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बस्तर के आदिवासियों के विकास का सच : कांकेर ,अंतागढ के कोयलीबेड़ा से अंकुर तिवारी की रिपोर्ट.

कोयलीबेड़ा के गांव मातलाबा  और कोटकोड़ो से सीधे 

21.04.2018

बस्तर। भाजपा सरकार देश-विदेश में अपनी कथित उपलब्धियों का ढोल पीटती रही है और विकास करने के बड़े-बड़े दावे करती नहीं अघाती। लेकिन, जमीनी सच्चाइयों की ओर नजर घुमाएं तो स्थिति एकदम उलट दिखाई देती है। आदिवासी बहुल बस्तर संभाग के कांकेर जिले के गांव आज भी विकास से कोसों दूर हैं। यहाँ तक की गांववालों को मूलभूत सुविधा भी मयस्सर नहीं है।
कोयलीबेड़ा और अंतागढ़ विकासखंड के गांवों में आवागमन के लिए पक्की सड़कें नहीं बनी है। सबसे खराब स्थिति कोयलीबेड़ा और अंतागढ़ क्षेत्र के गांवों की है। बरसात में छोटे-बड़े नदी नालों में पानी भर जाने के बाद ग्रामीण आबादी का संपर्क मुख्यालय से कट जाता हैं। दर्जनों गावों में 100 प्रतिशत आबादी को आज भी बिजली की सुविधा नहीं है। स्वच्छ भारत मिशन कभी इन गांवों में आया ही नहीं, इस वजह से आदिवासियों के परिवार आज भी खुले में शौच जाते हैं।

 

मातलाबा   और कोटकोड़ो गांव में पीने के पानी के नाम पर वही दशकों पुराना झरिया ग्रामीणों का सहारा है़। मातलाबा गांव के आदिवासियों को साफ पानी उपलब्ध कराने के लिए शासन-प्रशासन को हैंडपंप लगाने की फुर्सत ही नहीं मिली है। मातलाबा गांव के चिखलापारा में कई आदिवासी परिवार पानी की समस्या से जूझ रहे हैं। यहां आदिवासी समुदाय के लोग बारहों महीने झरिया के पानी से अपनी प्यास बुझाने को मजबूर हैं। सरकार ने इस गांव में रहने वाले आदिवासियों के घरों में बिजली के मीटर और खंभा जरूर लगवा दिया है लेकिन उसमें बिजली सप्लाई करना भूल गई है।

आदिवासी परिवारों को आज भी झरिया का पानी पीना पड़ता है। झरिया का दूषित पानी पीकर कई बार गांववालों को बीमारी का शिकार होना पड़ता है। जिला प्रशासन और जिम्मेदार अफसरों से मूलभूत सुविधाओं की मांग की गई है। उसके बाद भी यहाँ रहने वाले आदिवासी नागरिक जीवन की सुविधाओं के लिए तरस रहें है। ऐसे में ग्रामीणों की दुर्दशा की कल्पना करना मुश्किल काम तो नहीं है, जिन्हें पीने के लिए पानी तक नसीब नहीं हो रहा है। और अगर थोड़ा-बहुत पेयजल मिलता भी है तो उसका स्रोत दूषित हैं।

 

जबकि कोटकोड़ो गांव में तीन सरकारी हैंडपंप में दो खराब है़, गांव में कुआं नहीं है़ यहां चिकित्सा सुविधा कुछ भी नहीं है़। ग्रामीण कहते हैं- छोटी-बड़ी बीमारी होने पर उन्हें गांव के ही दवा दारू पर निर्भर रहना पड़ता है़। यहाँ रहने वाले आदिवासियों का कहना है कि चुनावी जुमलों में उन्हें मोहरे की तरह इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन जब सुविधा देने की बात होती है तो राजनीतिक दलों के नेताजी कन्नी काट लेते है। आदिवासियों की जिजीविषा ही है कि तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद वे अपने अस्तित्व बचाए हुए है।

कोयलीबेड़ा ब्लॉक के पानीडोबिर गांव में विद्युत कनेक्शन तो है, लेकिन बिजली हफ्तों गायब रहती है। गांव में लगाये गये अधिकतर हैडपंप खराब पड़े हैं। गांव में रोजगार के लिए कोई व्यवस्था नहीं है। ग्रामीण खेती या मजदूरी कर अपना जीवन बसर करते हैं। वहीं, गर्मी के ज्यों ज्यों तापमान में वृद्धि हो रही है आदमी तो क्या पशु पक्षियों को भी पानी की आवश्यकता बढ़ती जा रही है। जल का संकट गंभीर होता जा रहा है। झरिया का दूषित पानी पीकर अपनी प्यास बुझाने वाले आदिवासियों के सामने भीषण जल संकट गहरा रहा है।

 

