आदिवासी कला साहित्य एवं संस्कृति

बचा रह जायेगा बस्तर से : शाकिर अली की तीन लंबी कवितायें.

पिछले सप्ताह से शाकिर अली जी की प्रकाशित कविता संग्रह बचा रह जायेगा बस्तर से क्रमश:  कवितायें पढ रहे हैं. उसी संग्रह मे उनकी लंबी कविता  “कुटुमसर : एक अंतर्यात्रा ”  ,”निःशब्द टपकते हैं , महुआ फूल . ” और “.हमारे पूर्वज , आदिमानव ”  की बारी है . 

अगले अंक में शाकिर अली का पुस्तक पर लिखा प्रारंभिक वक्तव्य के साथ यह श्रंखला पूर्ण करेंगे.

 1.

कुटुमसर : एक अंतर्यात्रा

 

तीन साल से रूकी हुई थी , मेरी प्रतीक्षा
गुफा के शिला मुख पर ।
किसी प्रिय मित्र का करते इंतजार
आखिर में आ ही गये मित्र अग्निशेखर

” यही है कवि की तीसरी आँख
रोशन रखती गहनतम अंधेरों को ”
लिखने वाले कवि का हाथ पकड़कर
अंधेरे में टटोलते बढ़ा था मैं,
गुफा के अंदर , डरते डरते !
सचमुच अंधेरों ने रास्ता छोड़ दिया था ,
और मैं ,विजय सिंह , सूरज , सोनू , सभी

पथरीली , चिकनी , रपटीली राह पर
शनै – शनै बढ़ते गये थे , गुफा के अंतिम छोर तक ! !

ठिठक कर बीच – बीच में देखते
घूरते अंधेरे की परछाईयों को
जिनमें दिखती , मां की मूर्ति में ममतामयी
गोल – गोल आँखें
कहीं दिखता चंद्रमा , तो कहीं प्रस्तर मूर्तियाँ
बोलती – सी
कहीं बैठे हैं , शोक सभा में लोग
तो कहीं बहस में उलझे सभी
कही सजा है इंद्रलोक में देवताओं का दरबार
अंत में पहुँचे , शिवजी की बारात में
शामिल होने , शिव मंदिर था अंतिम छोर पर ,
जो नदी में खुलता है ,
जहाँ से आती है ,
हरदम ताजी हवा.

दरअसल बंद नाला है गुफा ,
बरसात में भरा पूरा , लेकिन छ : माह सूखा
जहाँ वर्षा का पानी
रिस – रिस कर आता रहता है , सालभर
घने जंगलों के भीतर छिपा था ,
गुफा का शिला – मुख
भीतर हर जगह टपक टपक कर
कैल्शियम के परमाणु जम गये थे ,
फासिल की शक्ल में
स्फटिक , बर्फ के रंग का , श्वेत संगमरमरी प्रस्तर खंड !
पुनः उन पर रिस – रिस कर गिरती बूंदें , उन्हें रोज ब रोज नये – नये आकारों में गढ़ती जाती , हर बार प्रकृति , नया दृश्य रचती .

किसी नाटककार की तरह , हर बार रिहर्सल में ,

जैसे हबीब तनवीर , करते सुधार , मॉजते दृश्यों को ,

अभिनेताओं को , उनके संवादों को , जोड़ते नये शब्द ,
आज के संदर्भो से , घटनाक्रमों से लेकर ! ! जैसे मधुकर गोरख करते हैं मोटेराम शास्त्री में या सैंया भये कोतवाल में अरूण दाभडकर अपना रोल निभाते हए । । ।

कवि की मिथक पकी आंखों से
देख रहे थे हम
अंधेरों में रूपायित होते , दरो – दीवार से टपकते तरल मिथ – शास्त्र को !
अंधी मछलियों की आँखों में छाया था ,
रौशनी का डर ,
हमारा गाइड अपनी आदिम भाषा पगी बोली में , तुतलाकर बता रहा था , रास्ता हमें ,
हाथ में रौशनी लिये ,
अग्निशेखर हमें दिखाते रहें , रास्ते भर प्रकृति पुरुष के हाथों रचे ,
विशाल स्थापत्य का अनोखापन ! !

हम दिखाने लाये थे , कश्मीरी कवि को
अपने घर – प्रांतर की गुफा गर्वीलपन से भरे हुए ,
लेकिन अग्नि शेखर बन गये थे , उलटे,
हमारे गाइड अनायास II

पत्थरों में उकेरे , मिथकों को पढ़ते हुए
बखान रहे थे ,
नागलोक के मिथकों से जोड़कर
इन निरंतर बदलते भित्ति – चित्रों की गाथा , उनके भीतर का चित्रकार
तबदील हो गया था , मूर्तिकार में ,
और वे गढ़ रहे थे , अपनी पैनी नजर की तराश से .

मूर्तियों को , पिघलती , पल – पल बदलती आकृतियों को ,
एक नया संगतराश पैदा हो रहा था ,
गुफा के अंदर , हमारे सामने !

अद्भुत , अनुभव था , हम लोगों का
, कुटुमसर की गुफा के भीतर
में अपनी अंर्तगुफा से
खोज – खोज कर ला रहा था ,
बाहर भारतीय मिथकों की परंपरा के तारों से जोड़ रहा था ,
अग्नि शेखर के वाक्यों को ! !

