कला साहित्य एवं संस्कृति

फिल्म समीक्षा : बारां माजिद – मजीदी की एक ईरानी फिल्म :. महज़बीं

सारिका श्रीवास्तव की प्रस्तुति 

17.09.2018

बारां माजिद – मजीदी की एक ईरानी फिल्म है ….इस फिल्म की खासियत यह है कि फिल्म की नायिका बिना बोले अपने किरदार को बाखूबी निभाती हैं… ज़्यादा उम्र नहीं उनकी लगभग 14/15 साल की हैं… इतनी कम उम्र में बिना बोले अपने किरदार को निभाना मामूली बात नहीं है… संवाद तो करती हैं चेहरे से आँखों से..हम यह नहीं कह सकते कि गुड़िया है चुपचाप बुत की तरह खड़ी है लिटा दिया लेटी है बिठा दिया बैठी है… बल्कि वो अपनी टिनेज़र ऐज़ में ही एक आदर्श रोज़गार याफ्ता ख़ुदमुख़्तार संघर्शील जिम्मेदार औरत की ज़िंदगी ज़ी रही है… वो कोई किसी राजा माहराजा ज़मीनदार अफ़सर राजनीतिकज्ञ की ना बेटी है ना पत्नी ना प्रेमिका… बल्कि एक मज़दूर ग़रीब बाप की बेटी है… जो अपने पिता के साथ अफगानिस्तान से बुरे हालात से सूझती हुई तेहरान आई है…यहाँ आते ही मज़दूरी करते हुए उसके पिता का पैर कट जाता है एक हादसे में काम के दौरान… तब ऐसे में वह बड़ा फैसला लेती है जो मामूली नहीं है सारी स्थितियां वीपरीत हैं… वो मुसलमान है, मुसलमान वो भी अफगानिस्तान की जहाँ औरतों को शिक्षा रोजगार ख़ुदमुख़्तारी की मज़दूरी करने की आज़ादी नहीं… पर्दे में ही बाहर जाती हैं बहुत ज़रूरी हो तब…ऐसे में फिल्म की टिनेज़र नायिका ‘रहमत’ अपना हुलिया बदलकर बालों को बांधकर लड़के का लिबास पहनकर मज़दूरी करने जाती हैं वहीं जहाँ उसके पिता करते थे.. वहाँ जाकर उसे तसला बोरी ढोने का काम मिलता है जो उसकी उम्र और क़ुव्वत से ज़्यादा है तब वहाँ उसे चाए बनाने और चाए खाना सर्व करने का काम दिया जाता है,चाए खाना सर्व करने का काम फिल्म के सत्रह साल के नायक लतीफ का था …पर अब रद्दोबदल हो गया.. चाए इत्यादि रहमत सर्व करती है तसला बोरी लतीफ ढोते हैं… लतीफ को यह लगता है सब अच्छा चल रहा था …यह मुश्किल काम रहमत के कारण करना पड़ रहा है… नतीजतन वो रहमत पर हमेशा अपना गुस्सा ज़ाहिर करता रहता है, उसकी सर्व की चाए भी फेक देता है.. एक दिन थप्पड़ भी मार देता है…रहमत उससे डरी – डरी सहमी – सहमी रहती है।

 