ग्रामीण इलाकों में सरकारी स्तर पर लोगों को शुद्ध पेय जल की आपूर्ति की कोई व्यवस्था नहीं है। आलम यह है कि वर्षो से खराब पड़े हैंडपंप को देखने तक कोई नही आता। लोगों को शुद्ध जल पिलाने के लिए नियुक्त लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी यानी पीएचई महकमा का आलम यह है कि इसके द्वारा लगाये गए हैंडपंप धरातल पर केवल दिखते है। जो पानी तो देते नहीं पर अपनी बदहाली का किस्सा ज्यादा बयां करते है।

वोट तो लेते रहेंगे, कभी पानी भी देंगे…

ग्रामीण सेदराम कहते हैं कि पिछले 70 सालों में जब उनके दादा और पिता जीवित थे तो इंदिरा गांधी से लेकर भारतीय जनता पार्टी (डॉ.रमन सिंह) सरकार आई, लेकिन किसी ने उनका ध्यान नहीं रखा है। हम हर चुनाव में वोट डालते हैं जिससे हमारे नेता हमें कुछ सुविधाएं दें। पर सब वादे तो खूब करते हैं पर पूरे नहीं करते। वोट लेकर चला जाए, वह नेता किस काम का।

मातलाबा के आदिवासी परिवारों के लिए सरकार ने विद्युत खंभा और घरों में बिजली का मीटर लगा दिया है, लेकिन उसमें विद्युत सप्लाई करना भूल गई है। कई वर्षों से आदिवासी परिवारों को गांव में बिजली आने का इंतजार है। और रात अंधेरे में गुजारनी पड़ रही है।

अंदरूनी क्षेत्र के गांवों में बिजली के नाम पर कभी-कभी सौर ऊर्जा से चलते बल्ब दिख जाते हैं। ज़ाहिर है दूरसंचार दूर की बात है। गांव में किसी नौजवान के पास जो मोबाइल सेट दिखते हैं उनका इस्तेमाल गाने सुनने के लिए किया जाता है। हैंडपंप मुश्किल से ही दिखता है। वरना पीने, खाना पकाने और नहाने के लिए बहते नालों और झरनों का ही सहारा है।

स्थानीय लोगों के अनुसार विधायक, सांसद समेत किसी ने गांव की सुध नहीं ली। गांववालों ने बताया कि आज तक गांव में कोई भी जनप्रतिनिधि नहीं आया है।

 बस्तर के पत्रकारों का नज़रिया 

कांकेर के जाने-माने पत्रकार सुशील सलाम बेहद दुखी मन से कहते है-देश की प्रगति के लिये शिक्षा एक मौलिक भूमिका का निर्वाह करती है और यह किसी भी देश या समाज के लिये रीढ़ की हड्डी है और देश के प्रत्येक नागरिक का जन्मजात मौलिक अधिकार भी है। फिर आदिवासी समाज अपने इस मौलिक अधिकार से क्यों वंचित रहा? शिक्षा बिना यहां का आदिवासी समाज आज भी अंधेरे में हैं।

कांकेर के ही बांदे क्षेत्र के पत्रकार राबिन मंडल कहते हैं कि भौगोलिक संरचना के कारण आवागमन की दिक़्क़तें, सामंती मानसिकता और आज़ादी के बाद चुने गए जनप्रतिनिधियों में विकास को लेकर राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी, ये तीन इस इलाक़े के पिछड़ेपन के प्रमुख कारण हैं।

वे आगे जोड़ते है कि यह सत्ताधारियों की गलती ही कही जाएगी कि आदिवासी समाज समस्याओं से उबर नहीं पा रहा है। आदिवासी, जो कम से कम में गुजारा कर रहा है, राजनीतिक पार्टियों के नारों एवं संवैधानिक स्थितियों के बावजूद आदिवासीे तिल-तिल मरने को मजबूर हैं। उनकी गरीबी और अशिक्षा जाने का नाम नहीं ले रही है।

अंतागढ़ के पत्रकार डंपी खान कहते है-इस विकास को केवल खास आदमियों से प्रेम है। बस्तर में आज भी आदिवासियों की समस्याएं बनी हुई हैं। आदिवासियों के अधिकारों का हनन किया जा रहा है और संविधान के अनुरूप उन्हें जितनी सुविधाएं मिलनी चाहिए उतनी नहीं मिल पा रही है।

अलग-अलग लोगों की राय अलग हो सकती है लेकिन इलाक़े का दौरा करने के बाद इसमें शायद कोई शक नहीं कि डॉक्टर रमन सिंह के विकास के दावों की सारी क़लई बस्तर में खुल जाती है।

आफसरों  का रटारटाया जबाब.

अपनी समस्याओं के लिए जब ग्रामीण अफसरों से गुहार लगाते हैं तो अधिकारी रटा-रटाया जवाब दे देते हैं। जैसे अभी मालूम चला है, मामले को देखता हूं, या फिर मामले की जांच की जायेगी या फिर जल्द ही समस्याओं का निपटारा किया जायेगा। ऐसे जवाब सुन-सुनकर गांववाले ऊब चुके हैं। उन्हें एक्शन चाहिए आश्वासन नहीं।

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अंकुर तिवारी स्वतन्त्र पत्रकार 

 

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