने कहा कि आर एस एस और भाजपा ने खुद इमरजेंसी को भुगता लेकिन पूरे देश में यह लोग आपातकाल के खिलाफ़ एक भी कार्यक्रम नहीं कर रहे है ,क्योंकि इन्हें लोकतंत्र और संविधान की बात करना पड़ेगी .आज भाजपा और मोदी ठीक इसके खिलाफ़ खडे और उसे खतम करने पर आमदा हैं. पूरी दुनिया में तानाशाही के खिलाफ लडा़ईयां लड़ी गई हैं और जीती गई है.मोदी ने देश को जंग में झोंक दिया हो जो उसके अनूकूल बैठता हैं. हमारा देश बेरोजगारी ,शिक्षा ,स्वास्थ्य और पर्यावरणीय संकट से गुजर रहा हैं और मोदी धार्मिक उन्माद फैला कर देश को बांटने में लगे है.


प्रथमेश मिश्रा ने शरद कोकास की कविता जय श्रीराम सुनाई और हरिशंकर परसाई से लेकर राहुल सांकृत्यायन को उदृधत करते हुये आज के सांप्रदायिक विभाजन के खतरे का संकेत दिया.


रेलवे मजदूर नेता तथा माकपा बिलासपुर के सचिव रवि बेनर्जी ,युवा नेता सामाजिक कार्यकर्ता प्रियंका शुक्ला ,अशोक सहगल ,
नागेश्वर मिश्रा ने भी सभा को संबोधित किया .
निलोत्पल शुक्ला ,अनुज श्रीवास्तव ,शाकिर अली ,धर्मेंद्र कुमार , असीम तिवारी ,पवन.,डा. लाखन सिंह आदि भी उपस्थित थे.

सभा के अंत में प्रिंयंका और साथियों ने एक गीत प्रस्तुत किया . और कहा कि समझ आया कि हम मानसिक गुलाम बनने के रास्ते पर है ,समाज का ये बटवारा हम अगले 100 साल भी नहीं पाट पाएंगे, इसलिए कोशिश कीजिए कि ऐसे लोगो के हाथो से देश की बागडोर छीनिए और बटवारा करने वालो को चिन्हित करके भागाइए दौड़ाकर…..

अंत में गीत गाया ..

दबे पैरों से उजाला आ रहा है
फिर कथाओं को खँगाला जा रहा है

धुंध से चेहरा निकलता दिख रहा है
कौन क्षितिजों पर सवेरा लिख रहा है
चुप्पियाँ हैं जुबाँ बनकर फूटने को
दिलों में गुस्सा उबाला जा रहा है

दूर तक औ’ देर तक सोचें भला क्या
देखना है बस फिजाँ में है घुला क्या
हवा में उछले सिरों के बीच ही अब
सच शगूफे सा उछाला जा रहा है

नाचते हैं भय सियारों से रँगे हैं
जिधर देखो उस तरफ कुहरे टँगे हैं
जो नशे में धुत्त हैं उनकी कहें क्या
होश वालों को सँभाला जा रहा है

स्थगित है गति समय का रथ रुका है
कह रहा मन बहुत नाटक हो चुका है
प्रश्न का उत्तर कठिन है इसलिए भी
प्रश्न सौ-सौ बार टाला जा रहा है

सेंध गहरी नींद में भी लग गई है
खीझती सी रात काली जग गई है
दृष्टि में है रोशनी की एक चलनी
और गाढ़ा धुआँ चला जा रहा हैं.
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