कला साहित्य एवं संस्कृति

फिल्मकार महबूब खान की पुण्यतिथि : फिल्म ‘मदर इंडिया

प्रस्तुति : द्वारका प्रसाद अग्रवाल

हिन्दी सिने-जगत ने विगत सौ वर्षों में अनेक प्रतिभाएँ दी, उन प्रतिभाओं को अनेक मौके मिले भी लेकिन अविस्मरणीय रचना तो संयोग से बनती है। ऐसी ही एक कृति थी- ‘मदर इंडिया।’
महबूब खान ने सन 1940 में फिल्म ‘औरत’ बनाई थी जो उस समय विशेष चर्चित नहीं हुई। उनके दिमाग में ‘औरत’ का ‘रीमेक’ बनाने का विचार आया। संगी-साथियों ने समझाया, बहुत मना किया लेकिन महबूब खान पर तो जैसे धुन सवार हो गई थी।

फ़िल्म का शीर्षक अमरीकी लेखिका कैथरीन मायो द्वारा 1927 में लिखित पुस्तक मदर इण्डिया से लिया गया जिसमे उन्होंने भारतीय समाज, धर्म और संस्कृति पर हमला किया था। पुस्तक में भारतीय स्वतंत्रता की मांग के विरोध में मायो ने भारतीय महिलाओं की दुर्दशा, अछूतों के प्रति भेद-भाव, जानवरों, धूल-मिट्टी और राजनेताओं पर हमला किया था। मायो ने पूरे भारत में गुस्से का माहौल उत्पन्न कर दिया और विरोधस्वरूप उनकी पुस्तकों को जलाया गया।

महबूब खान को इस फ़िल्म के शीर्षक का ख्याल सन 1952 में आया। महबूब खान ने बताया- “हमारी फ़िल्म ‘मदर इंडिया’ और मायो की ‘मदर इण्डिया’ को लेकर काफ़ी असमंजस की स्थिति पैदा हो गई थी। दोनों ही वस्तुएँ बेहद अलग और एक दूसरे के विपरीत हैं। हमने जानबूझ कर फ़िल्म को ‘मदर इण्डिया’ कहा ताकि हम पुस्तक को चुनौती दे सकें और लोगों के दिमाग में से मायो की बकवास को बाहर निकल सकें।”

फ़िल्म की कहानी इस तरह लिखी गई जिससे भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति, पुरुषों के बढ़ते आकर्षण का विरोध और स्त्री के अपने स्वाभिमान पर दृढ़ निश्चय को दर्शाया गया। महबूब खान को इस कहानी की प्रेरणा अमरीकी लेखक पर्ल एस. बक की द गुड अर्थ (1931) व द मदर (1934) पुस्तकों से मिली जिन्हें सिडनी फ्रेंकलिन ने 1937 और 1940 में फ़िल्मों के रूप में रुपंतारित किया था। महबूब खान ने इन सब चीज़ों का अपनी 1940 में बनी फ़िल्म ‘औरत ‘में प्रयोग किया था जो ‘मदर इण्डिया ‘(1957) की असली प्रेरणा बनी।

महबूब खान ने ‘लीड रोल’ के लिए नर्गिस को चुना, उस नर्गिस को जो जनमानस में अपनी रोमांटिक भूमिकाओं के लिए लोकप्रिय थी। नायिका राधा के पुत्र के रूप में उनकी पसंद दिलीप कुमार थे लेकिन वे नर्गिस के बेटे के रूप में अभिनय करने के लिए राज़ी नहीं हुए तब सुनील दत्त को उसका अवसर मिला। नायिका के पति की भूमिका में राजकुमार लिए गए। गीत शकील बदायूनी ने लिखे और अमर संगीत दिया नौशाद ने। महबूब खान, नौशाद और शकील का पिछली आठ फिल्मों का साथ था इसलिए उनमें आपसी समझ अच्छी थी जिसका परिणाम हुआ, ‘मदर इंडिया’ का अनुपम गीत-संगीत. फिल्म में 12 गीत पिरोये गए थे, सब एक से बढ़कर एक. नौशाद ने फिल्म में पार्श्वसंगीत के लिए वेस्टर्न क्लासिक और हालीवुड स्टाइल म्यूजिक का भरपूर उपयोग किया ताकि कथा के वातावरण को उभारा जा सके.