 

लौटते समय
द्वार की भीड़ में , पर्यटकों की उत्सुक जिज्ञासु आँखें
पूछ रही थी , भीतर का हाल चाल
में जवाब दे रहा था ,
अदभुत है , संसार का ऐसा रंगमंच ,
मैने पहले कहीं नहीं देखा
पूरा कश्मीर , पूरा कन्याकुमारी
, पूरा भारत समाया है ,
भीतर जाकर देखें , श्रीमान !
जिसे खोजा था , दुनिया के लिए डॉ . शंकर ने और मेरे लिये पुनर्आविष्कृत
किया है , मेरे मित्र कवि अग्नि शेखर ने ! !

2

निःशब्द टपकते हैं , महुआ फूल .

यह अलस्सुबह फजर का समय है .
मदमाती बयार में घुल रही है , महुआ फूल
की चुपचाप टपकती गंध ,
जिससे खिंचकर बाहर आना ही पड़ता है .
अपनी खोह से निकलकर भालू को
उसकी टूटती नींद में टपकता है महुआ !
सुबह से झउहा लेकर निकल पड़ती है । महुआ सकेलने वाली महुआरिनों की कतार ! !

हर पेड़ का अपना टपकता समय है
गीदम में बैंक के सामने रोज
सुबह साढ़े आठ बजे टपकता है महुआ !
जिसके बाजू में है , चाय का ठेला
आ जाती है काम वाली डोकरी फूलों
बर्तन मांजना छोड़कर उसे बीनने
या फिर कुचल जाते हैं , महुआ फूल
आती – जाती ट्रक के भारी पहियों के बीच ! ।

उधर डोंगरी में दोपहर को टपकने वाले
महुए को खाकर झूमता है भालू
डरकर भाग जाते हैं , बच्चे महुआरिनों के
गांव के आसपास खेतों के बीच
महुआ बीनते हैं , अपनी – अपनी टोकरी में .

शाम चार बजे उस पहाड़ी ढलान पर .
छितराये महुए के पत्रहीन
पेड़ों के कतार के नीचे से
गुजरते डर से छटकी हैं , घर लौटते
ढोरों के रेवड़ – भर की आँखें
शायद अभी – अभी गुजरे भालू के पदचाप और हुँकार उनके कानों में गूंज रहे हैं !
यहाँ शाम को टपकते हैं , महुआ फूल ! !

महुए के टपकने का समय या तो डगालों को पता है , या सूखे – झरे पत्तों को
जिसके नीचे छिपकर छुपा – छुपी का खेल खेलते हैं , मदमाते महुआ फूल
या फिर महुआरिन को पता है
जो जल्दी – जल्दी सब काम निपटाकर
आती है महुआ बीनने – उसके टपकते समय में !
फिर भी आठ आने पसेरी से अधिक नहीं हैं , उसके मेहनत की कीमत
जिसमें भालू के हमले से घायल होने से
खतरा भी शामिल हैं।।

निःशब्द टपकते हैं महुआ फूल
पेड़ के नीचे बिछे सूखे पत्ते भी चुपचाप हैं ।
जिन्हें बुहारने पर छिपने की जगह से निकल आते हैं।
महुए के फूल
वे कूद कूद कर बड़े से झउहे में
बाकी महुओं के साथ शामिल होते हैं !!
आज बस इतना ही
कल फिर इसी समय ,
टपकेंगें महुआ फूल
अपने निश्चित समय में ,
भले ही उन्हें कभी भी फुरसत में आकर
बाद में सकेले कोई महुआरिन । ।

3.

हमारे पूर्वज , आदिमानव

आदिवासी बचाये रखते हैं , सुरक्षित वीज
हजरत नूह की तरह , हर साल बटोरते हैं । सौंपते हैं , जंगल को फिर से जैसे बसंत से पहले , बारिश में समेटकर
जड़ों में रखे गये , जलकणों को सुरक्षित
पेड़ अपने दरार पड़ गये बदन की
शिराओ में बहाते हैं उसे बसंत में पुनर्नवा होकर
हरापन फिर से सौंपते है पृथ्वी को दोबारा हर साल.

पेड़ हर साल दधिचि की तरह
सौंपते हैं , पृथ्वी के मनुजनों को हर बार
अपनी हड्डियाँ , शिराएँ , हरापन
अपनी आग , अपना कारबन ,
सारा क्लोरोफिल , सारे फल , सारी नमी ,
सारे बीज , जड़े , तनों से लिपटी छाल ,
उनसे बनी दवाईयाँ , सिनकोना ,
रबर , लाख के दुधिया रस ,
सल्फी , छिंद , ताड़ के मद भरे रसो वाले पेड़
और पूजा के करोड़ों प्रसाद बाँटते
नारिकेल वृक्ष की ऊँचाईयाँ ,
कठोर गिरी के भीतर सुरक्षित पवित्र जल ,

 

आओ उस पवित्र जल से अभिषेक करें ,
इस प्राचीन ईश्वर भूमि का.

जिसे बचाकर रखे हुए हैं ,
आदिवासी , के सभी ,
यहाँ के मूल निवासी ,
जो मूल को अभी भी पकड़कर
बैठे हैं , बचाकर रखे हैं सुरक्षित ,
हमारे पूर्वज , आदिमानव ये !

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