एक दिन उस बिल्डिंग से जिसमें वह मज़दूरी करते हैं उसके ऊपर से रहमत के ऊपर पानी डाल देता है…जब रहमत अपने उस स्थान पर जहाँ वह चाए तैयार करती है वहाँ पर्दे के अंदर अपने कपड़े बाल सुखाकर कुछ गुनगुनाती है.. गुनगुनाने की आवाज़ लतीफ के कानों में पड़ती है वह नज़दीक जाकर सुनता है देख भी लेता है कि अन्दर तो कोई लड़की अपने बालों को दुरुस्त कर बांध रही है… फिर वह हैरत में पड़ जाता है.. रहमत की हक़ीक़त उसके सामने खुल जाती है… यहाँ से उसका नज़रिया अख़लाक़ सलूक़ रहमत के लिए बिल्कुल बदल जाता है… गुस्सा नर्मी अहसास हमदर्दी मुहब्बत में बदल जाता है धीरे – धीरे…वह देखता है रहमत छत पर जाकर बचे रोटी के टुकड़े कबूतरों को बड़ी मुहब्बत और ख़ुलूस से खिलाती है…उसे यह सब अच्छा लगता है… वो अब उसकी हिफाज़त करने लगता है कोई डांट दे तो उसकी हिमायत करता है उसकी तरफ़ से लड़ता है… एक रोज़ वहाँ छापा पड़ता है जो लोग बिना पहचान पत्र के या आईडी के अवैध तरीक़े से मज़दूरी करते हैं उन्हें पकड़ लिया जाता है… जब रहमत के पिछे छापे वाले भागते हैं तब लतीफ उसे भागकर बचाता है वहाँ से उसे भगा देता है… इसतरह रहमत की मज़दूरी वहाँ से छूट जाती है… अब रहमत लतीफ को याद आती रहती है उसे उसकी फिक्र होने लगती है.. उसके चले जाने पर वह कबूतरों को रोटी के टुकड़े खिलाता है।

 

लतीफ रहमत का ठिकाना ढूंढ लेता है.. वहाँ उसे पत्थरों को उठाते हुए देखता है कैसे वह अपनी क़ुव्वत से ज़्यादा काम करती है गिरती पड़ती है उठती है फिर पत्थर ऊठाती है… लतीफ उसकी मदद के लिए अपने सारे जोड़े हुए पैसे किसी के ज़रिए भेजता है ,पर रहमत के खुद्दार पिता लेते नहीं.. उन्हें अपने पैर कटने का मुआफ़ज़ा भी नहीं मिलता, उसके लिए भी लतीफ ठेकेदार से झगड़ता है..जिसे पैसे दिए थे रहमत के पिता को देने के वास्ते वो शख़्स भी मज़बूरियों का मारा एक ख़त में लिखकर कि “मैं यह पैसा क़र्ज़े के तौर पर ले जा रहा हूँ अफगानिस्तान से वापस आकर लौटा दूंगा”। अब लतीफ की जमापूंजी भी नहीं उसके पास वो कैसे मदद करे..वो अपनी पहचान अपना पहचानपत्र दलालों को बेचकर… मिला पैसा रहमत के पिता को देने जाता है ….ये कहकर देता है कि उनके परिचित नेमार ने भेजा है… रहमत के पिता लतीफ से पैसा लेते हैं और नेमार को ख़ूब दुआएं देते हैं, और बताते हैं कि उनके वतन के लोग मुसीबत में हैं उनके रिश्तेदार भी इसलिए वह कल सुबह यहाँ से अपने वतन लौट रहे हैं। यह ख़बर सुनकर लतीफ के पैरों के नीचे से ज़मीन निकल जाती है.. वह समझ नहीं पा रहा…वहाँ से दौड़ता है हक्का – बक्का होकर सड़क पर जहाँ से होकर रहमत सुबह चली जाएगी शायद हमेशा के लिए… सुबह सादिक़ में जब रहमत के घर के पास गाड़ी लगी है उसमें उनका सामान छोटी बड़ी पोटलियों में रखा जा रहा था, लगभग सारा सामान लद गया था.. आख़ीर में रहमत घर से बाहर निकलती है एक थैला लेकर जिसमें लहसुन की कलियाँ टमाटर प्याज़ खीरे हैं ..थैला उसके हाथ से छूट जाता है सामान गिर जाता है बिखर जाता है… लतीफ उसकी मदद करता है …दोनों एक – एक करके टमाटर प्याज़ लहसुन थैले में रखते हैं.. तब रहमत पहली बार बिना ख़ौफ़ के मुहब्बत से लतीफ को देखती है ..पहली बार मुसकुराती है लतीफ भी उसे देखता है ज़ी भरके देख भी नहीं पाता कि रहमत नकाब से मुँह ढक लेती है.. उठती है गाड़ी की ओर चल देती है.. तभी उसका पैर फिसलता है गीली मिट्टी में और जूता निकल जाता है वह मुड़ती है जूता पहनने के लिए लतीफ अपने हाथों से उसा जूता पहनाता है… रहमत गाड़ी में जाकर बैठती है लतीफ को नकाब की जाली से देखती है गाड़ी जा रही है और चली जाती है …लतीफ भी देखता है.. गाड़ी चले जाने पर वह रहमत के घर की और जिसे छोड़कर वह चली गई उसकी तरफ़ मुड़ता है..तभी उसे रहमत की जूते का धंसा निशान मिट्टी में नज़र आता है.. वह उस जूते के निशान को ग़ौर से देख रहा है.. तभी बारिश शुरू होती है.. वह खड़ा भीग रहा है… वहीं फिल्म ख़त्म हो जाती है।

