कला साहित्य एवं संस्कृति

बाल कथा -” बैंगन का भरता ” : राजीव रंजन प्रसाद .

 

[ बिटिया कुहू जब छोटी थी तब उसके लिये मैंने कुछ बाल-कहानियाँ और बाल-कवितायें लिखी थीं। वह बडी होती गयी और इस विधा पर मेरा हाध चलना कम हो गया। अब बेटे कनु को मुझसे कहानी सुनने की जिद रहती है। तलाशने पर बच्चों के लिये लिखी कुछ पुरानी रचनायें मिल गयीं। आज एक बाल-कहानी साझा कर रहा हूँ ]

राजीव रंजन प्रसाद 
*****

चिंटू ने लंबी डकार ली और खुश हो कर मम्मी से बोला – “आज आपने बैंगन का भरता बहुत स्वादिष्ट बनाया था”। वह लगभग कूदता हुआ अपने डायनिंग टेबल से उतरा।

“गिर पड़ोगे…” जब तक मम्मी उसे डाँट पाती वह लड़खड़ा कर गिर पड़ा। उसका हाथ पास ही रखी सब्जी की टोकरी पर इस तरह पड़ा कि वह नींचे और सारी सब्जियाँ ऊपर।

मटर के दाने खिलखिला कर हँस पड़े। कद्दू दादा अपनी हँसी रोक कर बोले – “…यह शैतान करेला है, उसपर नीम चढ़ा”।

करेला बरबटी की सेज पर सोया पड़ा था तुनक कर उठ गया। बोला – “एक तो कद्दू दादा, आपको कोई खाना पसंद नहीं करता उसपर आप हमेशा मेरा मजाक उड़ाते रहते है। आपको पता है मुझे खाने से बच्चों खा खून बढ‌ता है”।

चिंटू को चपत पड़ गयी थी, इस से सबसे ज्यादा दुख बैंगन को हुआ था। कितना प्यारा बच्चा है चिंटू, उसपर मुझे कितने चाव से खाता है। मैं हूँ ही इतना लजीज़ कि कोई भी खाये तो मस्त हो जाये। चिंटू की मम्मी भी बात बात पर मारने लगती हैं, यह कोई अच्छी बात नहीं है। सब्जी की डलिया में आज हलचल थी। किसी को चिंटू से सहानुभूति थी तो कोई चिंटू की मम्मी की तरफ से बोल रहा था।

“बच्चों को अपने नियंत्रण में रखना भी आवश्यक है” भिंडी चाची बोली। शैतान बच्चे अच्छे तो होते हैं लेकिन हमेशा शैतानी अच्छी नहीं होती।

“सच कह रही हो बहन” टमाटर बोल पड़ा – “कितनी बार चिंटू की इन्ही हरकतों के कारण मेरी बिना बात चटनी बन गयी है। कभी मुझपर बैठ जाता है कभी वह मुझे गेंद समझता है। उसके कमरे की दीवार पर जितने दाग हैं न उसमें मेरी चटनी भी है….”

सभी की बातों से दूर बैंगन बहुत खुश था। रह रह कर अपने आप को निहारता। बैंगनी रंग, गोल मटोल सुन्दर सलोना रूप और सबसे बड़ी बात कि सर पर ताज भी…कितनी सब्जियों के पास है इतना कुछ।

“क्या बात है? क्या सोच रहे हो” मिर्च ने बैंगन की सोच में खलल डाला।

“आज चिंटू भरता खा कर कितना खुश हुआ था..मेरा स्वाद है ही एसा” बैंगन नें इतरा कर कहा।

“छो़ड़ो भी” मिर्ची बोली। – “तुम्हे पता है अगर मैं न रहूँ तो तुम्हें को कोई पूछे भी न, हर सब्जी के स्वाद का कारण मेरा तीखापन है”।

“अरे जाओ, नाच न जाने आँगन टेढा, तुम्हें पूछता कौन है….तुम्हे जबरदस्ती मिलाया जाता है खाने में, वर्ना अपनी पौध में टंगी टंगी ही सड़ जाओ” – बैंगन की बात से घमंड टपक रहा था। घमंड करना अच्छी बात नहीं होती। मिर्ची को भी हमेशा यही लगता था कि बाकी सब्जियों की तारीफ उसके कारण ही होती है। खाने में अगर वह न हो तो कोई स्वाद नहीं। उस रोज बात बढ़ते-बढ़ते बतंगड़ बन गयी। सब्जियों के दो गुट हो गये और इतना झगड़ा बढ़ा कि बात चिंटू की मम्मी तक पहुँच गयी।

चिंटू की मम्मी दो घंटे से इस बहस को सुन रही थीं। उन्हे लगा कि यह अच्छा समय है सभी को इस बात का अहसास कराने का कि कौन कितने पानी में है। उन्होंने बैंगन और मिर्च से अलग-अलग बात की फिर तय हुआ कि दो भरते बनाये जायेंगे एक बैंगन का भरता लेकिन उसमें मिर्च बिलकुल नहीं होगी और दूसरा मिर्च का भरता।

“मेरा भी भरता बन सकता है” मिर्च बहुत उत्साहित हुई। उसने आँखे तरेर कर बैंगन को देखा जैसे कह रही हो आज फैसला हो ही जायेगा।

रात हुई। खाने की मेज पर सबको चिंटू का इंतजार था। सारी सब्जियों के कान खाने की टेबल पर लगे थे। चिंटू कूदता हुआ आया और चिल्लाते हुए बोला “मम्मी भूख लगी है जल्दी से खाना लगाओ”। मम्मी नें खाना परोसा। मनपसंद बैंगन का भरता देख कर उसके मुंह में पानी आ गया। साथ ही साथ हरे रंग का एक और भरता था।

“यह क्या बना है मम्मी” चिंटू नें पूछा।

”यह मिर्च का भरता है बेटा” मम्मी नें बताया। भरता चिंटू को बहुत पसंद था, उसे लगा कि यह तो सोने पर सुहागा है। एक साथ दो दो भरते…उसने बैंगन के भरते से शुरुआत की। एक चम्मच खाते ही वह थू-थू करने लगा। मिर्च इस पर हँस पड़ी। अब बारी मिर्च के भरते की थी…जीभ से लगते ही चिंटू जैसे नाँचने लगा। पानी-पानी चिल्लाते हुए वह मम्मी के पास पहुँचा। तेज मिर्च लगने के कारण उसकी आँख से पानी आ रहा था। मम्मी ने जल्दी से उसे चीनी खाने को दी। चीनी खाते ही चिंटू को शांति मिली।

“मम्मी यह कैसा भरता है, एक में कोई स्वाद नहीं तो दूसरा इतना तीखा” चिंटू ने शिकायत के लहजे में कहा। अब मम्मी सब्जियों की तरफ देख कर हँस पडी। बोलीं “मिलजुल कर चलने से ही सारे काम बनते हैं, एक दूसरे का साथ ही किसी कार्य को सफल बनाता है”।

मम्मी ने तब चिंटू को बैंगन और मिर्ची के झगड़े की पूरी कहानी सुनायी। चिंटू ने फिर सब्जी की डलिया की ओर देखा। बैंगन और मिर्ची दोनों की नजरें झुकी हुई थीं। एक दूसरे के साथ चलने का महत्व मिर्ची, बैंगन और चिंटू तीनों को समझ आ गया था।…। मम्मी ने फिर बैंगन का भरता चिंटू को परोसा, इस भरते का लाजवाब स्वाद बता रहा था कि मिलजुल कर रहने में कितना आनंद है।

 

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