फिल्म की अधिकांश शूटिंग गुजरात और महाराष्ट्र के गाँवों में हुई, मुंबई के महबूब स्टूडियो में भी हुई. फिल्म की शूटिंग शुरू होने के पहले सन 1955 में उत्तरप्रदेश में भीषण बाढ़ आई. फोटोग्राफर फर्दून ईरानी ने वहां जाकर शाट ले लिए जिसका उपयोग फिल्म की बाढ़ के दृश्य में किया गया. बाढ़ की विभीषिका से त्रस्त ग्रामवासियों के पलायन के दृश्य के लिए गुजरात के उमरा गाँव में की गयी. इसके लिए वहां के कृषकों ने अपनी 500 एकड़ जमीन, 300 बैल गाड़ियाँ और हल इत्यादि निःशुल्क दिये. समूह नृत्य में भी स्थानीय नर्तकों ने अपनी भागीदारी दी, प्रोफेशनल डांसर को नहीं बुलाना पड़ा.

इसी उमरा गाँव में 1 मार्च 1957 को आग लगने के एक दृश्य का फिल्मांकन करते समय नर्गिस आग की लपटों में घिर गयी थी और सुनील दत्त ने उन्हें बचाया था. दोनों बहुत जख्मी हुए थे, उन्हें मुंबई वापस भेजा गया जहाँ सुनील दत्त और नर्गिस के मध्य प्यार पनपा और दोनों विवाह के लिए उद्यत हो गए लेकिन महबूब खान ने उन्हें समझा-बुझा कर रोका क्योंकि उनके विवाह का फिल्म पर दुष्प्रभाव पड़ सकता था. दोनों ने प्रतीक्षा की और 11 मार्च 1958 को विवाह किया. उनका विवाह उन दिनों की बहुचर्चित घटना थी क्योंकि नर्गिस बेहद प्रसिद्ध थी और सुनील दत्त कम.

इसे 25 अक्तूबर 1957 को रिलीज़ किया गया लेकिन दो दिन पूर्व इसका विशेष प्रदर्शन राष्ट्रपति भवन में हुआ जहाँ तात्कालीन राष्ट्रपति डा.राजेंद्र प्रसाद और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने इसे देखा और मुक्तकंठ से प्रशंसा की. इसे विश्व की अनेक भाषाओं में डब करके प्रदर्शित किया गया, ब्रिटेन को छोड़कर यह फिल्म हर देश में सफल रही. ‘विश्व की वे 100 फिल्म, “जिन्हें मरने से पहले अवश्य देखना चाहिए” की सूची में ‘मदर इण्डिया’ का भी नाम है. पटकथा-संवाद लेखक जावेद अख्तर की मान्यता है- ‘सभी हिंदी फिल्म ‘मदर इण्डिया’ से निकल कर आती है.’

फ़िल्म ‘मदर इन्डिया’ में भारतीय ग्रामीण जीवन के वैविध्य भरे कथानक को पिरोया गया था। उसमें सपने भी थे और जिजीविषा का संघर्ष भी। लहलहाती फ़स्लों का संतोष था और बाढ़ से उजड़ गए सपने भी। स्त्री की लज्जा एवं सम्मान का संकट था और भूखे बच्चे का पेट भरने की विवशता भी। मेहबूब खान ने इन्सानी ज़ज़्बात और उसकी मजबूरियों को इस तरह उकेरा था कि फ़िल्म देखने वाले का दिल दहल जाए। स्वप्न और संकट का अनवरत संघर्ष मनुष्य के जीवन की वह विशेषता है जो सपनों को सच करने चाहत और उसे संकट से लड़ने की ताकत देते रहती है। यदि निराश करती है तो फ़िर से नए सपने दिखाकर पुनः आशा का संचार करती है और इसी तरह जीवनचक्र चलते रहता है। फ़िल्म ने दो विकल्प दिए- एक, नायक का घर-परिवार से पलायन कर जाना और दूसरा, नायिका का अत्यन्त विपरीत परिस्थितियों से संघर्ष करना. फिल्म में नायक को नहीं, नायिका को आदर्श के रूप में स्थापित किया गया जिसने बिगड़े हालात से जम कर लोहा लिया.

नर्गिस ने अनेक फिल्में की थी, उनके अभिनय का असर हर सिने-प्रेमी पर था लेकिन ‘मदर इंडिया’ में वे नर्गिस न रही, राधा बन गई। कलाकार विलुप्त हो गया और कला उजागर हो गई। फिल्म ‘मदर इण्डिया’ एक यादगार और क्लासिक फिल्म बन गयी और साथ में महबूब खान भी।

सूचना सहयोग: विकिपीडिया

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