 

इस फिल्म में कई चींज़ें एकसाथ हैं…. एक प्रेम कहानी है… ऐसी प्रेमकहानी जिसकी बुनयाद बहुत ठोस और मज़बूत है… मुहब्बत की बुनयाद अहसास है हमदर्दी, इंसानियत…इस मुहब्बत की बुनयाद में कहीं भी ख़ुदग़र्ज़ी जिस्मानी ज़रूरत औरतपन मर्दपन नहीं है… इस फिल्म के प्रेमी – प्रेमिका में जिस्मानी मुहब्बत कहीं दूर – दूर तक भी नहीं …ज़रा सा क़तरा भी जिस्मानी मुहब्बत का नहीं… वो छूते भी नहें पूरी फिल्म में एकदूसरे को और एकदूसरे के हो गए… रुहानी मुहब्बत क्या होती है ख़ुदा की मख़लूक़ की मुहब्बत क्या होती है इस फिल्म के केन्द्र में है… जो बाहर की हक़ीक़त की दुनिया में नामात्र को है वो इस फिल्म में दिखाया गया है…. बॉलीवुड की फिल्मों में जबतक प्रेमी प्रेमिका एकदूसरे से लिपट ना जाएं वस्त्रहीन होकर मुहब्बत के अहसास को अभिव्यक्त नहीं कर पाते निर्देशक.. आजकल यही धारण है…बरान फिल्म इस लिपटा लिपटाई से हटकर ..रुहानी मुहब्बत बयान करती है

