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बर्बरता की पूर्णिमा और बर्बरता की पूर्णिमा और भेड़ियों के पूर्णावतार का समय.

बादल सरोज .


● इस बार वे झारखण्ड के तबरेज़ अंसारी के लिए आये । बेख़ौफ़ और खुल्लमखुल्ला आये, दिनदहाड़े आये । उन्होंने उसे आसानी से ज़िबह नही किया । बहुत तसल्ली से पहले उन्होंने उसके साथ गिरफ्त में आये मेमने की तरह अपनी सारी क्रीड़ा की, खेल खेले । उनके बड़ों ने पिछले सप्ताह जिन नारों से देश की संसद को गुंजाया था उन्होंने वे जै श्रीराम के नारे तबरेज़ के चारों ओर घूम घूम कर गुंजाये, उससे भी लगवाये और फिर उसे कत्ल कर दिया ।


● तबरेज़ मुसलमान था – मगर भेड़िये भेड़िये होते हैं धर्मप्रचारक नही होते । वे जब आते हैं तो सिर्फ मुसलमानों के लिए नही आते । इसी झारखण्ड में दिल्ली और रांची में बैठी इन्ही सरकारों के रहते भेड़ियों की उन्मादी भीड़ जिन 18 को अपनी बर्बरता का शिकार बना चुकी है वे सब मुसलमान नही थे – उनमें हिन्दू भी थे, आदिवासी भी थे, दलित भी थे । इसलिए तबरेज़ न पहला है न आखिरी ; यह बर्बरता की पूर्णिमा का कुसमय है । यह भेड़ियों के पूर्णावतार का समय है – अगर उनकी चली तो वे इसे भारत देश, उसके समाज और उसकी अब तक की अर्जित सभ्यता की अमावस बना देना चाहते हैं ।


● वे अपने शिकार के धर्म, कर्म विवशता और उम्र को ज्यादा तवज्जोह नही देते । वे दुनिया भर के अपने सहधर्मी सहोदरों से थोड़ा सा भिन्न और कुछ आगे बढ़ी उन्मत्तता वाले हैं । मनु की रिंग मास्टरी ने उनकी बर्बरता को नई धार और देशज टारगेट्स बख्शे हैं । दलित और बच्चे और स्त्रियां भेड़ियों की मनपसंद शिकार होती हैं । इन्हें मुज़फ़्फ़रपुर में भी जीभ लपलपाते हुए देखा जा सकता है, ये गोरखपुर के बाद भी अपने दांत पैनाये भूखे के भूखे पाये जाते है .


● तबरेज़ युवा था । कि वह मुंबई से ईद मनाने छुट्टी पर आया था । कि हाल ही में उसका निकाह हुआ था । इस सबसे उन्हें कोई फर्क नही पड़ता । तर्क न वे करते हैं न सुनते हैं । तर्क और विधान, क़ानून और संविधान मनुष्य समाज के नियम हैं ; भेड़ियों से इनके अनुरूप चलने की अपेक्षा करने के भुलावे में रखने की आत्मघाती जोखिम आप उठाना चाहते हैं तो उठा सकते हैं, किन्तु ऐसा करना उनकी नस्ल के साथ विवेकसम्मत-तर्कसंगत-विधिमान्य व्यवहार नहीं होगा । वे भेड़िये हैं, वे कुछ भी कर सकते हैं ; वे एक निहत्थे बूढ़े आदमी को आदर पूर्वक प्रणाम करके अगले ही पल फटाक से उसके सीने में तीन गोलियां उतार सकते हैं और उसके बाद उसकी मूर्ती के आगे शीश नवा सकते हैं । वे सरेआम दिन दहाड़े युवा गर्भवती माँ को मारकर उसकी कोख से निकाले सात माह के गर्भ को त्रिशूल पर लहराते हुए उसे विजय-ध्वजा बना सकते हैं । वे लोकतंत्र चबा सकते हैं, संविधान रौंथ सकते हैं, ईश्वर और भगवानों को चींथ सकते हैं । उनके दाँत और नाखून कालनिरपेक्षता और कुटुंब निरपेक्षता की ठंडी क्रूरता के इनेमल से चमचमाते रहते है ; इनकी पैनी धार से खुद उनके शिशु और वृद्ध भी नहीं बचते .