….मुहब्बत की बुनयाद हमदर्दी है अहसास इंसानियत.. जो अस्ल ज़िन्दगी में है नहीं कहीं थी भी तो अब नहीं… दूसरे नायिका मुसलमान होते हुए भी अफगानिस्तान की होते हुए भी बिल्कुल अलग है… घर की चार दिवारी में बंद नहीं बल्कि बाहर निकल कर मज़दूरी करती है मर्दों के जैसे काम करती है किसी काम को मना नहीं करती हर तरह की मज़दूरी करती है.. ख़ुदमुख़्तार है..मज़दूर वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं नायक – नायिका..नायिका मुसलमानी लिबास में भी आती है फिल्म के आख़िरी हिस्से में.. नकाब भी लगाती है अंत में..उसका किरदार यह बताता है कि औरत के ऊपर बंधन बंदिश घुटन लिबास से ज़्यादा विचारों की मानसिकताओं की धारणाओं की ज़ंज़ीरे ज़्यादा हैं… अगर उन ज़ंज़ीरों को जकड़ताओं को खोल दिया जाए तोड़ दिया जाए तो लिबास कोई भी हो उसका वह कुछ भी कर सकती है… लिबास ज़्यादा रोड़े नहीं अटकाता उसके रास्तों में बल्कि समाज की लोगों की बने हुए विचार मानसिकता ज़्यादा रोड़ा अटकाता है.. बिना वस्त्रों के कम वस्त्रों वाली स्त्री आज़ाद नहीं है कपड़े कम होने से जकड़ताएं बंदिशें घुटन कम होती औरत की तो कबकी ख़त्म हो जाती आज तो आधे से ज़्यादा महिलाएं कम वस्त्रों में हैं आधुनिक वस्त्रों में इन आधुनिक वस्त्रों में उसे उसके हक़ूक मिल गए? फैसले करने का हमसफर शरीकेहयात चुनने का अधिकार मिल गया? अभी भी लाखों महिलाएं आधुनिक लिबास में पुरानी जकड़ताओं हक़तल्फ़ियों ग़ैरबराबरी को घुटन को झेल रही हैं… औरत की जब बात होती है धर्म में समाज में सियासत में सारी बातचीत जद्दोजहद उसके लिबास पर केन्द्रित होकर रह जाती है… लिबास के अंदर औरत है उसके बारे में उसके हक़ उसके वजूद के बारे में बात होनी चाहिये औरत है महत्वपूर्ण…उसका लिबास नहीं… हर मुल्क़ का राज्यों का लिबास अगग है..एकसा नहीं। मर्दों का भी अलग है…मर्द अपने क्षेत्र अपनी भौगोलिक स्थिति ज़रूरत के हिसाब से पहनते हैं… औरत भी पहने औरतों को क्यों एक ही युनीफॉर्म में सिमित करना.. धर्म अपने हिसाब से औरत का लिबास तय करता है, बाज़ार अपने हिसाब से, समाज अपने हिसाब से क्यों ? फिल्म की नायिका अपने वक़त अपनी भौगोलिक स्थिति अपनी ज़रूरत के मुताबिक लिबास पहनती है…वो बोलती नहीं उसकी अभिव्यक्ति इतनी सशक्त है कि चेहरे आँखों से ही सबकुछ कहती है…लिबास के बंधन में नहीं बंधी लिबास का उसपर कोई फर्क नहीं…वो फिल्म के अंत में नकाब की जाली में से ही संवाद करती अपनी अभिव्यक्ति व्यक्त करती जा रही है।औरत की बनी बनाई धारणाओं को फिल्म की नायिका तोड़ रही है.. वो चार दिवरी की क़ैद अफगानिस्तान की औरत नहीं वो ख़ुदमुख़्तार संघर्शील महनती कर्मशील मज़दूर है अंत में प्रेमिका भी …

 

फिल्म का अंत होता है बारिश से ….फिल्म का नाम है ‘बारां’ बारां शब्द का अर्थ है बारिश… नायिका का नाम है रहमत …..बारिश का शाब्दिक अर्थ मूल अर्थ वर्षा है मीह पर बारिश को दूसरे अर्थों में भी देखा जाता है जैसे बारिश रहमत है ….जब बारिश होती है तो बंदे को उससे सकून मिलती है राहत ठंडक तो बंदा हाथ उठाकर भीगता हुआ अंदर ही अदर कह उठता है या ख़ुदा या रब तेरी रहमत तेरी नियामत बरस रही है…. फिल्म की नायिका जिस्मानी तौर पर जा रही है …पर रुहानी तौर पर आ रही है आ चुकी है…उसके जूते के निशान को दर्शक ग़ौर से देंखे जूते का निशान जाने की ओर नहीं आने की ओर है… लतीफ के वजूद में उसकी रुह में रहमत आई थी आ रही है.. …और बारिश की शक्ल में लतीफ के ऊपर रहमत बरस रही है…अद्भुत प्रेम कहानी प्रेम का मुहब्बत का आला मुक़ाम क्या है फिल्म में रहमत लतीफ अपने किरदार से बताते हैं.. उनकी मुहब्बत उनसे शुरू उनपर ख़त्म नहीं… वो ख़ुदा की मख़लूक़ से भी मुहब्बत करते हैं.. कबूतरों को रोटी खिलाकर अपनी मुहब्बत का इज़हार करते हैं।इस फिल्म के प्रेमी ज़बान संवाद के जिस्म के मोहताज़ नहीं..इंसान की असली खासियत को पेश करते हैं…. मुहब्बत हमदर्दी संवेदना कर्म ही इंसान की खासियत है और होनी चाहिए।

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महज़बीं

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