● भेड़ियों की आक्रमण शैली आजमाई हुई है । सबसे पहले आता है बड़ा भेड़िया ; अचानक छलांग मारकर जबड़ों में भींच लेता है स्वर-रज्जु, वोकल कॉर्ड। शक्तिभर जतन करता है कि कोई आवाज निकले ही नही । पक्का करता है कि जो भी आवाज निकले वह उसी की आवाज हो ; उसके बाद आते हैं गीदड़ श्रृगाल पंक्तिबद्द, लोमड़ियों के साथ फिर आते हैं जंगली बना दिए गए श्वान – जिन्हे कुत्ता कहना कुत्ते का अपमान होगा – एक के बाद एक आते हैं, सब आते हैं अपने अपने हिस्से का भोग लगाने । शुरू में वे शिशुओं पर वार करते हैं – उसके बाद मनुष्य, फिर मनुष्यता, तदुपरांत समाज और अंततः सभ्यता पर .


● मगर अबकी वे तबरेज़ भर के लिए नही आये हैं । उनके भोग के मेन्यू में इस बार सब कुछ है । उन्हें पिछली 70 साल में रचा, बना सब कुछ चाहिये । सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम चाहिये, बैंकें चाहिये, मजदूरों का खुद का जमा भविष्य निधि का पैसा चाहिये । बिना कुछ दिये आदिवासियों की जमीन और कौड़ियों के मोल किसानों की फसल चाहिये । बिना किसी कानूनी ढाल के जकड़ा मजदूर चाहिए और खलिहान के पास के पेड़ से लटक आत्महत्या को विवश किसान चाहिये । वे तबरेज़ पर नही रुकेंगे – वे उन्मादी भीड़ के तुमुलनाद में सब कुछ ज़िबह करेंगे । इसलिये वे अपनी शक्ति हर प्रकार से जुटाने की जल्दबाजी में हैं । इसके लिए वे नयों नयों के भेड़ियाधसान वाले यग्योपवीत संस्कारों में भी जुटे हैं और अपने दलबल में डबल आजीवन कारावास काट रहे गुरमीतसिंह जैसे पुराने घाघो के साथ सच्चे सौदों में भी भिड़े हैं .


● वे भविष्य की आशंकाओं को भी निर्मूल कर देना चाहते हैं । इसलिये गांधी और भगतसिंह की जगह गोलवलकर और श्यामाप्रसाद मुखर्जी को पढ़ाना चाहते हैं । जेएनयू से एचसीयू तक की जगमगाती बत्ती गुल करके वहां बर्बरता के जंगल उगाना चाहते हैं । उन्हें कला और संस्कृति से डर और किताबों से भय लगता है .


● भेड़िये सिर्फ भेड़िये होते हैं, और वे हमेशा ही भेड़िये रहते हैं । सृजन के मामले में अत्यंत “निस्पृह कृपण और निष्काम अलाल” होते हैं वे, उन्होंने कभी सभ्यतायें नही रची । देश तो छोड़िये वे घर भी नहीं बसाते । हाँ अपने तरह के क्लोन जरूर बनाते हैं – जो हिंसा और क्रूरता की मिसालें गढ़ने में इनके साथ मुकाबला करते हैं । जब वे रांची में तबरेज़ की जान ले रहे होते हैं ठीक तभी पश्चिम बंगाल में उनकी एनडीए के सारे कुम्भों में साथ रही भगिनी की भेड़िया वाहिनी ताजीमुल करीम और निज़ामुद्दीन मण्डल का कत्ल कर रही होती हैं.


● मगर एक छोटा सा पेंच है ; और वो ये है कि भेड़िये प्रकाश से, रौशनी से डरते हैं । भेड़िये हुँकार से डरते हैं । वे मनुष्य की आवाज से भय खाते हैं । वे जागते, बोलते, सोचते, विचारते समाज के निकट नहीं फटकते .


● कवि सर्वेश्वर दयाल जी के शब्दों में “भेड़िए की आँखें सुर्ख़ हैं । उसे तब तक घूरो जब तक तुम्हारी आँखें सुर्ख़ न हो जायें । और तुम कर भी क्या सकते हो जब वह तुम्हारे सामने हो ? यदि तुम मुँह छिपा भागोगे तो भी तुम उसे अपने भीतर इसी तरह खड़ा पाओगे यदि बच रहे ।” इसलिये एकदम मुमकिन हैं इन्हें शहरों, गांवों, बसाहटों से खदेड़ना । इतिहास गवाह है कि इतिहास में यदाकदा दिख जरूर जाते हैं भेड़िये ; मगर भेड़ियों के खुद के कोई इतिहास नहीं होते, उनके उन्मूलन-निर्मूलन के जरूर होते हैं.

बादल सरोज

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